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सोमवार, 7 नवंबर 2022

 धर्मों की गति-नियति: पंथ, सांप्रदायिकता और भविष्य


आधुनिक पूंजीवादी दुनिया में सभी धर्म जहां पहुंचे हैं वहां उनके संस्थापकों अथवा मध्यकालीन समर्थकों ने कभी कल्पना नहीं की होगी। यहां तक कि सबसे कट्टर माने जाने वाले धर्मों का स्वरूप भी एकदम बदल गया है। 

इसका सबसे बड़ा कारण पूंजीवादी समाज के एकदम अलग तौर-तरीके तथा ज्ञान-विज्ञान का बेहद ऊंचे स्तर का विकास है। प्रकृति, समाज और मानव के बारे में जिन सवालों के जवाब धर्म देते थे या देने का प्रयास करते थे अब उनका ज्यादा बेहतर जवाब विभिन्न प्रकार के विज्ञान देते हैं। यही नहीं, विज्ञान के विकास के कारण बहुत सारे पुराने सवाल ही आप्रासांगिक हो गये हैं। उदाहरण के लिए जीव विज्ञान का हर छात्र जानता है कि धरती पर जीवन का कोई अन्य व्यापक उद्देश्य नहीं है। इसीलिए इसके एक हिस्से के तौर पर मानव जीवन का भी कोई अन्य व्यापक उद्देश्य नहीं है। इस उत्तर के साथ धर्मों का आदि काल से चला आ रहा यह सवाल स्वतः ही अप्रसांगिक हो जाता है कि आखिर मानव जीवन का उद्देश्य क्या है?

रविवार, 26 जनवरी 2020

इसाई धर्म

666 एक संख्या है, थोड़ी अजीब सी संख्या। पर इसाई धर्म में इसका खास महत्च है। इसके विश्वासों के अनुसार यह शैतान की संख्या है यानी 666 का मतलब शैतान है। इसका जिक्र बाइबिल के न्यू टेस्टामैन्ट के प्रकाशन ग्रंथ में मिलता है।

शनिवार, 25 जनवरी 2020

यहूदी धर्म

आज आबादी के हिसाब से दुनिया के दो सबसे बड़े धर्म इसाई और इस्लाम हैं। ये दोनों जिस आदि परंपरा को मानते हैं उस परंपरा वाला धर्म स्वयं काफी कम आबादी का धर्म है। यह है यहूदी धर्म। आज यहूदी धर्म के दुनिया भर में करीब डेढ़ करोड़ अनुयाई हैं। इनमें से आधे से थोड़ा कम इस्राइल में रहते हैं। भारत के साम्प्रदायिक हिन्दुओं को जो इस्लामी धार्मिक मान्यताएं इतनी अजीब लगती हैं उनमें से कुछ दरअसल यहूदियों की भी मान्यताएं हैं और प्रत्यक्षतः वहीं से ली गयी हैं, मसलन खतना, हलाल, सुअर को अपवित्र पशु मानना, इत्यादि। स्वयं यहूदियों ने अपनी कुछ विशिष्ट धार्मिक मान्यनाएं पारसियों से ग्रहण की जो फिर बाद में इसाई और इस्लामी मान्यताएं भी बन गई, मसलन कयामत का दिन, स्वर्ग और नरक तथा पुनरुथान इत्यादि।
पारसी धर्म

हिन्दू पुराण कथाओं में देवों के साथ असुरों की काफी चर्चा है। यह चर्चा वेदों की निरंतरता में है जिसमें असुर देवों के विरोधी और दुश्मन हैं। पुराण कथाओं में तो देवासुर संग्राम यानी देवों व असुरों के बीच युद्ध की भरमार है। अक्सर ही असुर देवों के स्वर्ग लोक पर धावा बोलते हैं और देव खुद को हारता हुआ पाकर मनुष्यों का सहारा लेते हैं। देवों और असुरों का मिलकर समुद्र मंथन करना तो बच्चे-बच्चे को पता है।

देवों और असुरों की इन कथाओं से हिन्दुओं के मन में जो तस्वीर बनती है उसमें देव अच्छे होते हैं और असुर बुरे। ऐसे में एक आम हिन्दू को यह जानकर आश्चर्य होगा कि दुनिया में एक ऐसा भी धर्म है जिसमें असुर अच्छे हैं और देव बुरे। और यह धर्म कोई कम पुराना नहीं है। यह धर्म है पारसी धर्म जिसे पश्चिम में जोरोस्टरवाद कहा जाता है।

