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मंगलवार, 30 जून 2026

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति
मानव सभ्यता के दुष्मन ट्रंप और नेतन्याहू का भविष्य
- अंजनि

जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त की एक कविता का हिंदी भाव यह है,
जनरल साहब,
यह जो तुम्हारा टैंक है न, गजब की चीज है,
यह एक साथ लोगों को रौंद सकता है
यह लोगों को मार सकता है,
लेकिन इसमें एक कमी है यह खुद नहीं चलता।

जनरल साहब,
यह जो तुम्हारा बमवर्षक विमान है,
यह बरस सकता है
यह बम बरसाकर लोगों को भून सका है
लेकिन इसमें एक कमी है, यह खुद नहीं बरसता ।

जनरल साहब,
यह जो इंसान है,
यह गजब की चीज है,
यह टैंक चला सकता है,
यह बमवर्षक विमान उड़ा सकता है,
लेकिन इसमें एक कमी है, कि यह सोच सकता है।

    इस कविता में ब्रेख्त ने बताया है कि इंसान सोचकर सही और गलत में भेद करके जब सही का पक्ष लेता है तो वह अन्यायी जनरल के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। यह कविता फासिस्ट शासन के विरुद्ध लिखी गयी थी।
इस कविता के भावों को यदि आज हम अमरीकी और इजरायली सेनाओं द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध और उनके विरुद्ध ईरानी सेना व जनता के जवाबी प्रहारों से समझने का प्रयास करें तो यह स्पष्टतया समझ में आ जाता है कि युद्ध का फैसला एक या दो किस्म के नये आधुनिक हथियार नहीं करते बल्कि करोड़ों-करोड़ सचेत व संगठित लोग करते हैं।
बालेन्द्र शाह: नया चेहरा नयी लफ्फाजियां

- कमल

    सितंबर 2025 में जेन-जी आंदोलन ने नेपाल को हिलाकर रख दिया दिया था। जेन-जी का यह आंदोलन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, भ्रष्टाचार, वंशवाद, युवाओं की बेरोजगारी के खिलाफ था, जैन-जी ने पुरानी सत्ता को चुनौती दी। अन्याय, भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुके नेताआंे और बिलिं्डगों को युवाओं ने अपने आक्रोश का निशाना बनाया। 76 युवा भी इस आंदोलन में मारे गये। जेन-जी का यह आंदोलन भविष्य की आशा, बेहतर जीवन की उम्मीद के लिये किया गया था।

सोमवार, 29 जून 2026

अंतर्राष्ट्रीय
बांग्लादेष
मौजूदा छात्र-युवा विद्रोह और छात्र-युवा आंदोलन की विरासत
पंकज

12 दिसंबर, 2025 को शरीफ उस्मान हादी को दो नकाबपोश हमलावरों ने गोलियां मारी और 18 दिसंबर, 2025 को सिंगापुर के अस्पताल में उनकी मौत हो गयी। शरीफ उस्मान हादी शेख हसीना की भ्रष्ट और तानाशाह सरकार के विरुद्ध जन विद्रोह के उभरते हुए प्रमुख युवा नेता थे। शेख हसीना सरकार के पतन और उनके भारत पलायन के बाद बनी अंतरिम सरकार की पंूजीपरस्त नीतियों के विरुद्ध भी वे ‘इंकलाब मंच’ संगठन के माध्यम से बांग्लादेश की जनता विशेषकर छात्रों-युवाओं और मजदूर-मेहनतकश आवाम को जागृत और गोलबंद कर रहे थे। वे आगामी फरवरी में होने वाले चुनावों में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के बतौर लड़ना चाहते थे। वे स्थापित पूंजीवादी पार्टियों के विरोधी थे। यही कारण था कि स्थापित पूंजीवादी पार्टियों के शीर्ष नेता और पूंजीपति वर्ग उनको अशांति और मौजूदा व्यवस्था में गड़बड़ी फैलाने वाला समझते हैं।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025


