वर्ष- 17, अंक- 3
कहानी
दूध, भैंस और इंसान
- पथिक
सड़क पर लगी घास को लेकर हुआ झगड़ा कब धार्मिक गालियों और जातिगत टिप्पणी पर बदल जाय कहा नहीं जा सकता। ‘‘हम हिन्दुओं में ही एकता नहीं, वरना ये मुल्ले इतना बोल पाते?’’ हाथ में डण्डा लेकर रामपाल बाकी मुहल्ले वालों को ललकार रहे हैं। झगड़े का निपटारा अन्त में कचहरी में जाकर शांत हुआ।
तिलक नगरी और शिव शक्ति विहार के बीच महज 10 मिनट का रास्ता भर है लेकिन इन दो मुहल्लों के बीच की खाई बहुत गहरी है और इस खाई की जड़ें हजार वर्ष पुरानी।
‘‘क्या आपके यहां एक्स्ट्रा दूध है’’ मेघना ने रुक्साना को आवाज दी। रुक्साना जानवरों को चारा डालने में मशरूफ है। पलटकर आवाज की दिशा में सर घुमाती है।
रुक्साना- आप तो शिव शक्ति विहार में रहती हैं।
मेघना- हां, आपको घास ले जाते हुए देखा है, मैंने।
रुक्साना- बुरा मत मानिएगा आपका पूरा नाम क्या है? (बहाने से नए ग्राहक की जातिगत पहचान जानना चाहती है।)
मेघना- मेघना पाण्डे
रुक्साना- हां, हां! कल सुबह से ले जाइएगा। दिमाग में अनबुझे सवाल लेकर अपनी सास को नए ग्राहक की इत्तला देती है।
मेघना के पति फैक्ट्री मजदूर हैं। आजाद ख्याल हैं। रात को घर आकर ब्लैक टी पीना पसंद करते हैं।
तुषार- बेगम! क्या ब्लैक टी मिल जाएगी।
मेघना- आज तो व्हाइट टी मिल जाएगी। कुछ मजाकिया अंदाज में।
तुषार- लगता है दूध की बात हो गई। तभी इतना खुश हो रही हो। चलो! कई दिन से परेशान थी, तुम।
मेघना- पता नहीं क्यूं रुक्साना तुम्हारा पूरा नाम सुनकर कुछ झेंप के बात कर रही थी।
तुषार- कुछ सोचकर, हां! एक तो हिन्दू ऊपर से ब्राह्मण। फिर आज का दौर। हैरान होना वाजिब बात है।
मेघना- पड़ोस की आंटी पूछ रही थी कि तिलक नगरी से क्यूं दूध ले रही हो वहां तो वैसे लोग रहते हैं, छी।
तुषार- तो तुमने क्या जवाब दिया?
मेघना- मैंने कहा आंटी दूध तो भैंस देती है फिर भैंस तो भैंस होती है जैसे इंसान, इंसान होते हैं।
तुषार- हां, इस मुहल्ले से सिर्फ दो ही घर हैं जो वहां से दूध ले रहे हैं।
क्या मुसलमानों में भी छुआ-छूत होती है। मेघना ने जानना चाहा। नहीं! छुआछूत तो नहीं होती। तुषार ने जवाब दिया। तो फिर रुक्साना क्यूं झेंप रही थी? मेघना ने दुबारा सवाल किया।
जब सवर्ण लोग दलितों के साथ भेदभाव रखते हैं तब मुसलमान तो दूसरे धर्म के लोग हुए उनके साथ तो ज्यादा बड़ा भेदभाव लाजिमी बात है। तुषार ने जवाब दिया।
तो क्या दलित भी मुसलमानों के साथ छुआ-छूत मानते हैं? पुनः प्रश्न। नहीं छुआ-छूत तो नहीं मानते लेकिन भेदभाव तो रखते ही हैं।
दलित तो खुद भेदभाव के शिकार हैं फिर मुसलमानों के साथ भेदभाव क्यों?
बात तो कड़वी है। मगर आज के दौर का एक सच यह भी है। खैर मैं नहाने जा रहा हूं। कल मैं भी चलूंगा दूध लेने। कहकर नहाने चले जाता है।
शाम के वक्त खेत ज्यादा खुशबू बिखेरते हैं। जिन्हें पार करके तिलक नगरी शुरू होती है। यहां कितने मुस्लिम परिवार होंगे? तुषार ने प्रश्न किया। 6-7 परिवार होंगे सब रिश्तेदार ही हैं। जवाब आया।
खुले आंगन में अमरूद का छायादार पेड़। दीवार के पास में बना मिट्टी का चूल्हा। रुक्साना जानवरों को चारा डाल रही है। जिस समय मेघना घर के भीतर दाखिल हुई रुक्साना की सास चारपाई पर बैठी हैं। तुषार को देखकर उठ गईं और सर पर दुपट्टा डाल लेती हैं।
बाजी, पानी पूछना शायद हिमाकत होगी। मन ही मन एक दुविधा घेरे हुए है। एक तरफ अतिथि धर्म है दूसरी तरफ सदियों पुरानी दीवार। जिसे तुषार के आग्रह ने तोड़ा।
तुषार- बाजी! पानी पिलवा दो।
बाजी! कितना मर्मस्पर्शी, आत्मीयता और अपनत्व लिए गहरा शब्द। दो कानों में पड़े और सदा के लिए दिल में बस गए।
बाजी- अभी लाती हूं, भाईजान। रुक्साना भीतर जाकर पानी ले आती है।
तुषार- इस बार ईद कितनी तारीख को है?
बाजी- शायद 17 या 18 की।
तुषार- मैं शीरी खाने आऊंगा।
खुले मन से बाजी; तुषार के परिवार को ईद पर घर बुलाने का न्यौता देती है। और चाय बनाकर भी ले आती है।
दिन बीते ईद का चांद नजर आया।
मेघना- ईद की बधाई, आंटी!
बाजी- तुम्हें भी। घर के भीतर सबको ले जाती है। सबसे गले मिले जाते हैं और ईद की बधाई दी जाती है।
रुक्साना दस्तरखान सजाने में मशरूफ है। घर में बूढ़ी सास सबके सर पर हाथ रखकर दुआएं दे रही है।
बाजी- लीजिए, शीरी से शुरुआत कीजिए।
तुषार- बिस्मिल्लाह
रुक्साना- हां! बिस्मिल्लाह कीजिए।
रुक्साना चूल्हे से बिरयानी की डेगची ले आई है। जिसे दम देने के लिए छोड़ा गया था।
रुक्साना- ‘‘लो भाई जान! आपके लिए स्पेशल बनाई है।’’ कहकर मेज पर बिरयानी का बर्तन दे देती है। बाजी प्लेट पर बिरयानी सजा रही है।
मेघना- आंटी! आप भी बैठिए।
सास- कुछ झेंपते हुए। मैं बाद में लूंगी, आप लोग लो।
मेघना- हमारे यहां घर के बड़े लोग बाद में नहीं खाते सब साथ में खाते हैं।
बाजी- तुम्हें पसंद है, न बिरयानी।
मेघना- बहुत ज्यादा लेकिन घर की बनी आज पहली बार खाई है।
तुषार- आपके आंगन में कभी शाम को बैठा जाय तो कैसा रहे?
बाजी- हां! हां! क्यों नहीं।
तुषार- कोशिश करते हैं। इस बार सावित्री बाई फूले का जन्मदिन यहीं मनाया जाय। बाकी मुहल्ले वालों को भी बुला लेंगे।
बाजी- कुछ बोल पाना अब मुश्किल होता जाता है। पल्लू से आंखें पोछती है। खुशी छलककर आंखों में उतर आती है। ‘‘हां-हां क्यूं नहीं! अल्लाह सलामत रखे आपके परिवार को। कहकर आंखें पोछने लगती है।’’
सर्वप्रथम इंकलाब जिंदाबाद और पूर्ण स्वराज का नारा देने वाले महान क्रांतिकारी
हसरत मोहानी
(1 जनवरी 1875-13 मई 1951)
हम कौल के हैं सादिक अगर जान भी जाती है वल्लाह कभी खिदमत-ए-अंग्रेज न करते।
(हम वादे के पक्के हैं, अगर जान भी जाती तब भी हम अंग्रेजों की मदद नहीं करते)
वर्ष- 8, अंक- 2
जनवरी-मार्च, 2017
अमरता
-पूरन मुद्गल
इमली का वह पेड़ कब और किसने लगाया था, किसी को मालूम नहीं है। स्कूल के आंगन में खड़ा वह पेड़ बच्चों के लिए विशेष आकर्षण बना रहता था। जब इमली की फलियां लगतीं तो बच्चे उन्हें तोड़ने के लिए उस पर चढ़ जाते और चटखारे लेकर उनकी खटाई का आनंद लेते। चपरासी ने पेड़ के साथ घंटी बांध रखी थी। जब किसी लड़के को घण्टी बजाने के लिए कहा जाता तो वह घण्टी बजाने से पहले पेड़ के नीचे चारों ओर नजर घुमाता और यदि उसे कहीं कोई फली नजर आ जाती तो मुंह में डाल देता।
