विरासत
एडलवाइस पाइरेट्स: नाजी षासन से टकराये दुर्लभ साहसी युवा
- चन्दन
जर्मनी मंे हिटलर ने फासीवादी नाजी शासन कायम किया। इस शासन में मेहनतकश जनता के राजनीतिक अधिकार छीन लिये गये। साथ ही उद्योगों में शोषण भी बढ़ा दिया। मजदूर वर्ग के युवाओं ने नाजी शासन का ‘एडलवाइस पाइरेट्स’ ग्रुप बनाकर प्रतिरोध किया। जर्मनी के पश्चिमी क्षेत्र औद्योगिक रूप से आगे बढ़े हुए थे। एडलवाइस पाइरेट्स अलग-अलग शहरों में अलग नाम से होते थे। ये विविध समूह व्यापक रूप से फैले हुए थे लेकिन परस्पर संगठित नहीं थे। कोलोन में ‘नवाजोस’, डसेलडोर्फ में ‘किटेल बैक पाइरेट्स’, एसेल में ‘रोविंग ड्यूड्स’ के नाम से जाने जाते थे। लेकिन अब इन सभी को ‘एडलवाइस पाइरेट्स’ के तौर पर ही याद किया जाता है।
‘एडलवाइस’ आल्पस पर्वत श्रंखला के पर्वतों में दुर्गम चट्टानों-चोटियों में पाया जाने वाला दुर्लभ फूल है। यह फूल दुर्लभता, साहस, शुद्धता, स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता है। एडलवाइस पाइरेट्स ने इस फूल के गुणों को अपना उसूल बनाया। साथ ही, एडलवाइस फूल के बैज, पिन या असली फूल को भी कपड़ों पर लगाते थे। नाजी भी सैन्य बहादुरी के प्रतीक के रूप में एडलवाइस फूल को अपनाते थे। इसलिए एडलवाइस बैज पहनना विद्रोह के रूप में देखा जाता और पकड़े जाने पर सजा का कारण बनता था।
पश्चिमी जर्मनी में मजदूर वर्ग के युवाओं का यह ढीला-ढाला समूह था। इसमें 14 से 17 वर्ष के युवा शामिल होते थे। हिटलर के फासीवादी छात्र समूह ‘हिटलर यूथ’ की सदस्यता लेने का युवाओं पर दबाव बनाया जाता था। ‘हिटलर यूथ’ के जरिये युवाओं के खाली समय की गतिविधियों पर नियंत्रण कायम किया गया। इसके कठोर अनुशासन के खिलाफ 1938 में एडलवाइस पाइरेट्स जैसे समूह बनने लगे। फासीवादी कठोर अनुशासन का विरोध करने के उनके तरीके अनोखे थे। ये चेकर्ड शर्ट, लेदर होजेन (चमड़े की छोटी पैंट) और काॅलर में एडलवाइस फूल के बैज से पहचाने जाते थे। ये नाजी अफसरों के फ्यूल टैंक में चीनी या अन्य चीज डाल देते थे। नाजी फौजी इकाइयों में खिड़की पर पत्थर फेंकते। ‘हिटलर मुर्दाबाद’, ‘नाजी बर्बरता मुर्दाबाद’ जैसे नारे लिखते, ग्रेफिटी बनाते। इनका सबसे प्रचलित नारा ‘हिटलर यूथ के खिलाफ अनंत युद्ध’ था। हिटलर यूथ के गश्ती दलों पर घात लगाकर हमला करते थे। उन्हें पीटने पर गर्व करते। युद्ध के अंतिम चरण में नाजी यातना शिविरों से भागे कैदियों को आश्रय देना जैसे जोखिम भरे काम भी बड़े मजे से करते। जर्मनी भर में फैली ये गतिविधियां कोई संगठित प्रतिरोध न होकर बिखरी कार्यवाहियां थीं।
नाजी शासन इन्हें संगठित राजनीतिक प्रतिरोध न होने के चलते खतरा नहीं मानता था। ‘व्हाइट रोज’ समूह संगठित राजनीतिक खतरा माना गया। नाजी शासन उनसे क्रूरता से निपटा। ‘युवा प्रति संस्कृति’ (ैूपदहरनहमदक) राजनीतिक खतरा तो नहीं माना जाता था लेकिन इनके समूह बहुत बड़े थे। कोलोन शहर में नवम्बर 1944 में नाजी गुप्तचर पुलिस (गेस्टापो) प्रमुख की हत्या का जिम्मेदार एडलवाइस पाइरेट्स के सदस्यों को माना गया। 10 नवम्बर 1944 को बिना मुकदमा चलाये रेलवे स्टेशन के पास सैकड़ों लोगों की भीड़ के सामने 13 एडलवाइस पाइरेट्स को फांसी दे दी गयी। 