राष्ट्रीय राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राष्ट्रीय राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 25 नवंबर 2023

 दुनियाभर में इजरायली शासकों के विरोध में प्रदर्शन

इजरायली शासकों द्वारा गाजा पर लगातार बमबारी जारी है। जिसमें अभी तक लगभग 10,000 लोग मारे गये हैं। गाजा अत्यधिक घना बसा आबादी क्षेत्र है। यहां मिसाइल हमलों का मतलब सीधे आम नागरिकों को निशाना बनाना है। इजरायली मिसाइल हमलों में अस्पताल और शरणार्थी शिविरों को भी निशाना बनाया जा रहा है। इजरायली शासकों के इन कुकर्मों के विरोध में दुनियाभर में जनता आक्रोशित है। इसमें प्रमुखता से इजरायली शासकों का विरोध, मानवीय सहायता दिये जाने, शांति तथा नागरिक हत्याओं पर रोक, गाजा से घेराबंदी हटाने आदि प्रमुख मांगें हैं। भारत, युनाइटेड किंगडम, जर्मनी, फ्रांस, हंगरी आदि देशों में जनता को इजरायली शासकों के कुकर्मों का विरोध करते हुए अपनी सरकारों के दमन का भी सामना करना पड़ रहा है।

 आगामी लोक सभा चुनाव और छात्र-नौजवान

पांच राज्यों में विधान सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। इन चुनावों को आगामी लोक सभा चुनावों के लिए सेमी फाइनल माना जा रहा है। इन विधान सभा चुनावों के नतीजे लोक सभा चुनावों को प्रभावित करेंगें, ऐसा समझा जा रहा है।

ये विधान सभा चुनाव और आगामी लोक सभा चुनाव ऐसे दौर में होने जा रहे हैं, जब हिन्दू बहुसंख्यकवाद पर आधारित फासीवादी ताकतें न सिर्फ मजदूर-मेहनतकश आबादी पर चौतरफा हमला जारी रखे हुए हैं, बल्कि इस हमले का दायरा शासक वर्ग की अन्य पार्टियो के नेताओं, मध्यम वर्ग के सचेत लोगों, पत्रकारों, मोदी सरकार के दमनकारी कदमों का विरोध करते वाले जनवादी अधिकारों की आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं और दलितों, महिलाओं, जन-जातियों और अल्पसंख्यकों विशेष तौर पर मुसलमानों तक बढ़ा दिया गया है।

रविवार, 23 अप्रैल 2023

 पूंजीवादी प्रचारतंत्र और जन चेतना

आजकल बहुत सारे लोगों के लिए एक चीज रहस्य और परेशानी का कारण बनी हुई है। वह है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता। देश के आम जन की हालत दिनों-दिन खस्ता होती जा रही है। बेरोजगारी, महंगाई, भुखमरी, गैर बराबरी सब आसमान छू रहे हैं। मोदी द्वारा आठ साल पहले किये गये सारे वायदों को स्वयं मोदी और उनकी पार्टी वाले ही भूल गये हैं चाहे भ्रष्टाचार खत्म करने का मामला हो या किसानों की आय दोगुनी करने का। ‘अच्छे दिन’ बहुत बुरे दिनों में तब्दील हो गये हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि मोदी और उनकी सरकार की लोकप्रियता गिरती। पर पूंजीवादी प्रचार माध्यम बताते हैं कि मोदी की लोकप्रियता बरकरार है और भाजपा उसके बल पर चुनाव जीत रही है। 

बुधवार, 23 नवंबर 2022

 ‘‘भारत जोड़ो यात्रा’’ निहित स्वार्थ और निहितार्थ

                                                                                                                   - कैलाश

आजकल कांग्रेस ‘‘भारत जोड़ो यात्रा’’ का जमकर प्रचार किये हुए है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक यह यात्रा चलनी है। 150 दिन में यह यात्रा 12 राज्य व केन्द्र शासित प्रदेशों से होते हुए जाएगी। 3570 किलोमीटर की इस पैदल यात्रा का उद्देश्य भारत को जोड़ना बताया जा रहा है।


