सोमवार, 29 जून 2026

इतिहास

औपनिवेषीकरण के दौर में भारत और चीन (भाग-2)
साम्राज्यवाद विरोधी संघर्श में परस्पर सहयोग की दास्तां
निशान्त

(परचम के पिछले अंक में हमने औपनिवेशिक भारत और औपनिवेशिक चीन के बीच संबंधों के उस पहलू पर चर्चा की थी, जिसमें अंग्रेज साम्राज्यवादियों द्वारा चीन के औपनिवेशीकरण में भारतीयों को फौजियों, पुलिस अथवा सुरक्षा गार्डों के रूप में इस्तेमाल किया गया था। जिसने उस दौर में आम भारतीय और आम चीनी नागरिक के बीच परस्पर संघर्ष और घृणा के बीज आरोपित किये थे। उस लेख के दूसरे हिस्से के बतौर वर्तमान लेख में हम आम भारतीयों और चीनियों के बढ़ती साम्राज्यवाद विरोधी चेतना के साथ परस्पर सहयोग कर साझा दुश्मन से लड़ने के पहलू पर चर्चा करेंगे। परचम के यह दोनों लेख एक-दूसरे के पूरक हैं। इन्हें इसी रूप में पढ़ा और समझा जाय।)

भारत में 1857 की क्रांति के साथ ही एक व्यापक अंग्रेजी साम्राज्यवाद विरोधी लहर का प्रसार होने लगा था। इस प्रसार ने भविष्य की साम्र्राज्यवाद विरोधी चेतना के विकास में अपना अमिट प्रभाव छोड़ा। इस प्रभाव को हम आने वाली बहुत सी घटनाओं में पाते हैं। इस प्रभाव का असर हमें अंग्रेजों द्वारा चीन भेजे गये भारतीय सैनिकों के व्यवहार में भी दिखाई पड़ता है। 

द्वितीय अफीम युद्ध (1856-60) के दौरान चीन भेजे गये भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने चीन के थाएफिड़ (1850-1864) विद्रोहियों को कुचलने के लिए भी किया। खासकर अफीम युद्ध की समाप्ति के बाद जब चीनी छिड़ शासकों और साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच पेईचिड़ की संधि (1860) संपन्न हो गई। थाएफिड़ विद्रोही ईसाई धर्म के समतावादी विचारों से प्रभावित थे और सामंती छिड़ साम्राज्य और विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष लड़ रहे थे। 

थाएफिड़ विद्रोह के दौरान बहुत बार देखने को मिला कि विद्रोहियों को कुचलने के लिए भेजे गए भारतीय सैनिकों में से बहुत से सैनिक विद्रोहियों से जा मिले थे और फिर उनकी तरफ से छिड़ साम्राज्य की सेना और विदेशी आक्रांताओं से लड़ते थे। छिड़ सेना के एक जनरल लांग कुओफान का बयान मिलता है, जिसमंे वह कहता है, ‘‘मैंने सुना है कि युशान शहर (च्याड़शी प्रांत) पर घेरा डालने के समय विद्रोही ली श्युछड़ की सेना में बहुत काले रंग के विदेशी सिपाही भी थे’’। इसी तरह का बयान शाओशिंग (चच्याड़ प्रांत) में विद्रोहियों से लड़ रहे छिड़ सेना के एक और जनरल ली होंगचाड़ का भी मिलता है, जो थाएफिड़ विद्रोहियों की तरफ से शहर की दीवार की रक्षा करने लिए लड़ रहे ‘‘पचास-साठ काले विदेशियों’’ का जिक्र करता है, जिनकी गोलियों का शिकार होकर एक फ्रांसीसी अफसर तार्दिफ द मोएद्रे की मौत भी हुई। थाएफिड़ विद्रोहियों की तरफ से लड़ रहे इन भारतीयों में से कुछ बंधक बना लिए सिपाही थे, जो अपनी मर्जी से विद्रोहियों से जा मिले थे। 

