मंगलवार, 30 जून 2026

हमारा कहना है

मोदी जी ! अमेरिका के आगे झुकने की कोई हद

    नरेन्द्र मोदी अक्सर 56 इंच के सीने के जुमले से भी पहचाने जाते हैं। अपने सीने की यह नाप उन्होंने खुद ही सार्वजनिक तौर पर बतायी। ‘56 इंच सीना’ आत्मसम्मान, साहस, बहादुरी का प्रतीक बन गया। लेकिन अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उनके सरगना डोनाल्ड ट्रंप के आगे यह सीना खासतौर पर पिचक जाता है। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया में भारत-चीन को ‘‘नरक’’ बताने वाली टिप्पणी शेयर की। मोदी मौन रहे। विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया में टिप्पणी को अनुचित माना पर साथ ही जोड़ दिया कि ‘‘ये भारत-अमेरिका के संबंधों की वास्तविकता को प्रतिबिंबित नहीं करती है।’’
समाज
नफरती माहौल के बीच उम्मीद जगाती किरणें
- महेश

    देश में संघ-भाजपा और इनके संगठनों, समर्थकों ने अपनी नफरत की फासीवादी-सांप्रदायिक राजनीति को लगातार आगे बढ़ाया हुआ है। हिन्दू धर्म के नाम पर फैलाई जा रही यह नफरत (इनको धर्म से कोई मतलब नहीं है) समाज को बांट रही है। इसमें मुस्लिमों, ईसाइयों, महिलाओं, बच्चों और प्रगतिशील लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। इसके खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में उम्मीद की किरणें भी दिखाई दे रही है।
विरासत
एडलवाइस पाइरेट्स: नाजी षासन से टकराये दुर्लभ साहसी युवा
- चन्दन

    जर्मनी मंे हिटलर ने फासीवादी नाजी शासन कायम किया। इस शासन में मेहनतकश जनता के राजनीतिक अधिकार छीन लिये गये। साथ ही उद्योगों में शोषण भी बढ़ा दिया। मजदूर वर्ग के युवाओं ने नाजी शासन का ‘एडलवाइस पाइरेट्स’ ग्रुप बनाकर प्रतिरोध किया। जर्मनी के पश्चिमी क्षेत्र औद्योगिक रूप से आगे बढ़े हुए थे। एडलवाइस पाइरेट्स अलग-अलग शहरों में अलग नाम से होते थे। ये विविध समूह व्यापक रूप से फैले हुए थे लेकिन परस्पर संगठित नहीं थे। कोलोन में ‘नवाजोस’, डसेलडोर्फ में ‘किटेल बैक पाइरेट्स’, एसेल में ‘रोविंग ड्यूड्स’ के नाम से जाने जाते थे। लेकिन अब इन सभी को ‘एडलवाइस पाइरेट्स’ के तौर पर ही याद किया जाता है।
मजदूर आंदोलन
मजदूर सड़कों पर
यह न होता तो क्या होता ?
- मदन
    2 अप्रैल को होण्डा मोटर्स मानेसर हरियाणा में ठेका मजदूर वेतन वृद्धि की मांग को लेकर सड़क पर उतरे। पुलिस प्रशासन दमन के सहारे इसे रोकने की कोशिश कर रहा था। देखते ही देखते मजदूरों के वेतन वृद्धि के संघर्ष मानेसर की अन्य फैक्टरियों के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी फैल गये। हरियाणा से होते हुए उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, राजस्थान के औद्योगिक केन्द्रों तक फैल गया। जहां-जहां मजदूर आंदोलन पहुंचा वहां-वहां पुलिस दमन, मजदूरों, मजदूर संगठनों के कार्यकर्ताओं-नेताओं को जेलों में डाला गया। मजदूरों के ये सभी संघर्ष स्वतः स्फूर्त थे।
साहित्य
‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’: मानव मुक्ति का महान गान
- रजनीश
    वास्तविकता (रियल्टी) और कल्पना (फैंटसी) दो सगी बहनें हैं। इन दो सगी बहनों का जीवंत संबंध मनुष्यों से है। खासकर मनुष्य के मस्तिष्क से, उसकी चेतना से है। पहली बहन (वास्तविकता के ज्ञान) को हम विज्ञान के रूप में भी जानते हैं तो दूसरी बहन कला है। और कला ने जितने रूप धरे हैं उनमें से एक रूप पौराणिक कथाएं भी हैं। कुछ लोग पौराणिक कथाओं को अपनी मिथ्या चेतना के कारण इतिहास या सच्चाई समझ बैठते हैं। और जब ये लोग किसी प्रतिक्रियावादी राजनैतिक समूह या वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं तो यह घोषणा कर देते हैं कि यही सच्चा इतिहास है। और यह उनकी आस्था का प्रश्न है। खैर! ऐसे कूढ़मगजों पर क्या बात की जाए।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति
मानव सभ्यता के दुष्मन ट्रंप और नेतन्याहू का भविष्य
- अंजनि

जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त की एक कविता का हिंदी भाव यह है,
जनरल साहब,
यह जो तुम्हारा टैंक है न, गजब की चीज है,
यह एक साथ लोगों को रौंद सकता है
यह लोगों को मार सकता है,
लेकिन इसमें एक कमी है यह खुद नहीं चलता।

जनरल साहब,
यह जो तुम्हारा बमवर्षक विमान है,
यह बरस सकता है
यह बम बरसाकर लोगों को भून सका है
लेकिन इसमें एक कमी है, यह खुद नहीं बरसता ।

जनरल साहब,
यह जो इंसान है,
यह गजब की चीज है,
यह टैंक चला सकता है,
यह बमवर्षक विमान उड़ा सकता है,
लेकिन इसमें एक कमी है, कि यह सोच सकता है।

