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मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

 गिरमिटिया मजदूरों की मार्मिक व्यथा का चित्रण  

कुली लाइंस गिरमिटिया मजदूरों के जीवन पर लिखी गयी किताब है। इसके लेखक प्रवीण झा हैं। ‘कुली’ तमिल शब्द है। इसका अर्थ है ‘काम के बदले पैसा’। आज से 200 वर्ष पूर्व भारत में काबिज साम्राज्यवादियों अंग्रेजों, फ्रांसीसियों द्वारा कुछ द्वीपों जैसे मारीशस, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, गयाना, सूरीनाम, रियूनियन, जमैका इत्यादि पर मजदूरों को गन्ना, कॉफी इत्यादि के बागानों में काम करने के लिए भेजा गया। ताज्जुब की बात है कि भारत से पहले कुली अंग्रेजों ने नहीं, फ्रेंच लोगों ने भेजने शुरु किये। वो भी ब्रिटिश सरकार से बिना पूछे, तस्करी कर ले गये। सन् 1826 से 1830 ई. के बीच लगभग 3,000 मजदूर फ्रांस ने भारत से चुराकर एक द्वीप पर भेज दिये। यह द्वीप ‘रियूनियन’ कहलाता है। गुलामी प्रथा के समापन की तरफ बढ़ते विश्व में नकदी फसल वाले मालिकों को सस्ते और आज्ञाकारी मजदूरों की आवश्यकता पड़ी। यद्यपि इन एग्रीमेंट मजदूरों को ही गिरमिटिया मजदूर कहा गया; शायद निरक्षर होने के कारण ये एग्रीमेन्ट शब्द को सही तरीके से उच्चारण नहीं कर पाते थे और गिरमेन्ट कहते थे; फिर ये शब्द अपभ्रंश होकर गिरमिटिया हो गया। इन गिरमिटिया मजदूरों में महिला या पुरुष, दोनों ही होते थे। हालांकि महिला मजदूरों की संख्या अमूमन कम होती थी, ये अनुपात 60ः40 का होता था। दास प्रथा खत्म होने के उपरांत अंग्रेजों (साम्राज्यवादियों) को अपने उपनिवेशों जैसे मॉरीशस, गयाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो में गन्ना, कॉफी के बागानों में कार्य करने के लिए मजदूरों की आवश्यकता थी तो इन गिरमिटिया मजदूरों को लाया गया। ये मजदूर कम से कम पाँच वर्ष तथा त्रिनिदाद एवं टोबैगो जैसी जगहों पर 10 वर्ष तक एक एग्रीमेंट के तहत रखे जाते थे। पर इनका जीवन दासों के जीवन की तरह ही बदतर था। इनके कोई भी अधिकार नहीं थे तथा इन्हें भरपेट भोजन भी नहीं मिलता था। 

सोमवार, 24 अप्रैल 2023

समाजवाद समाज की तलछट माने जाने वालों को भी ले चला ‘जीवन की ओर‘

अंतोन मकारेंको का ‘‘जीवन की ओर’’ उपन्यास पढ़कर अच्छा लगा। बहुत कुछ सीखने को मिला। उपन्यास हर व्यक्ति को महत्वपूर्ण मानना, कठिन परिस्थितियों में दृढ़तापूर्वक डटे रहना, कठिन परिस्थितियों में भी संयम रखना और एक अच्छा इंसान बनना सिखाता है। उपन्यास बहुत जीवंत है और सच्ची घटनाओं पर आधारित है।

रविवार, 26 जनवरी 2020

क्रांति की अग्निशिखा में जीवन का चित्रण ‘पराजय’
-महेश

अलेक्सान्द्र फेदेयेव समाजवादी सोवियत संघ के प्रसिद्ध लेखकों में से एक हैं। पराजय उनका पहला उपन्यास था जो 1927 में प्रकाशित हुआ था।

शनिवार, 25 जनवरी 2020

अग्निदीक्षा
....कबहुं न छाड़े खेत
-महेश

‘अग्नि-दीक्षा’ सोवियत संघ के लेखक निकोलाई आस्त्रोवस्की द्वारा लिखित एक उपन्यास है। उपन्यास का नायक पावेल कोर्चागिन एक गरीब मजदूर परिवार में पैदा हुआ। पिता, मां, भाई, बहन सब मजदूर थे। बचपन में ही पावेल ने गरीबी की जलालत देखी थी।

रविवार, 1 दिसंबर 2019

फ्रीडम एट मिडनाइट
भारत विभाजन का मुखर वर्णन, साम्राज्यवाद की भूमिका पर चुप


डोमिनिक लापियर और लैरी कॉलिन्स की पुस्तक ‘मध्य रात्रि में आजादी’ (फ्रीडम एट मिडनाइट) में भारत की आजादी और विभाजन को बहुत करीब से लेखकों ने समेटा है।
पुस्तक इस मायने में खास है कि इसमें उस समय की घटनाओं पर बारीकी से नजर डाली है। इतिहास के सूक्ष्म रूप से परिचय कराने वाली यह पुस्तक महात्मा गांधी की विभाजन को स्वीकार न करने तथा सांप्रदायिक दंगों को रोकने की उनकी भूमिका को भी उजागर करती है। 

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

पहला अध्यापक

        ‘पहला अध्यापक’ किरगीज (सोवियत संघ) के लेखक चंगीज आइत्मातोव द्वारा लिखित एक लघु उपन्यास है। इसका हिन्दी अनुवाद भीष्म साहनी ने किया है।

        यह उपन्यास महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति (1917) के बाद नये-नये स्थापित समाजवादी रूस के किरगीजिया क्षेत्र के एक छोटे से गांव कुरकुरेव में 1920-30 में घटी घटनाओं का उल्लेख करता है। नयी स्थापित सोवियत सत्ता में पिछड़ी मध्ययुगीन व सामंती मूल्य-मान्यताओं से किस प्रकार संघर्ष करना पड़ा इसका भी उपन्यास सूक्ष्म वर्णन करता है। यह उपन्यास उस नये इंसान का विशद वर्णन करता है जिसका निर्माण महान समाजवादी क्रांति के दौरान और क्रांति के बाद हुआ। यह नया इंसान दुइशेन है। चरित्र, त्याग, समर्पण, सोवियत सत्ता द्वारा दी गयी जिम्मेदारी का निष्ठा से पालन और सबसे बड़ी बात यह कि मेहनतकश जनता से असीम प्रेम आदि दुइशेन के गुण हैं।