चीन के अंदर ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों की चेतना में आ रहे बदलाव की एक झलक बाॅक्सर विद्रोह (1899-1901) के दौरान थिएनात्सिन शहर में तैनात बंगाल आर्मी की 7 वीं राजपूत रेजीमेंट के एक सिपाही गदाधर सिंह की डायरी से मिलती है। चीन पहुंचने से पहले से ही दुःख के बादल सिपाही गदाधर सिंह को घेरने लगते हैं। वे लिखते हैं, ‘‘एक भय मेरे हृदय को जकड़ने लगा था। हे भगवान! क्या आप चीन को भी उसी नियति से मिलवाने वाले हो?.... क्या चीन का सुंदर चन्द्रमा अस्त होने को है? आर्यों की भूमि का चमचमाता सूर्य तो पहले ही डूब चुका है।’’ चीन पहुंच कर जो तबाही-बर्बादी उन्होंने देखी, उसके बाद वो लिखते हैं, ‘‘हमारे दिल पिघल सकें, इसके लिए कोई अवसर ही नहीं था क्योंकि आखिरकार हम ठीक इन्हीं चीनीयों से ही तो लड़ने आये हुए थे लेकिन.... इनका रंग देखकर, जो कि हमारी ही तरह का था, एक किस्म की भावना दिल मंे उठती थी। चीनी लोग बौद्ध थे, भारत के सहधर्मी। एशिया महाद्वीप के निवासी होने के नाते वे हमारे पड़ोसी हैं। उनके और हमारे रंग में कोई खास अंतर नहीं है, न ही उनके रीति-रिवाजों और तौर-तरीके हमसे भिन्न हैं। भगवान ने आखिर क्यों उन पर यह कहर ढाया है? लड़ने के बजाय क्या हमेें इनकी मदद के लिए आगे नहीं आना चाहिए?’’

अपनी डायरी के पन्नांे में गदाधर सिंह चीन के लोगों पर आक्रामक सेनाओं द्वारा ढाई गई तबाही-बर्बादी का बेहद मार्मिक चित्र उकेरते हैं। खासकर फ्रांसीसी और रूसी सैनिकों द्वारा बरती जा रही बर्बरता का वह जिक्र करते हैं। हालांकि वह भारतीय सैनिकों की कारगुजारियों पर भी पर्याप्त क्षुब्ध और आलोचनात्मक दिखाई पड़ते हैं। लेकिन उनके लेखन से साफ पता चलता है कि भारतीय सैनिकों में चीनी लोगों के प्रति संवेदना रखने वालों की संख्या अच्छी-खासी थी। जैसे कि वह भारतीय सेना के एक चिकित्सक पं.राम दत्त का जिक्र करते हैं, जिन्होंने युद्ध में घायल चीनीयों की जान बचाने के लिए भरसक प्रयास किये। 

19 वीं सदी के दूसरे हिस्से में बढ़ती राजनीतिक व साम्राज्यवाद विरोधी चेतना और भारतीय व चीनी आम जनता में एक-दूसरे की तकलीफों के प्रति उभरती परस्पर संवेदना ने बीसवीं सदी में दोनों देशों की जनता को साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में परस्पर सहयोग के लिए प्रेरित किया। 

