मंगलवार, 30 जून 2026

समाज
नफरती माहौल के बीच उम्मीद जगाती किरणें
- महेश

    देश में संघ-भाजपा और इनके संगठनों, समर्थकों ने अपनी नफरत की फासीवादी-सांप्रदायिक राजनीति को लगातार आगे बढ़ाया हुआ है। हिन्दू धर्म के नाम पर फैलाई जा रही यह नफरत (इनको धर्म से कोई मतलब नहीं है) समाज को बांट रही है। इसमें मुस्लिमों, ईसाइयों, महिलाओं, बच्चों और प्रगतिशील लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। इसके खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में उम्मीद की किरणें भी दिखाई दे रही है।

लखनऊ विश्वविद्यालय में सांप्रदायिक सद्भाव की अनुपम मिसाल

22-23 फरवरी, 2026 में लखनऊ विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक लाल बारादरी परिसर में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जो भारत के एकता और भाईचारे को नई ऊंचाई दे गया। प्रशासन ने संरचनात्मक सुरक्षा कारणों से लाल बारादरी की मस्जिद को सील कर दिया। रमजान के महीने में मुस्लिम छात्रों को नमाज पढ़ने में कठिनाई हुई, तो उन्होंने गेट के बाहर शांतिपूर्वक नमाज अदा करने का फैसला किया।

इसी दौरान हिंदू छात्रों ने एक अनोखा कदम उठाया। उन्होंने मुस्लिम साथियों के चारों ओर मानव श्रृंखला बना दी। हाथों में हाथ डालकर वे उनके पीछे खड़े हो गए और ढाल बनकर सुरक्षा प्रदान की। उनका संदेश साफ था- नमाज बिना किसी बाधा या गड़बड़ी के शांतिपूर्वक पूरी हो।

यह मात्र एक घटना नहीं थी, बल्कि सद्भाव और भाईचारे का जीवंत प्रदर्शन था। शिक्षा के कैंपस में जब धर्म के नाम पर एबीवीपी और तथाकथित हिंदू धर्म के रक्षक तनाव पैदा कर सकते थे, तब छात्र-युवा पीढ़ी ने साबित कर दिया कि मतभेदों से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान और संरक्षण करना ही सच्चा भाईचारा है। तब उन्होंने दिखाया कि धर्म के नाम पर दीवारें कितनी भी ऊंची करने की कोशिश की जाए लेकिन इंसानियत और दोस्ती से ऊंची नहीं हो सकतीं। हिन्दू छात्रों का यह कदम दिखाता है कि भारत की एकता विविधता में निहित है।

ऐसी घटनाएं हमें सिखाती हैं कि सांप्रदायिक सद्भाव कोई कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत है। लखनऊ विश्वविद्यालय के इन छात्रों ने पूरे देश को संदेश दिया- जब नौजवान एकजुट होते हैं, तो कोई भी दीवार हमें अलग नहीं कर सकती। इस सद्भाव को और अधिक गहरा करने की जरूरत है। स्कूलों, काॅलेजों और समाज में छोटी-छोटी एकताओं को बढ़ावा देकर ही नफरत को कम किया जा सकता है। यह धर्म से ऊपर इंसानियत को रखकर ही हो सकता है। तभी हम एक मजबूत, समृद्ध और शांतिपूर्ण भारत का निर्माण कर पाएंगे।

कोटद्वार में साहस और सद्भाव की मिसाल

26 जनवरी, 2026 को उत्तराखंड के कोटद्वार शहर में एक घटना ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया। गणतंत्र दिवस की तारीख में जब देश में स्वतंत्रता और समानता की बातें की जा रही थी, तब एक 70 वर्षीय बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद की लगभग 30 वर्ष पुरानी दुकान ‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर’ पर लम्पट बजरंग दल के कुछ लोग पहुंचे। उन्होंने दुकान के नाम में ‘बाबा’ शब्द को जबरदस्ती हटाने का दबाव डाला। बुजुर्ग असहाय खड़े थे, पार्किंसन की बीमारी से जूझते हुए।

