साहित्य
‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’: मानव मुक्ति का महान गान
- रजनीश
वास्तविकता (रियल्टी) और कल्पना (फैंटसी) दो सगी बहनें हैं। इन दो सगी बहनों का जीवंत संबंध मनुष्यों से है। खासकर मनुष्य के मस्तिष्क से, उसकी चेतना से है। पहली बहन (वास्तविकता के ज्ञान) को हम विज्ञान के रूप में भी जानते हैं तो दूसरी बहन कला है। और कला ने जितने रूप धरे हैं उनमें से एक रूप पौराणिक कथाएं भी हैं। कुछ लोग पौराणिक कथाओं को अपनी मिथ्या चेतना के कारण इतिहास या सच्चाई समझ बैठते हैं। और जब ये लोग किसी प्रतिक्रियावादी राजनैतिक समूह या वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं तो यह घोषणा कर देते हैं कि यही सच्चा इतिहास है। और यह उनकी आस्था का प्रश्न है। खैर! ऐसे कूढ़मगजों पर क्या बात की जाए।
पौराणिक कथाएं मानव सभ्यता का अभिन्न अंग रही हैं। जितनी मानवीय सभ्यताएं उतनी ही पौराणिक कथाएं। इन पौराणिक कथाओं में यूनान (ग्रीक) की कथाओं का विशिष्ट स्थान है। ‘‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’’ (प्रोमेथियस की मुक्ति) एक प्राचीन ग्रीक पौराणिक कथा का पर्सी बिशे शैली द्वारा एक नये ढंग से पुनप्र्रस्तुति या पुनर्कथन है। प्राचीन पौराणिक कथा को शैली ने न केवल आधुनिक संदर्भ दिया बल्कि उस कथा के अंत को बदल महान क्रांतिकारी सन्देश दिया। ‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’ (च्तवउमजीमवने न्दइवनदक) एक ऐसा काव्यात्मक नाटक (स्लतपबंस क्तंउं) है जो फ्रांस की महान क्रांति से अनुप्राणित था। यानी कि एक प्राचीन ग्रीक पौराणिक कथा को फ्रांस की क्रांति (1789) की आत्मा से रचा गया था। इस रूप में देखें तो शैली की यह रचना जिन भी पौराणिक कथाओं की पुनप्र्रस्तुति, पुनर्कथन या पुनर्गठन किया गया, उनमें सबसे अनूठी है।
हमारे देश में इस विधा का खूब प्रयोग किया गया। रामायण, महाभारत की कथा का ही नहीं बल्कि इन महाकाव्यों के पात्रों के जरिये नये ढंग से समाज के समक्ष उपस्थित प्रश्न, द्वन्द्व, समस्याओं पर कई-कई बातें कही गयीं। भारत के राजनीतिज्ञों ने तो गीता का कई-कई बार पुनर्कथन या पुनर्पाठ किया। इस सन्दर्भ में तिलक, गांधी, अरविन्द घोष सहित कई अन्यों का नाम लिया जा सकता है। इसी सन्दर्भ में भारत के कई साहित्यकारों का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने इन महाकाव्यों के पात्रों के आधार पर, आधुनिक सन्दर्भ प्रदान करते हुए, अपने युग के प्रश्नों का अपनी सोच, वर्ग आदि के आधार पर जवाब दिया।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (‘राम की शक्ति पूजा’), रामधारी सिंह दिनकर (कर्ण के जीवन पर आधारित ‘रश्मिरथी’ व महाभारत के आधार पर ‘कुरुक्षेत्र’), धर्मवीर भारती (‘अंधा युग’) आदि का इस सन्दर्भ में नाम लिया जा सकता है। इसी सन्दर्भ में अमीश त्रिपाठी की ‘शिवा ट्रिलाॅजी’ (ैीपअं ज्तपसवहल), कविता काणे की ‘सीता’स सिस्टर’, आनंद नीलकांतन की ‘असुर’ (।ेनतं: ज्ंसम व िजीम टंदुनपेमक) आदि का नाम लिया जा सकता है। यानी यह पुनर्कथन या पौराणिक कथाओं का पुनर्गठन (डलजीवसवहपबंस त्मजमससपदह) एक अनवरत चलने वाली विधा बन गयी है। इस विधा का प्रयोग हिन्दी, अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं में हुआ है।
‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’ प्राचीन ग्रीक नाटककार एशिलस (।मेबीलसने) की त्रासदी ‘प्रोमेथियस बाउण्ड’ (च्तवउमजीमने ठवनदक) पर आधारित है।
‘प्रोमेथियस बाउण्ड’ में जुपिटर (ग्रीक भाषा में ज्यूस) और प्रोमेथियस के बीच अंत में सुलह-समझौता हो जाता है। शैली ने जब इस ग्रीक मिथकीय कथा का पुनर्गठन किया तो उन्होंने दिखाया कि अंत में जुपिटर का पतन हो जाता है और प्रोमेथियस की न केवल नैतिक विजय होती है बल्कि मानवता के नये युग का सूत्रपात भी होता है। मानवता न केवल मुक्त हो जाती है बल्कि अपने पर खुद शासन करने लगती है। दासता के सारे चिन्ह मिट जाते हैं। और ऐसा कैसे होता है। ऐसा महान क्रांति के जरिये होता है।
‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’ के पौराणिक आख्यान को समझने के लिए जहां उसकी कथा से परिचित होना जरूरी है वहां उसकी आत्मा को समझने के लिए महान फ्रांसीसी क्रांति (1789) की पृष्ठभूमि, उसके आवेग व मानवजाति पर पड़े व्यापक प्रभाव को समझना जरूरी है।
‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’ में प्रोमेथियस एक टाइटन है। टाइटन ग्रीक मिथकों में ऐसे विशालकाय देवता (कई बार दैत्य या दानव भी हैं) हैं जिन्होंने स्वर्ग के राजा जुपिटर (ज्यूस) से पहले पृथ्वी पर राज किया था। जुपिटर ने प्रोमेथियस को मानवजाति को अग्नि और ज्ञान देने के लिए भयानक सजा सुनायी थी। इस सजा के तहत प्रोमेथियस को काकेशस पर्वत पर जंजीरों से बांध (बाउण्ड) दिया गया है। वह तीन हजार साल से बंधा हुआ है। जुपिटर न तो उसे जीने देता है और न मरने देता है। रोज एक चील (ईगल) प्रोमेथियस के कलेजे (लीवर) को खा जाता है जो फिर रात में उग जाता है।
प्रोमेथियस पहले सजा सहते हुए जुपिटर से नफरत करता है, उसे श्राप देता है किन्तु फिर वह आंतरिक परिवर्तन के कारण जुपिटर से नफरत व घृणा करना बंद कर देता है और वह अपना श्राप भी भूल जाता है। जुपिटर उत्पीड़क सत्ता का प्रतीक है। यह उत्पीड़क सत्ता निरंकुश राजा, धर्म या ईश्वर की है।
शैली ने मूल मिथक में कई परिवर्तन किये थे। जहां मूल मिथक में महान योद्धा हरक्यूलिस प्रोमेथियस को आजाद कराके उसका जुपिटर से समझौता कराता है वहां शैली के यहां जुपिटर का पतन आंतरिक परिवर्तन व प्रेम से होता है। प्रोमेथियस तीन हजार साल से अपनी सजा भुगत रहा है परन्तु वह उफ तक नहीं करता। उसकी सहनशीलता अनुपम है। वह मानवजाति को आग (फायर) व ज्ञान देने के अपने कार्य को सही और उचित मानता है।
