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सोमवार, 29 जून 2026

छात्र जगत
पंजाब विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन जीत के साथ समाप्त
महेश


    केन्द्र सरकार ने पंजाब विश्वविद्यालय के सीनेट को भंग करने के इरादे से 28 अक्टूबर को एक ‘नोटिफिकेशन’ जारी किया था। इसके तहत सीनेट-सिण्डिकेट में चुनाव की प्रक्रिया को रद्द करके इसे पूरी तरह नामांकित पदों वाली बना दिये जाने का प्रावधान था। यही नहीं इसके सदस्यों की संख्या को 91 से कम करके 31 कर दिया गया था। केन्द्र सरकार ने इसके बाबत पहले भी कई कोशिशें की हैं लेकिन छात्र समुदाय और जनता के दबाव के चलते फासीवादी संघ-भाजपा सरकार इसमें सफल नहीं हो पायी।

रविवार, 23 अप्रैल 2023

 फासीवाद के खिलाफ छात्रों के मारक संघर्ष का अध्याय

‘‘सभी तरफ से हिटलर के सभी विरोधियों के बीच में एक बात सुनी जाती है- जनसंख्या के ठीक-ठाक हिस्से द्वारा- विलाप करते हुए, निराशा के शब्दों में और निराश करते हुए; अक्सर इस सवाल के साथ बात खत्म होती हैः ‘‘खैर आएगा तो  हिटलर ही...?’’ -‘द  व्हाइट रोज’ के चैथे पर्चे से।

यह पर्चा 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान म्यूनिख विश्वविद्यालय, जर्मनी के छात्रों ने लिखा। इसके लिखने और बांटने वाले  हेंस शाॅल, विली ग्राफ, एलेक्जेण्डर शमोरेल, सोफी शाॅल, क्रिस्टोफ प्रोब्स्ट, प्रोफेसर कर्ट हूबर थे। ये नौजवान हिटलर के फासीवादी निजाम से बेखौफ थे। जब हिटलर की काली करतूतें अपने उफान पर थीं, वो दुनियाभर में धिक्कारा जा रहा था। उसी समय जर्मनी के ये बहादुर नौजवान हिटलर के शासन में उसकी नाक के नीचे उसे अपने पर्चे ‘द व्हाइट रोज’ के जरिये ललकार रहे थे।

 बंग-भंग विरोधी आंदोलन और नौजवानों की भूमिका 

20 जुलाई, 1905 को अंग्रेज साम्राज्यवादियों के वायसराय लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन करने का आदेश जारी किया। विभाजन का यह आदेश 16 अक्टूबर 1905 से लागू भी कर दिया गया। उस समय बंगाल प्रांत में उडीसा, बिहार और बंगाल (पूर्वी व पश्चिमी दोनों) आते थे। जनसंख्या की दृष्टि से इस प्रांत की आबादी इंग्लैण्ड की आबादी से दुगनी थी। बंगाल का विभाजन करने के अंग्रेजों के अपने तर्क थे। उनका कहना था कि एक लैफ्टिनेंट गर्वनर के द्वारा इतने बड़े प्रांत को प्रशासित करना कठिन है। पूर्वी बंगाल में तो यह प्रशासन पूरी तरह नजरअंदाज ही है। इसलिए इस प्रांत का विभाजन जरूरी है। इस प्रकार अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने बंगाल का विभाजन कर इसके दो हिस्से कर दिये। बड़ी चालाकी से उन्होंने बंगाल और पूर्वी बंगाल नामक दो प्रांत बनाये। बंगाल प्रांत में पश्चिमी बंगाल, उडीसा और बिहार को रखा गया। पूर्वी बंगाल में असम सहित डेक्का (ढाका) को रखा गया। अंग्रेजों की इस कुटिल चाल से समझा जा सकता है कि वे बंगाल का विभाजन प्रशासनिक नजरिये से नहीं बल्कि बंगाल में फूट डालने के लिए कर रहे थे। उनके इस षड़यंत्र से बंगाल प्रांत में भी बंगाली भाषा बोलने वाले अल्पसंख्या में आ गये। वहां उडिया और हिन्दी बोलने वालों का बहुमत हो गया। इसके साथ ही पूर्वी बंगाल और बंगाल का विभाजन इस प्रकार किया गया कि पूर्वी बंगाल में मुस्लिमों का बहुमत हो गया। यह भाषा और धर्म दोनों के आधार पर फूट डालने की चाल थी। बंगाल का विभाजन करने से पूर्व और बाद में अंग्रेज साम्राज्यवादी अंदरखाने सांप्रदायिक विभाजन का जहर घोलते रहे। बंगाल के मुस्लिमों को भ्रमित करने के लिए उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद हिन्दुओं के बजाय मुस्लिमों को मौके मिलेंगे। वे सरकारी नौकरियों और कारोबार में हिन्दुओं का वर्चस्व तोड़ पायेंगे। मुस्लिमों की बुरी स्थितियों के लिए उन्होंने हिन्दुओं को दोषी बताया। 

