मंगलवार, 30 जून 2026

मजदूर आंदोलन
मजदूर सड़कों पर
यह न होता तो क्या होता ?
- मदन
    2 अप्रैल को होण्डा मोटर्स मानेसर हरियाणा में ठेका मजदूर वेतन वृद्धि की मांग को लेकर सड़क पर उतरे। पुलिस प्रशासन दमन के सहारे इसे रोकने की कोशिश कर रहा था। देखते ही देखते मजदूरों के वेतन वृद्धि के संघर्ष मानेसर की अन्य फैक्टरियों के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी फैल गये। हरियाणा से होते हुए उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, राजस्थान के औद्योगिक केन्द्रों तक फैल गया। जहां-जहां मजदूर आंदोलन पहुंचा वहां-वहां पुलिस दमन, मजदूरों, मजदूर संगठनों के कार्यकर्ताओं-नेताओं को जेलों में डाला गया। मजदूरों के ये सभी संघर्ष स्वतः स्फूर्त थे।

सवाल उठता है कि वह क्या वजह है जो यह आंदोलन शुरू हुए और होते ही चले गये? कहीं-कहीं मजदूर आंदोलन के हिंसक हो जाने के क्या कारण थे? क्या सरकार और मीडिया के इन मजदूर आंदोलनों के ‘‘पाकिस्तान’’ या ‘‘नक्सलियों’’ द्वारा प्रायोजित किये जाने के दावे का क्या मतलब है?

28 फरवरी को अमेरिका, इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के बाद देश में गैस की आपूर्ति प्रभावित होने लगी। इससे गैस न मिलने से लेकर कालाबाजारी में कई गुनी महंगी गैस मिलने तक की समस्यायें सामने आयीं। इससे भारी संख्या में मजदूरों के पलायन कर गांव-घरों की ओर जाने की तस्वीरें सामने आयीं। मोदी भी संसद में बोले कि ‘लाॅकडाउन जैसी स्थिति के लिए तैयार रहें’। गैस-तेल के कारण कई सारे उद्योग भी बंद हो गये। उन्हें तेल-गैस महंगी दी जाने लगी। इसने अपने ही तरह से महंगाई बढ़ाने में भूमिका निभाई।

इसका सबसे बुरा असर उद्योगों में कार्यरत ठेका मजदूरों पर पड़ा। पहले ही जैसे-तैसे गुजारा कर रहे मजदूरों के लिए यह महंगाई असहनीय साबित हुई। मुनाफे की हवस में अंधे पूंजीपतियों से लेकर गूंगी-बहरी सरकार (मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए) ने इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। आखिरकार मजदूरों को अपनी मांगों के लिए खुद ही सड़कों पर उतरना पड़ा। सभी जगह मजदूर; यूनियन विहीन थे। अधिकांश जगह तो नेतृत्वविहीन। सरकार ने इसे मजदूरों की आर्थिक-सामाजिक समस्या की तरह न देखा, हल करना तो दूर। सरकार ने फासीवादी रुख के हिसाब से इसे कानून व्यवस्था के मामले की तरह हल किया। जो अपनी बारी में इस आंदोलन के और फैलने का कारण बना। ऐसे में मजदूर संघर्ष के कहीं-कहीं हिंसक बनने में भी पूंजीपतियों, सरकार ने फायदा देखा और इसे उकसाया, होने दिया।

सारी बेरुखी और दमन के बावजूद पूंजीपतियों और सरकार को नाममात्र की मजदूरी बढ़ाने की घोषणा करने पर मजबूर होना पड़ा। इसी तरह मजदूरों ने आने-जाने की व्यवस्था से लेकर खाने, ब्रेक टाइम, ईएसआई, ओवरटाइम भुगतान, दुर्घटना मुआवजा, आदि-आदि मांगें उठाई। मांगों से साफ है कि मजदूर न सिर्फ वेतन वृद्धि बल्कि फैक्टरियों में मानवीय गरिमा के अनुसार काम करवाये जाने के लिए संघर्षरत हैं।

मजदूरों की मांगों से साफ है कि फैक्टरियों में मालिक, प्रबंधन से लेकर सरकार के श्रम मंत्रालय, श्रम अधिकारी तक सबने मजदूरों को नजरअंदाज किया है। उनको लूटा है। ऊपर से चार नयी श्रम संहितायें। मजदूर विरोधी इन श्रम संहिताओं के कई सारे प्रावधानों को तो फैक्टरियों में पहले से ही गैरकानूनी तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था।

तमाम औद्योगिक केन्द्रों में मजदूर अधिकारों के लिए विभिन्न क्रांतिकारी, गैर-क्रांतिकारी संगठन सालों-साल से काम करते हैं। अक्सर इनके प्रयासों के कारण ही कभी-कभार मजदूरों की दर्द भरी दास्तान बाकि समाज तक पहुंचती है। सरकारों ने मजदूरों को भड़काने, उकसाने का आरोप इन संगठनों, ट्रेड यूनियन नेताओं, कार्यकर्ताओं पर लगाया है। यह कोई योजनाबद्ध आंदोलन नहीं हैं। इतने दिनों में यह आन्दोलन कई राज्यों मंे फैल गये। एक फैक्टरी में यह आंदोलन कुछ मांगों के मान लिये जाने पर दो-चार दिनों में ही समाप्त हो जा रहे हैं। किसी अन्य फैक्टरी में आन्दोलन शुुरू होने की खबर आ जा रही है। लेकिन मजदूर संघर्ष के बहाने जगह-जगह मजदूर नेताओं, कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया।

इन आंदोलनों के ‘‘पाकिस्तान’’ और ‘‘नक्सलियों’’ से प्रभावित होने की बात भी मजदूर संघर्ष को बदनाम करने के लिए ही है। किसी आंदोलन को बदनाम करने के लिए ‘‘साजिश’’ के कोण से बात करके पूरा मामला ही संदिग्ध बनाने की कोशिश की जाती है। इसके बहाने गंभीर धाराओं में मजदूरों को फंसाने के लिए समाज में माहौल भी बना दिया जाता है। इसमें सरकार की हर हमेशा जय-जयकार करता मीडिया हद से गुजर जाता है। मजदूर आंदोलन के बारे में भी मीडिया ने ऐसी बातें की। सत्ताधारी दल के नेताओं ने अनर्गल बयान दिये।

अक्सर कुछ भी न समझे जाने वाले मजदूरों ने कुछ होने का प्रमाण दिया है। पूंजीपति, सरकार, प्रशासन की नजर में ये कुछ नहीं हैं। सब कुछ का निर्माण करने वाले इन मजदूरों ने कुछ दिनों के अपने आन्दोलन से ही निर्णायक ताकत होने का एहसास करा दिया। सचेत और संगठित मजदूर वर्ग निश्चित ही इतिहास का निर्माण भी करेगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें