सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

अफगानिस्तान में सूखा व साम्राज्यवाद का क्रूर चेहरा
-महेश

पिछले वर्ष अफगानिस्तान में पड़े सूखे ने सालों बाद अफगानिस्तान को प्राकृतिक अकाल की ओर धकेला। अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ से पहले ही वहां की जनता के मानवीय मूल्यों को निर्लज्ज तरीके से कुचलते हुए ‘त्रासदी’ में जीने को मजबूर किया हुआ है। सूखे ने इस कदर कहर बरपाया है कि लोग अपने-अपने बच्चों को बेचकर जिंदगी जी रहे हैं।


अफगानिस्तान के 10 राज्य सूखे से बुरी तरह प्रभावित हैं। 20-30 प्रतिशत पानी के स्रोत सूख चुके हैं। पानी के अभाव से 10 लाख लोगों के जीवन को खतरा है। उत्तरी पश्चिमी हिस्से में 20 लाख लोग जूझ रहे हैं। यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेंस फंड (यूनिसेफ) के अनुसार अफगानिस्तान में अकाल से 5,00,000 बच्चे प्रभावित हुए हैं। 92,000 बच्चों और 8,500 गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं को तत्काल पोषण सम्बन्धी सहायता की जरूरत है। आगामी महिनों में 20 लाख अतिरिक्त लोगों को समस्या का सामना करना पड़ेगा।

युद्ध से जर्जर अफगानिस्तान में पहले से ही बीस सालों से दयनीय स्थिति थी। सूखे से पहले ही 80 फीसदी से ज्यादा परिवार कर्ज की चपेट में हैं। यहां पहले से ही कुपोषण की उच्च दर है। पर्याप्त पोषण वाले भोजन, पीने के लिए साफ पानी, स्वच्छता व सफाई के बिना बच्चों का स्वास्थ्य गिरता जा रहा है। नई फसल चौपट हो चुकी है। गरीबों की जीवन परिस्थितियां काफी मुश्किल हुई हैं। सूखे ने पहले से ही बेहद निम्न स्तर का जीवन जी रही अफगानी जनता का मानवीय जीवन जीने का संकट और अधिक बढ़ा दिया है। 

ऐसे में बच्चों का बेचा जाना आम घटना बन गयी है। मानवीय मूल्यों को ताक पर रखते हुए लम्बे समय तक साम्राज्यवाद द्वारा युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में सूखे की समस्या ने मानवीय जीवन के संकट को इस कदर बढ़ा दिया है कि लोग ऋण चुकाने, खाद्य सामग्री खरीदने के लिए छोटी-छोटी बच्चियों को बेचने को मजबूर हैं। यूनिसेफ के अनुसार सूखाग्रस्त हेराज और बगदीज प्रांत में 1 महिने से लेकर 16 वर्ष उम्र तक के कम से कम 161 (इसमें 6 लड़के थे) बच्चियां सिर्फ 4 महिनों में ‘बेचे’ गये हैं। इसके साथ ही अफगानिस्तान में बाल विवाह की जड़े काफी गहरी हैं। यहां 35 फीसदी तक बाल विवाह होते हैं। 8-12 वर्ष उम्र की लड़कियों की शादी बूढ़े व्यक्तियों से की जा रही हैं।

अमेरिकी साम्राज्यवाद का क्रूर चेहरा- साम्राज्यवादी शासकों का इतिहास झूठ-फरेब व जालसाजियों से भरा पड़ा है। साम्राज्यवादी देश वर्षों तक युद्ध तैयारियों में जुटे रहते हैं। युद्ध शुरु होने पर खुद को निर्दोष साबित करने के लिए झूठ-फरेब का जाल बुनते हैं। फिर नये युद्ध में शामिल होने के लिए किसी छोटी-मोटी घटना का बहाना बनाते हैं। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए हमले का दोष अमेरिका ने अलकायदा पर मढ़ा। अमेरिका के ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ की अविवादित गवाह अफगानिस्तान सहित कई मुल्कों में लाखों कब्रें हैं।

अफगानिस्तान भी वह देश था जहां अमेरिका की मनमाफिक सरकार नहीं थी। अफगानिस्तान पर हमला तालिबानी कट्टरपंथियों की सरकार को नेस्तनाबूत करने के नाम पर किया गया। अमेरिका के अनुसार तालिबान ने अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को पनाह दे रखी थी। सालों के नरसंहार के बाद आज तक अफगानिस्तान से तालिबान को न उखाड़ा जा सका है। ना ही अमेरिका का यह मकसद था। उसे तो सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण इस भौगोलिक क्षेत्र पर कब्जा करना था। इसे अमेरिका ने ‘शांति’ और ‘आजादी’ का नाम दिया।

अमेरिका की इस ‘शांति’ और ‘आजादी’ से अफगानिस्तान यतीमों-विधवाओं से भर गया। आबाद शहर वीरान हो गये। तमाम आवश्यक सुविधाएं बिजली, सड़क, पानी सब नष्ट हो गये। शिक्षा, चिकित्सा से लोग महरूम रहे। अपने ही मुल्क में खौफ के साये में जीने लगे। आज के सूखे में वहां की जनता को साम्राज्यवादी युद्धों, अमेरिकीपरस्त अशरफ गनी अहमदजई की सरकार के कारण काफी कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। वर्षों तक यह अपने हितों को साधने के लिए अफगानी जनता पर हमले करते रहे। आज सूखे की चपेट में आने के कारण थोड़ा सा राहत राशि आवंटित की। वह भी एन.जी.ओ. व संयुक्त राष्ट्र की एजेन्सियों को। इसमें काफी राशि यह एजेन्सियां ही हड़प जायेंगी। ऊपर से यह दिखाना चाहते हैं कि ‘तुम हमारे टुकड़ों में पल रहे हो।’

वर्षों से अफगानिस्तान की जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद व उसकी सरकारों के खिलाफ संघर्ष कर रही है। उनकी हुकूमत स्वीकारने को तैयार नहीं है। आज यह प्राकृतिक सूखा भी उन्हीं हमलों व साम्राज्यवादी नीतियों के कारण है। तमाम तरह की परेशानियों को सहते हुए यह कष्ट भरे दिन भी बीतेंगे और एक दिन वह भी आयेगा जब अफगानी जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद को वहां से खदेड़कर उसकी सरपरस्त सरकार को नेस्तनाबूत कर मुक्ति के गीत गाएगी। अतीत में अफगानी जनता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद, सोवियत साम्राज्यवाद को अपने देश से खदेड़ा है। अब बारी अमेरिकी साम्राज्यवाद की है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें