सोमवार, 29 जून 2026

छात्र जगत
पंजाब विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलन जीत के साथ समाप्त
महेश


    केन्द्र सरकार ने पंजाब विश्वविद्यालय के सीनेट को भंग करने के इरादे से 28 अक्टूबर को एक ‘नोटिफिकेशन’ जारी किया था। इसके तहत सीनेट-सिण्डिकेट में चुनाव की प्रक्रिया को रद्द करके इसे पूरी तरह नामांकित पदों वाली बना दिये जाने का प्रावधान था। यही नहीं इसके सदस्यों की संख्या को 91 से कम करके 31 कर दिया गया था। केन्द्र सरकार ने इसके बाबत पहले भी कई कोशिशें की हैं लेकिन छात्र समुदाय और जनता के दबाव के चलते फासीवादी संघ-भाजपा सरकार इसमें सफल नहीं हो पायी।

इस नोटिफिकेशन के खिलाफ 10 नवम्बर के प्रदर्शन को असफल करने के इरादे से 10 और 11 नवम्बर को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छुट्टी घोषित कर दी। किसी भी बाहरी व्यक्ति के आने की मनाही, विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में ताला जड़ दिया गया और हाॅस्टलों में छापेमारी की गई। लेकिन छात्रों का संघर्ष जारी रहा और केन्द्र सरकार नोटिफिकेशन वापस लेने को मजबूर हुई। नोटिफिकेशन वापस होने के बाद भी छात्र समुदाय ने अपना संघर्ष जारी रखा। 25 नवम्बर तक सीनेट के चुनाव की तारीख न घोषित करने पर 26 नवम्बर को विश्वविद्यालय बन्द करने सहित बड़े प्रदर्शन की घोषणा की। (यह आंदोलन ‘पंजाब विश्वविद्यालय बचाओ मोर्चा’ के तहत चल रहा था। जिसे किसान संगठनों-यूनियनों और नागरिक समाज की ओर से व्यापक समर्थन मिल रहा था।) 27 नवंबर को केंद्र सरकार ने सीनेट के चुनाव की घोषणा कर दी। 28 नवंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ वार्ता में सभी मांगे माने जाने पर छात्र संगठनों ने आंदोलन को समाप्त कर दिया।

आन्दोलन की सफलता के बाद कैंपस में ट्रैक्टर मार्च और नारेबाजी की गई। धरना समाप्त होने से पहले मोर्चा ने पूरे कैंपस में हाॅस्टल-टू-हाॅस्टल मार्च निकाला। कैंपस में ‘मिट्ठी धुन रबाब दी, पंजाब यूनिवर्सिटी पंजाब दी’ के नारे गूंजते रहे।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान यूजीसी ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020’ के तहत पंजाब विश्वविद्यालय के संचालन की प्रक्रिया में परिवर्तन की बात की थी। जिसका अर्थ सीधे यह था कि सीनेट और सिण्डिकेट जैसी संचालक संस्थाओं को समाप्त कर दिया जाये और उनकी जगह चांसलर द्वारा नामित एक बोर्ड आॅफ गर्वनर्स को स्थापित कर दिया जाये। यह कदम पंजाब विश्वविद्यालय के जनवादी संचालन व संस्थाओं को भंग कर उन पर फासीवादी नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास था। यह ठीक वैसा ही प्रयास है जो कि पूरे देश में तमाम विश्वविद्यालयों के साथ किया जा रहा है या किया जा चुका है। चाहे वे विश्वविद्यालय केन्द्रीय हों या फिर राज्य सरकार द्वारा संचालित।

पंजाब विश्वविद्यालय देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। 1857 में देश में सबसे पहले मद्रास, कलकत्ता और बंबई विश्वविद्यालय की नींव रखी थी। उसके बाद 14 अक्टूबर, 1882 में पंजाब विश्वविद्यालय की आधारशिला लाहौर में रखी गई। तब दिल्ली के सेंट स्टीफेन काॅलेज और हिन्दू काॅलेज तक इसी पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। बाद में जब दिल्ली विश्वविद्यालय बना तो वे इससे संबद्ध हो गए।

