औपनिवेशीकरण के दौर में भारत और चीन (भाग 1)
अंग्रेजों द्वारा चीन के औपनिवेशीकरण में भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल
-निशांत
(औपनिवेशीकरण के दौर में भारत और चीन के बीच सम्बन्धों के बारे में यह लेख दो भागों में प्रस्तुत है। पहले भाग में मुख्यतः इतिहास के उस पहलू की चर्चा की गयी है, जो चीन को उपनिवेश बनाने के लिए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश सरकार द्वारा आम भारतीयों को फौज-पुलिस में भर्ती कर चीन में इस्तेमाल किये जाने से सम्बन्धित है। औपनिवेशीकरण के शुरूआती चरण में आम भारतीयों में राष्ट्रवाद व साम्राज्यवाद विरोध के विचार अभी परिपक्व नहीं थे। इसलिए ब्रिटिश साम्राज्यवादी चीनी जनता के आंदोलनों को कुचलने हेतु भारतीयों का इस्तेमाल करने में कामयाब रहे।)
सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में जब अंग्रेज व्यापारी भारत में आने शुरू हुए, उस समय भारत अभी एक मध्ययुगीन सामंती समाज की ही अवस्था में था। इसकी तुलना में यूरोप आधुनिकता के प्रवेश द्वार पर पहुँच चुका था। मध्ययुग की विशेषता के अनुरूप, यदि कभी राजनीतिक एकीकरण हो भी जाता तो वह सामंती स्वरूप के कारण कुछ समय बाद (खासकर किसी मजबूत शासक की अनुपस्थिति में) पुनः विघटन में बदल जाता था। ठीक इसी समय ब्रिटिश साम्राज्यवादी भारत में क्षेत्र विस्तार के अपने मंसूबों को परवान चढ़ा रहे थे।
उपरोक्त परिदृश्य को ही ध्यान में रखकर यह समझा जा सकता है कि कैसे अंग्रेज भारतीयों को ही इस्तेमाल कर भारत को गुलाम बनाने में कामयाब हो गये। आम भारतीय के लिए अपने किसी सामंत की नौकरी करने और ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए नौकरी करने में कोई अंतर नहीं था। सेना, पुलिस, राजस्व, सामान्य प्रशासन, आदि के निचले संस्तरों पर ब्रिटिश शासन-सत्ता का संचालन भारतीय ही करते थे। जो अपने उच्च पदस्थ अंग्रेज प्रशासकों के आदेशों-निर्देशों के अधीन थे।
भारतीयों से बनी व्यवस्थित और विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त टुकड़ियों की शुरूआत सबसे पहले फ्रांसीसियों ने की। आंग्ल-फ्रांसिसी युद्धों के बाद अंग्रेजों ने भारतीयों की विशेष सैन्य टुकड़ियों को संगठित करना प्रारम्भ कर दिया।
अंग्रेजी सेना में भर्ती हो रहे यह भारतीय बेहद गरीब परिवारों से सम्बन्धित थे। यह लोग या तो भूमिहीन परिवारों से सम्बन्धित थे या फिर अंगे्रजों की ही नीतियों के कारण अपने पूर्व के रोजगारों से उजडे़ हुए परिवारों से सम्बन्धित थे। अंगे्रजों की शोषणकारी नीतियों के चलते उन्नीसवीं सदी की शुरूआत से ही व्यापक अकालों का दौर शुरू हुआ। अतः शुरूआत से ही हम देख सकते हैं कि अंग्रेज साम्राज्यवादियों के औजार-हथियार बने इन भारतीय लोगों में से बहुत से लोग ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की ही नीतियों से उजड़े हुए मजबूर लोग थे।