तभी पास के जिम संचालक दीपक कुमार ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने बुजुर्ग की रक्षा की और लपंट उत्पाती बजरंग दल का डटकर विरोध किया। जब भीड़ ने उनका नाम पूछा, तो दीपक कुमार ने बिना किसी हिचक के जवाब दिया- मेरा नाम ‘मोहम्मद दीपक’ है। यह एक साधारण शब्द नहीं थे बल्कि इंसानियत का गहरा संदेश था। उन्होंने दिखा दिया कि धर्म की दीवारें कितनी भी ऊंची हों, मानवता उनसे कहीं ऊपर और व्यापक है।

दीपक कुमार और विजय रावत ने खड़े होकर एक बुजुर्ग की गरिमा बचाई। उन्होंने वह साहस दिखाया जो कमजोर के पक्ष में खड़ा होता है। भले ही अपनी सुरक्षा को खतरे में डालना पड़े। बाद में दीपक को धमकियां मिलीं, आर्थिक नुकसान हुआ, एफआईआर दर्ज की गयी। फिर भी उनकी आवाज नहीं डिगी।

कोटद्वार का यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में छिपी एकता है। जब हिंदू युवक मुस्लिम बुजुर्ग की रक्षा के लिए ‘मोहम्मद दीपक’ बन जाता है, यह दिखाता है कि सद्भाव अभी जिंदा है। दीपक कुमार जैसे साहसी लोग समाज में दिखाई देते हैं। वे सिखाते हैं कि धर्म से ऊपर इंसानियत रखो। अन्याय के सामने चुप मत रहो। समाज को संदेश दिया कि नफरत के सामने सिर झुकाना नहीं बल्कि सीना तानकर खड़े होना ही असली देशभक्ति है। ऐसी मिसालें देश में मेहनतकशों के बीच भाईचारे को मजबूत बनाती हैं।

नैनीताल में शैला नेगी की मिसाल

मई 2025 में उत्तराखंड के नैनीताल शहर में एक नाबालिग लड़की के साथ हुई जघन्य दुष्कर्म की घटना ने पूरे पहाड़ को झकझोर दिया। आरोपी गिरफ्तार हो चुका था। लेकिन भाजपा-संघ ने अपनी नफरती राजनीति के कारण इस गुस्से की लहर को सांप्रदायिक हिंसा में बदल दिया। उग्र भीड़ मुस्लिम दुकानों पर हमला करने, तोड़फोड़-मारपीट करने और ‘‘मुस्लिम विरोधी’’ नारे लगाने लगी। नफरत की इस आंधी में निर्दोषों को सजा दी जा रही थी।

इसी हिंसक माहौल में शैला नेगी- अकेली भीड़ के बीच खड़ी हो गईं। वायरल वीडियो में वे निडर स्वर में चीखकर कह रही हैं, ‘‘एक व्यक्ति के अपराध की सजा पूरे समुदाय को क्यों दी जा रही है? हम सब एक हैं। प्रदर्शन न्याय के लिए हो, न कि नफरत के लिए। हिंदू-मुस्लिम मत करो, हम इंसान हैं!’’

भीड़ के गुस्से, उग्र नारों, सांप्रदायिक माहौल और धमकियों के बीच शैला नेगी ने पहाड़ की चट्टान की तरह डटकर खड़े रहकर उनका सामना किया। उन्होंने सच्चे साहस का परिचय दिया। साहस वह है जो अन्याय और नफरत के खिलाफ लड़े, भले ही भीड़ में इंसान अकेला हो जो साहस की बात करे, इंसानियत यही है।

इसी तरह की घटनाएं देश भर में घट रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगह यह दिखाई दे रहा है। जहां पर प्रगतिशील, न्यायप्रिय लोग संघ-भाजपा की नफरत भरी राजनीति का जवाब दे रहे हैं। कहीं यह व्यक्तिगत तौर पर तो कहीं यह सामाजिक तौर पर साहस के रूप में दिखाई दे रहा है। इस तरह की घटनाओं को मीडिया में दबा या रोक दिया जा रहा है। ताकि संघी ताकतों द्वारा बनाये जा रहे नफरती माहौल के खिलाफ उठ रही आवाज लोगों को सुनाई ना दे।

संघ-भाजपा ने अपने किए वायदे निभाने के बजाय देश को नफरत की आग में झोंक रखा है। वक्त बीतने के साथ अब लोग इनकी असलियत समझने और इनके खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। इनके झूठ का घड़ा भर चुका है। कभी भी यह फूट सकता है। और संघ-भाजपा को रसातल में पहुंचाने का काम करेगा।

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