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सोमवार, 21 मई 2018

13 अप्रैल: अमर शहादत हमारी विरासत

-मोहन सिंह

13 अप्रैल का दिन भारतीय इतिहास में वह काला दिन है जब अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने नृशंसता की हदें पार कर दीं। और इस प्रकार अपने मानवद्रोही चरित्र का पर्दाफाश पूरी दुनिया में कर दिया। 13 अप्रैल, 1919 का जलियांवाला बाग नरसंहार जहां एक ओर साम्राज्यवादी शासन की क्रूरता के लिए जाना जाता है वहीं भारतीय मुक्तिकामी जनता के बलिदान के लिए भी जाना जाता है। 13 अप्रैल, 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर बड़ा असर डाला। दुनिया को गुलाम बनाने की मुहिम में साम्राज्यवादियों ने अनेक उपनिवेशों की जनता के साथ ऐसे ही हत्याकाण्डों को अंजाम दिया है। साम्राज्यवाद का इतिहास और समृद्धि गुलाम देशों की जनता के खून में सनी है। क्योंकि आज भी साम्राज्यवाद कायम है इसलिए इस तरह के हत्याकाण्ड आज भी किसी न किसी रूप में भी जारी हैं। 
नये-नये जलियांवाला रचते भारतीय शासक

-अनुपम

       यह वर्ष जलियांवाला बाग हत्याकांड का सौंवा वर्ष है। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा भारत को लूटने और भारतीयों के दमन का स्याह इतिहास जलियांवाला बाग हत्याकांड है। भारतीय मजदूरों, किसानों, छात्रों व युवाओं के बहादुर संघर्ष के परिणामस्वरूप अंग्रेज साम्राज्यवादियों को भागना पड़ा। अंग्रेजों के जाने के बाद सत्ता भारतीय पूंजीपतियों व सामंतों के हाथ में आ गई। समय के साथ पूंजीपति वर्ग सत्ता पर कब्जा मजबूत बनाता गया। 
कानूनों के आइने में भारतीय राज्य का दमनकारी चरित्र
राॅलेट एक्ट से यू.पी.पी.ए. तक

-प्रियंका

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा किया गया 13 अप्रैल जलियांवाला बाग हत्याकांड इतिहास के बेहद नृशंस क्रूर हत्याकांडों में से एक है। इस दिन चंद घंटों में सैकड़ों निर्दोष लोगों को ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर भून दिया गया। इनमें मासूम बच्चे, बूढ़े, औरतें, नौजवान सभी थे। इस घटना ने भारतीय जन मानस के दिल में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के प्रति गहरी नफरत को भर दिया। साम्राज्यवाद से यही नफरत पीढ़ी दर पीढ़ी होते हुए हमारे मन में भी आज तक मौजूद है। साम्राज्यवाद की क्रूरता के प्रति नफरत ने भारत के अंदर क्रांति का ज्वार पैदा किया और संघर्षों का सिलसिला तेज हो गया। लाखों-लाख भारतीयों के संघर्ष और कुर्बानियों की बदौलत 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ।


आजाद भारत में अब तक कई जलियांवाला बाग हत्याकांड सरकारें रच चुकी हैं। तेलंगाना, तेभागा किसान आंदोलन के दमन से लेकर आपातकाल, नीलम चैक गोली कांड, मुज्जफरनगर कांड, पंतनगर मजदूर हत्याकांड, नंदीग्राम, सिंगूर, भट्टा-परसौल किसानों का दमन, होण्डा-मारुति के मजदूरों का दमन आदि सैकड़ों जलियांवाला हत्याकांड सरकारें आजाद भारत में रच चुकी हैं। भारतीय शासकों ने अपने ही द्वारा बनाये कानूनों को ताक पर रखकर इन दमन चक्रों को अंजाम दिया। इन दमन चक्रों में सैकड़ों लोग मारे गये। 
एक और जलियांवाला काण्ड
तब क्रूर शासकों के खिलाफ एकजुट हुये थे छात्र और मजदूर

-किशन कुमार

         भारत देश में सत्ताशीन काले अंग्रेजों ने पन्तनगर विश्वविद्यालय में 13 अप्रैल, 1978 को एक और जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड रच डाला था। 13 अप्रैल, 1978 को जब पूरा देश गोरे अंग्रेजों द्वारा 1919 को रचे गये जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड की बरसी के अवसर पर गमगीन था, ठीक उसी दिन गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं औद्योगिक विश्वविद्यालय पन्तनगर, उत्तराखण्ड (तत्कालीन यू.पी.) में पुलिस व पी.ए.सी. द्वारा शांतिपूर्ण सभा व जुलूस निकाल रहे मजदूरों पर गोलियां बरसाकर कत्लेआम किया गया। इस कत्लेआम में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 14 मजदूर मारे गये थे। पन्तनगर गोलीकाण्ड शहीद-ए-आजम भगतसिंह की वह बात याद दिला देता है कि - ‘हमें गोरी बुराई के स्थान पर काली बुराई नहीं चाहिये..।’ आजादी के बाद सत्तासीन हुए काले अंग्रेजों का मजदूर-मेहनतकश विरोधी चरित्र एक बार पुनः उजागर हुआ था। इस घटना ने पुनः यह साबित कर दिया था कि इन काले अंग्रेजों की रीति-नीति व गोरे अंग्रेेजों की रीति-नीति में कोई बुनियादी अन्तर नहीं है। मजदूरों को काबू में रखने के लिए काले अंग्रेजों को जलियांवाला बाग सरीखे नरसंहार करने से गुरेज नहीं है।