ब्रिटिश साम्राज्यवादी शुरूआत में ही समझ गये कि भारतीय सिपाहियों को न केवल अन्य औपनिवेशिक शक्तियों बल्कि देशी सामंती शासकों के विरुद्ध भी बखूबी इस्तेमाल किया जा सकता है। प्लासी के युद्ध से लेकर 1857 के विद्रोह को कुचलने में भी अंग्रेजों ने ‘वफादार’ भारतीय सैनिक टुकड़ियों का ही इस्तेमाल किया। सेना में भारतीयों को उपयोग करना अंग्रेजों के लिए इस हद तक कारगर रहा कि अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल अन्य देशों के अपने अभियानों में भी किया। चीन में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा भारतीय सैनिकों का प्रयोग उनके इन्हीं अभियानों में से एक था, जिसकी हम अब विस्तार से चर्चा करने वाले हैं।
भारत से बाहर भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल सर्वप्रथम लार्ड वैलेजली के शासनकाल में हुआ। चीन में भारतीय सैनिकों को पहली बार 1808 में मकाऊ के अन्दर भेजा गया। चीनी सम्राट एक के बाद एक आते अंग्रेजी जहाजी बेड़ों को देखकर आशंकित था, इसलिए उसने व्यापार के लिए लीज पर जमीन देने की अंग्रेजों की मांग मानने से इंकार कर दिया। इस समय तक अंग्रेज चीनी सम्राट से सीधी सैनिक भिड़न्त करने को तैयार नहीं थे। इसलिए साल के अंत तक अंग्रेजों ने अपनी उपरोक्त भारतीय सैनिक टुकड़ी को वापस भारत बुला लिया।
चीनी सम्राट के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की पहली सीधी सैनिक भिड़न्त 1840 में प्रारम्भ हुई, इसे इतिहास में हम ‘अफीम युद्धों’ के नाम से जानते हैं क्योंकि इन युद्धों की जड़ में अंग्रेजों द्वारा भारत से भेजी जा रही अफीम के व्यापार का सवाल था। ‘प्रथम अफीम युद्ध’ 1840 से 1842 तक चला और ‘द्वितीय अफीम युद्ध’ का काल 1856 से 1860 है। इन दोनों ही युद्धों में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल चीन में किया। दरअसल अंगे्रजों के लिए चीन से इन लड़ाईयों को जीतने का काम मुख्यतः भारतीय सैनिकों ने ही किया। इस कारण आम चीनी नागरिकों की नफरत का पहला शिकार यह भारतीय सैनिक ही बनते थे, न कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी। अफीम युद्ध कई स्थानों पर एक साथ या अलग-अलग समय लड़ी गई लड़ाईयों की एक शृंखला थी।
प्रथम अफीम युद्ध के दौरान सम्राट के आधिकारिक सैन्य विराम पर सहमति के बावजूद आम चीनी नागरिक क्वांगचो पर कब्जे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। ऐसे में, क्वांगचो प्रान्त के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने ब्रिटिश कब्जे के विरुद्ध अपना प्रतिरोध जारी रखा। इसी कड़ी में हुई सानय्वानली की घटना का चीन में उपनिवेशविरोधी संघर्ष में खासा महत्व है। इस भिड़न्त के जवाब में अंग्रेज अधिकारियों ने मद्रास नेटिव इन्फैन्ट्री की 37वीं व 49वीं रेजिमेन्ट व कुछ अन्य टुकड़ियों को चीनी किसान जनता के दमन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ भेज दिया। ग्रामीण क्षेत्र में लड़ाई की बेहद विपरीत परिस्थितियों की संभावना के मद्देनजर ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों ने अंग्रेज सैनिकों के अधिकांश हिस्से को इस अभियान से दूर ही रखा। भारतीय सैनिकों को ही बहुतायत में भेजा।
