विरासत
‘‘युवा प्रति संस्कृति’’(स्विंगजुगेंड): क्रूर नाजी दमन का निराला विरोध
चंदन
हिटलर 30 जनवरी 1933 को जर्मनी का चांसलर बना। जर्मनी को ‘‘महान’’ बनाने के लिए उसने दुनिया भर की भाषा, साहित्य, संगीत, संचार (रेडियो) के प्रति हिकारत बरती। उसने इन प्रतिबंधों को पूरे समाज पर थोप दिया। ‘युवा प्रति संस्कृति’ (जर्मन शब्द का अंग्रेजी अर्थ स्विंग यूथ तो हिन्दी में परिवर्तनकारी युवा होगा) नौजवानों का समूह इन प्रतिबंधों को मानने से इंकार करता था। मामूली से लगने वाले इस प्रतिरोध को नाजी शासन गंभीर चुनौती की तरह लेता था। इसके लिए सैकड़ों युवाओं को ‘युवा एकाग्रता शिविर’ (यातना शिविर) तो कई को आस्विट्ज जैसे यातना कैम्पों में भेजा गया।
युवाओं के इस समूह का नाम अफ्रीकी-अमेरिकी स्विंग संगीत पर पड़ा। स्विंग संगीत जैज (jazz) से निकला था। स्विंग संगीत को 1990 में पुनः नये रूप में प्रचारित किया गया। नाजी शासन ने जैज और स्विंग संगीत पर रोक लगाई थी।
नाजी शासन एक खास तरह के जर्मन आर्य नस्ल के लोग तैयार करना चाहता था। वह यहूदियों के प्रति गहरी नफरत फैलाता था। वे अन्य को अपने से तुच्छ बताते थे। चूंकि यह बात सरासर झूठ है तो इसका पता न चल सके, इस बात पर नाजी शासन का खास जोर था। एक तरफ धुंआधार प्रचार किया गया दूसरी तरफ जनता किसी तरह सच्चाई से रूबरू न हो सके, इसके लिए प्रतिबंध थोपे। ‘‘विदेशी’’ भाषा (अंग्रेजी आदि), वेशभूषा (पहनावा तथा रहने का तरीका), साहित्य, संगीत, नृत्य आदि सब पर कठोरता से रोक लगा दी गयी। इसे न मानने पर सामाजिक अपमान (बाल मुंडवाना), मार-पीट, यातना शिविर (श्रम से लेकर गैस चैंबर तक) की सजा तय कर दी गयी। ऐसे में केवल जर्मन लोगों के समूह बनाये जा सकते थे। इन प्रतिबंधों को वास्तव में लागू कराने के लिए इसे छात्र-नौजवानों पर बचपन से ही थोप दिया गया। इसे व्यवस्थित करने के लिए ‘‘हिटलर युवा’’ जैसे समूह बनाये गये। जिसका सदस्य बनना अनिवार्य बना दिया गया। ये सदस्य परस्पर निगरानी का भी जरिया बनाये गये। इसका संगठित प्रतिरोध करना असंभव सा बना दिया गया।
ऐसे में मुख्य रूप से तीन तरह के समूह जर्मनी में बने। ‘व्हाइट रोज’, ‘एडेल्वाइस पाइरेट्स’ और ‘स्विंग युवा’। ‘व्हाइट रोज’ और ‘एडेल्वाइस पाइरेट्स’ मुख्यतः छोटे समूह के रूप में राजनीतिक प्रतिरोध, पर्चा वितरण आदि व्यवहारिक-सामाजिक कार्यवाही करते थे। स्विंग युवा समूह आस्ट्रिया, फ्रांस आदि यूरोप के देशों में भी बने। इनके प्रतिरोध का तरीका सांस्कृतिक और जीवन शैली से सम्बन्धित था। इनकी कार्यवाहियों का दायरा व्यापक था। साथ ही उसमें राजनीतिक भावना भी मौजूद थी।
