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मंगलवार, 30 जून 2026

मजदूर आंदोलन
मजदूर सड़कों पर
यह न होता तो क्या होता ?
- मदन
    2 अप्रैल को होण्डा मोटर्स मानेसर हरियाणा में ठेका मजदूर वेतन वृद्धि की मांग को लेकर सड़क पर उतरे। पुलिस प्रशासन दमन के सहारे इसे रोकने की कोशिश कर रहा था। देखते ही देखते मजदूरों के वेतन वृद्धि के संघर्ष मानेसर की अन्य फैक्टरियों के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी फैल गये। हरियाणा से होते हुए उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, राजस्थान के औद्योगिक केन्द्रों तक फैल गया। जहां-जहां मजदूर आंदोलन पहुंचा वहां-वहां पुलिस दमन, मजदूरों, मजदूर संगठनों के कार्यकर्ताओं-नेताओं को जेलों में डाला गया। मजदूरों के ये सभी संघर्ष स्वतः स्फूर्त थे।

बुधवार, 10 मई 2017

13 को उम्र कैद सहित 31 मारूति मजदूरों को कठोर सजा: वर्ग विद्वेष से भरा एक पूर्व निश्चित फैसला

-कविता

        आखिरकार मारूति मामले में कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। फैसला अंदेशे के अनुरूप न्यायिक मानदंडों पर नहीं बल्कि वर्ग विद्वेष पर आधारित एक राजनीतिक फैसला है। गुड़गांव (गुरूग्राम) के जिला न्यायालय ने 18 मार्च 2017 को मारूति के 31 मजदूरों को बहुचर्चित 18 जुलाई 2012 की दुर्घटना के लिए दोषी ठहराते हुए मारूति सुजुकी वर्कर्स यूनियन के 13 मजदूरों (12 पूर्व प्रतिनिधियों एवं एक अन्य मजदूर जिया लाल) को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। चार मजदूरों को 5 वर्ष की सजा एवं अन्य को उनके जेल प्रवास को ही सजा मानते हुए रुपये 2500 के अर्थदण्ड की सजा। अदालत द्वारा 117 मजदूरों को बरी कर दिया गया। गौरतलब है कि ये 117 मजदूर पहले ही तीन से चार साल तक जेल में काट चुके हैं। इस तरह सम्मानीय न्यायालय ने पूंजीपति वर्ग की सामूहिक अंतःकरण की तुष्टि करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय दिया। 

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

प्रिकोल लिमिटेड के मजदूरों का जुझारू संघर्ष

-महेश

        मजदूरों के खासकर ठेका मजदूरों के शोषण-उत्पीड़न की भीषणता क्या है इसका अंदाजा रुद्रपुर सिडकुल के प्रिकोल लि. के उदाहरण से समझा जा सकता है। श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन, शासन-प्रशासन, पुलिस की मैनेजमेन्ट के साथ घृणित एकता भी प्रिकोल लि. के उदाहरण से आसानी से देखी जा सकती है। इसके अलावा मजदूरों का अन्याय व शोषण के खिलाफ जुझारु संघर्ष व अन्य ट्रेड यूनियनों व समाज द्वारा उनका सहयोग समर्थन करना भी इस आंदोलन में दिखाई दिया।

सोमवार, 12 सितंबर 2016

बंगलुरु में गारमेंट मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल

-शिप्रा

        अप्रैल माह की 18-19 तारीख को बंगलुरु के गारमेण्ट मजदूरों ने ऐतिहासिक हड़ताल की। इस हड़ताल में महिलाओं की भूमिका प्रमुख थी। इसने केन्द्र सरकार को पी.एफ. के फरवरी 2016 के नोटिफिकेशन को वापस लेने पर मजबूर कर दिया।
        केन्द्र की मोदी सरकार ने 10 फरवरी 2016 को पी.एफ. पर एक नोटिफिकेशन जारी किया। इसके तहत 1 मई 2016 के बाद कोई भी मजदूर भविष्य निधि (पी.एफ.) कोष में से केवल अपने वाले हिस्से को ही निकाल सकता है। कम्पनी द्वारा जमा किया गया हिस्सा वह 58 साल की उम्र के बाद ही निकाल सकता था। केन्द्र सरकार का यह फैसला पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने वाला कदम था। जिसमें पूंजीपति मजदूर को दिए जाने वाले उसके हक से भी कटौती कर फायदा कमाते वहीं दूसरी तरफ मजदूर अपने कई जरूरी काम मसलन बच्चों की पढ़ाई, शादी, बीमारी आदि मौकों पर अपने इस सुरक्षित धन से वंचित हो जाते। यही थी 18-19 अप्रैल में मजदूरों को आक्रोशित कर देने वाली चिंगारी।