गुरुवार, 4 दिसंबर 2025



उत्तराखंड पेपर लीक

छात्र आंदोलन के आगे झुकी सरकार

-महेश

    21 सितंबर 2025 को UKSSSC (उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग) ने स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा ग्रेजुएट लेवल के 416 पदों के लिए पटवारी, लेखपाल आदि पदों की परीक्षाएं आयोजित की। परीक्षाएं शुरू होने के आधे घंटे बाद ही निजी ट्रस्ट के तहत आने वाले आदर्श बाल सदन इंटर काॅलेज हरिद्वार से पेपर लीक की घटना सामने आ गई। छात्र अन्दर परीक्षा केन्द्रों में परीक्षा दे रहे थे। बाहर सोशल मीडिया में पेपर लीक की खबरें दौड़ रही थी। छात्र परीक्षा देकर बाहर आए तो इसने छात्रों को आक्रोशित कर दिया।
औपनिवेशीकरण के दौर में भारत और चीन (भाग 1)

अंग्रेजों द्वारा चीन के औपनिवेशीकरण में भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल

-निशांत

    (औपनिवेशीकरण के दौर में भारत और चीन के बीच सम्बन्धों के बारे में यह लेख दो भागों में प्रस्तुत है। पहले भाग में मुख्यतः इतिहास के उस पहलू की चर्चा की गयी है, जो चीन को उपनिवेश बनाने के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश सरकार द्वारा आम भारतीयों को फौज-पुलिस में भर्ती कर चीन में इस्तेमाल किये जाने से सम्बन्धित है। औपनिवेशीकरण के शुरूआती चरण में आम भारतीयों में राष्ट्रवाद व साम्राज्यवाद विरोध के विचार अभी परिपक्व नहीं थे। इसलिए ब्रिटिश साम्राज्यवादी चीनी जनता के आंदोलनों को कुचलने हेतु भारतीयों का इस्तेमाल करने में कामयाब रहे।)
फिल्म समीक्षाः ‘द वेव’
पूंजीवाद में फासीवादी विचारों का आधार
-कविता

    2008 जर्मनी में बनी ‘द वेव’ फिल्म छात्रों के बीच फासीवादी विचारों के प्रसार की जमीन को बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाती है। अमेरिका के प्रोफेसर राॅन जोन्स द्वारा 1967 में कक्षा में ‘द थर्ड वेव’ नाम से प्रयोग किया। इस प्रयोग का मकसद यह दिखाना था कि जर्मनी में कैसे एक बड़ी आबादी हिटलर के फासीवादी विचारों के प्रभाव में आयी। बाद में इस प्रयोग के आधार पर एक किताब भी लिखी गयी। जिसे आधार बनाकर जर्मन निर्देशक डेनिस गैंसेल ने जर्मनी केन्द्रित रूपांतरण कर ‘द वेव’ जैसी प्रसिद्ध फिल्म बनायी।

गाजापट्टी में फिलिस्तीनी जनता का नरसंहार और तबाही

-भूपाल

    इजरायल की बेंजामिन नेतन्याहू सरकार का पिछले दो साल से गाजा पट्टी पर हमला लगातार जारी है। इस साल जनवरी माह में युद्ध विराम पर समझौता हुआ था, जिसे अलग-अलग चरण में लागू किया जाना था। मगर इजरायली शासक कुछ वक्त के बाद ही समझौते से मुकर गए। हवाई, जमीनी हमले लगातार ही जारी हैं। युद्ध विराम के समझौते के दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की धमकियों और फिर गाजा के लिए विशेष योजना की बात करके जता दिया था कि युद्धविराम समझौते का क्या हश्र होगा।


उत्तराखंड के 25 साल

शिक्षा और रोजगार की बुरी स्थिति

-महेश

    9 नवंबर 2025 को उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के 25 साल पूरे हो जाएंगे। 25 वें साल में प्रवेश करने पर उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने इसे रजत जयंती वर्ष के रूप में मनाया। राज्य की धामी सरकार ने इस अवसर पर उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करवाए। उत्तराखंड राज्य बनने की प्रमुख वजहों में शिक्षा और रोजगार भी प्राथमिक सवाल बने रहे। राज्य बनने के बाद यहां के निवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप राज्य का निर्माण नहीं हुआ और सत्ता में बारी-बारी से बैठी भाजपा-कांग्रेस ने मलाई खाई। उत्तराखंड के मामले में बात करने के लिए तो बहुत कुछ है परंतु यहां पर आगे हम शिक्षा और रोजगार के मामले में कुछ हालातों को रखेंगे।
विपरीतों का अंतप्र्रवेशः रूप और अंतर्वस्तु

-मनीष

    जैन पुराणकथाओं के अनुसार उनके तीर्थांकरों की लंबाई क्रमशः घटती गई है। पहले तीर्थांकर रिषभनाथ की लंबाई 1500 मीटर थी। उनके मुकाबले तेईसवीं तीर्थांकर पाश्र्वनाथ की लंबाई घटकर महज 13.5 फूट रह गई थी। चैबीसवें और अंतिम तीर्थांकर महावीर तो बस 6 फूट के थे।

आज अगर स्पिनोजा होते!