सानय्वानली में अभियान के दौरान भारतीय सैनिकों को पहले भीषण गर्मी और फिर तूफानी बारिश का सामना करना पड़ा। सारे मैदान, खेत और गड्ढे पानी से भर गए थे, ऐसे में सैनिक शिविर स्थापित करने के लिए भी कोई स्थान नहीं था। सेना का गोला बारूद भी पानी में भीग के किसी काम का नहीं रह गया था। इन परिस्थितियों की सबसे ज्यादा मार 37वीं मद्रास नेटिव इन्फैन्ट्री के भारतीय सैनिकों को झेलनी पड़ी। 60-70 भारतीय सैनिक अपनी मुख्य टुकड़ी से बिछुड़कर चीनी किसानों के हथियारबंद दस्तों से घिर गये और हताहत हुए। इस समय अगर क्वांगचो प्रान्त का स्थानीय चीनी अधिकारी (प्रीफेक्ट) ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का मोहरा न बनता तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की हार निश्चित होती। इस प्रकार, ब्रिटिश उपनिवेशवादी एक निर्णायक हार को टालते हुए पीछे हट गए। पूर्ण जीत न मिलने के बावजूद चीनी किसान जनता सानय्वानली के संघर्ष को भविष्य के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में अपनी प्रेरणा का स्रोत पाती रही है।
सानय्वानली की उपरोक्त घटना के बाद 1842 के साल के मध्य तक काफी बड़ी सेना भारत से चीन पहुँच चुकी थी। जिसमें बंगाल वालन्टियर्स (राजपूत) और मद्रास नेटिव इन्फैन्ट्री की तीन और रेजिमेन्ट शामिल थीं। जून, 1842 में शंघाई शहर पर भी आंशिक कब्जा स्थापित हो चुका था। नानचिंग में ही 29 अगस्त, 1842 को ‘नानचिंग की संधि’ हुई, जिसने ‘प्रथम अफीम युद्ध’ का पटाक्षेप किया। ब्रिटिश सेना ने नानचिंग शहर का कब्जा तभी जाकर छोड़ा, जब चीनी सम्राट ने 15 सितम्बर को ‘नानचिंग की संधि’ की औपचारिक स्वीकृति प्रदान की। नवम्बर तक सारी ब्रिटिश सेना हांगकांग वापस लौट आई और दिसम्बर, 1842 तक कुछ टुकड़ियां को छोड़कर बाकी सेना भारत वापस लौट आईं।
प्रथम अफीम युद्ध’ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए चीन में अपने कब्जे और व्यापार के लिए भी भविष्य में होने वाले मुनाफे के लिए निर्णायक था। किन्तु ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के इस भारी फायदे की कीमत चीनी जनता के साथ-साथ आम परिवारों के भारतीयों ने भी चुकाई। केवल 1842 के साल में ही हांगकांग की सुरक्षा में तैनात सेना के 25 प्रतिशत सिपाही बीमारियों से मर गए। 1843 तक यह आंकड़ा 39 प्रतिशत तक पहुंच गया। हांगकांग के ब्रिटिश कमांडर जनरल डि‘आग्योलार ने तो यह तक टिप्पणी कर दी थी कि हांगकांग पर कब्जा बनाए रखने के लिए हर तीन साल में पूरी एक रेजिमेन्ट तो केवल बीमारियों से ही खत्म हो जाने के लिए चाहिए। अंग्रेज सैनिक और अफसर जहाजों में रहते थे, जहां परिस्थितियां बेहतर होती थीं। इसके विपरीत भारतीय सिपाहियों को मुख्य भूमि पर तैनात किया जाता था। भारतीय सैनिकों को घटिया खाना परोसा जाता था, जबकि चुसान बंदरगाह पर ही अनाज से भरे दो व्यापारी जहाज पूरा समय मौजूद थे, जिनसे सस्ते में अनाज खरीदा जा सकता था।
