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बुधवार, 2 सितंबर 2020

कोरोना काल और भटकते बेरोजगार



   राजीव बीएससी तृतीय वर्ष का छात्र है। वह अपनी पढ़ाई के साथ छठी से 12वीं तक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्चा निकालता है। उसके मां-बाप गांव में रहते हैं जो छोटे से जमीन के टुकड़े पर खेती करते हैं। लाकडाउन लगने के साथ राजीव का रोजगार जो छूटा वो अब तक शुरू नहीं हुआ है क्योंकि सरकार ने कोचिंग पढ़ाने की अनुमति नहीं दी है। राजीव बेरोजगार हो चुका है। 

 सविता एक घरेलू नौकरानी है जो दिल्ली की एक पाश कालोनी में 3-4 घरों में झाडू़-पोछा करती थी। कोरोना शुरू होते ही उसे काम से निकाल दिया गया। अब तक उसे काम नहीं मिला है। आजकल वह दूसरे काम की तलाश में है। 

 लॉकडाउन, कोरोना काल में भी अपने मंसूबे पूरे करती सरकार


फरवरी माह में दिल्ली में हुए साम्प्रदायिक दंगों के आरोप में सीएए/एनआरसी/एनपीआर विरोधी आंदोलनकारियों पर झूठे मुकदमे थोपने व फर्जी गिरफ्तारियां करने का क्रम पूरे कोरोना काल में जारी है। छात्रों, शिक्षकों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, जनवादी, क्रांतिकारी संगठनों के कार्यकर्ता सहित सीएए जैसे साम्प्रदायिक कानूनों का विरोध करने वाले लोगों को केन्द्र की मोदी सरकार चुन-चुनकर जेलों में डाल रही है। दिल्ली दंगों के आरोप में अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। यह दिखाता है कि हमारे देश की सरकार कोरोना से लड़ने के बजाय अपने विरोधियों-आलोचकों को ठिकाने लगाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है।

महामारियां : पूंजीवादी समाज और समाजवादी समाज 


मोटे तौर पर 16वीं शताब्दी से यूरोप के देशों में पूंजीवादी संबंधों का काफी हद तक विकास हो चुका था। इन संबंधों के विकास के साथ स्वास्थ्य सेवा भी क्रमशः व्यापार में तब्दील होने लगी थी। तब भी उस समय लोग स्वास्थ्य सेवा की एक मिशन के बतौर बातें करते थे। कहा जाता था कि डॉक्टर लोग अपना मानवतावादी मकसद पूरा कर रहे हैं। चूंकि डॉक्टरों को राज दरबारों से वेतन और प्रतिष्ठा मिलती थी, अभिजात घरों से सुविधाएं मिल जाती थीं और अनेक मध्यम वर्गीय परिवारों से नियमित आय हो जाती थी, इसलिए वे अपने इस पेशे को खुले व्यापार के बतौर विकसित होने का एक हद तक विरोध करते थे। कई देशों में 19वीं सदी तक में चिकित्सक अपना बिल नहीं भेजते थे। इसके बजाय रोगी जो उचित समझते थे और जितना देने में समर्थ होते थे, दे देते थे। डॉक्टरी पेशे के लोग तब तक हृदयहीन लेन-देन के रिश्तों के अभ्यस्त नहीं हुए थे। लेकिन उनके ये प्रयास निरर्थक सिद्ध होने लगे थे। 

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

आगामी चुनाव और छात्र-युवा

मोदी जी के भाषणों-जुमलों को सुनते-सुनते और उनके लटके-झटकों को देखते-देखते चार साल बीत गये। अब कुछ महीनों के भीतर आम चुनाव होने हैं। आम चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू हो चुका है। नेताओं की भाग-दौड़ चालू है। इन सब के बीच सवाल हम छात्र-युवाओं के जीवन और भविष्य का है। सवाल यह भी है कि क्या हमारे देश के नेताओं के पास हमारे जीवन और भविष्य को लेकर कोई योजना है भी कि नहीं।

ऐसा नहीं है कि देश के प्रधानमंत्री व अन्य नेताओं को छात्र-युवाओं की समस्या का पता नहीं है। अच्छे से मालूम है कि आज के छात्र-युवाओं की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी की है। और इसीलिए मोदी जी ने 2014 के आम चुनाव के समय यह वायदा किया था कि हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देंगे। और चाल साल बीतने पर जब रोजगार का सवाल जोर-शोर से उठने लगा तो उन्होंने बेरोजगारों को पकौड़ा तलने की सलाह दे डाली। वायदा हवा हवाई साबित हुआ।