‘जेन-जी’: आगामी युगों के मुक्ति सैनिक
-मनोरमा
इस वक्त हर आकर ‘जेन-जी’ की धूम है। पिछले दो सालों में ‘जेन-जी’ ने कई देशों के बूढ़े, मक्कार, भ्रष्ट, ऐय्याश नेताओं की नींद हराम कर दी है। श्रीलंका, केन्या, बांग्लादेश, तुर्की, मंगोलिया, इण्डोनेशिया, नेपाल, फिलीपीन्स, पेरू, मोरक्को, मेडागास्कर, आदि देशों में जेन-जी ने या तो शासकों को धूल चटा दी या फिर उन्हें मजबूर कर दिया कि वे होश में आ जायें। अभी सितम्बर में सबसे बड़ी मिसाल बनकर नेपाल उभरा। विद्रोह की लपटों से नेपाल की संसद, उच्चतम न्यायालय भी नहीं बच सके। प्रधानमंत्री को गद्दी छोड़कर, सेना की बैरक में दुबकना पड़ा। यही हाल पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउपा और कल के सूरमा प्रचण्ड का भी हुआ। किसी नेता को सरेआम पीटा गया तो किसी का घर जला दिया गया। कुछ ऐसा ही हाल कुछ समय पहले श्रीलंका और फिर बांग्लादेश में हुआ था।
नेपाल की अनुगूंज भारत में भी सुनायी देने लगी। विपक्ष जेन-जी के नाम पर सत्ता पक्ष को डराने लगा। और भयभीत सत्ता पक्ष जेन-जी को कभी अनाप-शनाप बकने लगा तो कभी उसे पुचकारने लगा। और फिर जो कुछ लद्दाख में हुआ उसने सत्ता में बैठे लोगों के होश उड़ा दिये। शांतिपूर्ण ढंग से अलग लद्दाख राज्य की मांग करने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक, शिक्षाविद और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ (एन.एस.ए.) लगाकर जोधपुर जेल में डाल दिया। भारत में भी ‘जेन-जी’ में बड़ी बेचैनी है। वह कभी उत्तराखण्ड तो कभी बिहार तो कभी कर्नाटक में सड़कों में उतर रहा है। हद तब हुई जब डगमग होती अपनी कुर्सी को बचाने के लिए उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री तो सीधे जेन-जी के धरने-आमरण अनशन में पहुंच कर, उनकी चिरौरी करने लगे।
सितम्बर, 2025 तो ‘जेन-जी’ की सुनामी सा बनकर उभरा। नेपाल (8-13 सितम्बर), फिलीपीन्स (12 सितम्बर), पेरू (20 सितम्बर), मेडागास्कर (25 सितम्बर से) और मोरक्को में (27 सितम्बर से) ‘जेन-जी’ ने शासकों की नींद हराम कर दी। यहां सभी जगह मुद्दे कमोबेश एक जैसे थे। सत्ता में बैठे लोगों के प्रति गहरी नफरत। और इस गहरी नफरत के पीछे एक ओर सत्ताधीशों का भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और ऐय्याशी भरी जिन्दगी तो दूसरी ओर ‘जेन-जी’ के बीच फैली भयानक बेरोजगारी, गिरता जीवन स्तर, टूटते सपने, खराब होती शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था और शासकों द्वारा कदम-कदम पर उनकी आजादी व जनवाद (डेमोक्रेसी) पर प्रतिबंध की कोशिशें थी।
नेपाल में गुस्से का तात्कालिक कारण तो सोशल मीडिया पर लगाया गया प्रतिबंध था। नेपाल के शासक, विदेशों से संचालित मीडिया को अपने नियंत्रण में लाना चाहते थे। और फिर उन्होंने सोशल मीडिया (टिक टाक को छोड़कर) पर प्रतिबंध लगा दिया। पहले से खार खाये ‘जेन-जी’ ने इसे अपने जीवन और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध माना। फिर वह हुआ जिसकी कल्पना नेपाल के आज के शासकों ने शायद ही कभी की थी। पांच दिन के भीतर सारा खेल हो गया। ‘जेन-जी’ विद्रोह ने सत्ता में बैठे लोगों को दिन में तारे दिखा दिये। वे तो सत्ता के खेल में मशगूल थे। कभी वो इसके साथ तो कभी वो उसके साथ। के.पी.शर्मा ‘ओली’, शेर बहादुर देउपा और प्रचण्ड (वहां की तीनों प्रमुख संसदीय पार्टियों- एमाले, कांग्रेस और माओवादी के प्रमुख) इन तीनों के बीच प्रधानमंत्री की कुर्सी नाचती रहती थी। तीनों ने मिलकर सत्ताधारियों का एक ऐसा गिरोह बना लिया था जो वर्षों से सत्ता पर काबिज था। और नेपाल के ‘जेन-जी’ से लेकर साधारण जन इस गिरोह के शिकार बने हुए थे। वे इस गिरोह के सताये हुए थे।
नेपाल की जैसी कहानी ही श्रीलंका, बांग्लादेश आदि की भी थी। अब वैसी ही कहानी पेरू और मोरक्को की बन रही है। शासकों का व्यवहार, हर जगह एक सा ही है। इन देशों में ‘जेन-जी’ व मेहनतकशों के विद्रोह को दबाने के लिए घोर दमन का सहारा लिया गया। बहुत बड़ी संख्या में, ‘जेन-जी’ मारे गये। और अपनी बारी में ‘जेन-जी’ ने भी शासकों को नहीं छोड़ा। नेपाल में ही नहीं मेडागास्कर व मोरक्को में ‘जेन-जी’ के आक्रोष से न तो पुलिस, न सरकारी इमारतें और न ऐय्याशी के प्रतीक बने होटल, माॅल व कारें बची हैं। नेपाल और मेडागास्कर में तो ‘जेन-जी’ एक तरह से अपने तात्कालिक मकसद में कामयाब रहे परन्तु मोरक्को, पेरू में पुराने शासक अभी अपनी गद्दी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। कल को उनका हाल भी नेपाल जैसा हो, कौन जाने।
‘जेन-जी’ के इन आन्दोलनों का हाल कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा हाल क्रिप्टोकरेंसी बिटकाॅइन का है। कोई नहीं जानता कि बिटकाइन को किसने शुरू किया और कौन इसे संचालित करता है। सातोशी नाकामोतो नाम से एक गुमनाम व्यक्ति ने बिटकाइन को शुरू किया। यह एक विकेन्द्रीकृत डिजिटल मुद्रा है, जिस पर किसी केन्द्रीय बैंक का कोई नियंत्रण नहीं है। ठीक यही बात जेन-जी जैसे विकेन्द्रीकृत आन्दोलनों पर लागू होती है। ये आन्दोलन डिजिटल प्लेटफार्म (सोशल मीडिया) के द्वारा शुरू किये जाते हैं। शुरू करने वाले छद्म नाम का इस्तेमाल करते हैं। वे दावा करते हैं कि वे किसी विचारधारा को नहीं मानते। उनके प्रतीक नये हैं। इण्डोनेशिया, नेपाल आदि में उनका झण्डा मांगा धारावाहिक (सीरीज) ‘वन पीस’ से लिया गया है। इसे वे ‘आजादी और अन्याय के प्रति एक आवाज (ए सिम्बल आफ फ्रीडम एण्ड ए वायस अंगेस्ट इनजस्टिस) का प्रतीक बताते हैं। पहले-पहल इसका इस्तेमाल इण्डोनेशिया में (अगस्त, 2025) किया गया। और फिर इसका इस्तेमाल नेपाल, मोरक्को, मेडागास्कर व अन्य देशों में होने लगा। बिटकाइन की तरह ये आन्दोलन भी पूंजीवाद के आम नियमों से संचालित हो रहे हैं। और ठीक यहीं से इनकी सीमा सामने आने लगती है। कोई बांग्लादेश व नेपाल की तरह सेना की सरपरस्ती स्वीकार करते हैं तो कोई मोरक्को की तरह कहता है कि उसे ‘‘अपने देश और अपने राजा’’ से मुहब्बत है। पूंजीवाद और उसकी राजनैतिक व्यवस्था की सीमा को ये आंदोलन नहीं लांघते हैं।