हर वर्ष स्कूल में नये बालक प्रवेश लेते और पुराने परीक्षा पास करके स्कूूल छोड़ जाते। इमली के पेड़ से नये बच्चों का रिश्ता स्थापित हो जाता और पुरानों का टूट जाता।
इस बार गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला तो मैने देखा कि इमली का पेड़ सूख गया है-माली ने छोटी-बड़ी सब टहनियां काट दीं और केवल तना शेष रह गया है। कुछ ही दिनों में उसे भी काटकर गिरा दिया जायेगा। चपरासी ने तने से बंधी घंटी उतार ली थी और उसे बरामदे में कील के सहारे लटका दिया था।
रविवार की छुट्टियां थीं, लेकिन मैं किसी कार्यवश स्कूल गया था। सूखे तने के पास इमली का एक बीज अंकुरित हो गया था-माली उसके चारों ओर बड़ी सावधानी से ईंटों की बाड़ खड़ी कर रहा था। मैं उस अंकुर को टकटकी बांधकर देख रहा था। मुझेे लगा जैसे वह अंकुर बड़ा पेड़ बन गया है चपरासी ने उसके तने के साथ घण्टी बांध दी है और लड़के उस पर चढ़ गये हैं और असंख्य हरी-पीली पत्तियों में लटकी फलियों को तोड़ रहे हैं। अचानक एक दिन वह पेड़ ठूंठ में बदल जाता है। पास ही उस पेड़ से गिरा एक बीज अंकुरित हो रहा है। और फिर पेड़.....और फिर अंकुर...
अंधविश्वास
-मोहन राकेश
पेशेंट की हालत देखते ही डाॅक्टर शर्मा खिन्न हो उठे- ‘ हूं, अब लाया है, जब गिनती की सांसें रही हैं छोकरी में’। उस मरियल से बूढ़े को हिकारत से देखते हुए उन्होंने लताड़ा-‘सोया हुआ था अब तक।’
नहीं डाॅक्टर साब, झाड़ो लगवाई थी फेर चैकी की परकमा दी फेर...’ बूढ़ा विस्तार से अपने प्रयत्नों का ब्यौरा देना चाहता था कि उन्होंने डपट दिया’-बस-बस जानता हूं, तुम सब लोग एक ही थैली के हो। पहले पंडे-पुजारियों की पूर्जा-अर्चना, फिर ओझा-गुनियों के डोरे-डंडे और झाड़ू फूंक बाद में गांव के वैद्य जी की पुड़िया फाकेंगे, तब रोग काबू से बाहर हो जायेगा तो दौड़ेंगे डाॅक्टर के पास जैसे..
डाॅक्टर शर्मा कुछ कहना चाहते थे कि एकाएक उन्हें मेरी उपस्थिति का आभास हो आया, अपनी झुंझलाहट छिपा, चेेहरे पर सुपरिचित अभिजात्य ओढते हुए वे मेरी ओर मुखातिब हुए- ‘अब आप ही देखिए प्रोफेसर। ये जाहिल लोग सिर से पैर तक इस प्रकार अंधविश्वास मेें डूबे हुए हैं कि दुनिया चाहे आसमान में क्यों न पहुंच जाये ये लोग ओझाओं की झाड़-फूंक और फकीरों के गण्डे-ताबीजों से मुक्त नहीं हो सकते। अब ऐसे लोगों का है कोई इलाज!’- उन्होंने कुछ ऐसी मुद्रा में पूछा मानो डाॅक्टर में हूं।
मुझ जैसे ‘इंटलैक्चुअल’ से ग्रामीण के अज्ञान एवं अशिक्षा जनित अंधविश्वासों पर अच्छे खासे ‘लेक्चर’ की अपेक्षा रही होगी उन्हें पर जाने क्यों और कब मेरी दृष्टि उनकी दाहिनी बांह मे बंधे उस मोटे से धागे पर स्थिर हो रही थी, जो उनकी हाफ स्लीव शर्ट से यदा कदा बाहर झांक जाता था।
डाॅक्टर शर्मा ने अब तक मेरी निगाह भांप ली थी। इस स्थिति में जैसा भी हो सकता था, उसी लहजे में बोले- ‘श्रीमती जी की जिद थी यार, इसलिए बांध लिया है। पुश्तैनी पंडित जी हैं न अपने। उन्हीं के द्वारा अभिमंत्रित सूत्र है। इन दिनों प्रैक्टिस कुछ डल सी रही थी न.....’ उन्होंने खिसियानी हंसी बिखेरते हुये मेरी ओर देखा और मेरा चेहरा सपाट देख बुझ से गये और उस देहाती बच्ची के परिक्षण में व्यस्त हो गये।
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