स्विंग युवा समूह हर तरह की सांस्कृतिक पाबंदी का उल्लंघन करते थे। 1933 के मई में हिटलर यूथ समूह ने माक्र्स, आइंस्टीन, ब्रेख्त आदि की किताबों को जलाया। स्विंग युवा ने उसे बचाया, छिपाया। 1935 में जैज (श्रं्र्र) संगीत के प्रसारण पर रोक लगा दी गयी। स्विंग युवा समूह जैज संगीत सुनने के लिए पार्टियां आयोजित करते। खुले या गुप्त ढंग से उसे सुनते थे, उस पर नाचते थे। जबकि नाजी आदेश पर जगह-जगह साइन बोर्ड टंगे होते ‘स्विंग नृत्य वर्जित’। 1938 में यहूदी संगीतकारों के रिकार्डिंग बेचना प्रतिबंधित हो गया तो उसे संरक्षित करने लगे। यह सब करते हुए स्विंग युवा समूह स्वतंत्रता, अंतर्राष्ट्रीयता और जीवन के प्रति प्रेम की भावना से प्रेरित होते। इनके लिए नाजी शासन गुंडे या बदमाश, बिगड़े युवा जैसा सम्बोधन करता और उसी तरह क्रूरता भी अपनाता।
स्विंग युवा अपने समूह में यहूदी युवाओं और गैर जर्मनों को भी शामिल करते। हिटलर युवा के सैनिक डीलडौल के विपरीत स्विंग युवा लड़के लम्बे बाल रखते, कारी का सूट, हैम्बर्ग हैट पहनते। हर मौसम में छाता रखते जिसे नाजी अंग्रेज (ब्रिटिश) संस्कृति कहकर रोकते थे। स्विंग युवा लड़कियां विरोध स्वरूप शार्ट स्कर्ट पहनती, मेकअप करती, लिपस्टिक लगाती जिसे नाजी एंग्लो-अमेरिका संस्कृति के नाम पर रोकते। हिटलरी शासन लड़कियों को जर्मन परंपरागत पहनावा और तौर-तरीके अपनाने पर जोर डालता था।
नाजी अंग्रेजी के बजाय जर्मन भाषा के इस्तेमाल का जोर डालते। स्विंग युवा समूह ब्रिटिश-अमेरिकी युवाओं की स्लेंग (नौजवानों की कोड भाषा) अपनाते। अंग्रेजी के नामों से एक-दूसरे को सम्बोधित करते। हिटलर का मजाक बनाते हुए हाॅटलर (भ्वज डनेपब) कहते। हिटलर यूथ समूह को ‘होमो यूथ’ कहते। एक-दूसरे को हाॅट ओल्ड बाॅय, अलास्का बिल, टेक्सास जैक, बाॅबी, टेडी जैसे अंग्रेज-अमेरिकी प्रतीकों से जुड़े नामों से सम्बोधित करते। अभिवादन में नाजी सम्बोधन (ैमपह भ्मपस) को ैूपदह भ्मपस कहते। अपने समूह या क्लब का ओके गैंग क्लब, काॅटन क्लब, हरलेम क्लब, हाॅट क्लब जैसा नाम रखते। बोल चाल में अंग्रेजी-जर्मन से मिले-जुले वाक्य बोलते। जबकि नाजी शासन शुद्ध जर्मन भाषा के इस्तेमाल का दबाव बनाता।
हिटलर यूथ की अनिवार्य सदस्यता से इंकार करते। नाजी शासन द्वारा प्रतिबंधित ‘‘दुश्मन रेडियो’’ को सुनते। अन्य मित्र राष्ट्रों (अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत रूस, फ्रांस) के रेडियो सुनते। बीबीसी (ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग काॅरपोरेशन) को सर्वाधिक सुना जाता। इसके जरिये प्रतिबंधित संगीत सुन पाते। नाजी शासन के प्रचार से अलग जानकारी मिलती, स्वतंत्रता की इच्छा जाहिर करते। नाजी शासन में इसे ‘‘वायर टैपिंग अपराधी’’ की संज्ञा दी जाती थी।
