गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

फिल्म समीक्षाः ‘द वेव’
पूंजीवाद में फासीवादी विचारों का आधार
-कविता

    2008 जर्मनी में बनी ‘द वेव’ फिल्म छात्रों के बीच फासीवादी विचारों के प्रसार की जमीन को बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाती है। अमेरिका के प्रोफेसर राॅन जोन्स द्वारा 1967 में कक्षा में ‘द थर्ड वेव’ नाम से प्रयोग किया। इस प्रयोग का मकसद यह दिखाना था कि जर्मनी में कैसे एक बड़ी आबादी हिटलर के फासीवादी विचारों के प्रभाव में आयी। बाद में इस प्रयोग के आधार पर एक किताब भी लिखी गयी। जिसे आधार बनाकर जर्मन निर्देशक डेनिस गैंसेल ने जर्मनी केन्द्रित रूपांतरण कर ‘द वेव’ जैसी प्रसिद्ध फिल्म बनायी।

    गौरतलब है साल 2008 वही समय है जब अमेरिका से शुरू हुए आर्थिक संकट ने पूरे यूरोप को अपनी जद में ले लिया था। यूरोप में नव फासीवादी विचार समाज में फिर से जगह बना रहे थे। जर्मनी समेत पूरे यूरोप ने एक समय फासीवाद की विभीषिका को सबसे अधिक झेला, इसके बावजूद जर्मनी में नव फासीवादी विचारों का फैलाव देखकर जर्मनी की एक आबादी के बीच बेचैनी बढ़ रही थी। ऐसे समय में जर्मनी में बनी ‘द वेव’ फिल्म काफी चर्चा में रही। कई शिक्षण संस्थानों ने क्लास रूम में यह फिल्म सामूहिक तौर पर दिखाई। फिल्म में न सिर्फ फासीवादी सोच के पैदा होने की प्रक्रिया को दिखाया गया, बल्कि फिल्म पूंजीवाद की उन सीमाओं को भी उकेरती है, जिसमें फासीवादी पिशाच के पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

    संक्षेप में फिल्म की कहानी- फिल्म की कहानी एक जर्मन शिक्षक रेनर वेंगर के इर्द-गिर्द घूमती है। जिसे तानाशाही के बारे में सिखाने का एक सप्ताह का प्रोजेक्ट मिलता है। पहले दिन की क्लास में शिक्षक पाता है कि सभी छात्र तानाशाही को ‘‘पुरानी बात’’ मानकर खारिज कर देते हैं। वे कहते हैं ‘‘आज के जर्मनी में फासीवाद संभव नहीं’’ है। धीरे-धीरे क्लास आगे बढ़ती है और शिक्षक छात्रों से पूछता है कि ‘‘तानाशाही के लिए क्या जरूरी है’’। छात्र कहते हैं- ‘‘एक खास विचारधारा’’, ‘‘नियंत्रण’’, ‘‘निगरानी’’, ‘‘एक ताकतवर नेता का उभार’’, ‘‘लोगों में फैला असंतोष’’। फिल्म आगे बढ़ती है और लगभग सभी छात्र शिक्षक वेंगर को अपना नेता स्वीकार कर लेतेे हैं। क्लास के अनौपचारिक माहौल को खत्म कर छात्रों को पंक्ति में बैठा दिया जाता है। छात्रों को सिखाया जाता है कि ‘‘अनुशासन और एकता में शक्ति है’’। लगभग सारी क्लास उत्साहित हो जाती है और तानाशाही के रूप, प्रतीकों के लिए सुझाव देने लगती है। जल्द ही छात्र एक समूह में बंध जाते हैं इस समूह को ‘द वेव’ नाम दिया जाता है, एक लोगो, एक सलामी तय की जाती है। ‘द वेव’ की सलामी हिटलर की सलामी से मिलती-जुलती बनायी जाती है। समूह की वेशभूषा (सफेद कमीज और जींस) तय कर ली जाती है। ‘द वेव’ समूह अब आगे बढकर हिंसक समूह बन जाता है। वे विरोधियों को गद्दार ठहराने लगे, स्कूल और शहर की सड़कों पर उन्मादी ढंग से समूह का लोगो लगाने लगते हैं। वे कहने लगते हैं ‘‘हम देश को बदल डालेंगे’’ लेकिन क्या बदलना है यह स्पष्ट नहीं है। वेव समूह के उन्माद, नफरत और हिंसा को देखते हुए क्लास के कुछ छात्र-छात्राएं असहज हो जाते हैं और इसका विरोध करने लगते हैं। शिक्षक वेंगर की पत्नी भी वेंगर के स्वभाव में आये बदलाव के कारण विरोध करती है। अंत में वेंगर सभी छात्रों को एक हाॅल में बुलाकर दरवाजा बंद कर एक जोशिला भाषण देता है। जब एक छात्र उसकी बातों का विरोध करता है तो उसे देशद्रोही कहा जाता है। वेंगर के आदेश पर छात्र उसे सजा देने के लिए उठाकर मंच पर ले आते हैं। तब वेंगर स्पष्ट करता है कि वह अभिनय कर रहा है। यह दिखाने के लिए कि ‘द वेव’ का कितना असर है। वह बताता है कि ‘द वेव’ की सोच एक फासीवादी सोच है। वेंगर की बात सुनकर कुछ छात्र ‘द वेव’ की बुरी बातों को छोड़कर अच्छी बातों को अपनाने पर जोर देते हैं। लेकिन एक छात्र टिम जिसे ‘द वेव’ में अपने जीवन की सार्थकता का अहसास हुआ था, वह ‘द वेव’ को खत्म करने को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। वह घर से लाई पिस्तौल से विरोध करने वाले एक छात्र को गोली मार देता है और अंत में निराश होकर खुद को भी गोली मार आत्महत्या कर देता है। इस दुखद घटना पर फिल्म खत्म होती है।