बीमारियों के अतिरिक्त बहुत से लोग समुद्री तूफानों में जहाज डूबने से भी इस दौरान मारे गए। जहाज ‘गोलकोण्डा’ और ‘नर्बदा’ इसी तरह के चक्रवाती तूफानों का शिकार बने थे। इसमें भी ‘नर्बदा’ की कहानी तो और भी दयनीय है। तूफान आने पर जहाज पर सवार सभी 18 अंग्रेज अफसर जीवन रक्षक नौकाओं पर बैठ कर भाग गए। अंतिम बची नौका को अंग्रेजों द्वारा जला दिया गया। इन भारतीयों में से काफी सारे लोग तूफान में मारे गए। स्पष्ट है कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए जैसे आम चीनी नागरिकों के जीवन का कोई मतलब नहीं था, ऐसे ही अपने ही भारतीय सैनिकोें की जान की भी उनके लिए कोई गिनती नहीं थी। साम्राज्यवादियों का पूरा इतिहास ही ऐसी घटनाओं से कलुषित है।
चीनी इतिहास में ‘द्वितीय अफीम युद्ध’ और ‘थाएफिंग विद्रोह’ (स्वर्गिक राज्य आंदोलन, 1850-1864) का कालखण्ड कुछ समय के लिए एक-दूसरे से गुंथा हुआ रहा है। इस बार ब्रिटेन के साथ फ्रांस भी मिला हुआ था। ‘थाएफिंग विद्रोह’ के निशाने पर बाह्य आक्रांताओं के साथ ही चीन की घरेलू सामंती शासन-सत्ता भी थी। इन दोनों ही ऐतिहासिक घटनाक्रमों में पुनः ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भारतीय सैनिकों को अपने औजार-हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। हालांकि इस बार भारत में 1857 की क्रांति अपने चरम पर थी।
ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1856 में दक्षिण-पूर्वी चीन के सबसे बड़े शहर क्वांगचो पर कब्जा करने की योजना बनाई। लेकिन इस योजना में भारत के अन्दर 1857 में हुए विद्रोह ने परेशानी डाल दी। जून, 1858 में कुछ भारतीय सैनिक चीन के अभियान पर वहां पहुंचे। इसके बाद, जून-जुलाई, 1859 में ब्रिटिश-फ्रेंच संयुक्त सेना उत्तर में थिएनत्सिन शहर के नजदीक पहुंची। गौरतलब है कि इस समय तक भारत में क्रांति की ज्वाला लगभग ठण्डी पड़ गयी थी। साथ ही बहुत से क्षेत्र ऐसे थे, जहां 1857 की क्रांति का प्रभाव ज्यादा नहीं था, उदाहरण के लिए पंजाब का क्षेत्र। ऐसे में, पंजाब इन्फैन्ट्री की चार रेजिमेन्टों के अलावा लुधियाना सिक्ख रेजिमेन्ट, पहली सिक्ख इररेगुलर कैवेलरी व दूसरी सिक्ख कैवलरी को चीन लड़ाई के लिए भेजा गया। कुल मिलाकर इस समय तक चीन अभियान के अलावा लगभग 4 हजार भारतीय सिपाही वहां पहुंच चुके थे।
अगस्त से अक्तूबर, 1860 तक यह सेनाएं शाही सरकार की राजधानी बीजिंग के आस-पास युद्धरत रहीं। अंततः 13 अक्तूबर, 1860 को यह सेना पहली बार बीजिंग शहर के अन्दर प्रवेश कर गईं। प्राचीन और ऐतिहासिक शहर बीजिंग को पूरी तरह से सेना की लूटपाट और आगजनी के लिए छोड़ दिया गया। शाही महल (समर पैलेस) के खजाने लूट लिये गए और महल को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया। यह सब साम्राज्यवादी पागलपन 24 अक्तूबर को जाकर ही थमा, चीनी सम्राट और साम्राज्यवादियों के बीच शांति समझौता सम्पन्न हुआ। लुधियाना रेजिमेन्ट, पंजाब रेजिमेन्ट, बाम्बे और मद्रास की कुछ सैनिक टुकड़ियां विद्रोह कुचलने के लिए रोक दी गयीं। इस काले वक्त में कुछ राहत देने वाला तथ्य यह है कि भारतीय टुकड़ियों के कुछ सैनिक इस दौरान थाएफिंग विद्रोहियों से भी जा मिले थे, और उनकी लड़ाई में सहयोग करने लगे थे। निश्चित ही यह 1857 की क्रांति का प्रभाव था।