गुरुवार, 10 नवंबर 2022

 अग्निपथ योजना

‘अग्निवीर’ के नाम पर युवाओं को छलती मोदी सरकार

                                                                                                                       -कैलाश

‘जिस दिन मोदी जी अपनी मां का जन्मदिन मनाने गये थे उस दिन हमारी सबकी माताएं घर पर रो रही थीं, इस मारे की हमारे बच्चों के संग ऐसा कर दिया गया है।’ ‘मोदी जी ने हमारे आगे हाथ जोड़कर वन रैंक, वन पेंशन के नाम पर वोट मांगा था और आज नो रैंक, नो पेंशन की योजना बनाकर हम युवाओं को बेरोजगारी में धकेल दिया है।’ ‘हम आर्मी की 2020 की भर्ती का फिजिकल और मेडिकल पास करके 2 सालों से रिटर्न का इंतजार कर रहे थे। कोरोना का बहाना बनाकर अभी तक हमें लटकाये रखा और अब पुरानी भर्ती रद्द कर अग्निपथ योजना को लाकर सरकार ने हमारे सपनों को एक झटके में तोड़ दिया है।’ ‘हमारे पास कोई रिएक्शन नहीं बचा है। क्योंकि जो भी एक आशा, एक उम्मीद परिवार की हमारी थी, जो सपने थे वो एक लाइव प्रेस कान्फ्रेंस द्वारा खत्म कर दिया गया।’ यह बातें उन नौजवानों की हैं जो सरकार द्वारा सेना में भर्ती के लिये लाई गयी नयी अग्निपथ योजना (टूर ऑफ ड्यूटी) का विरोध कर रहे हैं।

 कैसा ‘अमृत महोत्सव’, किसका ‘अमृत महोत्सव’

                                                                                                             -मोहित


भारत अपनी आजादी का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है। ‘अमृत महोत्सव’ नाम मोदी सरकार ने दिया हुआ है। इस रूप में ‘अमृत महोत्सव’ मोदी सरकार और अधिक से अधिक कह सकते हैं कि भारत का शासक वर्ग मना रहा है। इस ‘अमृत महोत्सव’ को जिस ढंग से मनाया जा रहा है उसमें आम लोगों की कोई भागीदारी नहीं है। सरकारी कार्यक्रम जैसे आयोजित कराये जाते हैं वैसे ही ‘अमृत महोत्सव’ का आयोजन हो रहा है। देश के छात्रों-नौजवानों, मजदूर-मेहनतकशों का इस आयोजन से शायद ही कोई मतलब हो।

बुधवार, 9 नवंबर 2022

 बेरोजगारी और समाज

अपनी मनपसंद नौकरी पाने पर किसी युवा का उत्साह देखते ही बनता है। जितना खुश वह युवा होता है, उससे कहीं ज्यादा खुश उसके मां-बाप और अन्य पारिवारिक जन होते हैं। और यदि नौकरी ऐसी मिली हो, जिसमें मोटी तनख्वाह हो तो क्या बात है। और गर आपकी कामयाबी के बाद फोटो अखबार में छप जाये या सोशल मीडिया पर आपकी तस्वीर कामयाबी के साथ वायरल हो जाये तो और अच्छी बात है। और गर नौकरी सरकारी अथवा किसी बड़े एमएनसी (बहुराष्ट्रीय कम्पनी) की हो तो...। मनपसंद, अच्छी नौकरी भविष्य की राह आसान कर देती है। 