रविवार, 1 दिसंबर 2019

जैन धर्म

जिस देश में पहनावे पर, खासकर लड़कियों-महिलाओं के पहनावे पर इतना ध्यान दिया जाता हो वहां एक नंग-धड़ंग व्यक्ति के पीछे सफेद साड़ी पहने महिलाओं तथा अन्य आम स्त्री-पुरुषों का एक छोटा-मोटा ‘जुलूस’ वास्तव में एक अजीबो-गरीब दृश्य उत्पन्न करता है। पर ऐसा दृश्य कई बार शहरों-कस्बों में देखने को मिल जाता है और आस-पास से गुजर रहे लोगों के लिए कुतूहल का विषय बन जाता है। 

इस तरह का ‘जुलूस’ दिगंबर जैन मुनियों और उनके अनुयाईयों का होता है। नंग-धड़ंग व्यक्ति जैन मुनि होता है जबकि सफेद साड़ी में जैन साध्वियां। शेष लोग जैन धर्म के आम अनुयाई होते हैं। दिगंबर जैन विश्वासों के अनुसार दिगंबर जैन मुनि वस्त्रों का भी इसलिए त्याग कर देते हैं कि वे अपरिग्रह के सिद्धांत का पूर्णता से पालन कर सकें। इनके मुकाबले श्वेतांबर जैन मुनि बिना सिला हुआ वस्त्र धारण करते हैं। 

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

बौद्ध धर्म
-शाकिर

  आज हमारे देश में दलितों में एक धारा है जो जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न से अपनी मुक्ति हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाने में देखती है। इसके अनुसार बौद्ध धर्म न केवल जातिगत भेदभाव से मुक्त है बल्कि इसका विरोधी भी है। इसलिए इसे अपनाकर जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न से मुक्ति पायी जा सकती है। इसकी शुरुआत 1956 में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने की थी। जब उन्होंने अपने हजारों अनुयाइयों के साथ नागपुर में बौद्ध धर्म अपना लिया था। बौद्ध धर्म अपनाने वाले इन लोगों को आम तौर पर नव-बौद्ध कहा जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे भारत में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान के तौर पर देखा जा रहा है। यानी लगभग एक हजार साल तक विलोपन के बाद अब भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान हो रहा है। 

बुधवार, 21 नवंबर 2018

हिन्दू धर्म
-शाकिर

        अक्सर ही कुछ शरारती किस्म के लोग हिन्दू धर्म के अनुयाईयों से एक सवाल करते हैं। वह यह कि हिन्दू धर्म का प्रवर्तक या संस्थापक कौन है? बौद्ध धर्म के गौतम बुद्ध, जैन धर्म के महावीर जैन और सिख धर्म के गुरू नानक की तरह क्या हिन्दू धर्म का कोई प्रवर्तक है? और है तो वह कौन है?

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

कबीलाई समाजों में धर्म

कछुआ, मेंढक और सांप कोई आकर्षक जीव नहीं है। कोई यह भी नहीं कह सकता कि वे बहुत सम्मानित जीव हैं। यह इसके बावजूद कि कुछ हिन्दू धर्म के कुछ अनुयाई नागपंचमी के दिन नागों की पूजा करते हैं। कछुओं और मेंढकों को तो यह सम्मान भी हासिल नहीं है। पर्यावरणवादी कछुओं को लुप्तप्राय जाति मानकर तब भी हो-हल्ला मचाते हैं पर अपनी बहुतायत के चलते मेंढकों को यह भी नसीब नहीं है। कुल मिलाकर यह कि कछुआ, मेंढक और सांप कहीं गिनती में नहीं आते।

ऐसे में जब पता चलता है कि अपने देश में प्राचीन काल में एक वेद का नाम सांप पर था, एक उपनिषद का नाम मेंढक पर था तथा एक ऋषि का नाम कछुआ पर था तो थोड़ी हैरानी की बात हो जाती है। ऋग्वेद की एकमात्र संहिता जो आज उपलब्ध है उसका नाम शाकल संहिता है। शाकल सांप की एक किस्म है। एक उपनिषद का नाम माण्डूक्य उपनिषद है यानी मेंढक उपनिषद (वैसे एक और उपनिषद का नाम श्वेताश्वतर यानी सफेद खच्चर उपनिषद है) प्राचीन ऋषियों में एक सम्मानित ऋषि कश्यप है जो नाम कस्सप अथवा कच्छप (कछुआ) से निकला है। वैदिक साहित्य के नामों से परिचित कोई भी व्यक्ति इस तरह के जन्तुओं या पौधों से निकले हुए तमाम नामों से जरा भी चकित नहीं होता क्योंकि वहां तो इसकी भरमार है।