बुधवार, 2 सितंबर 2020

 लॉकडाउन, कोरोना काल में भी अपने मंसूबे पूरे करती सरकार


फरवरी माह में दिल्ली में हुए साम्प्रदायिक दंगों के आरोप में सीएए/एनआरसी/एनपीआर विरोधी आंदोलनकारियों पर झूठे मुकदमे थोपने व फर्जी गिरफ्तारियां करने का क्रम पूरे कोरोना काल में जारी है। छात्रों, शिक्षकों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, जनवादी, क्रांतिकारी संगठनों के कार्यकर्ता सहित सीएए जैसे साम्प्रदायिक कानूनों का विरोध करने वाले लोगों को केन्द्र की मोदी सरकार चुन-चुनकर जेलों में डाल रही है। दिल्ली दंगों के आरोप में अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। यह दिखाता है कि हमारे देश की सरकार कोरोना से लड़ने के बजाय अपने विरोधियों-आलोचकों को ठिकाने लगाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र फरहान अंसारी को उत्तर प्रदेश पुलिस ने 29 मई को सीएए/एनआरसी/एनपीआर विरोध के आंदोलन में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया था। साथ में रवीश अली खान को भी गिरफ्तार किया था। रवीश को बाद में छोड़ दिया गया। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में छात्र जामिया मिलिया इस्लामिया में 15 दिसम्बर 2019 को पुलिस द्वारा कैम्पस में घुसकर तोड़फोड़ करने, लाइब्रेरी में छात्रों को पीटने का विरोध कर रहे थे।

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र मीरान हैदर व छात्रा सफूरा जरगर को दिल्ली पुलिस ने यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया। यहीं के एक अन्य छात्र आसिफ इकबाल तन्हा को भी यूएपीए के तहत जेल में भेज दिया गया। मीरान हैदर जामिया के पीएचडी के छात्र हैं और सीएए कानून के मुखर विरोधी रहे हैं। सफूरा जरगर जामिया कोर्डिनेशन कमेटी की सदस्या थीं। 10 अप्रैल को गिरफ्तारी के समय सफूरा गर्भवती भी थीं। 2 माह कानूनी संघर्ष के बाद 23 जून को अदालत से विशेष तौर पर उन्हें फौरी जमानत मिली। इस पूरे प्रकरण में साफ दिखता है कि निर्दयी सरकार की तरह उसकी पुलिस ने भी अपने आकाओं की राजनीतिक इच्छाओं के तहत काम किया।

यहां गौर करने लायक बात है कि साम्प्रदायिक नागरिकता कानून सीएए के विरोध को तमाम दमन के बावजूद रोका नहीं जा सका था। शाहीन बाग तो संघर्ष का प्रतीक ही बन गया था। शांतिपूर्ण आंदोलन के तौर पर भी शाहीन बाग प्रदर्शन ने ख्याति पायी थी। अब फरवरी में दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों को सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों से जोड़कर उन्हें अपराधी साबित करने की कोशिश हो रही है। कोरोना की आड़ में आंदोलनकारियों का दमन संघर्ष को कुचलने की कोशिश है। यूएपीए जैसे काले कानून का दमन के लिए भारी पैमाने पर उपयोग हो रहा है।

दक्षिण-पूर्वी दिल्ली दंगों में ‘पिंजड़ा तोड़’ संगठन की दो सदस्य देवांगना कलिता और नताशा नरवाल को 23 मई को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। यह दोनों जेएनयू में एमफिल और पीएचडी की छात्राएं हैं। दोनों को अदालत से पेशी के दौरान जमानत मिल गई थी। परन्तु उसी दिन षड्यंत्र के तहत दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने एक अन्य मामले में दोनों को गिरफ्तार कर लिया। बाद में दोनों पर यूएपीए लगा जेल में डाल दिया गया। जेएनयू के ही एक अन्य छात्र उमर खालिद पर भी यूएपीए लगाया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानन्द को दिल्ली पुलिस ने 5 अगस्त को पूछताछ के लिए बुलाया। 5 घण्टे की पूछताछ के बाद उनका फोन जब्त कर लिया गया।

