इतिहास
औपनिवेषीकरण के दौर में भारत और चीन (भाग-2)
साम्राज्यवाद विरोधी संघर्श में परस्पर सहयोग की दास्तां
निशान्त
(परचम के पिछले अंक में हमने औपनिवेशिक भारत और औपनिवेशिक चीन के बीच संबंधों के उस पहलू पर चर्चा की थी, जिसमें अंग्रेज साम्राज्यवादियों द्वारा चीन के औपनिवेशीकरण में भारतीयों को फौजियों, पुलिस अथवा सुरक्षा गार्डों के रूप में इस्तेमाल किया गया था। जिसने उस दौर में आम भारतीय और आम चीनी नागरिक के बीच परस्पर संघर्ष और घृणा के बीज आरोपित किये थे। उस लेख के दूसरे हिस्से के बतौर वर्तमान लेख में हम आम भारतीयों और चीनियों के बढ़ती साम्राज्यवाद विरोधी चेतना के साथ परस्पर सहयोग कर साझा दुश्मन से लड़ने के पहलू पर चर्चा करेंगे। परचम के यह दोनों लेख एक-दूसरे के पूरक हैं। इन्हें इसी रूप में पढ़ा और समझा जाय।)
भारत में 1857 की क्रांति के साथ ही एक व्यापक अंग्रेजी साम्राज्यवाद विरोधी लहर का प्रसार होने लगा था। इस प्रसार ने भविष्य की साम्र्राज्यवाद विरोधी चेतना के विकास में अपना अमिट प्रभाव छोड़ा। इस प्रभाव को हम आने वाली बहुत सी घटनाओं में पाते हैं। इस प्रभाव का असर हमें अंग्रेजों द्वारा चीन भेजे गये भारतीय सैनिकों के व्यवहार में भी दिखाई पड़ता है।