मोरक्को का ‘जेन-जी 212’ नामक आन्दोलन (212: मोरक्को का अंतर्राष्ट्रीय फोन कोड +212 है। यह एकता का प्रतीक भी है।) से जुड़े लोगों का कहना है; उनका किसी राजनैतिक विचारधारा से कोई जुड़ाव या उसके प्रति कोई झुकाव नहीं है। उनका मोरक्को की राजशाही से कोई विरोध नहीं है। और उन्हें तो ‘अपने देश व राजा से प्यार है’। वे तो मोरक्को की बदहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और सरकारी स्कूलों में महज सुधार चाहते हैं। वे बढ़ती सामाजिक असमानता से नाराज हैं। मोरक्को में कोई नहीं जानता, किसने यह आन्दोलन शुरू किया। और यह हकीकत है कि आन्दोलन सोशल मीडिया में पैदा और उसके जरिये ही आगे बढ़ा। और फिर इसने मोरक्को के सत्ता तंत्र को हिला दिया। वहां का ‘जेन-जी 212’ आन्दोलन भारी दमन के बाद भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
मेडागास्कर में भी आन्दोलन के सूत्रधार व मुख्य ताकत ‘जेन-जी’ ही हैं। फेसबुक से शुरू इस आन्दोलन में अक्टूबर के पहले सप्ताह तक दर्जनों लोग मोर जा चुके हैं। देश की राजधानी में सरकार को तब कफ्र्यू लगाना पड़ा जब राष्ट्रपति ने अपनी सरकार को बर्खास्त कर दिया पर ‘जेन-जी’ व अन्य प्रदर्शनकारियों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। मेडागास्कर, हिन्द महासागर में स्थित एक अफ्रीकी द्वीप देश है। यहां की तीन करोड़ आबादी में से 75 फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं। मोरक्को में जहां मुख्य सवाल बदहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य व सरकारी स्कूल व्यवस्था बनकर उभरे थे तो मेडागास्कर में गुस्से की वजह बिजली और पानी की जबरदस्त कमी बने।
ऐसा नहीं है कि ‘जेन-जी’ आन्दोलन सिर्फ एशिया, अफ्रीका व लातिनी अमेरिकी देशों में ही फैला हुआ है बल्कि इसकी चपेट में यूरोप, अमेरिका व आस्ट्रेलिया महाद्वीप भी हैं। यूरोप, अमेरिका व आस्ट्रेलिया में इजरायल द्वारा गाजा पट्टी में किये जा रहे भीषण नरसंहार के विरोध व फिलीस्तीन की आजादी के समर्थन में स्कूल, विश्वविद्यालय से लेकर सड़कों पर व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड जैसे दर्जनों देशों में छात्र-युवाओं (बस! यहां इन्हें जेन-जी नाम नहीं दिया जा रहा है हालांकि ये सब जेन-जी ही हैं) ने अपने-अपने देश के शासकों को मजबूर कर दिया है कि वे इजरायल के जियनवादी हत्यारे शासकों द्वारा किये जा रहे नरसंहार (सं.रा.अमेरिका को छोड़कर जहां ट्रम्प-नेतन्याहू के साथ खड़ा है) का खुलकर विरोध करें। इसका नतीजा यह निकला है कि फ्रांस, ब्रिटेन, आदि देश फिलीस्तीन को एक स्वतंत्र देश की मान्यता देने को मजबूर हुये हैं। इटली की राजधानी रोम में 5 अक्टूबर को बहुत बड़ा प्रदर्शन, फिलीस्तीन के समर्थन में हुआ। जिसमें पुलिस के अनुसार ढाई लाख लोगों ने हिस्सा लिया। ऐसे ही प्रदर्शन पूरे यूरोप में हुये हैं।