गाजापट्टी में फिलिस्तीनी जनता का नरसंहार और तबाही

-भूपाल

    इजरायल की बेंजामिन नेतन्याहू सरकार का पिछले दो साल से गाजा पट्टी पर हमला लगातार जारी है। इस साल जनवरी माह में युद्ध विराम पर समझौता हुआ था, जिसे अलग-अलग चरण में लागू किया जाना था। मगर इजरायली शासक कुछ वक्त के बाद ही समझौते से मुकर गए। हवाई, जमीनी हमले लगातार ही जारी हैं। युद्ध विराम के समझौते के दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की धमकियों और फिर गाजा के लिए विशेष योजना की बात करके जता दिया था कि युद्धविराम समझौते का क्या हश्र होगा।

शनिवार, 25 नवंबर 2023

आसमान से टपका खजूर में लटका
                                                                                              -नीता
महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण बिल अभी तक अधर में लटका हुआ था। अब 19 सितंबर 2023 को इतने लम्बे समय बाद ये बिल पास हो गया है। इस बिल को ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से जाना जाएगा। इस बिल की वैधता लागू होने के बाद 15 साल तक के लिए ही होगी। 15 साल बाद संसद इस पर पुनर्विचार करेगी। 

फिस्तिीनी मुक्ति संघर्ष

फिलिस्तीन को खून में डुबोता अत्याचारी इजरायल

                                                                                कंचन

7 अक्टूबर को हमास ने इजरायल पर हमला कर दिया। इसके बाद इजरायल ने गाजा पर बर्बर हवाई हमले कर हजारों निर्दोष फिलिस्तीनियों की जानें ले ली। इन हमलों में मरने वालों की संख्या 10,000 को पार कर चुकी है, और यह लगातार बढ़ रही है। हमास के अचानक हमले से शुरू हुए इस युद्ध ने एक बार फिर इजरायल के फिलिस्तीन पर अवैध कब्जे के सवाल को विश्व राजनीति में पुनः जिन्दा कर दिया है।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

 पश्चिम एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव और दुनिया के लिये इसके मायने

अभी हाल ही में चीन की मध्यस्थता में साउदी अरब और ईरान के बीच एक समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत दोनों देश दो महीने के भीतर एक-दूसरे के यहां अपना-अपना दूतावास खोलेंगे। इसके अतिरिक्त वे इस बात पर भी सहमत हुए कि वे एक-दूसरे की प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखण्डता का सम्मान करेंगे और एक-दूसरे के अन्दरूनी मामलों में दखल नहीं देंगे। ये दोनों देश लम्बे समय से एक-दूसरे के प्रति दुश्मनाना रुख रखते रहे हैं जो 2016 में दूतावासों की बन्दी तक जा पहुंचा। जहां सउदी अरब अमरीकी साम्राज्यवादियों के प्रभाव में पिछले दो दशकों से लगातार रहा है, वहीं ईरान 1979 में हुई शाह विरोधी क्रांति के बाद से अमरीकी साम्राज्यवादियों की आंख की किरकिरी रहा है। वह ईरान मंे तख्तापलट कराने की कोशिशों में उसके विरुद्ध व्यापक प्रतिबंध लगाकर आर्थिक तबाही पैदा करता रहा है। वह जनअसंतोष को भड़काने की कोशिश और साजिश करता रहा है। 