यह देश का अकेला विश्वविद्यालय है जिसने विभाजन का दंश भी झेला। देश का विभाजन हुआ तो पंजाब विश्वविद्यालय का भी विभाजन हो गया। देश के विभाजन के बाद 1 अक्टूबर 1947 को ईस्ट पंजाब विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया। फिलहाल, पंजाब विश्वविद्यालय ‘पंजाब विश्वविद्यालय एक्ट 1947’ के अन्तर्गत संचालित होता है, जिसमें आखिरी संशोधन 1984 में हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान में जारी रहे पंजाब विश्वविद्यालय और भारत के चण्डीगढ़ में स्थापित पंजाब विश्वविद्यालय की जनवादी परम्परा समान ही रही। यानी लाहौर और चण्डीगढ़ दोनों के पंजाब विश्वविद्यालय में ही चुनी गयी सीनेट ही उच्चतम गवर्निंग बाॅडी बनी रही। हालांकि दोनों देशों के कानून के अनुसार समय-समय पर इसमें कुछ बदलाव भी किये गये। सीनेट पूरे पंजाब विश्वविद्यालय के प्रबन्धन, संचालन व उसकी सम्पत्ति के सम्बन्ध में सभी निर्णय लेने वाला सर्वोच्च निकाय था और अभी तक बना रहा था। शुरू में इसे देश में कई जगह स्थानांतरित किया गया। जब चंडीगढ़ को पंजाब की राजधानी बनाया गया तो वहां 550 एकड़ जमीन पर इसका स्थायी ठिकाना बन गया।

भाषा के आधार पर 1966 में जब पंजाब का विभाजन हुआ और हरियाणा एवं हिमाचल प्रदेश बने। तब पूरे इलाके के ज्यादातर काॅलेज पंजाब विश्वविद्यालय से ही संबद्ध थे। धीरे-धीरे जब इन प्रदेशों में विश्वविद्यालय बने तो सिर्फ पंजाब के काॅलेज ही इस विश्वविद्यालय से जुड़े रह गए। इस संशोधन के तहत पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में सीनेट चुनाव खत्म किए गए थे और साथ ही स्नातक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व भी खत्म कर दिया गया था। ज्ञात रहे सीनेट की संरचना में उसके सदस्यों की संख्या 91 होती है। जिसमें पंजाब के मुख्यमंत्री, पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस और पंजाब व चण्डीगढ़ के वित्त और शिक्षा विभाग के अधिकारी, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेण्ट प्रोफेसर, काॅलेजों के प्रिंसिपल और यूनिवर्सिटी के स्नातक शामिल होते हैं। पंजाब विश्वविद्यालय भारत का एकमात्र विश्वविद्यालय है जहां सभी निर्णय विश्वविद्यालय की सिंडिकेट और सीनेट द्वारा लिए जाते हैं।

पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम- 1947 के तहत अलग-अलग कोर्सों में डिपार्टमेंट का गठन करने की शक्तियां सीनेट के पास हैं। आम बोलचाल की भाषा में सीनेट विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों और नीतियों के लिए जिम्मेदार संस्था है।

15 सदस्यीय सिंडिकेट विश्वविद्यालय का कार्यकारी निकाय है जो विश्वविद्यालय के रोजमर्रा के कामों की देखरेख करता है। फिलहाल यह एक अंतरराज्यीय विश्वविद्यालय है यानी न यह राज्य विश्वविद्यालय है और न ही केन्द्रीय विश्वविद्यालय। कुछ लोग इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाने की माँग करते रहे हैं। यह केन्द्र सरकार व पंजाब सरकार द्वारा संयुक्त रूप से संचालित होता है और इसके फण्ड्स का 60 प्रतिशत केन्द्र सरकार से और 40 प्रतिशत पंजाब सरकार से आता है।

पंजाब विश्वविद्यालय पूरे देश में बचे उन विश्वविद्यालयों में से था, जिसकी जनवादी संस्थाओं व परम्पराओं को तबाह-बर्बाद करने का काम अभी तक मोदी सरकार नहीं कर पायी थी। जैसा कि उसने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आदि के साथ किया है। अब यहां भी अपनी खतरनाक छात्र-विरोधी ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020’ को लागू करने के नाम पर, मोदी सरकार सीनेट और सिण्डिकेट की जनवादी संस्था को ही समाप्त करने पर आमादा हो गयी।

प्रगतिशील छात्र समुदाय, न्यायप्रिय, जनवाद पसंद लोगों ने पंजाब विश्वविद्यालय में मोदी सरकार के कुत्सित फासीवादी प्रयासों को फिलहाल रोक दिया है। यही आज समय की मांग है कि इन संस्थाओं में चिंतनशील छात्र पीढ़ी और जनवादी माहौल कायम रह सके।                                                                                  ऽऽऽ

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