यूरोप के कई देशों खासकर फ्रांस में कटौती कार्यक्रमों के खिलाफ एक के बाद एक बड़े प्रदर्शन हुए हैं। फ्रांस की हालत यह है कि राष्ट्रपति मैक्रों से देश नहीं संभल रहा है। एक के बाद एक चार प्रधानमंत्री पिछले दो साल में वहां बदले जा चुके हैं। फिर 6 अक्टूबर को खबर आई कि पांचवे प्रधानमंत्री ने भी इस्तीफा दे दिया है। फ्रांस राजनैतिक ही नहीं सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है।
‘जेन-जी’ असल में इक्कीसवीं सदी की पहली पीढ़ी है। इस पीढ़ी को 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों के लिए जाना जाता है। इस तरह इस पीढ़ी में, वर्ष 2025 में 28 साल से कम उम्र के युवा शामिल हैं। इस पीढ़ी के दिलो-दिमाग में, बीसवीं सदी की अच्छी या बुरी स्मृतियां नहीं हैं। उनके लिए वह जो कुछ है, वह इतिहास का अंग है। इस पीढ़ी ने न तो महान क्रांतियों (रूस की अक्टूबर क्रांति, चीन की नवजनवादी व सांस्कृतिक क्रांति) की धमक सुनी है और न ही पहले और दूसरे विश्व युद्ध की त्रासदियों का अनुभव किया है। इस पीढ़ी ने न तो साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध में हिस्सा लिया है, और न ही चे ग्वेरा जैसे क्रांतिकारी की रोमानी छवि को अपने जीवन में उतारा है। असल में इस पीढ़ी को न तो समाजवाद का ठीक से पता है और न समाजवाद को दी जाने वाली पूंजीवादी गालियों का पता है। न तो उन्होंने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की मीठी बातें और न ही शीतयुद्ध की तल्ख बातों को सुना है। उन्होंने अपनी पहली या दूसरी पीढ़ी के उन लोगों के ठाट तो देखे हैं जो सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियां पा जाते हैं, परन्तु अपने जीवन में एक स्थायी नौकरी के लिए भी मारे-मारे फिरते ही खुद को या साथ वालों को भटकते पाया है।
‘जेन-जी’ ने जब जन्म लिया तब तक कल्याणकारी राज्य का ढांचा लगभग ध्वस्त हो चुका था। हर ओर नंगा, बेलगाम पूंजीवाद था। सामाजिक असमानता बढ़ती ही गयी है। एक तरफ चंद वे लोग हैं जिनकी ऐय्याशियों और अमीरी के किस्सों से प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, सोशल मीडिया पटा रहता है तो दूसरी ओर व्यापक आबादी है, जो खुलकर अपने सपने नहीं देख पाती है। हकीकत में उतारना तो बहुत दूर की बात है। कदम-कदम पर अवरोध हैं। सामान्य इन्सानी जिन्दगी भी जीना मुश्किल है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म ही एक ऐसा स्थान है, जहां ‘जेन-जी’ खुलकर अपने अंदाज में जीता है। उसका दिल व दिमाग सोशल मीडिया में धड़कता और चलता है। सोशल मीडिया ‘जेन-जी’ का न केवल जीवन बल्कि उसका एक सामाजिक हथियार भी है। इसलिए उन सभी देशों में जहां ‘जेन-जी’ विद्रोह पर उतरा वहां सोशल मीडिया ही उसका संगठन, उसका मोर्चा, उसका हथियार बनकर उभरा।
