मंगलवार, 30 जून 2026
सोमवार, 29 जून 2026
गुरुवार, 4 दिसंबर 2025
शनिवार, 25 नवंबर 2023
विज्ञान पर नित नए हमले करती दक्षिणपंथी ताकतें
-दीपक
बीते 13 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने महान वैज्ञानिकों डार्विन और आइंस्टीन के सिद्धांतो के खिलाफ लगाई गई एक जनहित याचिका को रद्द कर दिया। यह याचिका राजकुमार नाम के एक दक्षिणपंथी व्यक्ति द्वारा लगाई गई थी।याचिका में राजकुमार द्वारा कहा गया था कि उसने अपने स्कूल और कॉलेज में डार्विन के ‘जैव विकास’ और आइंस्टीन के म्=उब2 के सिद्धांत को पढ़ा था। लेकिन उसने पाया कि ये सिद्धांत गलत हैं। इसलिए इन सिद्धांतों को संस्थानों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए। इसी को रोकने के लिए ही उसके द्वारा जनहित याचिका लगाई गई थी।
सोमवार, 24 अप्रैल 2023
संघ-भाजपा से जुड़े लोगों को फर्जी तरीके से दी नौकरी
मध्यप्रदेश में राज्य के जिला और ब्लॉक समन्वयक के 89 उम्मीदवारों के लिए 10,000 आवेदकों में से 890 को सूचीबद्ध किया गया। 4 फरवरी 2022 को यह सूची जारी की गयी। सूचीबद्ध आवेदक कौशिक उइके ने बताया 8 फरवरी को फोन पर राज्य उद्यम विकास केन्द्र के जरिये फोन पर इंटरव्यू रद्द करने की सूचना दी गयी। कौशिक ने विगत एक साल से लगातार फोन, ई-मेल कर उद्यम विकास केन्द्र में इंटरव्यू के बारे में पूछा तो उन्हें जल्द ही इंटरव्यू होने का आश्वासन मिलता रहा। मार्च 2023 में कौशिक को पता चला कि 89 लोगों को पहले ही काम पर रखा जा चुका है।
परीक्षा और नकल विरोधी कानून
उत्तर प्रदेश में हाईस्कूल तथा इण्टरमीडिएट की बोर्ड परीक्षाएं 16 फरवरी से प्रारंभ होकर 4 मार्च को सम्पन्न हुई। बोर्ड परीक्षा प्रारंभ होने से पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार ने एक आदेश जारी करते हुए कहा कि बोर्ड परीक्षाओं में नकल में शामिल पाये जाने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कारवाई की जाएगी। यही नहीं परीक्षा में बाधा डालने वालों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कारवाई होगी, उनकी सम्पत्ति भी कुर्क की जायेगी। और तीन महीने तक बगैर आरोप पत्र के जेल में डाल दिया जायेगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने पहले ही 1992 में ‘नकल अध्यादेश’ लाकर नकल करने और कराने को अपराध घोषित कर दिया था।
उत्तर प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पद
उत्तर प्रदेश के प्राइमरी और जूनियर में शिक्षकों के 51,442 पद खाली पड़े हैं और माध्यमिक शिक्षा विभाग में प्रवक्ता तथा सहायक अध्यापक और संस्था प्रधान के मिलाकर 33,000 पद खाली हैं।विधानसभा में एक प्रश्न के जवाब में बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने कहा कि बेसिक शिक्षा विभाग में भर्ती के लिए कोई योजना विचाराधीन नहीं है।
कलाक्षेत्र कॉलेज में लैंगिक उत्पीड़न पर छात्राओं को चुप कराने की कोशिश
चेन्नई स्थित कलाक्षेत्र फाउंडेशन देश के प्रमुख सांस्कृतिक संस्थानों में है। यहां भरतनाट्यम, कथकली जैसे नृत्यों के अलावा गीत-संगीत की शिक्षा दी जाती है। 1936 मंे स्थापित इस संस्थान को 1993 से राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में मान्यता दी गयी।
बेखौफ आजादी के लिए दिल्ली वि.वि. की छात्राओं का प्रदर्शन
दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज ऑफ वुमेन में 28 मार्च को एक फेस्ट आयोजित हुआ। फेस्ट के दौरान बाहर से कुछ अराजक लड़के जबरन संस्थान के अंदर घुस गये। छात्राओं के साथ छेड़छाड़ की। छात्राओं ने इसका विरोध किया और फेस्ट के दौरान अफरा-तफरी हुई। इंद्रप्रस्थ कॉलेज से पहले भी दिल्ली वि.वि. के मिरांडा और गार्गी कॉलेज में छात्राओं से छेड़छाड़ की घटनाएं हो चुकी हैं। ऐसे में कॉलेज में आयोजित फेस्ट में सुरक्षा के उचित इंतजाम न होना, घोर लापरवाही है।
बच्चों का अकाल पूंजीवादी निजाम में प्राइमरी शिक्षा
- मदन पाण्डे