 बेरोजगारी से पलायन तक खत्म न होती त्रासदी 

बेरोजगारी आज देश की क्रूर सच्चाई है। पिछले दो सालोें से तो छात्रों-युवाओं ने प्रधानमंत्री मोदी के जन्म दिवस को राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस मना अपना आक्रोश जगजाहिर कर ही दिया। इसके अलावा समय-समय पर बेरोजगारों के विरोध प्रदर्शनों की खबरें कभी किसी प्रदेश से तो कभी किसी प्रदेश से सामने आती रही हैं। उत्तराखण्ड भी इससे अछूता नहीं है। यहां बेरोजगारी के साथ पलायन का मुद्दा भी जुड़ जाता है। पहाड़ी जिलों में रोजगार न होने के चलते युवा-नौजवान मैदानी जिलों या देश के अन्य हिस्सों में पलायन करते रहे हैं।

 उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी की स्थिति


दिसंबर माह में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस नौजवानों पर लाठियां भांजते नजर आ रही है। यह नौजवान प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शिक्षक भर्ती को लेकर करीब 5 महीने से धरना दे रहे थे। इस धरने में आये मैनपुरी जिले के रजत जैन (35) कहते हैं ‘‘मैंने कई भर्तियों के फार्म भरे। किसी भर्ती में इंटरव्यू में पैसे मांगे गए तो किसी का पेपर लीक हो गया। शिक्षा भर्ती से उम्मीद थी, कोर्ट का आदेश भी है कि हमें 69 हजार शिक्षक भर्ती में शामिल किया जाए, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।’’ यह सिर्फ एक नौजवान नहीं बल्कि यूपी के लाखों नौजवानों की व्यथा है। साथ ही यह उनके साथ सरकार व प्रशासन के रुख को भी दिखा देता है।

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

 हम पढ़ेगें और अपना जनवादी अधिकार ले के रहेंगे

कर्नाटक के मंडया और उडुपी शहरों में मुस्लिम छात्राओं का हिजाब पहनकर स्कूल-कॉलेज जाने पर रोक लगाने के बाद हिजाब के समर्थन और विरोध में देश के कोने-कोने में विवाद फैल गया। वहीं दूसरी तरफ हिजाब के विरोध में दक्षिणपंथी व फासीवादी हिन्दू संगठनों से जुड़े छात्र भगवा शॉल पहन कर प्रदर्शन करने लगे। हिन्दू छात्रों का कहना था अगर मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहनंेगी तो हम भी भगवा पहनेंगे। हिजाब को समानता से जोड़ा जाने लगा है। फिलहाल इस मुद्दे पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है।

 कहानी दो कम्पनियों की

एक ही देश, एक ही सरकार, एक ही प्रधानमंत्री और एक ही समय में दो कम्पनियों से दो व्यवहार। संकटग्रस्त दो कम्पनियों में एक को बचाने के लिए सरकार अपने खजाने का मुंह खोल देती है और दूसरी कम्पनी को अपनी मौत मरने के लिए छोड़ देती है। मजे की बात यह है कि जिस कम्पनी को बचाने के लिए सरकार अपने खजाने का मुंह खोलती है वह देशी-विदेशी मालिकाने वाली निजी कम्पनी है और जिसको अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया जाता है वह एक सरकारी कम्पनी है। पहली कम्पनी का नाम ‘वोडाफोन आइडिया’ (VI) है तो दूसरी कम्पनी का नाम ‘भारत संचार निगम लिमिटेड’ (BSNL) है।

किसान आंदोलनः फ़ासीवादी सरकार से जंग जारी है


’यह फसलों नहीं नस्लों को बचाने की लड़ाई है’, ’बिल वापसी नहीं तो घर वापसी नहीं’ के उद्घोष के साथ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों को डटे हुए एक वर्ष पूरे होने को है। जबकि छोटे-मझोले किसान व आमजन विरोधी काले कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष करते हुए किसानों को एक साल से भी ज्यादा समय हो गया है। संघर्ष करते हुये बीते समय के दौरान जहाँ किसान नेतृत्व नये-नये प्रयोग करते हुए अपने संघर्ष को आगे बढ़ा रहा है, व्यापक मेहनतकश आबादी को संघर्ष से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। वहीं देश की सत्ता पर काबिज़ फ़ासीवादी मोदी सरकार अपने ही देश की जनता के खिलाफ युद्धरत है। वह जनता के आंदोलन को कुचलने-बदनाम करने के लिए नित नए तरीके खोजने में मशगूल रही है। अब सरकार किसान आंदोलन को थकाने व मौका मिलते ही नये हमले कर इसे कुचलने की दिशा में काम कर रही है।

