-महेश
मजदूरों के खासकर ठेका मजदूरों के शोषण-उत्पीड़न की भीषणता क्या है इसका अंदाजा रुद्रपुर सिडकुल के प्रिकोल लि. के उदाहरण से समझा जा सकता है। श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन, शासन-प्रशासन, पुलिस की मैनेजमेन्ट के साथ घृणित एकता भी प्रिकोल लि. के उदाहरण से आसानी से देखी जा सकती है। इसके अलावा मजदूरों का अन्याय व शोषण के खिलाफ जुझारु संघर्ष व अन्य ट्रेड यूनियनों व समाज द्वारा उनका सहयोग समर्थन करना भी इस आंदोलन में दिखाई दिया।
दरअसल 7-8 सालों से कंपनी में मशीनों पर काम कर रहे मजदूरों में से जब कुछ मजदूर मैनेजमेन्ट के पास यह कहने गये कि हम 7-8 वर्षों से कंपनी में काम कर रहे हैं, हमारी तनख्वाह भी नये रखे मजदूरों जितनी है (6000 रुपये के लगभग) इसलिए हमारा 1000 रु. बढ़ा दिया जाए। इस पर प्रबंधन ने उन्हें अपमानित किया और उनको काम से निकाल दिया। मैनेजमेन्ट के इस गैरकानूनी कृत्य के विरोध में 150 मजदूर बाहर आ गये और निकाले गये साथियों को वापस रखने की मांग के साथ 8 अगस्त से आंदोलन शुरू कर दिया।
प्रिकोल लि. के इन संघर्षरत मजदूरों में लगभग सभी युवा हैं। 40 के आस-पास महिला श्रमिक भी इस आंदोलन में भागीदार रही हैं। ये वे लोग हैं जो पहाड़ से शहर में नौकरी कर अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण करने आये थे। अधिकतर मजदूरों- महिला मजदूरों का परिवार उनकी नौकरी से ही चलता है। बेहद गरीबी व मजबूरी के कारण ये लोग फैक्ट्री में काम करने आये हुए हैं। समझा जा सकता है कि 6-7 हजार रुपये में ये किस तरह अपने व अपने परिवारों का भरण-पोषण करते होंगे?
लगभग 2 माह तक मजदूरों का संघर्ष चलता रहा। पहले धरना फिर 2 बार आमरण अनशन किया गया। पहले चरण के आमरण अनशन के दौरान मजदूरों का बर्बर दमन किया गया। हद दर्जे का व्यवहार करते हुए एस.डी.एम., सी.ओ. व पुलिस अधिकारी ने महिलाओं के बाल खींचने, उनके कपड़े फाड़ने जैसी हरकतों के जरिए ‘मित्रता’ व ‘बहादुरी’ का परिचय दिया। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड पुलिस का नारा ‘उत्तराखण्ड पुलिस आपकी मित्र’ है।
इस बर्बर दमन के बाद आमरण अनशनकारियों को हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती करवा दिया। लेकिन आमरण अनशनकारियों ने यहां भी अपना संघर्ष जारी रखा। अस्पताल व नगर प्रशासन ने उनको दबाव में लेकर अनशन तुड़वाने की पुरजोर कोशिश की लेकिन वे मजदूरों खासकर महिला मजदूरों के जुझारुपन के सामने असफल रहे।
7 सितम्बर को हुए समझौते जिसमें ए.एल.सी., एस.डी.एम., प्रिकोल प्रबंधन, ठेकेदार, इंटक जिलाध्यक्ष जनार्दन सिंह और कांग्रेसी नेता डी.के. सिंह शामिल थे। ज्ञात हो कि पहले ही ए.एल.सी. द्वारा ठेकेदार का लाइसेन्स निरस्त करने की संस्तुति भेजी जा चुकी थी फिर भी प्रबंधन, प्रशासन व इंटक, कांग्रेसी नेताओं ने ठेकेदार व मजदूरों का समझौता करवा दिया। ठेकेदार व ठेका श्रमिकों के बीच हुए इस समझौते के तहत 50 प्रतिशत मजदूरों की तत्काल बहाली व 50 प्रतिशत मजदूरों को 45 दिन बाद प्रत्यावेदन देने पर बहाली की बात थी।
आश्चर्य की बात यह है कि इस मजदूर विरोधी समझौते को भी ठेकेदार ने नहीं माना व 2 दिनों तक संघर्ष करने के बाद मजदूर पुनः आमरण अनशन पर बैठने को मजबूर हुए। दूसरी बार का यह आमरण अनशन 20 दिन तक चला। 20 दिन बाद हुए समझौते के तहत 1 से 57 तक या 58 से 113 तक अगले दिन काम पर जायेंगे बाकि 19 अक्टूबर को काम पर जायेंगे। ट्रेड यूनियन नेताओं व आमरण अनशनकारियों से सलाह-मशविरा करने के बाद इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया कि 58-113 वाले मजदूर पहले काम पर जायेंगे।
आज सभी ठेका श्रमिक अंदर फैक्ट्री में वापस जा चुके हैं। इस संघर्ष के दौरान सबसे मजबूत कड़ी के रूप में महिला मजदूरों का जुझारूपन रहा। हर मौके पर महिला मजदूर चाहे वह आमरण अनशन पर बैठना हो, चाहे पुलिस-प्रशासन आदि से भिड़ना हो, बहादुरी से लड़ी। यूं तो सिडकुल रुद्रपुर में अन्य कम्पनियों के भी बहाली को लेकर आंदोलन चल रहे हैं परंतु अगर किसी आंदोलन ने ध्यान अपनी ओर केन्द्रित करवाया तो वह प्रिकोल का आंदोलन था। इसका कारण यह था जहां अन्य कंपनियों के संघर्षरत मजदूर अनुनय-विनय व पूंजीवादी नेताओं के पिछलग्गू बने हुए हैं। वहीं प्रिकोल के मजदूर शुरु से ही जुझारू संघर्ष की दिशा में आगे बढ़े। उन्होंने अपने निशाने पर न सिर्फ मैनेजमेन्ट व प्रशासन को लिया बल्कि सरकार को खुलेआम कटघरे में खड़ा किया।
पूंजीवादी पार्टियों के पीछे चलने वाले कुछ नेताओं द्वारा प्रिकोल के मजदूरों के इस जुझारू कार्यवाही की आलोचना की गयी। उन्होंने कहा कि ऐसे आंदोलन नहीं जीता जाता है। हमें शांतिपूर्ण हल निकालना होेगा। प्रिकोल के संघर्ष ने दिखा दिया है कि जो लोग शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं उनका समझौता तब तक नहीं हुआ बल्कि प्रिकोल का हो गया। वे लोग कम्पनी के स्थाई मजदूर हैं फिर भी वह अपना समझौता करवाने में असफल रहे। आज अगर कोई सफल आंदोलन हो सकता है तो वह फैक्ट्री के भीतर आंदोलन चलाने, हड़ताल या जुझारू तरीके से संघर्ष कर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाकर ही हो सकता है।
आमरण अनशन के दौरान व अस्पताल में भर्ती अनशनकारियों की हौसला अफजाई तथा पूरे आंदोलन को नेतृत्व देने में इंकलाबी मजदूर केन्द्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही। क्रांतिकारी लोकअधिकार संगठन, परिवर्तनकामी छात्र संगठन तथा प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र के कार्यकर्ताओं द्वारा आंदोलन में बराबर भागीदारी कर मजदूरों के साथ एकजुटता प्रदर्शित की। प्रिकोल के संघर्ष के जुझारूपन के कारण ही अन्य यूनियनों द्वारा इनको सक्रिय सहयोग व समर्थन दिया गया। सिडकुल के भीतर कई रैलियां व मजदूर महापंचायत की गयीं। सहयोग करने वाली यूनियनों का साफ कहना था कि हम अगर अन्य आंदोलनों के बजाय प्रिकोल के आंदोलन में आ रहे हैं तो इसका कारण यह है कि यह सही मायने में लड़ रहे हैं। लगभग 1 लाख रु. का आर्थिक सहयोग विभिन्न ट्रेड यूनियनों व सामाजिक संगठनों द्वारा दिया गया जो मजदूरों की एकजुटता का परिचायक है।
प्रिकोल के जुझारू आंदोलन की सफलता के बाद अब संघर्षरत अन्य फैक्ट्रियों के मजदूर भी जुझारू रूप लेने को मजबूर हो रहे हैं। ढीले नेतृत्व पर अब आम मजदूर दबाव बना रहे हैं कि वे भी अपने आंदोलन को जुझारू रूप दें।
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