    फिल्म कुछ सवाल, कुछ चेतावनी जरूर छोड़ जाती है। ‘द वेव’ फिल्म की खास बात यह है कि यह फासीवाद को कोई ऐतिहासिक भूल, कोई अस्वभाविक कृत्य के रूप में नहीं बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था की अंतरर्निहित विसंगतियों की उपज के तौर पर दिखाती है। फिल्म पूंजीवाद की उन सीमाओं को उजागर करती है जो फासीवाद के जन्म को संभव बनाती है।

    असमानताओं से भरे पूंजीवादी समाज में छात्र भी इससे अछूते नहीं हैं। अमीर-गरीब छात्र, प्रतिभावान-औसत छात्र आदि तरह की असमानताएं छात्रों के बीच भेदभाव, कुंठा, अहंकार को जन्म देती हैं। फिल्म में दिखाया गया कि पूंजीवादी व्यवस्था में रचे-बसे छात्र उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद, अलगाव और सामाजिक पदानुक्रम (धनी बनाम गरीब, लोकप्रिय बनाम हाशिए के छात्र) के शिकार हैं। छात्र के पास बेहतर भविष्य और सार्थक जीवन जीने का कोई रास्ता नहीं है। छात्रों का जीवन एक भयानक खालीपन से भरा हुआ है। छात्रों के अकेलेपन, असुरक्षा से मुक्ति के नाम पर एक झूठा सामूहिकता का नारा उन्हें तेजी से आकर्षित करता है। तानाशाही का यह झूठा सामूहिकता का नारा कभी धर्म, कभी नस्ल, कभी राष्ट्र के नाम पर दिया जाता रहा है। फासीवाद या तानाशाही का ‘‘अनुशासन और एकता में शक्ति’’ का नारा अपने अंतर्य में जनता को नियंत्रित करने वाला नारा बन जाता है। लोगों को नियंत्रित करने के लिए हिंसा भी जायज लगने लगती है। और यही फिल्म की परिणति भी होती है। छात्र तानाशाही विचारों के प्रभाव में पूरी तरह आ जाते हैं और वे हिंसक समूह बनाने लगते हैं। विरोधियों को गद्दार और गद्दारों के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराने लगते हैं। फिल्म का अंत भी टिम (छात्र) द्वारा एक छात्र की हत्या और खुद की आत्महत्या पर खत्म होती है।

    समग्रता में ‘द वेव’ फिल्म की बात करें, तो फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसका यर्थाथवादी चित्रण है। जो दिखाती है कि फासीवाद कोई बाहरी चीज नहीं बल्कि पूंजीवाद की आंतरिक कमियों का ही परिणाम है। फिल्म की सबसे बड़ी कमी वर्गीय संघर्ष को स्पष्ट रूप से नहीं दिखाना है। यह छात्रों के व्यक्तिगत मनोविज्ञान पर ज्यादा केन्द्रित है। यह फासीवाद का एकाधिकारी पंूंजीपति वर्ग और उसकी संकटग्रस्तता का फासीवाद के साथ सम्बन्ध को गहराई और स्पष्टता से रेखांकित नहीं करती है। भारत में जहां आम तौर पर जनवादी सोच और माहौल बेहद कमजोर है। यहां के छात्र-नौजवान फासीवादी जहर के आसान शिकार बन रहे हैं। पिछले समय में हिन्दू फासीवाद ने छात्र-नौजवानों के बीच अपने जहरीले विचारों को काफी फैला भी दिया है। भारत में छात्र-नौजवानों का फासीवादी विचारों से दूषित होने के कारणों के एक पहलू को ‘द वेव’ जैसी फिल्म से समझा जा सकता है।

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