सोमवार, 7 नवंबर 2022

पैंडोरा पेपर्स 

अमीरों द्वारा कानूनी टैक्स चोरी की दास्तान



साल 1997 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खोजी पत्रकारों की एक संस्था; इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआई) की स्थापना हुई। इस संस्था में 100 से ऊपर देशों के मीडिया संस्थानों के सैकडों पत्रकार जुटे थे। भारत से इंडियन एक्सप्रेस इससे जुड़ा है। तब से यह संस्था दुनिया भर में नेटवर्क बनाकर होने वाले भ्रष्टाचार और लूट की छानबीन में लगी हुई है। इसने वर्ष 2016 में पनामा पेपर्स जारी किये थे और अभी हाल ही में 117 देशों के 150 मीडिया संस्थानों के 600 पत्रकारों की मदद से एक रिर्पोर्ट जारी की है। जिसे पैंडोरा पेपर्स के नाम से जाना गया है। इस रिपोर्ट में 1990 के दशक के भी दस्तावेज शामिल हैं। यद्यपि ज्यादातर दस्तावेज 1996 से 2020 के बीच के हैं। ये दस्तावेज जर्सी, ब्रिटिश वर्जिन आईलैण्ड्स, साइप्रस जैसे कई ऑफशोर टैक्स हैवन्स में स्थित 14 सेवा प्रदाताओं (कंपनियों) से जुड़े हुए हैं, जिसमें करीब 29000 ऑफशोर कंपनियां और ट्रस्ट स्थापित करने का विवरण है। यह सेवा प्रदाता इस तरह की कंपनियां और ट्रस्टों का गठन करने में मदद देते हैं, जिससे धनकुबेर पैसे का घाल-मेल कर टैक्स बचा सकें। टैक्स हैवेन उन देशों या आइलैण्ड्स को कहा जाता है जहां अन्य देशों की तुलना में बहुत कम या कोई टैक्स नहीं लगता है। यह टैक्स हैवेन विदेशी नागरिकों, निवेशकों और उद्योगपतियों को यह सुविधा प्रदान करते हैं कि वे उनके यहां कागजी कंपनियों या ट्रस्ट का गठन कर सकें। इस तरह यह धनकुबेर टैक्स हैवेन वाले स्थान पर कागजी कंपनियां एवं ट्रस्ट खोल कर अपना पैसा देश से बाहर भेजते हैं, ताकि उनके मूल देश के टैक्स प्राधिकारियों को उनकी वास्तविक सम्पत्ति का पता न चल सके और वे टैक्स देने से बच जायें। यह कंपनियां ऑफशोर कंपनी कहलाती हैं। इसमें मालिक या स्टाक होल्डर जिस देश का नागरिक है उसके बजाय इसके किसी टैक्स हैवेन जगह पर कंपनी स्थापित करते हैं और मूल देश के अपने धन को इस कंपनी में भेजते हैं। इस कंपनी के माध्यम से निवेश करते हैं व टैक्स चोरी को अंजाम देते हैं। 

 पेगासस जासूसी षडयंत्र 

सरकार की मजबूती नहीं कमजोरी का परिचय 

पिछ़ले दिनों में पेगासस स्पाईवेयर द्वारा जासूसी कराये जाने पर काफी हो-हल्ला मचा। मोदी सरकार पर कई आरोप लगाये गये, लेकिन मोदी सरकार पूर्व में लगे आरापों की भांति ही इस गंभीर आरोप के समय भी या तो चुप रही या फिर झूठ बोलती रही। मोदी सरकार और उसके कई मंत्री-नेता इस गंभीर आरोप पर अपने-अपने तरीके से सफाई देते रहे।   