प्रोमेथियस पृथ्वी का पुत्र है और जब से उसे बन्दी बनाया जाता है तब से पृथ्वी की रौनक खत्म हो जाती है। पृथ्वी विषैली गैसों व वनस्पतियों का उत्सर्जन करने लगती है और जिसके कारण महामारियां फैलने लगती हैं। प्रोमेथियस के बन्दी होने से सारी प्रकृति शोक में डूबी है। सूर्य, चन्द्र, समुद्र सभी दुःखी हैं। प्रोमेथियस की पत्नी एशिया है जो समुद्र की बेटी है। वह एक अप्सरा है। वह प्रोमेथियस को लेकर परेशान है। प्रोमेथियस की मुक्ति कैसे होगी इसके लिए जुपिटर का संदेशवाहक मरकरी (भारत के नारद मुनि की तरह) उससे जुपिटर की सत्ता को स्वीकारने व झुकने के लिए कहता है। प्रोमेथियस कहता है वह अनन्त काल तक सजा भुगतने को तैयार है। वह मानव जाति को गुलाम बनाने वाले का विरोध करता रहेगा।
प्रोमेथियस ने जुपिटर को स्वर्ग का राजा बनने से पहले ज्ञान इस शर्त पर दिया था कि वह मानवजाति को आजाद कर देगा पर जुपिटर ने उल्टा किया। उसने मानवजाति पर खूब अत्याचार किये जिसके कारण जुपिटर से लड़ने के लिए प्रोमेथियस ने अग्नि और ज्ञान मानवजाति को दिये। ऐसा करने की सजा प्रोमेथियस तीन हजार साल से भुगत रहा है।
शैली के इस काव्यात्मक नाटक के अंत में डेमोगोरगोन (क्मउवहवतहवद) जो जुपिटर का बेटा है उसे स्वर्ग की सत्ता से हटा देता है। और फिर हरक्यूलिस उसे आजाद करा देता है। और इस तरह प्रोमेथियस मुक्त (अनबाउण्ड) हो जाता है। उसके मुक्त होते ही पृथ्वी की रंगत बदल जाती है। पूरी प्रकृति नाच उठती है। मानवजाति के सारे भेद, झगड़े मिट जाते हैं। वर्ग संघर्ष खत्म हो जाता है। प्रागैतिहासिक काल मिट जाता है और इतिहास का प्रारम्भ होता है।
शैली के इस काव्यात्मक नाटक (लिरिकल ड्रामा) में चार एक्ट है। पहले एक्ट में प्रोमेथियस जुपिटर से नफरत करना छोड़ देता है यद्यपि उसकी सजा जारी है। दूसरे एक्ट में प्रोमेथियस की पत्नी एशिया डेमोगोरगोन नामक शक्ति से मिलती है। तीसरे एक्ट में प्रोमेथियस की मुक्ति होती है। और अंत में चैथे एक्ट में पूरी प्रकृति, तत्व (म्समउमदजे), मानवजाति मिलकर गाते हैं। पूरे ब्रह्माण्ड में खुशी, प्रेम व स्वतंत्रता का राज कायम हो जाता है। शोषण-उत्पीड़न का नामोनिशां मिट जाता है।
शैली के इस महान काव्यात्मक नाटक का हिन्दी अनुवाद उपलब्ध नहीं है। और इस तरह से मानव मुक्ति के इस महान गान से हिन्दी भाषी वंचित हैं।
‘‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’’ हर उस व्यक्ति को अवश्य ही पढ़ना चाहिये जो मानव मुक्ति की चाह रखता है। जो ऐसे समाज का स्वप्न देखता है जहां मानवजाति बराबर हो, आजाद हो और आपस में प्रेम से, खुशी से, स्वतंत्रतापूर्वक रहती हो।
‘अपने पर खुद षासन करता है’
‘‘राज सिंहासन, वेदियां, न्याय पीठ और जेलें
जिनके आस-पास अभावग्रस्त लोगों द्वारा जलाये गये
राजदंड, मुकुट, तलवारें, जंजीरें
और गलत सोच के परिणाम वृहत् ग्रन्थ
लेकिन वे अज्ञानतावश
उनके महत्व को नहीं समझ सके
उनकी शक्लें राक्षसी और बर्बर आकृतियों से मिलती हैं-
लगभग विस्मृत प्रेतों की शक्लों से
और वे छद्म आकृतियां,
जिनसे नफरत करते हैं देवता और मनुष्य
जो बहुनामा और बहुरूपिया हैं
दुनिया के बड़े आततायी जुपिटर की तरह
और जो राष्ट्र आतंकित, रक्तरंजित
दीर्घाशा से भग्न हृदय
उसकी वेदिकाओं की ओर कर्षित
दूषित और मूल्यविहीन लोगों के
अनुद्धारक आंसुओं के बीच मरा पड़ा हो
जिस चीज से वे डरते थे
उसकी खुशामद करना
जो भय, घृणा या
उसके भ्रू-भंग छोड़ी गई वेदिका के ऊपर गढ़ते हैं
घृणित नकाब का पतन हो गया है
और आदमी हो जाता है
राजदंड-हीन, स्वतंत्र, सीमाबद्ध
लेकिन आदमी समान, वर्गविहीन
जनजाति-रहित, राष्ट्रहीन, भय, पूजा और उपाधि से रहित
अपने पर खुद शासन करता है।’’
(‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड, भाग-3, पृष्ठ-4’; साभार- माक्र्सवाद और कविता, जाॅर्ज थामसन, अनुवाद- रामनिहाल गुंजन, गार्गी प्रकाशन)
पर्सी बिषे षैली
‘‘रोम-रोम से क्रान्तिकारी कवि’’
पर्सी बिशे शैली को एक साथ विद्रोह, क्रांति, आशा, प्रेम, विश्वास और भविष्य का कवि कहा जा सकता है।
पर्सी बिशे शैली की एक प्रसिद्ध कविता है ‘ओडे टू द वेस्ट विंड’ जिसकी एक पंक्ति बहुत प्रभावशाली व लोकप्रिय है। वह पंक्ति है ‘यदि शिशिर आ गया है, तो बसंत कितनी दूर होगा? (प् िॅपदजमत बवउमे, ब्ंद ैचतपदह इम ंित इमीपदकघ्)’
शैली की यह पंक्ति उद्दाम आशावाद का प्रतीक है। शैली के आशावाद में न तो मंसूबेबाजी है और न शेखचिल्लीपन। उनका आशावाद महान फ्रांसीसी क्रांति (1789) की पैदाइश था। वे एक विद्रोही थे। उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती दी (1811 में उन्होंने ‘अनीश्वरवाद की आवश्यकता’ (ज्ीम छमबमेेपजल व ि।जीमपेउ) नाम से एक पुस्तिका लिखी)। उन्होंने राजशाही व सामन्तवाद की तीखी आलोचना की। उन्होंने चर्च और विवाह संस्था की निन्दा की व विरोध किया। उन्होंने दासता का खुलकर विरोध किया।
शैली ने लम्बी आयु नहीं पायी। लेकिन उन्होंने अपने छोटे से जीवन में जो काव्य रचा वह युगों की सीमाओं को लांघता चला गया। उनकी काव्य रचनाएं हर युग के, हर देश के विद्रोहियों, क्रांतिकारियों व स्वतंत्रता प्रेमियों को आकर्षित करती रही और प्रेरणा देती रही। ‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’ (प्रोमेथियस की मुक्ति) में वे एक ऐसे मानवीय समाज की कल्पना करते हैं, जहां न राज्य का आतंक है और जहां न कोई ऊंच और नीच है। सब मनुष्य समान हैं। सब मनुष्य स्वतंत्र हैं। वे खुद पर शासन करते हैं। वहां सिर्फ स्वतंत्रता व प्रेम है।
शैली का जन्म 4 अगस्त 1792 को इंग्लैण्ड के अमीर जमींदार परिवार में हुआ था। शैली के पिता टिमोथी शैली एक सांसद भी थे। शैली कुशाग्र थे। पढ़ने-लिखने में उनकी रुचि थी। महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने ग्रीक व लैटिन भाषा में महारत हासिल कर ली थी। अपने स्कूली दिनों में उन्होंने ‘‘पागल’’ और ‘‘नास्तिक’’ की उपाधि इसलिए हासिल कर ली थी क्योंकि वे स्कूल में रूढ़िवाद और क्रूरता का विरोध करते थे।