सोमवार, 7 नवंबर 2022

कन्हैया कुमार कांग्रेस में शामिल

एक अवसरवादी अवसर की तलाश में


चुनाव का मौसम करीब है। हर पूंजीवादी नेता अपने लिए सुरक्षित आशियां ढूंढ रहा है। कोई लुढ़ककर यहां तो कोई लुढ़ककर वहां पहुंच रहा है। यूं तो पूंजीवादी राजनीति में पतन यहां तक पहुंच चुका है कि अब यह कोई मायने नहीं रखता की कौन नेता कितना अवसरवादी है। राजनीतिक कैरियर, सत्ता सुख के लिए कौन नेता कब कहां पलटी मार जाये कोई नहीं कह सकता। पूंजीवादी नेताओं में ना विचार, ना आदर्श बचे हैं। एक ही आदर्श है सिर्फ अपना राजनैतिक कैरियर देखो, इसके लिए सब कुछ जायज है। धन बहाना, विचार-मूल्य बहाना यहां तक खून बहाना सब कुछ आज नैतिक है।

शनिवार, 24 नवंबर 2018

‘नकबा’ के 70 वर्ष और फिलीस्तीनी जनता का प्रतिरोध संघर्ष
-नरेश कुमार



        5 अक्टूबर, हर शुक्रवार की तरह हजारों की संख्या में फिलीस्तीनी गाजा सीमा की ओर बढ़ रहे थे। सीमा पार इजरायली सैनिकों की राइफलें तनी हुयी थीं। बेखौफ फिलीस्तीनी; जिसमें बच्चे, महिलाएं, बूढ़े, नौजवान सभी शामिल थे; जान की परवाह किये बगैर आगे बढ़ रहे थे। इस जनसैलाब में नौजवानों की संख्या सर्वाधिक थी। ऐसे नौजवान जिन्होंने जन्म लेते ही बारूद की गंध में अपनी पहली सांस ली और गोलियों व बम के धमाकों के रूप में पहली आवाजें और प्रतिध्वनियां सुनीं।

बुधवार, 21 नवंबर 2018

एच.एन.एल.यू. के छात्र-छात्राओं का बहादुराना संघर्ष जीत के साथ समाप्त
-दीपक


        इस वर्ष कैम्पसों के भीतर छात्राओं के हाॅस्टलों व लाइब्रेरी की टाइमिंग में गैरबराबरी के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन देखने को मिले। इन सभी आंदोलनों में हिदायतुल्ला नेशनल लाॅ यूनिवर्सिटी (एचएनएलयू) के छात्र-छात्राओं का संघर्ष एक विशेष स्थान रखता है। कैम्पसों में छात्राओं की गैरबराबरी के खिलाफ शुरू हुआ ये आंदोलन अन्ततः अपनी सारी मांगें मनवाने और वी.सी. के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ। एचएनएलयू, रायपुर (छत्तीसगढ़) में स्थित एक लाॅ यूनिवर्सिटी है। जहां 27 अगस्त की रात से छात्र-छात्राओं का आंदोलन तब शुरू हुआ जब छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने वी.सी. सुखपाल सिंह के कार्यकाल बढ़ाने के संस्थान के फैसले पर रोक लगा दी। सुखपाल सिंह अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा कर चुके थे और इसके बाद यूनिवर्सिटी के कानूनों में बदलाव करवाकर उन्होनें अपना कार्यकाल बढ़वा लिया था। 27 अगस्त को हाइकोर्ट का फैसला आने के बाद इसी रात को कैम्पस में छात्राओं द्वारा हाॅस्टल और लाइब्रेरी टाइमिंग को बढ़ाने और छात्राओं का उत्पीड़न बंद करने की मांग के साथ आंदोलन की शुरुआत कर दी गयी। जिसमें बाद में छात्र भी शामिल हो गए और आंदोलन बढ़ने के साथ इसमें कई मांगें जुड़ती चली गयीं।