पेगासस स्पाईवेयर द्वारा जासूसी करने, फोन हैक करने के बारे में सबसे पहले फ्रांस की एक संस्था द्वारा खुलासा किया गया। फ्रांस की राजधानी पेरिस के एक गैर लाभकारी मीडिया संगठन फारविडन स्टोरीज को 50 हजार नंबरों का डेटा बेस मिला। उसने मानवाधिकारों पर काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल से संपर्क किया। इसके बाद इन दोनों संस्थाओं ने पूरी दुनिया की 17 मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर एक समूह बनाया। इस समूह ने डेटा बेस के नंबरों की जांच पड़ताल की। इस जांच-पड़ताल को उन्होंने ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ नाम दिया। 

 सावरकर को नायक बनाने की नाकाम कोशिशें जारी हैं

विनायक दामोदर सावरकर हिन्दू फासीवादियों के आदर्श नायकों में से एक हैं। परंतु अंडमान की सेलुलर जेल के अपने जीवन के दौरान माफीनामे और द्विराष्ट्र के साम्प्रदायिक सिद्धांत के कारण भारतीय जनमानस में उनके प्रति कोई सम्मान नहीं है। बल्कि जब सावरकर को पुनः स्थापित करने की कोशिश होती है तो जनता का भारी विरोध ही फूटता है। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा ‘सावरकर ने गांधी के कहने पर माफीनामे लिखे।’ हिन्दू फासीवादियों की इस कोशिश के बाद इतिहासकारों ने ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रखकर इनकी खूब मजम्मत की। इस तरह जनता के दिलो-दिमाग में सावरकर की भूमिका से जुड़े तथ्यों को पुनः ताजा कर दिया।

 17 सितंबर राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस


भारत में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। सरकारी नौकरियों में भर्ती न के बराबर हो रही है। इस समय भारत में कारोबार ठप्प होना, सरकारी संस्थानों को निजी हाथों में बेचा जाना, तेजी से गिरती जीडीपी आम चर्चा का विषय है। जुमले गढ़ने में माहिर मोदी सरकार हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा करके सत्ता में आयी थी। परंतु सरकार एक के बाद दूसरी रोजगार विहीन योजनाएं प्रस्तुत कर रही है। इस बीच बेरोजगारी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है। 

सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार अक्टूबर माह में बेरोजगारी दर 7.02 प्रतिशत है। सभी जानते हैं कि यह आंकडे़ वास्तविकता से काफी कम हैं। शहरी क्षेत्रों में यह दर 8 प्रतिशत तक है। सीएमआईई के अनुसार 20-24 आयु वर्ग के स्नातक युवाओं में बेरोजगारी दर 2017 में 42 प्रतिशत थी जो 2019 में बढ़कर 63.4 प्रतिशत तक पहुंच गयी। जो पिछले वर्ष 45 वर्षों में सबसे ऊंचे स्तर पर थी। तब से अब तक बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। लेकिन इस सब से बेखबर मोदी सरकार शुतुरमुर्ग की तरह मुंह छिपाये है। बढ़ती बेरोजगारी छात्रों-नौजवानों को क्षोभ से भर रही है। 

 मोदी की अमेरिका यात्रा

लचर विदेश नीति लाचार प्रधानमंत्री


2014 के आम चुनावों से पहले आम जनमानस में यह धारणा बैठाने की मुहिम चलायी गयी कि मनमोहन सिंह बहुत कमजोर प्रधानमंत्री हैं। यह धारणा घरेलू और विदेश नीति दोनों के संदर्भ में थी। 