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

 विश्व शक्तियों के बीच टकराव का एक अन्य क्षेत्र- आर्कटिक क्षेत्र

दुनिया के साधन स्रोतों और प्रभाव क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष और टकराहटें तेज होती जा रही हैं। दुनिया के अलग-अलग क्षत्रे टकराहट के क्षेत्र बने हुए हैं। इनमें रूस-यूक्रेन युद्ध अभी सबसे तीखा है। यूक्रेन के पीछे संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में नाटो/यूरोपीय संघ और उसके समर्थक देश हैं, जबकि रूस के साथ उत्तरी कोरिया, ईरान, सीरिया, वेनेजुएला और क्यूबा जैसे देशों के अलावा चीन जैसे देश हैं। भारत, मिश्र, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील सरीखे देश किसी भी पाले में न होने की बातें कर रहे हैं। इस तीखी टकराहट का मुख्य बिन्दु यह है कि अभी तक चली आ रही दादागिरी को चुनौती देने वाले और अपने राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक प्रभाव का विस्तार करने वाले देश रूस और चीन हैं। वे मुख्यतया अमेरिका की ताकत को, उसके वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। बदले में वे अपने वर्चस्व के क्षेत्र को बनाना चाहते हैं और उसका विस्तार करना चाहते हैं। यूक्रेन की सत्ता तो मोहरा है। इस मोहरे को अमेरिकी शासक इस्तेमाल करके रूस को इस कदर उलझा करके कमजोर करना चाहते हैं कि वह अमेरिकी वर्चस्व के नीचे आ जाये। इसी प्रकार, दक्षिणी चीन सागर में आवागमन के खुले रास्ते के अधिकार के नाम पर अमेरिकी शासक एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी नेतृत्व में यूरोपीय संघ और नाटो के देशों की संयुक्त ताकत के विरुद्ध रूस और चीन के शासक अपनी रणनीतिक साझेदारी कायम कर चुके हैं। अब यह साझेदारी विश्वव्यापी बन रही है। इस विश्वव्यापी साझेदारी में ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन, यूरेशियाई आर्थिक संघ में अन्य साझीदार शामिल हो रहे हैं। इस तरह इन दोनों प्रतिद्वन्दी गठबंधनों के बीच टकराहट अलग-अलग रूपों और स्तरों पर दुनिया के पैमाने पर चल रही है। यह लातिन अमेरिका, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और एशिया प्रशांत क्षेत्र व पूर्वी एशिया तक में चल रही है।

बुधवार, 23 नवंबर 2022

 ईरानी महिलाओं का बहादुराना संघर्ष जारी है

ईरान में बीते 16 सितंबर के बाद से जनता सड़कों पर उतरी हुई है। जनता की मांगों को सुनने के बजाए ईरानी कट्टरपंथी शासकों ने भारी दमन का रास्ता चुना है। सरकार द्वारा जारी दमन में अब तक 244 आंदोलनकारियों के मारे जाने की खबर है जिसमें 32 नाबालिग भी शामिल हैं। लगभग 12,570 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया गया है। इस भारी दमन के बावजूद ईरानी जनता चैन से नहीं बैठी है और ना ही उसने शासकों को चैन से सांस लेने दी है।

 लातिन अमेरिका

’’वामपंथी उभार की दूसरी लहर’’ के मायने

                                                                                                                    - मोहन

यूरोप के कई देशों में दक्षिणपंथी, धुर दक्षिणपंथी और फासिस्ट शक्तियां ताकतवर हो रही हैं और कई देशों में सत्ता में आ रही हैं, वहीं लातिन अमेरिका के कई देशों में ‘‘वामपंथी’’ या ‘‘वामपंथी रूझान रखने वाली’’ सत्ताएं आ रही हैं। इस परिघटना को पंूजीवादी प्रचार मीडिया में लातिन अमेरिका में ‘‘वामपंथी उभार की दूसरी लहर’’ घोषित किया जा रहा है। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में ब्राजील में लूला डी सिल्वा और वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज के सत्ता में आने के बाद की परिघटना को पहली लहर घोषित किया गया था। इस दूसरी लहर को 2017 के बाद की परिघटना बताया जा रहा है। 


गुरुवार, 10 नवंबर 2022

 श्रीलंका में जनसंघर्ष 

जनता संघर्ष के मैदान में, इधर-उधर भागते शासक


श्रीलंका में पिछले कुछ महीनों से आर्थिक संकट के कारण जनता सड़कों पर है। श्रीलंका का यह आर्थिक संकट आगे बढ़कर राजनीतिक संकट में तब्दील हो गया है। जनता का शासकों पर से भरोसा उठ गया है। हद ये है कि जनता से डरकर देश का राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर भाग गया। अब वह अपनी अय्याशी के नये ठिकाने ढूंढ रहा है। जनता राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास में पहुंच गयी तो सेना भी जनसैलाब के आगे मूकदर्शक बनी रही। आपातकाल के सारे आदेश बेकार चले गए। जनता के विद्रोह और शासकों की भगदड़ ने दिखा दिया कि शासन के पुराने तौर-तरीके नहीं चल सकते हैं। 