1913 में अमेरिका के अंदर भारत के कुछ क्रांतिकारियों ने ‘गदर पार्टी’ की स्थापना की। दुनियाभर में फैले भारतीय प्रवासियों के बीच ‘गदर पार्टी’ का अच्छा प्रभाव व संगठन था। चीन के कई प्रमुख शहरों में ‘गदर पार्टी’ के केन्द्र मौजूद थे, जिन्हें स्थानीय चीनी राष्ट्रवादियों का सहयोग व समर्थन मिलता था। ‘गदर पार्टी’ के प्रचार से चीन में तैनात भारतीय सैनिकों व पुलिसकर्मियों में क्रांतिकारी राजनीतिक चेतना का प्रभाव बढ़ा। जिस कारण वे चीनी राष्ट्रवादियों व आम चीनी जनता के विरुद्ध संघर्ष के बजाय सहयोग के लिए प्रेरित हो रहे थे। खासकर शंघाई व हांगकांग इस तरह के राजनीतिक केन्द्रों के रूप में उभर रहे थे। गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध और उसके बाद भारत व दुनियाभर में ‘गदर पार्टी’ के केन्द्र साम्राज्यवादी दमन के कारण टूट-बिखर गये। किन्तु चीनी राष्ट्रवादियों व क्रांतिकारियों के सहयोग से ‘गदर पार्टी’ के चीनी केन्द्र 1930 के दशक तक सक्रिय रहे। 

1925 में ‘गदर पार्टी’ व चीनी राष्ट्रवादियों के सहयोग से देश निकाला झेल रहे भारतीय क्रांतिकारी राजा महेन्द्र प्रताप को चीन में शरण मिली। चीन में प्रथम गृहयुद्ध के काल (1924-27) में ‘गदर पार्टी’ को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग से अपनी गतिविधियों को पुनगर्ठित करने में काफी सहायता मिली। शंघाई में ‘गदर पार्टी’ ने अपना मुख्यालय ‘जनरल लेबर यूनियन’ के दफ्तर में ही स्थापित किया हुआ था। पेईचिंग के अंदर ‘गदर आश्रम’ खोला गया। जहां से गुरूमुखी में ‘गदर ढिंढोरा’ नामक पाक्षिक अखबार प्रकाशित होता था। 

भारतीय व चीनी जनता के भावों व विचारों को साथ लाने के प्रयासों के बतौर ‘पेईचिंग लेक्चर एसोसिएशन’ के बुलावे पर गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने 1924 मंे चीन की यात्रा की। उन्होंने अपने चीन प्रवास के दौरान बहुत सी सभाओं-गोष्ठियों को संबोधित किया। इस प्रकार, भारतीय व चीनी जनमानस को परस्पर नजदीक लाने मंे उन्होंने भी अपनी भूमिका निभाई।

इसी प्रकार, प्रथम चीनी गृहयुद्ध के दौरान भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक संगठनकर्ताओं में से एक मानवेन्द्र नाथ राय भी ‘कम्युनिस्ट इंटरनेशनल’ के निर्णय के तहत 1926 से कुछ समय के लिए ‘चीनी कम्युनिस्ट पार्टी’ के सहयोग के लिए चीन में रहे। 

इस समय तक, दोनों ही देशों में राष्ट्रवादी व साम्राज्यवाद विरोधी चेतना का स्तर वहां पहुंच चुका था, जहां ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा चीनी जनता के दमन के लिए भारतीय सैनिकों के इस्तेमाल पर तीखी प्रतिक्रिया होती थी। 
1925 मंे क्वाड़चै प्रांत में हड़ताली चीनी मजदूरों पर ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों द्वारा गोली चलाये जाने पर गदर पार्टी से जुड़े अखबार ‘युनाइटेड स्टेट्स आफ इंडिया’ ने लिखा, ‘‘यह जानकर कि हमारे भाईयों ने चीन के अंदर निर्दोष चीनियों, जिनसे हमारा किसी प्रकार का कोई झगड़ा नहीं है, मार डाला, हमारा सिर शर्म से झुक जाता है....’’ इसी प्रकार, जापान में मौजूद रासबिहारी बोस भी इस घटना को ‘भारत माता’ के नाम को खराब करने वाला घोषित करते हैं। 