2013 के बाद से ही कारपोरेट घरानों की तरफ से मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत किये जाने की रूपरेखा बनायी जाने लगी। मोदी को प्रोजेक्ट करने में दो धारणाओं का भरपूर इस्तेमाल किया गया। एक, मोदी एक मजबूत नेता हैं और दूसरा, मोदी एक कुशल प्रशासक हैं। 

कारपोरेट घरानों की योजना सफल रही। प्रचार माध्यमों के तेज ने मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर बैठाने में उनकी पूरी मदद की। मोदी की विदेश यात्राओं का, उनके भाषणों का सीधा प्रसारण किया जाता था। 

प्रचार करो, प्रचार करो सच्चा हो या झूठा 

प्रचार करो बस प्रचार करो


प्रचार क्या है? अपने सामान या सेवा की प्रशंसा करना। इस प्रशंसा से आपका सामान ज्यादा बिकेगा, आपकी सेवाऐं ज्यादा ली जायेंगी और आपकी दुकान ज्यादा चलेगी। बाजार की भाषा में प्रचार को विज्ञापन कहते हैं। प्रचार के लिए इस्तेमाल होने वाले बहुचर्चित चेहरे को ‘‘ब्रांड एंबेसडर’’ कहते हैं। राजनीति सेवा (सर्विस) है। भाजपा के राष्ट्रीय ब्रांड एंबेसडर मोदी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के ब्रांड एंबेसडर योगी हैं। मोदी को विज्ञापनों (फोटो छपवाने) से कितना प्यार है यह बताने की जरूरत नहीं है। फोटो छपवाने की इच्छा योगी में भी कम नहीं है। फोटो के साथ देश-प्रदेश के विकास की तस्वीर भी दिख जाती है। 

रविवार, 26 जनवरी 2020

नागरिकता (संशोधन) कानून 2019
हिन्दू राष्ट्र में रूपान्तरण की ओर एक कदम

आजादी पूर्व जो काम हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग न कर सके वह काम आजादी के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसकी पार्टी भाजपा कर रही है। द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के आधार पर ब्रिटिश कालीन भारत का विभाजन न हो सका। और इसलिये वीर सावरकर की आत्मा को शांति भी न मिल सकी। सावरकर की आत्मा को शांति प्रदान करने की ओर एक कदम है नागरिकता (संशोधन) कानून 2019।
CAA/NRC/NPR
देश की मेहनतकश जनता पर एक और हमला

भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद से अलग-अलग सरकारों में अल्पसंख्यकों पर अलग-अलग रूपों में हमले होते ही रहे। परंतु 2014 में बहुमत से केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद अल्पसंख्यकों पर हमले बेतहाशा बढ़े हैं। पिछले 6 सालों में पूरे समाज में मुस्लिम विरोधी माहौल बनाया गया। जगह-जगह पर मुस्लिमों की गाय के नाम पर हत्याएं की गयीं। जगह-जगह पर मुस्लिमों-दलितों को प्रताड़ित किया गया। इन सब से बीजेपी सरकार द्वारा हिन्दू-मुस्लिमों को बांटने का प्रयास किया गया। परंतु सरकार की आर्थिक असफलताएं सच को छुपा नहीं सकी। सच ये है कि नौजवान चाहे हिन्दू हों या मुस्लिम दोनों आज बेरोजगार हैं, देश में पिछने 45 सालों में सबसे अधिक बेरोजगारी है। चाहे हिन्दू हों या मुस्लिम दोनों ही मजदूर फैक्ट्रियों में जल कर मर रहे हैं, मजदूरों के सारे अधिकार मोदी सरकार ने छीन लिए हैं। हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही धर्मों के किसान व्यवस्था की मार सहकर या तो आत्महत्या कर रहे हैं या खेती छोड़कर नारकीय जीवन जी रहे हैं। ये ही वो सच्चाईयां हैं जिनसे मोदी सरकार हमारा ध्यान भटकाना चाहती है। वो चाहती है कि हम इन सच्चाईयों से मुंह फेरकर हिन्दू-मुस्लमान के नाम पर लड़ते रहें।