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शनिवार, 6 मई 2017

पूंजीवाद नहीं मजदूर राज चाहिए

5 राज्यों में विधानसभा चुनाव
-कविता

        5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव का माहौल इन दिनों गरम है। पान-चाय की दुकानों से लेकर टीवी-अखबारों में किसके सर ताज-किसकी हार की बहस चल रही है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी चुनावी बिसात बिछा कर विरोधियों को परास्त करने की योजनाओं में मशगूल हैं। चुनावी रैली-दौरे, दल-बदल, वायदे-जुमलों आदि का माहौल बना हुआ है। ऐसे समय में बेहद आवश्यक हो जाता है कि संजीदगी से यह सोचा जाय कि देश के मजदूरों, किसानों, शोषित, उत्पीड़ित, वंचितों को इस चुनाव से क्या मिलने वाला है। क्या फैक्टरियों में होने वाले शोषण से मजदूरों को मुक्ति मिलेगी? क्या बर्बाद होते किसानों, बेरोजगार घूमती जवानी के जीवन में कोई फर्क पड़ेगा? यदि नहीं तो फिर इन चुनावों का देश की मजदूर-मेहनतकश आबादी से क्या लेना-देना?

पूंजीवादी जनतंत्र

-प्रेम प्रकाश

        जनतंत्र का भावनात्मक आशय जनता के स्वशासन की सार्वजनिक सत्ता से है। लेकिन आदिम गोत्र समुदायों को अलग रख दें और वर्गीय समाजों को सामने रखें तो बहुसंख्य जनता राजनैतिक भागीदारी से पृथक रही है। सार्वजनिक सत्ता ‘‘राज्य’’ के रूप में हमेशा से प्रभुत्वशाली, संपत्तिशाली वर्ग की सेवा करती रही है। अगर प्राचीन गणतंत्रों को अपने सामने रखे- एथेंस, स्पार्टा जैसे यूनानी गणतंत्र बहुत चर्चित रहे हैं। यहां एथेंस जनतंत्र को ही देखें अपने समृद्धि के शिखर में एथेंस में 90000 स्वतंत्र नागरिक, स्त्री, पुरुष, बच्चे थे। यहां दासों की संख्या 365000 और आश्रितों की संख्या 45000 थी। इन दासोें व मुक्त आश्रितों को कोई अधिकार नहीं था। यहां ‘‘जनतंत्र’’ शब्द अलंकारिक भर रह जाता है। 

सांपनाथ-नागनाथ में से ही फिर किसी को चुनेगी जनता

विधानसभा चुनाव 2017 
-कैलाश

        फरवरी-मार्च माह में  पांच राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा व मणिपुर) में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावी रण में जीत हासिल करने के लिए चुनावबाज पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों ने अभी से जोड़-तोड़ शुरु कर दी है। प्रत्येक पार्टी साम-दाम-दण्ड-भेद का इस्तेमाल कर अपनी चुनावी नैया पार लगाना चाहती है।