शिक्षा का ‘जवाहर नवोदय विद्यालय’ मॉडल अपनी जगह रुका नहीं रहा। उसी तर्ज पर कुछ राज्यों ने अपने यहाँ ‘राजीव नवोदय विद्यालय’ शुरू किये। इसके लिए भी टेस्ट सिस्टम बनाया गया; यानी क्रीम बच्चों को अपनाना। लेकिन राज्य सरकारों के पास इतना पैसा कहाँ है? अतः बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के टाईम टेबल पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने के बावजूद इनके पास खर्च का टोटा रहता ही है। इधर इसी नकल पर देश के अनेक राज्यों ने आदर्श विद्यालय शुरू कर दिये हैं। यानी दस बच्चों से कम वाले प्राइमरी विद्यालय बंद कर दिए गए और आस-पास के अनेक विद्यालयों को मिलाकर एक केन्द्रीय आदर्श विद्यालय चलाया जाने लगा। इसमें आस-पास के विद्यालयों के बच्चों से भर्ती होने की अपेक्षा की गई। इस प्रकार आदर्श विद्यालयों में तो बच्चों की संख्या बढ़नी ही थी। लेकिन कम बच्चों वाले अनेक विद्यालय बंद हो गए। केन्द्रीय विद्यालयों में अध्यापकों का चुनाव सावधानी से किया गया है। संसाधन-भवन और शिक्षक भी यहाँ मानक के अनुसार हैं। समय सारणी पर भी मेहनत की गई है। लेकिन इससे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा उनके घर-परिवेश में रहते हुए देने का मामला खटाई में पड़ गया। जो स्कूल बंद हुए उनके भवनों के निर्माण और मरम्मत आदि पर आया अब तक का खर्च बेकार ही गया। उनके सभी शिक्षक तो आदर्श विद्यालय में लिए नहीं जा सकते थे उन्हें अन्य विद्यालयों में समायोजित कर दिया गया। खाली स्कूल भवनों का क्या होगा इसका कुछ पता नहीं।
रविवार, 23 अप्रैल 2023
भारत में खुलेंगे विदेशी विश्वविद्यालय!
पिछले दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को खोलने के लिए नियमों का एक मसौदा जारी किया है। इस मसौदे को सार्वजनिक कर 18 जनवरी 2023 तक सुझाव मांगे गए हैं। इसके बाद यूजीसी इन नियमों को अपनी तरफ से अंतिम रूप देकर जारी करेगी।
‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ (नेप) में सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में खोले जाने का संकेत किया था, उसी दिशा में अब यूजीसी ने ये मसौदा जारी किया है। इसे जारी करते हुए यूजीसी अध्यक्ष एम.जगदीश कुमार ने बयान देकर कहा कि ‘‘नेप के तहत विश्व स्तरीय और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने हेतु यह कदम उठाया जा रहा है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि जारी शैक्षिक सत्र में तकरीबन साढ़े चार लाख छात्र उच्च शिक्षा लेने हेतु दुनिया भर के देशों में गए। इनकी पढ़ाई पर अनुमानित 28 से 30 अरब डाॅलर (लगभग 2100 अरब रुपये) खर्च हो जाता है।
बुधवार, 23 नवंबर 2022
पूंजीवादी निजाम में प्राइमरी शिक्षा-1
मदन पाण्डे
दुनिया के कुछ अतिविकसित देशों को छोड़ दे तो बाकि पूंजीवादी देशों में सरकारी प्राइमरी-जूनियर स्कूलों और शिक्षा का हाल लगभग एक जैसा है। सो भारत मंे भी है। यहां भी दोहरी शिक्षा नीति जो आजादी से पहले थी, उसके बाद भी जारी है। एक ओर जहां बड़े-बड़े संत-महात्माओं के, राजाओं वगैरह के नाम पर बने अंग्रेजी माध्यम स्कूल हैं, जहां मोटी फीस भर सकने वालों के बच्चे पढ़ते हैं और देश का शासक वर्ग तैयार किया जाता है। सो दूसरी ओर साधारण सरकारी प्राइमरी स्कूल हैं, जिनमें निम्न मध्यम वर्ग और गरीब गुरबा के बच्चे पढ़ते हैं और देश का शासित वर्ग तैयार होता है। इस लेख मेें देश के सरकारी प्राइमरी स्कूलों (कक्षा 1-8) के बारे में कुछ जानाकारियां हैं-उनकी भौतिक दशाओं के बारे में, उनके शैक्षणिक हालात के बारे में अगली किश्तांे में।
इलाहाबाद वि.वि. छात्रा आंदोलन
अमन
बीते लगभग दो दशकों से भारत निजी शिक्षण संस्थानों के बहुत तेज उभार को देख रहा है। तमाम सरकारें निजी संस्थानों के फायदे के लिए नीतियां बनाती रहीं और इस कारण सार्वजनिक शिक्षा के लगभग सभी सरकारी संस्थान या तो पूरी तरह से बर्बाद हो गए या बर्बादी के कगार पर पहुंच गए। खास तौर पर बीते 8 सालों में जब से नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आयी है, देश लगातार सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों पर हमले देख रहा है। ऐसे संस्थानों को मिलने वाले सरकारी अनुदान में भारी कटौती की गई है, जिसके कारण बार-बार फीस वृद्धि हो रही है। बीते वर्षों में देश के लगभग सभी सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों की फीस बढ़ाई गयी है और ये प्रक्रिया लगातार जारी है।
गुरुवार, 10 नवंबर 2022
छात्रों-शिक्षकों पर बढ़ रहे हमले!