विद्रोही स्वभाव के शैली ने 1810 में आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और एक साल के भीतर ‘अनीश्वरवाद की आवश्यकता’ पुस्तिका लिखने के कारण उन्हें पहले विश्वविद्यालय और फिर घर से भी निकाल दिया गया। इसके बाद का उनका जीवन आर्थिक तंगी, अभाव और यायावरी में बीता।
शैली ने दो विवाह किये। पहला विवाह 1811 में हेरियट से किया। यह विवाह असफल रहा। बाद में 1816 में मेरी गोड्विन से उनका दूसरा विवाह हुआ। मेरी गोड्विन ने मेरी शैली नाम से प्रसिद्ध ‘फ्रेंकेंस्टीन’ (थ्तंदामदेजमपद) नामक उपन्यास लिखा था।
शैली की मृत्यु दुर्घटनावश हुयी। 8 जुलाई 1822 को इटली में समुद्र में नाव के डूब जाने से उनकी मृत्यु हुयी। उस समय वे महज 29 वर्ष के थे। शैली की अंतिम इच्छा थी कि उनके शव को जला दिया जाए और राख को रोम में दफना दिया जाय।
शैली को अपने जीते-जी वह प्रसिद्धी नहीं मिली जिसके वे वास्तव में हकदार थे। वे एक महान कवि ही नहीं बल्कि एक अच्छे नाटककार, निबंधकार, राजनैतिक विचारक और दार्शनिक भी थे।
शैली अंग्रेजी साहित्य की उस धारा के प्रमुख कवि थे जिसे रोमांटिक युग के नाम से जाना जाता है। अक्सर उनकी चर्चा जान कीट्स और लार्ड बायरन के साथ होती है। इन तीनों को रोमांटिक युग की दूसरी धारा में ‘‘त्रयी’’ के रूप में जाना जाता है।
पर्सी बिशे शैली की प्रमुख रचनाएं ‘‘प्रोमेथियस अनबाउण्ड’’ के अलावा ‘क्वीन् मेब’ (1814), ‘अलास्टोर, ओर दि स्प्रीट आफ सोलिट्यूड’ (1815), मांट ब्लैंक (1816), ‘हाइम टू इंटेलेक्चुअल ब्यूटी’ (1816), ‘द मास्क आफ अनार्की’ (1819), ‘ओडि टू द वेस्ट विंड’ (1819), ‘द क्लाउड’ (1820), ‘द ट्रम्प आॅफ लाइफ’ (1822, अधूरी) आदि हैं। इन काव्य रचनाओं के इतर ‘ए फिलोसोफिकल व्यू आफ रिफार्म’, ‘ए डिफेंस आफ पोएट्री’ व एक ट्रेजडी नाटक ‘दि सेंसी’ प्रमुख हैं।
शैली के बारे में कार्ल माक्र्स की राय क्या थी। इसे माक्र्स की बेटी ने बताया है कि ‘‘वह कहा करते थे; ‘बायरन और शैली के बीच वास्तविक अन्तर यह है कि जो लोग उन्हें समझते तथा उनसे प्रेम करते हैं वे इस बात को शुभ मानते हैं कि बायरन की मृत्यु उनके जीवन के छत्तीसवें वर्ष में हो गयी थी क्योंकि यदि वह और अधिक समय तक जीवित रहते तो निश्चित है कि वह एक प्रतिक्रियावादी पूंजीपति बन जाते, ठीक इसके विपरीत, उन्हें इस बात का दुःख है कि शैली की मृत्यु उनतीस वर्ष की अवस्था में ही हो गयी, क्योंकि वह अपने रोम-रोम से क्रांतिकारी थे और (यदि वह जीवित रहते तो) निश्चित रूप से वह सदा समाजवाद के हिरावल दस्ते के साथ होते।’’(माक्र्स, एंगेल्स की नजर में साहित्य और कला, पृष्ठ 312, इण्डिया पब्लिशर्स लखनऊ)
पर्सी बिशे शैली के जीवन व रचना संसार को देखकर कार्ल माक्र्स की बात सौ फीसदी सही लगती हैं।
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