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सोमवार, 29 जून 2026

नस्लीय हिंसा का शिकार एंजेल चकमा
सुरभि


        एंजेल चकमा, त्रिपुरा का एक छात्र जो अपनी पढ़ाई करने देहरादून, उत्तराखंड आया था। उसके माता-पिता ने अपने बेटे को सुंदर भविष्य की उम्मीदों के साथ देहरादून भेजा था। ना तो एंजेल चकमा अपनी पढ़ाई पूरी कर पाए और न ही उनके माता-पिता का उनके सुंदर भविष्य का सपना ही पूरा हो पाया। नस्लीय हिंसा ने उत्तराखंड में उनकी जान ले ली। अपने खिलाफ दी गई नस्लीय गालियों का विरोध करने की सजा एंजेल को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। इस हमले में उनके भाई भी घायल हुए थे। एंजेल चकमा की हत्या ने एक बार फिर नस्लीय घृणा और हिंसा के ज़ख्म को ताज़ा कर दिया है।

रविवार, 1 मई 2016

जाति व्यवस्था और आरक्षण

-सुखवीर

        पिछले दिनों हरियाणा के सबसे बड़े औद्योगिक शहर फरीदाबाद के पास एक गांव सुनपेड़ में एक दलित परिवार के घर को आग की भेंट चढ़ा कर दो मासूम बच्चों की हत्या कर दी गयी। घटना देश की राजधानी के निकट थी इसलिए तुरंत सुर्खियों में आ गयी और राजनीतिक दलों के बीच विवाद का विषय बन गयी।

भारत में जाति व्यवस्था

-महेन्द्र

        जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक क्रूर सच्चाई है। भारत का इतिहास जाति व्यवस्था की अमानवीयता से भरा पड़ा है। समाज के एक बड़े हिस्से को पशुओं से भी नीचे का जीवन जीने को मजबूर किया गया और यह सब जातीय श्रेष्ठता व हीनता वाली जाति व्यवस्था के आधार पर किया गया। हिन्दू धर्म में जातियों का एक ऐसा सोपानक्रम है जिसमें सबसे नीचे दलित जाति और सबसे ऊपर ब्राह्मण जाति थी। क्योंकि जाति का निर्धारण जन्म से ही हो जाता था इसलिए पवित्रता और अपवित्रता भी जन्म से ही तय होती थी। ब्राह्मण सबसे पवित्र तो अंत्यज (दलित) सबसे अपवित्र माने जाते रहे हैं। इसमें शारीरिक काम शूद्रों व अंत्यजों के हिस्से तो बौद्धिक काम ब्राह्मणों के पास रहे हैं। सभी जातियों के अपने-अपने विशिष्ट काम निश्चित थे। वह काम उन जातियों के अलावा अन्य जाति के करने में मनाही थी। विवाह सम्बन्ध भी जाति के भीतर ही बनाये जाते थे। इसका उल्लंघन करने पर जाति से निकाला देकर कठोर दंड दिया जाता था। 

दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटनाएं व संघर्ष की दिशा

-राजेन्द्र

        देश की आजादी के 68 वर्ष बाद भी एक व्यक्ति की नाक इसलिए काट दी गयी क्योंकि वह एक दलित है और उसने सवर्ण के पास बैठकर खाना खाने की जुर्रत की। सुनपेड़ हरियाणा में एक दलित घर पर तेल डालकर मासूत बच्चों को जिंदा जला दिया गया। मध्यप्रदेश के नेगरुण गांव में दबंग सवर्ण लोगों द्वारा एक बारात पर इसलिए भारी पथराव किया क्योंकि दूल्हा घोड़ी पर चढ़ा था। इस घटना में 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गये और मजबूर होकर दूल्हे को पैदल जाना पड़ा। सवर्ण दबंगी की यह घटनाएं इक्का-दुक्की नहीं बल्कि समय-समय पर ऐसी घटनाएं सुनायी व दिखाई देती रहती हैं। दलित महिलाओं को निशाना बनाना भी दलित उत्पीड़न में आम बात है। पिछले वर्षों में हरियाणा में ऐसी दर्जनों घटनाएं प्रकाश में आयीं। वर्ष 2014 में ही ऐसी घटनाओं की संख्या हजारों में है। (देखें तालिका- 1) कई मामलों में तो तीखे प्रतिरोध भी हुए। भगाड़ा का संघर्ष ऐसे ही संघर्ष के रूप में याद किया जा सकता है।