-महेन्द्र
मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को 2020 में पास किया गया। यह नीति संसद में बिना चर्चा किए पास कर दी गई। इस नीति का छात्र व शिक्षक जगत से कोई विरोध न हो सके, इसके लिए मोदी सरकार ने वह समय चुना जब देश में कठोर लॉकडाउन लागू था। यह लॉकडाउन मोदी सरकार ने ही लागू किया था। इस लॉकडाउन के जरिये ‘आपदा में अवसर’ खोजते मोदी सरकार ने श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव, कृषि कानूनों में किसान विरोधी बदलाव तथा शिक्षा नीति में छात्र-शिक्षक विरोधी बदलाव कर डाले।
एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव
लोकतंत्र, भाईचारा, सामाजिक आंदोलन नहीं सिर्फ हिन्दू राष्ट्र है शिक्षा के नये मूल्य -पृथ्वी
एक शिक्षा समागम में प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (छम्च्द्ध शिक्षा को नई दिशा देगी। ऐसी ही कई आकर्षक बातें हम कई समागमों और सम्मेलनों में सुनते रहें हैं। शिक्षा की यह नई दिशा क्या है? जिसके बारे में इतना प्रचार हो रहा है। सरकार द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत शिक्षा में व्यापक बदलाव का मसौदा रखा गया था। जिसके तहत आने वाले वर्षों में शिक्षा के उद्देश्यों, कार्यप्रणालियों, स्वरूप, पाठ्यक्रमों आदि में भारी बदलाव किये जाने हैं। ढेरों बदलाव किए जा चुके हैं और ढेरों बदलाव आगे किये जाने हैं।
बुधवार, 9 नवंबर 2022
यूजीसी द्वारा 4 वर्षीय स्नातक प्रोग्राम का मसौदा जारी
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (नेप) को पास करने के बाद अब इसे जल्दबाजी में लागू करने के प्रयास जोरों पर हैं। इस नेप में शिक्षा का निजीकरण करने, शिक्षा का भगवाकरण करने तथा कारपोरेट पूंजीपति वर्ग की आज की जरूरतों को पूरा करने के लिए शिक्षा में व्यापक बदलाव करने की योजना ली गई है। संघ-भाजपा के चहेते और जेएनयू के पूर्व कुलपति प्रो. एम. जगदीश कुमार को शायद नेप को जल्द से जल्द लागू करने के लिए ही यूजीसी का अध्यक्ष बनाया गया है। एम.जगदीश कुमार ने पद संभालते ही वे काम करने शुरू कर दिये जो कि संघ-भाजपा शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से चाहते रहे हैं। शिक्षा का भगवाकरण करना और स्वास्थ्य, सार्वजनिक संस्थाओं की तरह शिक्षा का भी निजीकरण करना संघ-भाजपा के एजेण्डे में रहा है। एम. जगदीश कुमार ने जेएनयू का कुलपति रहते हुए संघ-भाजपा के एजेण्डे को लागू करवाने में अपनी पूरी निष्ठा और लगन का परिचय दिया था। इसी निष्ठा और लगन का इनाम उन्हें यूजीसी का अध्यक्ष बनाये जाने के तौर पर मिला है।
सीयूईटी, यूजीसी और शिक्षा
शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव करते हुए यूजीसी इस साल से एक नया कानून लागू कर रहा है जिसके अंतर्गत 12 वीं की परीक्षा पास करने के बाद जो भी छात्र अंडर ग्रेजुएट कोर्सों में दाखिला लेना चाहते हैं उन्हें अब कम्प्यूटर पर आधारित एक टेस्ट पास करना होगा। जिसे सीयूईटी (सेंट्रल यूनिवर्सिटीज एंट्रेंस टेस्ट) नाम दिया गया है। अंडर ग्रेजुएट कोर्सों में दाखिला पाने के लिए इस टेस्ट को पास करना अनिवार्य होगा। इसी के आधार पर देश में मौजूदा 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिले दिए जाएंगे।
बुधवार, 2 सितंबर 2020
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
