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गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

फिल्म समीक्षाः ‘द वेव’
पूंजीवाद में फासीवादी विचारों का आधार
-कविता

    2008 जर्मनी में बनी ‘द वेव’ फिल्म छात्रों के बीच फासीवादी विचारों के प्रसार की जमीन को बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाती है। अमेरिका के प्रोफेसर राॅन जोन्स द्वारा 1967 में कक्षा में ‘द थर्ड वेव’ नाम से प्रयोग किया। इस प्रयोग का मकसद यह दिखाना था कि जर्मनी में कैसे एक बड़ी आबादी हिटलर के फासीवादी विचारों के प्रभाव में आयी। बाद में इस प्रयोग के आधार पर एक किताब भी लिखी गयी। जिसे आधार बनाकर जर्मन निर्देशक डेनिस गैंसेल ने जर्मनी केन्द्रित रूपांतरण कर ‘द वेव’ जैसी प्रसिद्ध फिल्म बनायी।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

 आरआरआर (राइज, रोर, रिवोल्ट)

मिथक, छद्म इतिहास और विजुअल इफेक्ट से पैदा किया गया दूषित मनोरंजन

आरआरआर (राइज, रोर, रिवोल्ट) फिल्म के गाने नाटू-नाटू को ऑस्कर अवार्ड मिलने से यह फिल्म विश्व भर में सुर्खियों में है। फिल्मी दुनिया का सबसे बड़ा अवार्ड मिलने से फिल्म की कमाई भी बढ़नी है। फिल्म के बारे में बताया जा रहा है कि फिल्म निर्माता ने फिल्म में इतिहास, मिथक (रामायण, महाभारत के पात्रों को चित्रित कर) और तकनीक के जरिये मानवीय क्षमताओं से परे फिल्म के नायकों को दिखाया है। इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन है। सवाल ये है कि जब इतिहास को मनोरंजन के तौर पर पेश किया जाए तो ऐसे फिल्मी इतिहास से वास्तविक इतिहास के प्रति नजरिया कितना दूषित हो सकता है? भारत में आज जिस तरह शिक्षा से लेकर समाज की आम धारणाओं में संघ-भाजपा द्वारा इतिहास से खिलवाड़ किया जा रहा है, ऐसे में फिल्म आरआरआर कहां खड़ी होती है? इतिहास से यह खिलवाड़, मानवीय क्षमताओं का अतिरंजित चित्रण समाज में आम मेहनतकश लोगों, छात्रों-नौजवानों पर क्या असर छोड़ेगा?

शनिवार, 25 जनवरी 2020

सुपर 30
बाजारीकरण के दौर में शिक्षा का यतीमखाना उर्फ ‘सुपर 30’


विकास बहल निर्देशित ‘सुपर 30’ फिल्म पिछले दिनों काफी चर्चा में रही। यह फिल्म आई.आई.टी. प्रवेश परीक्षा के लिए गरीब बच्चों को मुफ्त कोचिंग देने वाले आनंद कुमार के जीवन पर आधारित(बायोपिक) है। ‘सुपर 30’ इन्हीं आनंद कुमार का मुफ्त कोचिंग सेन्टर का नाम है, जिसमें वे हर साल प्रतियोगिता द्वारा चयनित 30 गरीब बच्चों को मुफ्त कोचिंग व रहने-खाने की व्यवस्था मुहैया कराते हैं। 

यह फिल्म आनंद कुमार को एक आदर्श शिक्षक के रूप में और उनके ‘सुपर 30’ कोचिंग सेन्टर को शिक्षा के व्यवसायीकरण-बाजारीकरण के खिलाफ प्रतिरोध के एक सार्थक, सराहनीय प्रयास के रूप में पेश करती है। इसी के साथ इस बात को भी स्थापित करने का प्रयास करती है कि गरीब, बेसहारा तथा समाज व शिक्षा व्यवस्था में पूरी तरह उपेक्षित छात्र भी कामयाबी की बुलंदियों को छू सकते हैं। कामयाबी से यहां तात्पर्य यह है कि इस विषमता और भयंकर गरीबी-असमानता की दुनिया में वे उस मुकाम तक पहुंच सकते हैं, जहां केवल खाते-पीते अभिजात घराने व अंग्रेजीदां पृष्ठभूमि के छात्र ही पहुंच सकते हैं। बशर्ते इन गरीब-बेसहारा-उपेक्षित बच्चों की आंखों में आगे बढ़ने, ऊपर उठने का एक सपना हो। उस सपने को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प व जद्दोजहद हो और उस सपने की तामीर के लिए उन्हें आनंद कुमार और उनके ‘सुपर 30’ जैसे किसी समाजसेवी प्रयास का सहारा मिल जाये।