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

 रूसी साम्राज्यवादियों का यूक्रेन पर हमला

लम्बे समय तक युद्ध का माहौल बनाने के बाद अंततः 24 फरवरी को रूसी साम्राज्यवादियों ने यूक्रेन पर हमला बोल दिया। रूसी टैंक व बमवर्षक विमान यूक्रेन को रौंदने में जुट गये। इससे तीन दिन पूर्व 21 फरवरी को रूस ने पूर्वी यूक्रेन के अलगाववादियों के नियंत्रण वाले दोनेत्स व लुशांक जन गणराज्यों को स्वतंत्र देश की मान्यता दे अपनी फौजें वहां घुसेड़ दी थी। इस हमले के साथ ही रूसी व अमेरिकी-यूरोपीय साम्राज्यवादियों की प्रभाव क्षेत्र कायम करने की होड़ का नया शिकार यूक्रेन बन गया। वैसे बीते 3 दशक से ही साम्राज्यवादियों की यह होड़ यूक्रेन को तबाह-बर्बाद कर रही थी।

शनिवार, 25 जनवरी 2020

इण्डोनेशिया का छात्र आंदोलन

15 अगस्त 2119 के बाद से ही इण्डोनेशिया छात्रों-नौजवानों के जुझारू प्रदर्शनों-संघर्षों का केन्द्र बना हुआ है। एक के बाद एक दो छात्र संघर्षों ने अन्याय न सहने की छात्रों की विरासत को और मजबूत किया है। आज इण्डोनेशिया के छात्र न केवल न्याय व अधिकरों की खातिर सड़कों पर संघर्षरत हैं बल्कि पुलिस व सैन्यबलों के भारी दमन का मुकाबला करते हुए मौत की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। 
ब्राजील छात्र-युवा प्रदर्शन


 मई माह के मध्य में ब्राजील छात्रों-युवाओं द्वारा जोरदार प्रदर्शन किये जाने से हिल उठा। छात्रों और नौजवानों ने राष्ट्रपति बोलसोनारो द्वारा शिक्षा पर बोले गये बड़े हमले का जवाब भी बड़े-बड़े प्रदर्शनों से दिया। 15 मई को देश भर में हुये ये प्रदर्शन हाल फिलहाल ब्राजील में हुए सबसे बड़े प्रदर्शनों में हैं। ये प्रदर्शन ब्राजील के बड़े-बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं रहे बल्कि दूर-दराज के इलाकों में भी इन प्रदर्शनों की गूंज स्पष्ट सुनायी दी। इन प्रदर्शनों में मात्र विश्वविद्यालयों के छात्र ही शामिल नहीं हुए बल्कि हाईस्कूलों के छात्र भी शामिल हुए। ये प्रदर्शन ऐसे प्रदर्शन रहे जिसमें निजी विद्यालयों के छात्र भी शामिल हुए। प्रदर्शनों में छात्र-छात्राओं के हजारों अभिभावकों ने भाग लिया।
ईरान पर अपनी मनमर्जी थोपते धूर्त अमेरिकी साम्राज्यवादी

ईरान पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों का आक्रामक रुख   पिछले समय लगातार चर्चा में रहा है। अमेरिका के ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम समझौते से पीछे हटने की घटना हो, ईरान द्वारा अमेरिका के जासूसी ड्रोन को गिरा देने का मामला रहा हो या अब ईरान की परमाणु समझौते के अन्य देशों से शर्तों को मनवाने के लिए परमाणु प्रसार की धमकी, आदि। इस दौरान भारत ने ईरान के साथ तेल व्यापार (जो कि भारत को किफायती पड़ता था) अमेरिका के प्रभाव व दबाव में बन्द कर दिया। वहीं यूरोप के जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देश ईरान को समझाने-बुझाने में लगे हैं, बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। 


ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका-ईरान के विवाद की नींव पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति आइजेनहावर ने 1953 में रख दी थी। जब उन्होंने ईरान की चुनी हुई मोसादे सरकार को गिरा कर उसकी जगह अमेरिका समर्थित रजा पहलवी की सरकार कायम करवाई। इसी साल अमेरिका ने ‘एटम्स फॉर पीस’ कार्यक्रम की शुरूआत की। शीत युद्ध के काल में अमेरिका ने परमाणु तकनीक को अपने समर्थित सरकारों को देने में रणनीतिक बढ़त को ध्यान में रखते हुए ‘एटम्स फॉर पीस’ कार्यक्रम की शुरूआत की थी। आइजेनहावर ने इसके समर्थन में कहा कि ‘‘इससे मानवता के लिए एक शांतिपूर्ण माहौल बनेगा।’’ हालांकि पश्चिमी रणनीतिकारों के अलावा हर किसी ने आइजेनहावर की बात का विश्वास नहीं किया। द्वितीय विश्वयुद्ध में परमाणु हथियारों के अमेरिका द्वारा इस्तेमाल के बाद सबके लिए परमाणु शक्ति सम्पन्न होने के दुष्परिणाम सामने थे।

