सोमवार, 29 जून 2026
रविवार, 23 अप्रैल 2023
फासीवाद के खिलाफ छात्रों के मारक संघर्ष का अध्याय
‘‘सभी तरफ से हिटलर के सभी विरोधियों के बीच में एक बात सुनी जाती है- जनसंख्या के ठीक-ठाक हिस्से द्वारा- विलाप करते हुए, निराशा के शब्दों में और निराश करते हुए; अक्सर इस सवाल के साथ बात खत्म होती हैः ‘‘खैर आएगा तो हिटलर ही...?’’ -‘द व्हाइट रोज’ के चैथे पर्चे से।
यह पर्चा 1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान म्यूनिख विश्वविद्यालय, जर्मनी के छात्रों ने लिखा। इसके लिखने और बांटने वाले हेंस शाॅल, विली ग्राफ, एलेक्जेण्डर शमोरेल, सोफी शाॅल, क्रिस्टोफ प्रोब्स्ट, प्रोफेसर कर्ट हूबर थे। ये नौजवान हिटलर के फासीवादी निजाम से बेखौफ थे। जब हिटलर की काली करतूतें अपने उफान पर थीं, वो दुनियाभर में धिक्कारा जा रहा था। उसी समय जर्मनी के ये बहादुर नौजवान हिटलर के शासन में उसकी नाक के नीचे उसे अपने पर्चे ‘द व्हाइट रोज’ के जरिये ललकार रहे थे।
बंग-भंग विरोधी आंदोलन और नौजवानों की भूमिका
20 जुलाई, 1905 को अंग्रेज साम्राज्यवादियों के वायसराय लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन करने का आदेश जारी किया। विभाजन का यह आदेश 16 अक्टूबर 1905 से लागू भी कर दिया गया। उस समय बंगाल प्रांत में उडीसा, बिहार और बंगाल (पूर्वी व पश्चिमी दोनों) आते थे। जनसंख्या की दृष्टि से इस प्रांत की आबादी इंग्लैण्ड की आबादी से दुगनी थी। बंगाल का विभाजन करने के अंग्रेजों के अपने तर्क थे। उनका कहना था कि एक लैफ्टिनेंट गर्वनर के द्वारा इतने बड़े प्रांत को प्रशासित करना कठिन है। पूर्वी बंगाल में तो यह प्रशासन पूरी तरह नजरअंदाज ही है। इसलिए इस प्रांत का विभाजन जरूरी है। इस प्रकार अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने बंगाल का विभाजन कर इसके दो हिस्से कर दिये। बड़ी चालाकी से उन्होंने बंगाल और पूर्वी बंगाल नामक दो प्रांत बनाये। बंगाल प्रांत में पश्चिमी बंगाल, उडीसा और बिहार को रखा गया। पूर्वी बंगाल में असम सहित डेक्का (ढाका) को रखा गया। अंग्रेजों की इस कुटिल चाल से समझा जा सकता है कि वे बंगाल का विभाजन प्रशासनिक नजरिये से नहीं बल्कि बंगाल में फूट डालने के लिए कर रहे थे। उनके इस षड़यंत्र से बंगाल प्रांत में भी बंगाली भाषा बोलने वाले अल्पसंख्या में आ गये। वहां उडिया और हिन्दी बोलने वालों का बहुमत हो गया। इसके साथ ही पूर्वी बंगाल और बंगाल का विभाजन इस प्रकार किया गया कि पूर्वी बंगाल में मुस्लिमों का बहुमत हो गया। यह भाषा और धर्म दोनों के आधार पर फूट डालने की चाल थी। बंगाल का विभाजन करने से पूर्व और बाद में अंग्रेज साम्राज्यवादी अंदरखाने सांप्रदायिक विभाजन का जहर घोलते रहे। बंगाल के मुस्लिमों को भ्रमित करने के लिए उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद हिन्दुओं के बजाय मुस्लिमों को मौके मिलेंगे। वे सरकारी नौकरियों और कारोबार में हिन्दुओं का वर्चस्व तोड़ पायेंगे। मुस्लिमों की बुरी स्थितियों के लिए उन्होंने हिन्दुओं को दोषी बताया।
सोमवार, 7 नवंबर 2022
कन्हैया कुमार कांग्रेस में शामिल
एक अवसरवादी अवसर की तलाश में
चुनाव का मौसम करीब है। हर पूंजीवादी नेता अपने लिए सुरक्षित आशियां ढूंढ रहा है। कोई लुढ़ककर यहां तो कोई लुढ़ककर वहां पहुंच रहा है। यूं तो पूंजीवादी राजनीति में पतन यहां तक पहुंच चुका है कि अब यह कोई मायने नहीं रखता की कौन नेता कितना अवसरवादी है। राजनीतिक कैरियर, सत्ता सुख के लिए कौन नेता कब कहां पलटी मार जाये कोई नहीं कह सकता। पूंजीवादी नेताओं में ना विचार, ना आदर्श बचे हैं। एक ही आदर्श है सिर्फ अपना राजनैतिक कैरियर देखो, इसके लिए सब कुछ जायज है। धन बहाना, विचार-मूल्य बहाना यहां तक खून बहाना सब कुछ आज नैतिक है।