बुधवार, 10 मई 2017

मोदी राज में ‘देशद्रोही’ बनते छात्र

-दीपक

        केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद से शिक्षा-संस्थानों और छात्रों पर हमले तेज हुए हैं। अभी हाल में डीयू के रामजस कालेज में आरएसएस के छात्र संगठन ने एक सेमिनार पर हमला बोला था। सेमिनार में आए छात्रों-शिक्षकों के साथ उक्त संगठन द्वारा मारपीट की गयी। अगले दिन इस घटना का विरोध कर रहे छात्रों-शिक्षकों पर पत्थरों से हमला किया गया। एबीपीपी सेमिनार में जेएनयू के शोध छात्र उमर खालिद को बुलाए जाने का विरोध कर रहा था। उसका कहना था कि उमर एक देशद्रोही है इसीलिए उसे सेमिनार में नहीं बुलाया जाना चाहिए। यही नहीं एबीवीपी की गुण्डागर्दी का विरोध कर रहे डीयू के सभी शिक्षकों को उक्त संगठन देशद्रोही के तमगे से नवाज रहा था।

शिक्षा का भगवाकरण

-चंदन

        मार्च माह के अंतिम सप्ताह में ‘ज्ञान संगम’ नाम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से एक कार्यशाला आयोजित की गयी। यह कार्यशाला इस बात के लिए चर्चा का विषय रही कि इसमें 20 केन्द्रीय विश्वविद्यालय तथा 31 राज्य विश्वविद्यालय के कुलपति शामिल हुए थे। इसके अतिरिक्त लगभग 750 एकेडमिक (शिक्षा जगत से जुड़े लोग) इसमें शामिल हुए। कुलपतियों का आर.एस.एस. के किसी कार्यक्रम में जाने का क्या अर्थ है? आर.एस.एस. शिक्षा क्षेत्र की तो कोई संस्था नहीं है, ना ही वह विज्ञान क्षेत्र की कोई संस्था है, ना ही वह सरकार की कोई इकाई है। आर.एस.एस. केन्द्र में काबिज भाजपा सरकार की जननी, विचारक एवं मार्गदर्शक है। इस माने में वह खुद सरकार भी बन जाती है। ठीक यही कारण है कि विज्ञान, कला, इतिहास, से कोसों दूर आर.एस.एस. के कार्यक्रम में कुलपति शामिल होते हैं। शिक्षण संस्थाओं के विभिन्न लोगों में सरकार की जी हुजुरी एक विशेष गुण बन गया है। यदि कुलपति ऐसा करें तो इसके गम्भीर दूरगामी नुकसान होंगे।

गुण्डागर्दी के खिलाफ एकजुट हुए छात्र

रामजस कालेज
-प्रियंका

        21 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज के अंग्रेजी विभाग ने ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने उमर खालिद के उस सेमिनार में वक्तव्य देने के लिए आने का विरोध किया। एबीवीपी के उग्र विरोध को देखते हुए आयोजकों ने अंतिम समय में उमर खालिद को मना कर दिया। लेकिन तब भी सेमिनार अन्य वक्ताओं के साथ चलता रहा। एबीवीपी यह बर्दाश्त नहीं कर सका। उसको जो शिक्षा संघ से मिली है, उसमें अन्य आवाजों को पूरी तरह से दबाना सिखाया गया है। आखिर केरल के बागान मजदूरों, बस्तर के आदिवासियों, बंगलुरु के गारमेण्ट मजदूरों, छात्रों के संघर्षो पर हो रहा सेमिनार, जनता के प्रतिरोध को एबीवीपी चुपचाप नहीं सुन-देख सका। उसने सेमिनार हाल के बाहर डीजे चलाया, हाॅल पर पत्थर फेंके। पुलिस आयी तो अपनी संवैधानिक ड्यूटी भूलकर इन उत्पातियोें के साथ हो ली। आखिर पुलिस सरकार और व्यवस्था से अलग तो है, नहीं। उन्हें सरकार की जी- हुजूरी की ट्रेनिंग दी जाती है। ड्यूटी करने वाला कोई सालों में एक-आध दिखता है। 

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका तक छात्र सड़कों पर

-जुनैद
        दक्षिण अफ्रीका के छात्रों ने अक्टूबर माह में अपने जुझारू संघर्ष से सरकार को फीस वृद्धि पर कदम पीछे खींचने को मजबूर कर दिया। इन्हीं की तर्ज पर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के छात्र भी अपनी मांगों को लेकर 12 नवंबर को अमेरिका के विभिन्न शहरों में सड़कों पर उतरे। दक्षिण अफ्रीका के छात्रों ने अपने संघर्ष को ‘फी मस्ट फाल’ (फीसें जरूर गिरनी चाहिए) नाम दिया तो अमेरिकी छात्रों ने खुद के संघर्ष को ‘मिलियन स्टूडेण्ट मार्च’ नाम दिया। छात्रों की यह पहलकदमी वैश्विक आर्थिक संकट के साये में महंगी होती शिक्षा, असुरक्षित भविष्य के प्रतिकार के रूप में सामने आयी। इस पहलकदमी से छात्र शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ खड़े होने का साहस कर रहे हैं।