रविवार, 1 दिसंबर 2019

साहसी चेल्सिया मैनिंग 


8 मार्च को जब दुनिया भर में प्रचार माध्यम महिलाओं के सशक्तिकरण और महिलाओं की आजादी के संबंध में तमाम पूंजीवादी सरकारों के लंबे-चौड़े दावों का बखान कर रहे थे, उसी समय अमेरिका के एक संघीय न्यायाधीश एक महिला चेल्सिया मैनिंग को अनिश्चित काल के लिए जेल की सलाखों के पीछे धकेलने का फरमान सुना रहे थे। 
बदलना एक तानाशाह का मिट्टी के लौदे में

11 अप्रैल, 2019 का दिन सूडान के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। दर्ज हो भी क्यों नहीं। इस दिन सूडान का एक तानाशाह जो तीस सालों से अपना क्रूर शासन चला रहा था, सूडान की सत्ता छोड़ने को मजबूर हो गया। उसे सत्ता छोड़ने को मजबूर किया। देश के मजदूरों, युवाओं, औरतों और बुद्धिजीवियों ने। और 11 अप्रैल के दिन सूडान की सेना के सिपाही और आम जन एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। सड़कों पर जश्न का माहौल था और कईयों ने कहा ऐसी खुशी उन्हें अपनी जिंदगी में कभी भी नहीं मिली थी। 

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

मेहनतकशों के संघर्ष से हिल रहा है फ्रांस...
-दीपक

पिछले डेढ़ माह से फ्रांस मेहनतकशों के संघर्ष का अखाड़ा बना हुआ है। हर शनिवार हजारों की संख्या में जनता सड़कों पर उतरकर मौजूदा सरकार और उसकी नीतियों का विरोध कर रही है। फ्रांस की सरकार जनता का दमन करके इन आंदोलनों को रोकने का प्रयास कर रही है। सरकार द्वारा किए जा रहे बर्बर दमन के बावजूद जनता पीछे हटने को तैयार नहीं है। वो अपनी पूरी ताकत के साथ सरकार के हर दमन का सामना करते हुए संघर्ष के मैदान में डटी हुई है।
अफगानिस्तान में सूखा व साम्राज्यवाद का क्रूर चेहरा
-महेश

पिछले वर्ष अफगानिस्तान में पड़े सूखे ने सालों बाद अफगानिस्तान को प्राकृतिक अकाल की ओर धकेला। अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ से पहले ही वहां की जनता के मानवीय मूल्यों को निर्लज्ज तरीके से कुचलते हुए ‘त्रासदी’ में जीने को मजबूर किया हुआ है। सूखे ने इस कदर कहर बरपाया है कि लोग अपने-अपने बच्चों को बेचकर जिंदगी जी रहे हैं।

शनिवार, 24 नवंबर 2018

‘नकबा’ के 70 वर्ष और फिलीस्तीनी जनता का प्रतिरोध संघर्ष
-नरेश कुमार



        5 अक्टूबर, हर शुक्रवार की तरह हजारों की संख्या में फिलीस्तीनी गाजा सीमा की ओर बढ़ रहे थे। सीमा पार इजरायली सैनिकों की राइफलें तनी हुयी थीं। बेखौफ फिलीस्तीनी; जिसमें बच्चे, महिलाएं, बूढ़े, नौजवान सभी शामिल थे; जान की परवाह किये बगैर आगे बढ़ रहे थे। इस जनसैलाब में नौजवानों की संख्या सर्वाधिक थी। ऐसे नौजवान जिन्होंने जन्म लेते ही बारूद की गंध में अपनी पहली सांस ली और गोलियों व बम के धमाकों के रूप में पहली आवाजें और प्रतिध्वनियां सुनीं।