यह कहना सच नहीं होगा कि ‘जेन-जी’ की कोई विचारधारा नहीं है। यह जानी-पहचानी बात है कि किसी भी समाज में शासक वर्ग की विचारधारा व संस्कृति ही प्रभुत्वशाली होती है। ‘जेन-जी’ का भी बड़ा हिस्सा इसका शिकार है। इसीलिए नेपाल में वे सेना के सामने झुक जाते हैं। एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को (जिसने निःसंदेह पूरी ईमानदारी से नेपाली पूंजीवादी व्यवस्था की सेवा की थी), अपनी ओर से अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री चुनते हैं। ठीक इसी तरह मोरक्को के ‘जेन-जी’ कहते हैं कि ‘हमें राजा मुहम्मद से प्यार’ है। जो व्यक्ति मोरक्को की बर्बादी के लिए जिम्मेदार है, वे उसी पर आस लगाये बैठे हैं।
विश्व इतिहास के दृष्टिकोण से देखें तो यह बहुत अनोखा नहीं है। अतीत में कई बार क्रांतिकारी जनता इस भ्रम का शिकार रही है कि राजा या जार या सम्राट तो भला है परन्तु बीच के लोग, मंत्री या अफसर खराब हैं। फिर एक समय ऐसा आता है जब यह भ्रम भी टूट जाता है। 9 जनवरी 1905 को रूस में ऐसी घटना घटी थी जब मजदूर; पादरी गेपन के नेतृत्व में जार के पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पहुंचे थे। जार की सेना ने मजदूरों के खून से पीटरबुर्ग की सड़कों को लाल कर दिया था। यह ‘खूनी इतवार’ बाद में अक्टूबर क्रांति के रणबाकुरों के लिए एक सबक बन गया। उन्होंने पहले जार, पूंजीपतियों, भूस्वामियों के विचारों से मुक्ति पाते हुए ही क्रांति का झण्डा लहराया। वे अपने दुश्मनों को ढंग से पहचान गये। ‘जेन-जी’ को भी यह करना है।
आज ‘जेन-जी’ जो कुछ कर रहे हैं कल वे इसके कहीं न कहीं आगे बढ़ेंगे। आज विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले कल को लाल झण्डा भी लहरायेंगे। इंकलाब की जरूरत को समझेंगे। पूंजीवाद की कब्र को खोदेंगे और समाजवाद को कायम करेंगे। वे अपने अनुभवों, अपने आन्दोलन का जब वैज्ञानिक सार-संकलन करेंगे तो उन्हें यह साफ-साफ दिखायी देगा कि यह पूंजीवाद ही है जो उनके जीवन, भविष्य व सपनों की कब्र खोद रहा है।
जेन-जी मतलब?
सदा से पीढ़ियों में फर्क रहा है। यह फर्क उनके नजरिये, सोच, रहन-सहन, पसन्द तकनीक, संस्कृति, फैशन, आदि में दिखलायी देता रहा है। पीढ़ियों के इस फर्क को हिन्दी फिल्मों में बखूबी पेश किया और भुनाया है। हर जमाने के युवा नये चीजों के तलबगार रहे हैं। वे ऐसा कुछ नया हमेशा गढ़ते रहे हैं, जो उन्हें पुराने से अलग कर देता है। हमारे समय में तो लोग मौजूद हैं, उनमें मोटा-माटी पांच पीढ़ियों के लोग हैं।
पहली पीढ़ी के लोग वे हैं जिनका जन्म मोटे तौर पर दूसरे विश्व युद्ध (हमारे देश में आजादी के आस-पास हुआ) के समय या उसके कुछ समय बाद हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के बाद तेजी से आजादी में वृद्धि हुयी। इसे ‘बेबी बूम’ काल भी कहा गया। इस पीढ़ी में अक्सर ही मां-बाप की कई-कई संतानें होती थी। यह पीढ़ी आम तौर पर 1965 के पहले की मानी जाती है। यही पीढ़ी ‘बेबी बूम’ पीढ़ी भी कही जाती है। ये 60 साल से अधिक उम्र वाले लोग हैं।
दूसरी पीढ़ी: 1965 से 1980 के बीच जन्म लेने वाली पीढ़ी की है। यह पीढ़ी कम्प्यूटर युग के पहले की है। इस पीढ़ी को जनरेशन-एक्स या ‘जी-एक्स’ कहते है। इस पीढ़ी ने आर्थिक उदारीकरण, सोवियत संघ का पतन, जर्मनी का एकीकरण, भारत में बाबरी मस्जिद ध्वंस व भाजपा का उदय आदि देखा। इस वक्त इनकी उम्र 45 से 60 साल के बीच है।