इस प्रकार की आलोचनाओं व बढ़ती चेतना के कारण हम दूसरे उदाहरण भी देखते हैंै जैसे कि उसी वर्ष सत्तर-अस्सी भारतीय सैनिकों का एक दल ब्रिटिश सेना को छोड़कर क्वाड़तुंग के चीनी गवर्नर को अपनी सेवाएं देने के लिए प्रस्तुत होते हैं। इसी प्रकार, 1927 के बाद क्वोमिड़तांग व चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संयुक्त प्रयास से चलाये गये ‘उत्तरी अभियान’ के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा चीनी जनता के दमन के लिए भेजे गये भारतीय सैनिक अपने अफसरों के आदेश मानने से इंकार कर देते हैं। यहां तक कि हानखो नामक स्थान पर तो भारतीय सैनिक चीनी विद्रोहियों से जाकर मिल गये। हानखो की क्रांतिकारी सरकार ने इन सैनिकों को पूरे सम्मान और अच्छे वेतन के साथ अपनी सेना में शामिल कर लिया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार भारतीय सैनिकों व पुलिसकर्मियों द्वारा इसी तरह की बगावत की तैयारी शंघाई में भी हो चुकी थी। 

ब्र्रिटिश सेना के अंदर भारतीय सैनिकों के इस तरह के बढ़ते प्रतिरोध के कारण 1930 के दशक से अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने चीन के भीतरी इलाकांे में भारतीयों के इस्तेमाल को काफी कम कर दिया। भारतीय सैनिकों का प्रयोग मुख्यतः अब हांगकांग, मकाऊ व अन्य ब्रिटिश कब्जे वाले क्षेत्रों की सुरक्षात्मक पंक्तियों के रूप में ही किया जाने लगा।

चीन में जनवादी क्रांति के पुरोधा डाॅ. सुन यात सेन अपने ‘पैन-एशियन युनाईटेड फ्रंट’ के विचार के अनुरूप सदैव भारत व चीन की जनता की एकता की वकालत करते थे। 1920 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी इस बात की शिकायत करते थे कि बंगाल के क्रांतिकारियों को चीन के जरिये से हथियार मिलते हैं, जो कि किसी हद तक सच भी था। 

उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में भारत व चीन की आम जनता के बीच सहयोग का एक सुनहरा पन्ना डाॅ. कोटनीस के अमर बलिदान के रूप में दर्ज है। ‘‘जापानी आक्रमण विरोधी संघर्ष’’ के दौरान 1938 में भारत की तरफ से डाॅ. अटल के नेतृत्व में चार सदस्यीय डाॅक्टरों का एक दल चीन में लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर अपनी सेवाएं देने पहुंचा। डाॅ. कोटनीस इस दल के एक सदस्य थे। जिन्होंने दिन-रात घायल सैनिकों की सेवा-सुश्रूषा में खुद को खपा दिया। अंततः वे स्वयं संक्रमण का शिकार होकर चीन में शहीद हो गये। आज भी भारत व चीन में डाॅ. कोटनीस को उपनिवेशविरोधी संघर्ष मेें भारतीय व चीनी जनता की एकता के अमर नायक के तौर पर याद किया जाता है। 

साम्राज्यवादियों का यह इतिहास रहा है कि वे अपने मुनाफे व स्वार्थ के लिए दुनियाभर के मेहनतकशों को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करते रहे हैं। दुनियाभर में साम्राज्यवादी-विस्तारवादी आज भी युद्धों में संलग्न हैं। इन युद्धों के दौरान व उपरांत दुनिया भर की मेहनतकश जनता के हिस्से में महज तबाही-बर्बादी और मुफलिसी ही आती है। भारत व चीन के उपरोक्त औपनिवेशिक ऐतिहासिक विवरण से हमें यही सीख मिलती है कि वर्तमान में भी हम साम्राज्यवादी-विस्तारवादी शासकों की साजिशों को समझें और उनके हाथ की कठपुतली बनने से साफ इंकार करें। इससे आगे बढ़कर दुनियाभर के मेहनतकशों-छात्रों-नौजवानों की एकजुटता कायम करें, जो आज के दौर के साम्राज्यवाद-विस्तारवाद का मुकाबला कर सकें।
          

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