उपरोकत घटनाक्रम के बाद अगले लगभग चार दशक तक कोई सीधी सैनिक कार्रवाई ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की चीन के अन्दर नहीं रही। इसी दौरान बहुत से पूर्व फौजी चीन के अन्दर पुलिस-सेवा व ब्रिटिश संस्थानों व क्षेत्रों की सुरक्षा में गार्ड की नौकरियों में भी तैनात हुए। आम चीनी जनता में खौफ पैदा करने के लिए पुलिस व गार्ड की नौकरियों के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की पहली पसन्द जट्ट सिक्ख व पठान हुआ करते थे। आज भी टकराव की स्थितियों में चीनी लोग जब भारतीयों के प्रति अपनी नफरत अभिव्यक्त करते हैं तो उसका प्रतीक वे काले, लम्बी दाढ़ी वाले, पगड़ी बांधे, हट्टे-कट्टे इंसान को बनाते हैं। उदाहरण के लिए आप चीनी फिल्मों के भारतीय हास्य पात्रों और हाल में चीन के अन्दर लोकप्रिय हुए कामेडियन ‘हाउ क क’ (ब्रदर हाउ) के यूट्यूब विडियोज देख सकते हैं।
1899-1900 में चीन के अन्दर साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध एक और जनविद्रोह फूटा, जो ‘ई ह थ्वान’ (बाक्सर विद्रोह) के नाम से जाना जाता है। बाक्सर विद्राहियों के दमन की कार्रवाई चीन के अन्दर मौजूद सभी साम्राज्यवादियों की एक संयुक्त कार्रवाई थी; ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जापान व अमेरिका इनमें प्रमुख थे।
ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने इस दमनात्मक कार्रवाई के लिए लगभग 18 हजार भारतीय सिपाहियों की भारी-भरकम फौज उतारी, जो साम्राज्यवादियों की संयुक्त सेना का सबसे बड़ा हिस्सा बनता था। गौर करने वाली बात यह है कि इस अभियान में कुछ भारतीय रजवाड़ों; जोधपुर, अलवर, बीकानेर और मलेरकोटला; की सेनाएं प्रमुख थीं। बीकानेर और ग्वालियर के महाराजा तो व्यक्तिगत तौर पर भी इस अभियान में चीन गए। यह तथ्य भारतीय राजा-रजवाड़ों और नवाबों की ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के साथ गठजोड़ की पराकाष्ठा को दिखाता है। अफसोस की बात है किन्तु तथ्य है कि आम भारतीय परिवारों के बेटे एक बार फिर साम्राज्यवादियों को मोहरा बन इस लूट-खसोट के कुशल औजार-हथियार साबित हुए। लेकिन बहुत से भारतीयों ने इस अभियान में आम चीनी नागरिकों के प्रति अपनी संवेदनाएं भी प्रकट कीं, जिनके रिकार्ड उपलब्ध हैं और बहुत से चीनी नागरिकों के साथ भी जा खड़े हुए। इस तरह के सारे प्रकरणों की चर्चा लेख के दूसरे भाग में विस्तार से की जायेगी।
उपरोक्त सम्पूर्ण विवरण से हम समझ सकते हैं कि साम्राज्यवाद विरोधी चेतना के अभाव में किस प्रकार आम भारतीय लोग ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल हुए। आज भी हम यह सत्य अपने चारों तरफ देख सकते हैं कि किस प्रकार शांति सेनाओं और संयुक्त राष्ट्र सेनाओं के अभियानों के बतौर आम भारतीय साम्राज्यवादियों की साजिशों के लिए इस्तेमाल होते हैं। अन्तर बस इतना है कि आज की साम्राज्यवादी साजिशों में आजाद भारत के शासक शामिल हैं। यह पहले से भिन्न है जब साम्राज्यवादियों के किसी अभियान से इन्कार का कोई अधिकार भारतीयों को नहीं था।
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