-कबीर

    स्पिनोजा ने कहा था कि ‘मन शरीर के बारे में ईश्वर का ज्ञान है।’  (Mind is God’s idea of the body)। बल्कि यह वाक्य उनके दर्शन की बुनियाद था।
स्कूल काॅम्प्लेक्स: गरीब छात्रों को शिक्षा से बाहर करने की योजना
-महेश

    स्कूलों को क्लस्टर (मर्जर) करने की योजना पूरे देश में चलाई जा रही है। इसको लागू करने के पीछे सरकारें सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा के लिए लैब, पुस्तकालय, स्मार्ट क्लास रूम, खेल की सुविधा, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने आदि संसाधन की बात प्रचारित कर रही हैं। 2020 में जारी छम्च् (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) स्कूल काॅम्प्लेक्स की बात कही गई है। इस स्कूल काॅम्प्लेक्स में आंगनबाड़ी से लेकर 12 तक के सरकारी विद्यालय एक जगह बनाए जाने हैं। स्कूल काॅम्प्लेक्स में आसपास के विद्यालय मर्ज किए जाने हैं। जिसमें हजारों छात्र प्रभावित होने हैं।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

युवाओ! जेन-जी! आप किधर

    युवाओं ने शासकों को ऐसा नचाया कि कोई गद्दी छोड़ कर भाग रहा है तो कोई देश छोड़कर। हाल में नेपाल, मोरक्को, मेडागास्कर, पेरू, आदि इस फेहरिस्त में नये जुड़े हैं। ये युवा यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, एशिया सभी महाद्वीपों में शासकों को हैरान-परेशान करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं इन्हें जेन-जी कह दिया गया तो कहीं बस युवा या जनता। यह आम मेहनतकश जनता की इच्छा-आकांक्षाओं के अनुरूप संघर्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। गत वर्ष श्रीलंकर, केन्या, बांग्लादेश से निकलकर युवाओं के विद्रोह की दायरा बढ़ता गया है।

रविवार, 22 सितंबर 2024

 सिद्धू-कानू ने फूंका था अंग्रेजों के खिलाफ पहला बिगुल

‘करो या मरो, अंग्रेजो हमारी माटी छोडो!’         - राजेन्द्र

वैसे तो स्वाधीनता संग्राम की पहली लड़ाई 1857 में मानी जाती है मगर इसके पहले ही वर्तमान के झारखंड राज्य के संथाल परगना में ‘संथाल हूल’ या ‘संथाल विद्रोह’ के द्वारा अंग्रेजों को भारी क्षति उठानी पड़ी थी। दो भाइयों सिद्धू-कानू के नेतृत्व में 30 जून 1855 को वर्तमान साहेबगंज जिले के भगनाडीह गांव से प्रारंभ हुए इस विद्रोह के मौके पर सिद्धू ने घोषणा की - ‘करो या मरो’, ‘अंग्रेजो हमारी माटी छोड़ो’।

 लेनिन के जन्मदिवस ( 22 अप्रैल) के अवसर पर

भारतीय युवाओं के नाम लेनिन का पत्र  (काल्पनिक)


भारत के युवाओ!

        मैं लेनिन आपसे चंद बातें करना चाहता हूं। सबसे पहले मेरा हार्दिक अभिनंदन स्वीकार कीजिए। मुझे हमेशा से युवाओं खासकर युवा मजदूरों से बातें करने में विशेष आनंद आता रहा है।

युवावस्था की बात कुछ और ही होती है। यह अवस्था मानव जीवन के सर्वोत्तम को अभिव्यक्त करती है। आप जानते ही हो मार्क्स और एंगेल्स ने अपने क्रांतिकारी विचारों को अपनी युवावस्था में ही सूत्रित किया था। मानव जाति के इतिहास से अनेकानेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जब महान वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, कलाकारों ने अपना सर्वोत्तम अपनी युवावस्था में ही दिया था।

हिंदुस्तान को लीडरों से बचाओ
                                                                                                                                                                               
                                                                              -सआदत हसन मंटो

हम एक अर्से से ये शोर सुन रहे हैं। हिन्दुस्तान को इस चीज़ से बचाओ। उस चीज़ से बचाओ, मगर वाक़िया ये है कि हिन्दुस्तान को उन लोगों से बचाना चाहिए जो इस क़िस्म का शोर पैदा कर रहे हैं। ये लोग शोर पैदा करने के फ़न में माहिर हैं। इसमें कोई शक नहीं, मगर उनके दिल इख़लास (अच्छी नीयत) से बिलकुल खाली हैं। रात को किसी जलसे में गर्मा-गर्म तक़रीर (भाषण) करने के बाद जब ये लोग अपने पुर-तकल्लुफ (सुकून से) बिस्तरों में सोते हैं तो उनके दिमाग़ बिल्कुल ख़ाली होते हैं। उनकी रातों का ख़फ़ीफ़-तरीन (थोड़ा सा) हिस्सा भी इस ख्याल में नहीं गुज़रा कि हिन्दुस्तान किस मर्ज़ में मुब्तला (विपत्ति में पड़ा हुआ) है। दरअसल वो अपने मर्ज़ के इलाज मुआलिजे (इलाज करने वाला) में इस क़दर मसरूफ़ रहते हैं कि उन्हें अपने वतन के मर्ज़ के बारे में ग़ौर करने का मौक़ा ही नहीं मिलता। 

शनिवार, 25 नवंबर 2023

 दमन फासीवाद की फितरत, संघर्ष है छात्रों-युवाओं की विरासत

हर गुजरते दिन के साथ केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा राजकीय दमन की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय(ईडी), सीबीआई, एनआईए, आयकर विभाग, जैसी संस्थाएं विरोध की आवाजों को डराने-दबाने का जरिया बन गयी हैं। जिन पत्रकारों, वेब पोर्टल, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को निशाना बनाया जा रहा है, वे मोदी सरकार से भिन्न रुख रखते रहे हैं या समाज के किसी शोषित-उत्पीड़ित हिस्से की आवाज उठाते रहे हैं। सरकारी दमन की शिकार संस्थाओं में द वायर, ऑल्ट न्यूज, बीबीसी आदि की फेहरिस्त में नया नाम न्यूज क्लिक का जुड़ गया है।