नई शिक्षा नीति (जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति का नाम दिया गया है।) 2020(नेप) को शिक्षा मंत्रालय और केन्द्र सरकार ने जारी कर दिया है। नई शिक्षा नीति में शिक्षा में व्यापक बदलाव करने की बात की गई है। केन्द्र की भाजपा सरकार ने कस्तूरीरंगन समिति द्वारा प्रस्तुत मसौदे को लगभग स्वीकार कर लिया है। यद्यपि नहीं मानने का भी काम किया गया है जैसे मिड डे मील को कक्षा 12 तक विस्तारित करने के सुझाव को नहीं स्वीकारा गया है। मसौदे में प्रस्तावित सुझावों को अपनी जरूरत के अनुसार शिक्षा के रंग को और भगवा करने की जिद संघी सरकार की इस शिक्षा नीति में साफ तौर पर देखी जा सकती है। गौर करने योग्य बात यह है कि नेप निरंतर मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की आलोचना करते हुए आगे बढ़ती है(आलोचना का यह स्वर कस्तूरीरंगन समिति के मसौदे में अधिक है)। कमियों-खामियों, भ्रष्टाचार, अफसरशाही के दुष्परिणामों पर चोट करते हुए दिखती है। और यह सब करने के बाद इन कमियां-खामियों को दूर करने के लिए अपने सुझावों को रखती है। अपनी गैर जनवादी कार्य करने की पद्धति का परिचय देते हुए मोदी सरकार ने नेप को संसद में बिना बहस के पास कर दिया।
लॉकडाउन और ऑनलाईन शिक्षा : एक साथ दो-दो हमले
लॉकडाउन में ऑनलाइन शिक्षा का काफी शोर सुनायी दे रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने दावा किया कि जब तक बच्चे लॉकडाउन के कारण स्कूल नहीं पहुंच रहे हैं तब तक ऑनलाइन कक्षा के जरिये उनके स्कूल घर तक पहुंचाए गए हैं। लॉकडाउन के लागू होने के बाद शीघ्र ही सीबीएसई ने 25 मार्च को ही बच्चों की पढ़ाई की चिंता जताते हुए किसी भी कीमत पर बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न होने देने की चिंता जाहिर की। और इस चिंता को जताने के लिए देश के स्कूलों के लिए गाइडलाइन जारी करते हुए उन्हें फरमान सुनाया कि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो इसलिए सारे स्कूल ऑनलाइन पढ़ाई शुरू करें। ऐसा न करने पर उन्हें धमकी देते हुए कहा गया कि उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है। सीबीएसई के अलावा कई राज्यां के शिक्षा बोर्डों ने भी ऐसा ही कुछ किया। इसके अतिरिक्त शिक्षण संस्थानों ने, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने और निजी शिक्षण संस्थानों के संचालकों ने इस नये प्रयोग का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। इस गर्मजोशी के उत्साह में इन संस्थानों ने व इनके संचालकों ने एक के बाद एक आदेश जारी किये मानो वे कोई नयी और बेहद ही महत्वपूर्ण चीज को पेश कर रहे हों। ऑनलाइन शिक्षा के पक्ष में तर्कों की बाढ़ सी आ गयी। और कोरोना महामारी के इस संकटकाल में ऑनलाइन शिक्षा को एक रामबाण के रूप में पेश करने से ये संस्थान जरा भी नहीं चूके। ऑनलाइन शिक्षा के पक्ष में इनके ये तर्क ऐसे मालूम पड़ रहे थे जैसे भारतीय शिक्षा में कोई आमूलचूल बदलाव हो रहा हो। इन सभी के द्वारा शुरू में ऐसा आभास कराया गया कि ये सब भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में कोई क्रांति करने पर आमादा हैं। कि मोटे बस्तों और स्कूलों की कक्षाओं की पढ़ाई के दिन अब लद चुके हैं। कि अब एक नये युग का सूत्रपात हो चुका है। कुल जमा शासक वर्ग मौजूदा समस्याओं के समाधान को इस रूप में पेश करता है।