14-17 साल के तरुणों को क्रूरतापूर्वक फांसी देना नाजी शासन की बर्बरता के साथ ही उनकी हताशा की भी अभिव्यक्ति थी। क्योंकि युद्ध के मोर्चे पर सोवियत संघ की सेनायें नाजियों को शिकस्त दे रही थीं। यही नाजीवादी शासन का असली चेहरा था। युद्ध में जीतने पर भी जनता पर बर्बरता तो हारने पर भी बर्बरता। इसीलिए फासीवाद के खिलाफ संघर्ष को ‘बर्बरता के खिलाफ सभ्यता के लिए संघर्ष’ के तौर पर देखा जाता है।
हिटलर की कायराना आत्महत्या और नाजीवाद की पराजय के बाद भी एडलवाइस पाइरेट्स को उचित सम्मान प्राप्त नहीं हुआ। जर्मनी का पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी में बंटवारा हो गया। पश्चिमी जर्मनी में अमेरिका, ब्रिटेन के प्रभाव वाला पूंजीवादी शासन कायम हुआ तो पूर्वी जर्मनी में सोवियत संघ के प्रभाव वाला समाजवादी शासन। पश्चिमी जर्मनी में शासन, सरकार से लेकर न्यायालयों में नाजी फासीवाद के समर्थक बने रहे। संगठित राजनीतिक प्रतिरोध न होने के कारण एडलवाइस पाइरेट्स की पहचान करना मुश्किल था। जब इनके मामले न्यायालयों तक पहुंचे तब भी इन्हें अराजक तत्वों की तरह देखा गया। फ्रिट्ज थेलन को 1943 में गुप्त नाजी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वो पहले फोर्ड मोटर्स में काम करते थे। लेकिन बाद में रिहा होने पर उन्हें वापस फोर्ड मोटर्स में काम पर नहीं रखा गया।
दूसरी तरफ पूर्वी जर्मनी में समाजवादी सत्ता में मौजूद अनुशासन और सामाजिक कर्तव्य बोध को एडलवाइस पाइरेट्स स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने हिटलर के क्रूर अनुशासन के विरोध में अपनाये तरीकों के कारण हर तरह के अनुशासन को मानने से मना कर दिया। कईयों ने नए समाजवादी शासन को अपनाया तो कुछ ने दूरी बनाए रखी। अतः यहां भी इन्हें एडलवाइस पाइरेट्स के रूप में सम्मान नहीं मिला।
1984 में फ्रिट्ज थेलन ने अपने संस्मरण प्रकाशित किए। इसमें एडलवाइस पाइरेट्स को ‘प्रतिरोध सेनानी’ कहा। 1988 में इजरायल के याद वाशेम ने इन्हें ‘अन्य राष्ट्रों के शानदार लोग’ (त्पहीजमवने ।उवदह जीम छंजपवदे) कहा। 2011 में कोलोन के मेयर ने पांच जीवित एडलवाइस पाइरेट्स को जर्मनी का ‘आॅर्डर आॅफ मेरिट’ प्रदान किया।
लम्बे समय (लगभग 60 साल) बाद उपयुक्त सम्मान मिलने से इतर एडलवाइस पाइरेट्स का प्रतिरोध सराहनीय था। यदि यह संगठित राजनीतिक प्रतिरोध होता तो इसका प्रभाव ज्यादा व्यापक होता और समाज को गहरे से प्रभावित करता। संगठित फासीवादी क्रूरता के खिलाफ बिखरे हुए एडलवाइस पाइरेट्स का प्रतिरोध संघर्ष आज के फासीवादी खतरे के खिलाफ संगठित होने की ही प्रेरणा देता है। दुर्लभ साहस और स्वतंत्रता के फूल ‘एडलवाइस पाइरेट्स’ हमेशा खिलते रहेंगे।
एडलवाइस पाइरेट्स का एक प्रसिद्ध गीत-
‘‘हिटलर की ताकत हमें नीचा दिखा सकती है,
लेकिन हम अभी भी जंजीरों में हैं।
एक दिन हम फिर से आजाद होंगे,
जंजीरों को तोड़ देंगे।
हमारी मुट्ठियां सख्त हैं, हां,
और हमारे चाकू तैयार हैं,
एडलवाइस के बच्चों की स्वतंत्रता के लिए...’’
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