छात्रों के साथ-साथ मुस्लिमों को भी दिल्ली दंगे का आरोपी बनाया गया है। दिल्ली में संघियों द्वारा पूर्व नियोजित दंगों के दौरान चुन-चुनकर मुस्लिमों के घरों-दुकानों में लूटपाट कर आग लगा दी गयी थी। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट भी कहती है कि यह दंगे पूर्व नियोजित थे। भाजपा नेता कपिल मिश्रा, रागिनी तिवारी, प्रवेश वर्मा, केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, गृहमंत्री अमित शाह के खुलेआम साम्प्रदायिक बयानों ने दिल्ली हिंसा को भड़काया था। ये लोग आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।

दिल्ली पुलिस कितने पूर्वाग्रह से भरी हुई थी इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। पुलिस ने अपनी चार्जशीट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान दंगे की योजना बनाने के आरोप में उमर खालिद सैफी व आम आदमी पार्टी के निलम्बित पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को आरोपी बनाया है। चार्जशीट में आरोप लगाया है कि 8 जनवरी 2020 को शाहीन बाग में इन तीनों ने बैठक कर ट्रम्प के भारत दौरे पर दिल्ली में दंगों की योजना बनाई। जबकि 13 जनवरी को मीडिया में सूत्रों के हवाले से ट्रम्प के भारत दौरे पर आने की सम्भावित खबर पहली बार आयी थी। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिल्ली पुलिस पक्षपातपूर्ण, पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर कार्यवाही कर रही है। साफ है कि भारत सरकार की अधिसूचना के मीडिया में आने से पहले उक्त तथाकथित आरोपियों के पास ट्रम्प की भारत यात्रा की खबर नहीं हो सकती।

इसी तरह भीमा कोरेगांव मामले में एनआईए अभी तक 15 लोगों की गिरफ्तारियां कर चुकी है। तेलुगु कवि और सामाजिक कार्यकर्ता वरवरा राव को 17 नवम्बर 2018 से पुलिस ने भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया हुआ है। 80 वर्षीय राव पहले से ही बीमार हैं। जेल में रहते हुए वे कोरोना पाजिटिव पाये गए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश कि ‘बीमार व बूढ़े लोगों को घर भेज दिया जाए’ के बावजूद केन्द्र सरकार व एनआईए राव को छोड़ने को राजी नहीं हैं। सुधा भारद्वाज, वर्नान गोंजाल्विस, प्रो. आनंद तेलतुंबडे, आदि को भी भीमा-कोरेगांव मामले में जेल में डाला गया है। कोरोना काल में ही पत्रकार गौतम नवलखा को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। ताजा मामला दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हनी बाबू को 28 जुलाई को गिरफ्तार कर जेल भेजने का है। इन पर यूएपीए जैसे काले कानून थोपकर जेल में डाला गया है जबकि भीमा-कोरेगांव मामले का  मुख्य आरोपी मिलिंद एकबोटे सहित अन्य लोग बाहर खुलेआम घूम रहे हैं। 

इस कोरोना महामारी के समय में सरकार ने ‘आपदा प्रबंधन व महामारी एक्ट’ लगा रखा है। जिसके तहत नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों को रद्द किया हुआ है। उनके धरना, प्रदर्शन, विरोध करने के अधिकार को रद्द किया हुआ है। लोगों से विरोध न करने को कहा जा रहा है। अदालतों में सिर्फ ‘‘विशेष’’ मामलों को छोड़कर अन्य मामले नहीं सुने जा रहे हैं। ऐसे समय में पुलिस व सरकारों की मनमर्जी खुलेआम दिखाई दे रही है। लॉकडाउन के समय परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कार्यकर्ता महेश पर उत्तराखण्ड पुलिस ने घर में रहकर छात्रों-मजदूरों के समर्थन में एक दिवसीय भूख हड़ताल करने पर जानबूझकर महामारी फैलाने का आरोप लगा मुकदमा दर्ज कर दिया। इंकलाबी मजदूर केन्द्र के कार्यकर्ता अभिलाख  पर देशद्रोह का मुकदमा और कैलाश भट्ट पर पलायन करते मजदूरों की खबर पोस्ट करने पर जांच करने के नाम पर फोन जब्त कर लिया गया। यह सब साफ दिखाता है कि पुलिस व सरकारें कहीं की भी हों सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे दर्ज करने व उनका दमन करने में एक जैसी ही हैं।