    इस कविता में ब्रेख्त ने बताया है कि इंसान सोचकर सही और गलत में भेद करके जब सही का पक्ष लेता है तो वह अन्यायी जनरल के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। यह कविता फासिस्ट शासन के विरुद्ध लिखी गयी थी।
इस कविता के भावों को यदि आज हम अमरीकी और इजरायली सेनाओं द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध और उनके विरुद्ध ईरानी सेना व जनता के जवाबी प्रहारों से समझने का प्रयास करें तो यह स्पष्टतया समझ में आ जाता है कि युद्ध का फैसला एक या दो किस्म के नये आधुनिक हथियार नहीं करते बल्कि करोड़ों-करोड़ सचेत व संगठित लोग करते हैं।
विज्ञान

एपिजेनेटिक्स: आंतरिक और वाह्य की अंतर क्रिया

- गुरुप्रीत

    लंदन से प्रकाशित होने वाली विज्ञान की लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ ने एपिजेनेटिक्स को इस शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत घोषित किया है। उसके अनुसार एपिजेनेटिक्स से ही यह स्पष्ट हो पाता है कि जीन की अपेक्षाकृत सरल संरचना से जटिल जीवन का निर्माण कैसे होता है।
बालेन्द्र शाह: नया चेहरा नयी लफ्फाजियां

- कमल

    सितंबर 2025 में जेन-जी आंदोलन ने नेपाल को हिलाकर रख दिया दिया था। जेन-जी का यह आंदोलन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, भ्रष्टाचार, वंशवाद, युवाओं की बेरोजगारी के खिलाफ था, जैन-जी ने पुरानी सत्ता को चुनौती दी। अन्याय, भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुके नेताआंे और बिलिं्डगों को युवाओं ने अपने आक्रोश का निशाना बनाया। 76 युवा भी इस आंदोलन में मारे गये। जेन-जी का यह आंदोलन भविष्य की आशा, बेहतर जीवन की उम्मीद के लिये किया गया था।
शिक्षा जगत
स्कूलों के लिए नहीं है बजट
- राजेन्द्र


    नई शिक्षा नीति 2020 लागू होने के बाद से लगातार प्राथमिक विद्यालयों को कम करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाए जा रहे हैं। चाहे फिर क्लस्टर योजना हो या फिर शिक्षा स्वयं सेवकों की तैनाती का मामला। अब सरकार उत्तराखंड में रेगुलर शिक्षक के स्थान पर शिक्षा सेवकों की तैनाती शुरू कर चुकी है।
समसामयिक

ट्रांसजेंडर व्यक्ति संसोधन बिल और ट्रांसजेंडर समुदाय

- ऋृचा

    मार्च 2026 को भारतीय संसद में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन का एक बिल पास हुआ। इस बिल के पास होने के बाद से ही पूरे देश के ट्रांसजेंडर समुदाय में एक रोष की लहर दौड़ गई। जगह-जगह बिल के खिलाफ प्रदर्शन हुए किंतु भाजपा सरकार ने इन सारे प्रदर्शनों और असहमति को एक किनारे लगाकर कुछ ही दिन बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करवा कानून बना दिया। इस बिल के पास होने के साथ ही पूरे देश में ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर एक बहस चल पड़ी है। तीसरे जेंडर के रूप में देखे जाने वाले इस समुदाय के लिए कौन ट्रांसजेंडर है, कौन नहीं इत्यादि विषयों पर एक लंबी चर्चा चली।
छात्र जगत

दिल्ली विष्वविद्यालय का अनुमति नोटिस: असहमति का गला घोंटती तानाषाही

- महेन्द्र

    दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) का प्रशासन एक ऐसा नोटिस जारी कर चुका है जिसमें प्रदर्शन, सभा या कोई कार्यक्रम आयोजित करने से पहले 72 घंटे का पूर्वानुमोदन अनिवार्य कर दिया गया है। 23 मार्च 2026 को प्राक्टर कार्यालय द्वारा जारी यह नोटिस ‘कैंपस व्यवस्था’ के नाम पर लिया गया, लेकिन वास्तव में यह छात्रों और शिक्षकों की असहमति को दबाने की सुनियोजित साजिश है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार को खत्म कर देता है। यह नोटिस बिना स्पष्ट अपील प्रक्रिया के मनमानी को बढ़ावा देता है, जो लोकतंत्र-विरोधी है।
दिल्ली के छात्र संगठनों का मजदूर आंदोलन के समर्थन में एकजुटता बयान

    देश भर में चल रहे मजदूरों के आंदोलन के दमन और बदनाम करने की कार्यवाही का हम पुरजोर विरोध करते हैं।

सोमवार, 29 जून 2026

वी आई टी भोपाल में खाने और पानी की शिकायत पर छात्रों का दमन
महेश

    मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में स्थित वेल्लोर इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (VIT) के भोपाल कैंपस में 25 नवंबर की रात के लगभग 10 बजे कुछ छात्र मेस के खराब खाने और गंदे पानी की शिकायत लेकर अपने असिस्टेंट प्रोफेसर प्रशांत कुमार पांडे के पास पहुंचे थे। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी समस्या सुनी जाएगी। लेकिन जो हुआ वह किसी ने सोचा भी नहीं था। प्रोफेसर ने छात्रों की शिकायत सुनने के बजाय आपा खो दिया और उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। छात्रों के बालों को पकड़कर घसीटा गया, उन्हें थप्पड़ मारे गए और जलील किया गया। यही रात में छात्रों के आक्रोश का कारण बना।