तीसरी पीढ़ी: 1981 से 1997 के बीच पैदा हुयी। ये ‘जी-वाई’ या ‘‘मिलेनियल्स’’ कहलाये। इस समय इनकी उम्र 29 से 44 साल के बीच है। आर्थिक उदारीकरण या नई आर्थिक नीतियों के दौर में से पले-बढ़े। सोशल मीडिया खासकर इन्हें ‘फेसबुकिया’ पीढ़ी भी कह सकते हैं।
चैथी पीढ़ी: ‘जेन-जेड’ या ‘जेन-जी’ पीढ़ी है। 1997 से 2012 के बीच जन्मी यह पीढ़ी इस वक्त 13 से 28 साल की है। इस वक्त इसी पीढ़ी के ही जलवे दुनिया में चल रहे हैं।
पांचवी पीढ़ी: यह पीढ़ी ‘जेन-एल्फा’ कहला रही है। 12 साल तक बच्चे इस पीढ़ी के हैं।
इस पीढ़ी या उसके बाद की पीढ़ी ‘जेन-बीटा’ और उसके बाद की पीढ़ी को ‘जेन-गामा’ कहा जा सकता है। कौन जाने नयी पीढ़ियां अपने को क्या कहलवाना पसंद करें और या फिर उसे यह वर्गीकरण भी उबाऊ और बोरिंग लगने लगे। वह कुछ नया लेकर आ जाये।
‘जेन-जी’ और भगत सिंह
‘जेन-जी’, भले ही युवाओं के लिए एक नया नाम हो परन्तु हर युग में युवाओं ने ही जमाने को बदलने में निर्णायक भूमिका निभायी है। इन्हें कभी ‘‘नयी पीढ़ी’’ तो कभी ‘‘युवा तुर्क’’ तो कभी ‘‘नौजवान’’ कहा गया। ये सभी उसी उम्र का प्रतिनिधित्व करते थे जिसका प्रतिनिधित्व ‘जेन-जी’ करते हैं। ऐसे ही युवावस्था के बारे में शहीदे-आजम भगत सिंह ने 1925 में ‘‘युवक!’’ नामक लेख में कहा था। तब वे स्वयं 18 साल के थे।
‘‘युवावस्था मानव जीवन का वसन्तकाल है। उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो जाता है। हजारों बोतल का नशा छा जाता है। विधाता की दी हुई सारी शक्तियां सहस्र-धारा होकर फूट पड़ती हैं। मदान्ध मातंग की तरह निरंकुश, वर्षाकालीन शोणभद्र की तरह दुर्द्धर्ष, प्रलयकालीन प्रबल प्रभंजन की तरह प्रचण्ड, नवागत वसन्त की प्रथम मल्लिका कलिका की तरह कोमल, ज्वालामुखी की तरह उच्छृंखल और भैरवी-संगीत की तरह मधुर युवावस्था है। उज्जवल प्रभात की शोभा, स्निग्ध सन्ध्या की छटा, शरच्चन्द्रिका की माधुरी ग्रीष्म-मध्यान्ह का उत्ताप और भाद्रपदी अमावस्या के अर्द्धरात्र की भीषणता युवावस्था में सन्निहित है। जैसे क्रांतिकारी के जेब में बमगोला, षड्यन्त्री की असटी में भरा-भराया तमंचा, रण-रस-रसिक वीर के हाथ में खड्ग, वैसे ही मनुष्य की देह में युवावस्था। 16 से 25 वर्ष तक हाड़-चाम के सन्दूक में संसारभर के हाहाकारों को समेटकर विधाता बन्द कर देता। दस बरस तक यह झांझरी नैया मंझधार तूफान में डगमगाती रहती है। युवावस्था देखने में तो शस्यश्यामला वसुन्धरा से भी सुन्दर है, पर इसके अन्दर भूकम्प की-सी भयंकरता भरी हुई है। इसीलिए युवावस्था में मनुष्य के लिए केवल दो ही मार्ग हैं- वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर, वह गिर सकता है अधःपात के अंधेरे खन्दक में।’’
‘‘आगामी युगों के मुक्ति सैनिक’’
- नागार्जुन
...
आगामी युगों के मुक्ति-सैनिक, कहां हो तुम
निपीड़ित-शोषित मानवता के उद्धारक, कहां हो तुम
आओ, सामने आओ बेटे
मैं तुम्हारा चुंबन लूंगा
मैं तुम्हें अपना चुंबन दूंगा
...
