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रविवार, 22 सितंबर 2024

हिंदुस्तान को लीडरों से बचाओ
                                                                                                                                                                               
                                                                              -सआदत हसन मंटो

हम एक अर्से से ये शोर सुन रहे हैं। हिन्दुस्तान को इस चीज़ से बचाओ। उस चीज़ से बचाओ, मगर वाक़िया ये है कि हिन्दुस्तान को उन लोगों से बचाना चाहिए जो इस क़िस्म का शोर पैदा कर रहे हैं। ये लोग शोर पैदा करने के फ़न में माहिर हैं। इसमें कोई शक नहीं, मगर उनके दिल इख़लास (अच्छी नीयत) से बिलकुल खाली हैं। रात को किसी जलसे में गर्मा-गर्म तक़रीर (भाषण) करने के बाद जब ये लोग अपने पुर-तकल्लुफ (सुकून से) बिस्तरों में सोते हैं तो उनके दिमाग़ बिल्कुल ख़ाली होते हैं। उनकी रातों का ख़फ़ीफ़-तरीन (थोड़ा सा) हिस्सा भी इस ख्याल में नहीं गुज़रा कि हिन्दुस्तान किस मर्ज़ में मुब्तला (विपत्ति में पड़ा हुआ) है। दरअसल वो अपने मर्ज़ के इलाज मुआलिजे (इलाज करने वाला) में इस क़दर मसरूफ़ रहते हैं कि उन्हें अपने वतन के मर्ज़ के बारे में ग़ौर करने का मौक़ा ही नहीं मिलता। 

शनिवार, 25 नवंबर 2023

 शेर आया, शेर आया दौड़ना                                 -सआदत हसन मंटो

ऊंचे टीले पर गडरिए का लड़का खड़ा, दूर घने जंगलों की तरफ मुँह किए चिल्ला रहा था, ‘‘शेर आया, शेर आया दौड़ना।’’ बहुत देर तक वो अपना गला फाड़ता रहा। उसकी जवाँ बुलंद आवाज बहुत देर तक फिजाओं में गूंजती रही। जब चिल्ला-चिल्ला कर उसका हलक सूख गया तो बस्ती से दो-तीन बुढ्ढे लाठियां टेकते हुए आए और गडरिए के लड़के को कान से पकड़ कर ले गए।पंचायत बुलाई गई। बस्ती के सारे अक्लमंद जमा हुए और गडरिए के लड़के का मुकदमा शुरू हुआ। फर्द-ए-जुर्म1 ये थी कि उसने गलत खबर दी और बस्ती के अमन में खलल डाला।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

 मेंढ़कों के बीच

                                                                                              - सुकेश साहनी


वर्षों पहले मैंने अपने बेटे को एक कहानी सुनाई थी, जो कुछ इस तरह थीः एक बार की बात है, रात के अंधेरे में एक गाय फिसलकर नाले में जा गिरी। सुबह उसके इर्द-गिर्द बहुत से मेंढ़क जमा हो गये।

‘‘आखिर गाय नाले में गिरी कैसे?’’ उनमें से एक मेंढ़क टरटराया, हमें इस पर गहराई से विचार करना चाहिए।

‘‘मुझे तो दाल में कुछ काला लगता है’’, दूसरे ने कहा।

‘‘कुछ भी कहो.....’’ तीसरा मेंढक बोला, ‘‘अगर पुण्य कमाना हो तो इसे बाहर निकालना होगा।’’

‘‘मरने दो!’’ चौथा टर्राया, ‘‘हमारी नाक के नीचे रोज ही सैकड़ों गायें-बछड़े काटे जाते हैं, तब हम क्या कर लेते हैं?’’

रविवार, 26 जनवरी 2020

शेर की गुफा में न्याय
-शरद जोशी

जंगल में शेर के उत्पात बहुत बढ़ गए थे। जीवन असुरक्षित था और बेहिसाब मौतें हो रही थीं। शेर कहीं भी, किसी पर हमला कर देता था। इससे परेशान हो जंगल के सारे पशु इकट्ठा हो वनराज शेर से मिलने गए। शेर अपनी गुफा से बाहर निकला - ‘कहिए क्या बात है?’

उन सबने अपनी परेशानी बताई और शेर के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई। शेर ने अपने भाषण में कहा -

‘प्रशासन की नजर में जो कदम उठाने हमें जरूरी हैं, वे हम उठाएँगे। आप इन लोगों के बहकावे में न आवें जो हमारे खिलाफ हैं। अफवाहों से सावधान रहें, क्योंकि जानवरों की मौत के सही आँकड़े हमारी गुफा में हैं जिन्हें कोई भी जानवर अंदर आकर देख सकता है। फिर भी अगर कोई ऐसा मामला हो तो आप मुझे बता सकते हैं या अदालत में जा सकते हैं।’

चूँकि सारे मामले शेर के खिलाफ थे और शेर से ही उसकी शिकायत करना बेमानी था इसलिए पशुओं ने निश्चय किया कि वे अदालत का दरवाजा खटखटाएँगे।

जानवरों के इस निर्णय की खबर गीदड़ों द्वारा शेर तक पहुँच गई थी। उस रात शेर ने अदालत का शिकार किया। न्याय के आसन को पंजों से घसीट अपनी गुफा में ले आया।

शेर ने अपनी नई घोषणाओं में बताया - ‘जंगल के पशुओं की सुविधा के लिए, गीदड़ मंडली के सुझावों को ध्यान में रखकर हमने अदालत को सचिवालय से जोड़ दिया है, ताकि न्याय की गति बढ़े और व्यर्थ की ढिलाई समाप्त हो। आज से सारे मुकदमों की सुनवाई और फैसले हमारी गुफा में होंगे।’

इमर्जेंसी के दौर में जो पशु न्याय की तलाश में शेर की गुफा में घुसा उसका अंतिम फैसला कितनी शीघ्रता से हुआ इसे सब जानते हैं। 
                                                  (वर्ष- 11 अंक- 2 जनवरी-मार्च, 2020)