धर्मों की गति-नियति: पंथ, सांप्रदायिकता और भविष्य
आधुनिक पूंजीवादी दुनिया में सभी धर्म जहां पहुंचे हैं वहां उनके संस्थापकों अथवा मध्यकालीन समर्थकों ने कभी कल्पना नहीं की होगी। यहां तक कि सबसे कट्टर माने जाने वाले धर्मों का स्वरूप भी एकदम बदल गया है।
इसका सबसे बड़ा कारण पूंजीवादी समाज के एकदम अलग तौर-तरीके तथा ज्ञान-विज्ञान का बेहद ऊंचे स्तर का विकास है। प्रकृति, समाज और मानव के बारे में जिन सवालों के जवाब धर्म देते थे या देने का प्रयास करते थे अब उनका ज्यादा बेहतर जवाब विभिन्न प्रकार के विज्ञान देते हैं। यही नहीं, विज्ञान के विकास के कारण बहुत सारे पुराने सवाल ही आप्रासांगिक हो गये हैं। उदाहरण के लिए जीव विज्ञान का हर छात्र जानता है कि धरती पर जीवन का कोई अन्य व्यापक उद्देश्य नहीं है। इसीलिए इसके एक हिस्से के तौर पर मानव जीवन का भी कोई अन्य व्यापक उद्देश्य नहीं है। इस उत्तर के साथ धर्मों का आदि काल से चला आ रहा यह सवाल स्वतः ही अप्रसांगिक हो जाता है कि आखिर मानव जीवन का उद्देश्य क्या है?