1940 में नाजी शासन ने सार्वजनिक जमावड़ों पर प्रतिबंध लगा दिया। स्विंग युवा समूह घरों, किराए के हाॅल, क्लब में गुप्त पार्टियां आयोजित करते, जिसमें सैकड़ों युवा भागीदारी करते। 1940 में प्रतिबंध के दौरान हैम्बर्ग शहर में हुई गुप्त सभा में छापे पड़े। इसमें सैकड़ों युवाओं के नाम दर्ज कर आतंकित किया गया। 18 अगस्त 1941 को स्विंग युवा समूह के खिलाफ तत्काल कार्यवाही के तहत 300 से अधिक युवाओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 26 जनवरी 1942 को नाजी सुरक्षा दल (ैै; ैबीनज्रैजंििमस) के प्रमुख हेनरिक हिमलर ने स्विंग युवा समूहों के बारे में कहा ‘‘सभी गुंडों को एक एकाग्रता शिविर में रखा जाना चाहिए....2-3 साल के लिये....कड़ी मेहनत कराई जाए।’’ इसके जरिये अंग्रेजियत (एंग्लोफिल) प्रवृत्ति को रोकने का आदेश दिया। यह दिखाता है कि केन्द्रीय नाजी नेतृत्व भी स्विंग युवा समूहों पर नजर रखे हुए थे और उनके प्रति क्रूर थे।
स्विंग युवा समूह 1941-42 के बीच हैम्बर्ग में ‘व्हाइट रोज’ के सदस्यों से सहयोग करने लगे। राजनीतिक पर्चों का वितरण कर विरोध करने लगे। यह नाजी सेना के ‘‘विश्व विजयी’’ होने के भ्रम के टूटने का समय भी था। सोवियत रूस में वह फ्रांस, पोलैण्ड आदि की तरह कब्जा नहीं कर पाया था। युद्ध लम्बा खिंच रहा था और बौखलाहट बढ़ रही थी। जिसका असर जर्मन जनता के और अधिक क्रूर दमन में सामने था। बदले में जनता की तरफ से भी प्रतिरोध बढ़ता रहा। स्विंग युवा समूह के गिरफ्तार लोगों में से लगभग 70 को ‘युवा एकाग्रता शिविर’ में भेजा गया।
युवा एकाग्रता शिविर में युवाओं को भूखा रखना, बाल मुंडवाना, पिटाई करना, कोड़े लगाना, कठोर श्रम करवाना जैसी क्रूरतायें की जाती थी। भेदभाव, लगातार अपमान और निगरानी से मानसिक तौर पर भी प्रताड़ित किया जाता। आॅस्विट्ज जैसे यातना शिविरों से इनका फर्क बस यही था कि इसका मकसद हत्या करना नहीं था। लेकिन तब भी यातना, उपेक्षा, बीमारी के कारण युवा एकाग्रता शिविर में भी हत्या होती थी।
मुख्यतः उच्च वर्ग के युवा स्विंग युवा समूहों का हिस्सा होते थे। अतः इनका दमन करते समय प्रक्रिया का पालन किया जाता था। ‘व्हाइट रोज’ के सदस्यों को तो चार दिन में (18 फरवरी 1943 को गिरफ्तार हुए और 22 फरवरी 1943) गुलोटिन पर चढ़ाकर मार डाला था। हालांकि ‘व्हाइट रोज’ के सदस्य भी छात्र-प्रोफेसर थे उनके विरोध का तरीका नाजी विचारों पर गहरी चोट करता था।
स्विंग युवा समूह का नाजी शासन के खिलाफ संघर्ष और बलिदान इस बात का प्रमाण है कि अंधेरे दौर में भी आम लोगों द्वारा प्रतिरोध के तरीके ढूंढ लिए जायेंगे। कुछ साफ-साफ दिखेंगे तो कुछ छिपे होंगे लेकिन सब अपने आप में निराले तरीके होंगे। और इससे फासीवादी-नाजीवादी चिढ़ेंगे, बौखलायेंगे और आखिरकार इतिहास का कूड़ा-करकट या गाली बन जायेंगे। ऽऽऽ
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