मंगलवार, 30 जून 2026

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति
मानव सभ्यता के दुष्मन ट्रंप और नेतन्याहू का भविष्य
- अंजनि

जर्मन कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त की एक कविता का हिंदी भाव यह है,
जनरल साहब,
यह जो तुम्हारा टैंक है न, गजब की चीज है,
यह एक साथ लोगों को रौंद सकता है
यह लोगों को मार सकता है,
लेकिन इसमें एक कमी है यह खुद नहीं चलता।

जनरल साहब,
यह जो तुम्हारा बमवर्षक विमान है,
यह बरस सकता है
यह बम बरसाकर लोगों को भून सका है
लेकिन इसमें एक कमी है, यह खुद नहीं बरसता ।

जनरल साहब,
यह जो इंसान है,
यह गजब की चीज है,
यह टैंक चला सकता है,
यह बमवर्षक विमान उड़ा सकता है,
लेकिन इसमें एक कमी है, कि यह सोच सकता है।

    इस कविता में ब्रेख्त ने बताया है कि इंसान सोचकर सही और गलत में भेद करके जब सही का पक्ष लेता है तो वह अन्यायी जनरल के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। यह कविता फासिस्ट शासन के विरुद्ध लिखी गयी थी।
इस कविता के भावों को यदि आज हम अमरीकी और इजरायली सेनाओं द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध और उनके विरुद्ध ईरानी सेना व जनता के जवाबी प्रहारों से समझने का प्रयास करें तो यह स्पष्टतया समझ में आ जाता है कि युद्ध का फैसला एक या दो किस्म के नये आधुनिक हथियार नहीं करते बल्कि करोड़ों-करोड़ सचेत व संगठित लोग करते हैं।

दुनिया की बड़ी और आधुनिक सेना, अपने स्टील्थ बमवर्षक बी-2, बी-52 से लैस आधुनिक वायुसेना और न्ैै लिंकन, न्ैै जेराल्ड फोर्ड और कई आधुनिक आण्विक पनडुब्बी से लैस एयरक्राफ्ट कैरियर से ईरान पर हमलावर है। आधुनिक रडार प्रणाली व वायुरक्षा प्रणालियों में अग्रणी अमरीकी साम्राज्यवादी और उसके सहयोगी यहूदी नस्लवादी इजरायली आधुनिक सेना बड़ी ताकत बनते हैं। इनके संयुक्त आक्रमण के विरुद्ध ईरानी सेना, इस्लामी क्रांतिकारी गार्ड कोर (प्त्ळब्) और ईरानी जनता की एकता प्रत्याक्रमण कर रही है। ईरान के प्रत्याक्रमण ने अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझौता वार्ता में आने के लिए विवश कर दिया।

ईरान के ऊपर अमरीकी-इजरायली हमला बिना किसी उकसावे के था। यह उस समय किया गया, जब अमरीकी-ईरानी प्रतिनिधि प्रत्यक्ष समझौता वार्ता में लगे थे। यह ईरान से वार्ता के साथ एक विश्वासघात था। यह एक संप्रभु राज्य की संप्रभुता का खुला उल्लंघन था। यह अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन था। अमेरिका-इजरायल ने हमले के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता, कई मंत्रियों सहित शीर्ष कमाण्डरों की हत्याओं के साथ-साथ लगभग 160 अबोध बच्चों की एक स्कूल में हत्यायें कर दीं। इसने इसके बाद नागरिक अवरचना, स्कूलों, अस्पतालों, स्टील व पेट्रोकेमिकल संयंत्रों इत्यादि के साथ-साथ बड़े पैमाने पर नागरिक आबादी को हमलों का निशाना बनाया। अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान को तहस-नहस कर रहे थे। गाजापट्टी की तरह व्यापक विनाश और नरसंहार कर रहे थे। लेकिन वे ईरान की जनता की एकजुटता और तैयारी को नहीं समझ सके। वे ईरानी सरकार, उसकी सेना और प्त्ळब् की अमरीकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध लम्बी तैयारी को नहीं समझ सके। वे ईरानी प्रत्याक्रमण करने की क्षमता को नहीं समझ सके। इसलिए जब ईरानी प्रत्याक्रमण शुरू हुआ तो खाड़ी देशों में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डे उसकी जद में आये। ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों ने साउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन, कुवैत और जार्डन में अमरीकी फौजी अड्डों को तबाह किया। इजरायली फौजी ठिकानों, मोसाद के अड्डों, ड्रोन बनाने के कारखानों, हवाई अड्डों और पेट्रोकेमिकल संयंत्रों को ईरानी मिसाइलों ने तहस-नहस कर दिया।