आओ, खेत-मजदूर और भूमिदास नौजवान
आओ, खदान श्रमिक और फैक्टरी-वर्कर नौजवान
आओ कैंपस के छात्र और फैकल्टियों के नवीन प्रवीण प्राध्यापक
हां, हां तुम्हारे ही अंदर तैयार हो रहे हैं
आगामी युगों के लिबरेटर
(‘मैं तुम्हें अपना चुंबन दूंगा’, 1973 कविता से एक अंश, शीर्षक ‘परचम’ ने दिया है।)
इन्हें जमानत भी मयस्सर नहीं
-विजेयता
उमर खालिद 14 सितम्बर 2020 को गिरफ्तार किये गये। वो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोध छात्र थे। कई छात्र और सामाजिक आंदोलनों के साथ वे सीएए-एनआरसी विरोधी आन्दोलन में सक्रिय रहे। 2020 में हुए दिल्ली दंगों में उमर को मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर गिरफ्तार किया गया। उमर खालिद के साथ मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शरजील इमाम, शिफा उर रहमान, शादाब अहमद, शादाब अहमद, आदि की जमानत याचिकाएं लगातार खारिज की जा रही हैं। आसिफ इकबाल तन्हा, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, सफूरा जरगर जैसे कुछ छात्रों को ही जमानत मिली। छात्रों को जमानत न मिल पाने का मुख्य कारण उन पर ‘गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून’ (यूएपीए) लगाना है। यह कानून आतंकी गतिविधि के मामलों में इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया था। आज भारतीय राज्य व्यवस्था ने, अपने ही नागरिकों की असहमति और न्याय की आवाजों को दबाने के लिए आतंकवाद के नाम पर क्रूर दमन चक्र चला रखा है।
यह जनमानस में स्थापित बात है कि 2020 का दिल्ली दंगा; सीएए-एनआरसी विरोधी आन्दोलन को कुचलने के लिए प्रायोजित करवाया गया। भाजपा नेता (अब विधायक) कपिल मिश्रा ने अपने साथ आयी भीड़ के सामने दिल्ली पुलिस को धमकी दी थी कि धरना खत्म करवाओ वरना हम अपने तरीके से खत्म करवायेंगे। संघ की लम्पट सेनाओं के लिए यह करना संभव है। बजरंग दल, विहिप, एबीवीपी, भाजपा, आदि-आदि संगठनों में ऐसे लम्पट गुण्डे भरे पड़े हैं। लेकिन दंगों का आरोप आन्दोलनकारी छात्रों व अन्य लोगों पर लगा दिया गया। फिर शुरू हुआ राजकीय दमन का खेल इस दमन चक्र के अंदर इंसाफ पसंद आवाजों को कुचलने का काम जारी है। संघर्षशील सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ही अल्पसंख्यक नागरिकों के नागरिक अधिकारों को रद्द किया जा रहा है। मजदूरों, दलितों-आदिवासियों की आवाज उठाने वाले लोगों को जेलों में भरा जा रहा है।
नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में 2019 में यूएपीए कानून को और सख्त किया गया। जहां पहले संगठित समूह को आतंकी कार्यवाही के लिए दोषी माना जाता था वहीं अब एक व्यक्ति को ‘‘आतंकी’’ बना देने के प्रावधान बना दिये गये। हिंसा की परिभाषा को व्यापक किया गया। कानून सख्त बनाये जाने के समय ठीक ही यह संदेह जताया जा रहा था कि इसका इस्तेमाल सामाजिक कार्यकर्ताओं पर किया जायेगा। पूर्व में बने टाडा, पोटा, मकोका, आदि ऐसे ही आतंकवाद निरोधी कानून थे जिनका दुरुपयोग किया गया था। लेकिन इन कानूनों को एक समय सीमा के लिए बनाया गया था इसकी तुलना में यूएपीए की कोई समय सीमा नहीं है। NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2023 तक 2700 लोग UAPA के तहत जेल में बंद थे पर इनमें से 95 प्रतिशत लोगों का ट्रायल ही नहीं शुरू हुआ। 2019 से 2022 तक यूएपीए के तहत 5023 मामलों में केवल 252 को ही दोषी करार दिया गया। 2016 से 2022 तक UAPA के तहत 8000 मामले दर्ज हुए जिनमें से सिर्फ 3 प्रतिशत ही दोषी पाए गए। इसका अर्थ ये है कि 97 प्रतिशत लोग बिना किसी जुर्म के जेलों में बंद रहे। इस समय भी बहुत सारे राजनैतिक कार्यकर्ताओं, नागरिकों को UAPA के तहत बिना किसी दोष सिद्धि के सालों से जेल में बंद किया गया है।