वहीं लॉकडाउन में करोड़ों मजदूर सरकार की बिना पूर्व तैयारी के कारण पलायन को मजबूर थे। इस दौरान पुलिस ने मजदूरों को मुर्गा बनाया, डण्डे मारे, लाठीचार्ज करके उनको एक जगह से दूसरी जगहों पर भगाया, सड़कों के रास्ते उनको पैदल न जाने देने जैसे कदम उठाये गये। मजदूरों को देश का एक नागरिक न समझकर उनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया गया। घर जाने की मांग करने पर जब मजदूर सूरत, हैदराबाद, महाराष्ट्र, आदि जगहों पर इकट्ठा हुए तो पुलिस ने उनका तीखा दमन किया। मजदूरों सहित सामाजिक कार्यकर्ता जब पुलिस की इन ज्यादतियों का विरोध कर रहे थे तो उन पर ही महामारी फैलाने व देशद्रोह जैसी संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज कर उनका उत्पीड़न किया गया। इस दौरान कई मजदूरों को जेल में डाल दिया गया। इसी तरह पूरे देश में पुलिस अपने उत्पीड़नकारी चरित्र का प्रदर्शन कर रही थी।

सत्तासीन भाजपा नेता व सरकार लॉकडाउन में नियमों का खुलेआम उल्लंघन करते रहे। मध्य प्रदेश में मार्च में सरकार बनाकर शपथ ली गई और सैकड़ों लोगों को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया गया था। खुद भाजपा के नेता, मंत्री कई जगहों पर ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के नियमों का उल्लंघन करते रहे। कई राज्यों में विपक्षी दलों के नेताओं-कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज किये गये। 

लॉकडाउन के समय में मोदी सरकार ने अपना पूरा जोर दमन में लगाया हुआ था। स्वयं मोदी ने कहा था ‘आपदा को अवसर में बदलो’ उसी को चरितार्थ करते हुए संघी भाजपा सरकार अपने मंसूबां को पूरा करने में लगी हुई थी। अदालतों में काम हो नहीं रहा है, लोगों को इकट्ठा होने या प्रदर्शन करने की इजाजत नहीं है। जहां सरकार को कोरोना संकट के समय में व्यापक टेस्टिंग, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार व अन्य समस्याओं को हल करने में लगना था वहां सरकार अपने वैचारिक-राजनीतिक विरोधियों को चुन-चुनकर जेलों में डाल रही है। मोदी सरकार अपने विरोधियों या आलोचकों को कभी बर्दाश्त नहीं करती रही है। आज तो वह ‘अवसर’ का उपयोग कर रही है। 

सभी फासीवादियों को जनता के आंदोलन-विरोध हमेशा ‘लॉ एंड आर्डर’ की समस्या ही लगते हैं। मोदी सरकार भी समस्याओं को हल करने की जगह दमन का सहारा ले रही है। दमन से संघर्ष को कभी नहीं रोका जा सकता। कोरोना काल में भी जहां संभव हुआ प्रदर्शनों की शक्ल में विरोध हुआ। इसके अलावा सोशल प्लेटफार्म का भी विरोध जताने के लिए इस्तेमाल किया गया। आज निश्चित ही छात्रों-नौजवानों, मेहनतकशों सहित मजदूर वर्ग के सामने क्रांतिकारी एकता कायम करने का कार्यभार है। अपनी क्रांतिकारी एकता और संगठन से ही शोषणकारी-उत्पीड़नकारी पूंजीवादी व्यवस्था के दमन का मुकाबला किया जा सकता है।

                                              वर्ष- 11 अंक- 3 व 4 (अप्रैल-सितंबर, 2020)

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