यह ट्रम्प और नेतन्याहू का घोर गलत आंकलन था। वे ईरान को ऐसा समझते थे कि शीर्ष नेतृत्व की हत्या कर देने के बाद सत्ता परिवर्तन कर देंगे और अपने किसी पिट्ठू तथा पूर्व शासक शाह रजा पहलवी के पुत्र को गद्दी में बिठा देंगे। यह सभी साम्राज्यवादियों का चरित्र होता है कि वे अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत भी मद में अंधे होते हैं। वे दुनिया में सभी को अपने इशारों पर चलाना चाहते हैं। यहीं वे गच्चा खा जाते हैं। लेकिन यही उनका बुनियादी चरित्र होता है।

सभी साम्राज्यवादियों और प्रतिक्रियावादियों का यह चरित्र होता है कि वे गड़बड़ी करते हैं, असफल होते हैं, तब वे फिर गड़बड़ी करते हैं और फिर असफल होते हैं और वे तब तक गड़बड़ी करते रहते हैं, जब तक उनका नाश नहीं हो जाता। वहीं दूसरी ओर, व्यापक क्रांतिकारी जनता और न्याय के पक्ष के लिए लड़ने वाली साम्राज्यवाद विरोधी, प्रतिक्रियावाद-विरोधी ताकतें संघर्ष करती हैं, असफल होती हैं, वे फिर संघर्ष करती हैं और फिर असफल होती हैं और वे तब तक संघर्ष करती रहती हैं, जब तक कि उनको विजय न मिल जाये।
इस ऐतिहासिक सच्चाई को अमरीकी-इजरायली हमलों के विरुद्ध ईरानी और क्षेत्रीय प्रतिरोधी ताकतों के संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है।

ईरान में व्यापक विनाश और जनसंहार बरपा करने के बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवादी 40 दिनों के भीतर ही युद्ध विराम के लिए प्रयास करने लगे। लेकिन तब भी वे धमकियां देने से बाज नहीं आये। ट्रम्प ने घोषणा की कि वे युद्ध जीत गए हैं। उन्होंने ईरान को बर्बाद कर दिया है। वहां कुछ भी नहीं बचा है। कि ईरान की सेना, वायुसेना और नौसेना सभी खत्म हो चुकी हैं। फिर भी ट्रम्प ने धमकी देना जारी रखा, यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के समुद्री रास्ते को नहीं खोला तो वे उसे तबाह कर देंगे। उसे पाषाण युग में पहुंचा देंगे। उसकी सभ्यता का अंत कर देंगे।

अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अपनी विजय की नकली घोषणा और ईरान को पाषाण युग में पहुंचा देने की बात करते हुए उसे समझौता वार्ता के लिए अपना 15 सूत्रीय प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव को ईरान ने पूरी तरह रद्द कर दिया। इसके प्रत्युत्तर में ईरान ने 10 सूत्रीय प्रस्ताव पेश किया। ट्रम्प ने इसे आगामी समझौता वार्ता के आधार के तौर पर स्वीकार कर लिया। ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल में यह भी लिखा कि होर्मुज की खाड़ी से टोल वसूलने में अमरीका ईरान की मदद करेगा। इस समझौते के प्रस्ताव में 14 दिनों का अस्थाई युद्ध विराम लागू होना था। यह लेबनान सहित समूचे प्रतिरोध संगठनों के इलाकों के संघर्ष क्षेत्रों में लागू होना था। लेकिन यह 14 दिनी युद्धविराम लागू होने के ही दिन इजरायल ने लेबनान पर अभी तक का सबसे बड़ा हमला बोल दिया। इस हमले में 300 से अधिक नागरिक मारे गये और 1200 से ज्यादा घायल हुए। इजरायल ने यह कहा कि इस युद्धविराम में लेबनान शामिल नहीं है।

बहरहाल, पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरानी और अमरीकी प्रतिनिधि मण्डलों की वार्ता हुई और बगैर किसी समझौते के वार्ता खत्म हो गयी।

अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासक एक रक्त पिपासु मानव की शक्ल में दानव हैं। ये अबोध बच्चों, महिलाओं और आम नागरिकों का नरसंहार कर सकते हैं और व्यापक विनाश ला सकते हैं और वस्तुतः लाते भी हैं। लेकिन ये किसी समाज को रसातल में ले जाने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकते।
इस बार इनका सामना ईरान की ऐसी सत्ता से पड़ा है जिसका जन्म ही अमरीकी साम्राज्यवाद के कठपुतले शाह रजा शाह पहलवी के विरुद्ध व्यापक जनविद्रोह के जरिए हुआ था। यह अपने जन्म से ही अमरीकी साम्राज्यवाद और यहूदी नस्लवादी इजरायली सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की तैयारी करती रही है। ईरानी सत्ता सालों से खाड़ी देशों के शासकों को अमेरिकी-इजरायली शासकों के वर्चस्वकारी कदमों के प्रति सचेत करती रही है। लेकिन इन देशों के शासक ईरान को ही अपने लिए मुख्य खतरा मानते रहे हैं।

आज जब पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली समझौता वार्ता बेनतीजा रही है, उस समय ट्रम्प फिर से ईरान को होर्मुज की खाड़ी को खोलने को धमका रहा है। वह अभी भी उसकी सभ्यता का विनाश करने और तहस-नहस करने की धमकी दे रहा है।

ट्रम्प जैसे प्रतिक्रियादी मानव सभ्यता और संस्कृति की परंपरा को नहीं समझते। एक तो अमरीका का जन्म ही कुछ सदियों का है। वह भी स्थानीय आबादी को अधिकांश नेस्तनाबूत करके हुआ। अमरीकी साम्राज्यवादियों की सभ्यता की विरासत मुश्किल से 2-3 सदियों की है। और वह भी अफ्रीका के गुलामों के बल पर इसका विकास हुआ। और यहूदी नस्लवादी इजरायल जिसका अस्तित्व ही 1948 में आया वह भी फिलिस्तीनी आबादी का नरसंहार और उनको उनकी जमीनों से बेदखल करके। तो वे मानव सभ्यता और संस्कृति की शानदार विरासत को क्या समझेंगे।

खासकर ईरान जिसका लगभग 6000 वर्ष पुराना सतत इतिहास है। जिसकी फारसी परम्परायें और मूल्य इस्लाम धर्म के आने से पहले से ही मौजूद रही हैं। जहां फिरदौसी जैसे कवि व लेखक दसवीं शताब्दी में हुए थे जिन्होंने कभी दसवीं और तेरहवीं शताब्दी के बीच में 50 हजार से ज्यादा छंदों वाला शाहनामा महाकाव्य रचा था। इतना अधिक प्रभाव रखने वाला महाकाव्य और इतना विशाल महाकाव्य शायद ही कोई और हो। इस महाकाव्य में प्राचीन काल से लेकर इस्लाम धर्म के आने से पहले तक के फारसी (ईरानी) समाज के राजाओं की कहानी और उस समय के समाज का चित्रण किया गया है। फिरदौसी के शाहनामा का प्रभाव न सिर्फ आज के ईरान बल्कि अजरबैजान, तुर्की, आर्मेनिया और जाॅर्जिया तक रहा है।

ट्रम्प जैसे धनपशुओं और नेतन्याहू जैसे ‘ईश्वर के चुने हुए लोगों’ के मानवद्रोही हत्यारों को सभ्यता और संस्कृति की सतत प्रवाहमान धारा की शक्ति और मानवचरित्र को उन्नत करने वाले मूल्यों की न तो समझ हो सकती है और न ही इन नरहत्यारों के लिए ये फायदेमंद हैं।

इसलिए ट्रम्पों और नेतन्याहुओं जैसे मानव हत्यारों और मानव सभ्यता के दुश्मनों को सभ्यता का विनाश करने का ख्याल आता है। इसलिए ये विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थानों और प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों को निशाना बनाते हैं।

इन प्रतिक्रियावादियों और मानवद्रोहियों को अपनी ताकत के बारे में भ्रम है, दुनिया की जनता की शक्ति को ये कुछ भी नहीं समझते। इसलिए ये भ्रम के शिकार होकर ईरानी जनता के संघर्ष को नहीं समझते और न ही उसकी ताकत भांप सके। और इस ताकत की जड़ें ईरानी सभ्यता के हजारों साल के इतिहास में है। ये उस ताकत को नहीं समझते।

इसलिए इन मानवद्रोहियों और नरसंहारकर्ताओं का नाश इतिहास की कार्यसूची में लें।

हमें ऐसी किताबें
पढ़नी चाहिए, जो
कुल्हाड़ी की तरह
हमारे अंदर के जमे
समंदर के ऊपर पड़ें,
हमें चोट पहुंचा दें,
घायल कर दें।
उन किताबों को पढ़ने के
बाद हम पहले जैसे
बिल्कुल न रहें।
फ्रैंज काफ्का
3 जुलाई 1883 - 3 जून 1924

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