दिल्ली दंगों में दोषी बनाये गये उमर, शरजील, आदि छात्रों पर अभी तक चार्जशीट भी दाखिल नहीं की गयी है। पूर्व में दी गयी हजार पन्नों की जांच रिपोर्ट इतनी फर्जी थी कि पुलिस की जगहंसाई ही हुई। जिसमें बताया गया कि जब आधिकारिक रूप से डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा तय भी नहीं हुई थी तब डोनाल्ड ट्रम्प के भारत भ्रमण के दौरान दंगों की योजना उमर बना रहे थे। साफ है कि पुलिस की कार्यवाही न्यायसंगत या दिल्ली दंगों के दोषियों को पकड़ने की नहीं है। उमर के खिलाफ मुख्य आरोप उनके भाषणों और सोशल मीडिया पोस्टों पर आधारित हैं। कोई भी व्यक्ति अपनी बात बोल या लिखकर ही व्यक्त करेगा। उसे आतंकी कहने का मतलब है कि सरकार सबको चुप करा देना चाहती है। पुलिस की कार्यवाही ऐसी है कि संघर्षरत छात्रों को पकड़ लिया गया, अब उनको किसी भी तरह दोषी साबित करना है।
न्यायालय जो समय-समय पर कहता रहा है कि ‘जमानत अपवाद नहीं, अधिकार हो’। इस नैतिक ज्ञान के अलावा व्यवहार में साफ है कि अपनी गिरफ्तारी के छठे साल में भी उमर व अन्य छात्र जमानत के लिए अदालत-अदालत चक्कर काट रहे हैं। और तारीख-पे-तारीख पा रहे हैं। बेवजह जमानत बार-बार टाली जा रही है।
साफ है कि सरकार यूएपीए कानून के जरिये लोगों के संघर्ष की आवाज को दबा देना चाहती है। सच्चाई ये है कि इन छात्रों के लिए आवाजें अभी भी उठ रही हैं। और अन्याय के एहसास के साथ विरोध की ये आवाज अब और बुलन्द होगी। ये आवाजें मोदी सरकार के फासीवादी कदमों का जवाब देंगी। दमन के खिलाफ उठने वाली आवाजें दमन तंत्र को ही ध्वस्त करने के लिए खड़ी होंगी।
वे जिन्हें जेल में नहीं होना चाहिए
इस मामले में खालिद सैफी को भी गिरफ्तार किया है जो कि एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। 2017 में लिंचिंग, हेट क्राइम और जाति आधारित उत्पीड़न के मामलों में हस्तक्षेप करने और दस्तावेजीकरण करने में इनकी भूमिका रही है। इन्हें 21 मार्च 2020 में गिरफ्तार किया गया था। हिरासत के दौरान इन्हें क्रूर यातनाएं सहनी पड़ी। जिसमें वो गंभीर रूप से घायल भी हो गए थे।
इनके साथ मीरान हैदर का नाम भी इस सूची में शामिल है। मीरान जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र हैं। वे आम आदमी पार्टी की युवा शाखा के सदस्य थे। इन्हें 1 अप्रैल 2020 में गिरफ्तार किया गया था। उनकी जमानत याचिका अभी भी कोर्ट में लंबित है।
इसी तरह गुल्फिशा फातिमा भी MBA की छात्रा है, ये भी CAA के खिलाफ दिल्ली के सीलमपुर में महिलाओं के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन में सक्रिय रूप से शामिल थी। उन्हें 9 अप्रैल 2020 को गिरफ्तार किया गया था और अभी तक उन्हें जमानत नहीं मिली है।
इस प्रकार शिफा-उर-रहमान जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। वे भी CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल थे। उन्हें 26 अप्रैल 2023 में गिरफ्तार किया गया था और अभी तक जेल में बंद हैं। एक और छात्र शरजील इमाम को भी CAA विरोध प्रदर्शन में सक्रिय होने के कारण 28 जनवरी 2020 से जेल में रखा गया है।
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