मंगलवार, 30 जून 2026

विज्ञान

एपिजेनेटिक्स: आंतरिक और वाह्य की अंतर क्रिया

- गुरुप्रीत

    लंदन से प्रकाशित होने वाली विज्ञान की लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ ने एपिजेनेटिक्स को इस शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत घोषित किया है। उसके अनुसार एपिजेनेटिक्स से ही यह स्पष्ट हो पाता है कि जीन की अपेक्षाकृत सरल संरचना से जटिल जीवन का निर्माण कैसे होता है।

उदाहरण के लिए इंसान में कुल करीब बीस हजार जीन होते हैं। पहले इनकी संख्या एक लाख मानी जाती थी क्योंकि इंसान में कुल प्रोटीन अणुओं की संख्या एक लाख है। इन एक लाख प्रोटीन अणुओं से करीब 10 लाख कार्यकारी प्रोटीन बनते हैं जो इंसानी शरीर की संरचना और क्रिया तय करते हैं। इंसान की सभी कोशिकाओं के केंद्रक में ये ही बीस हजार जीन होते हैं जो 23 जोड़े डीएनए अणुओं या क्रोमोसोम पर होते हैं। पर एक से जीन होने के बाद भी इंसानी शरीर में पाई जाने वाली खरबों कोशिकाएं करीब दो सौ प्रकार की होती हैं। आखिर उन्हीं जीन से इतनी जटिलताएं कैसे पैदा हो जाती हैं?

जीन विज्ञान या जेनेटिक्स 20वीं सदी के पूर्वार्ध में विकसित हुआ और अपने विकास के साथ इसने जीन नियतत्ववाद को प्रोत्साहित किया। जीन नियतत्ववाद के अनुसार जीवों की सारी संरचना और क्रिया उनमें पाए जाने वाले जीन से तय होती है। जीवों पर उनके वातावरण के प्रभाव को स्वीकार करने के बावजूद जीन नियतत्ववाद अंततः सब कुछ जीन से तय होता मानता था। मामला वहां पहुंच गया जहां न केवल शारीरिक बनावट बल्कि बुद्धिमत्ता और सामाजिक व्यवहार भी जीन से तय माने जाने लगे। कोई पूंजीपति या मजदूर है तो अपने जीन के कारण! कोई अपराधी है तो अपने जीन के कारण!

20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में जीन और प्रोटीन की आणविक संरचना तथा इनके बीच संबंध पता चलने के बाद जीन नियतत्ववाद को और बढ़ावा मिला। पता चला कि सारे प्रोटीन अणु अमीनो एसिड की श्रृंखला होते हैं। प्रकृति में कुल 20 किस्म के अमीनो एसिड हैं। एक प्रोटीन अणु दूसरे से इसी रूप में भिन्न होता है कि उनमें अमीनो एसिड की संख्या और क्रम भिन्न होता है। प्रोटीन अणु की अमीनो एसिड की यह श्रृंखला संरचना और क्रिया में इस्तेमाल होने के लिए यानी कार्यकारी प्रोटीन अणु बनने के लिए भांति-भांति से लिपट-लिपटकर त्रिआयामी आकार ग्रहण कर लेती है। यह कुछ ऐसे ही होता है जैसे एक लंबी रस्सी को लपेटकर या गूंथ कर भांति-भांति की त्रि-आयामी संरचना बना ली जाए। कोई खास कार्यकारी प्रोटीन किसी खास त्रि-आयामी आकार में ही काम करता है। इस त्रि-आयामी आकार में जरा भी परिवर्तन उसे खास काम के अयोग्य बना देगा। इसी वजह से इंसान में करीब एक लाख प्रोटीन अणुओं से करीब दस लाख कार्यकारी प्रोटीन बनते हैं।

जीन से प्रोटीन का अथवा जीन की आणविक संरचना से प्रोटीन की आणविक संरचना का क्या संबंध है? पता चला कि जीन और कुछ नहीं प्रोटीन अणु के लिए कोड होते हैं। जीन या डीएनए अणु स्वयं चार किस्म के न्यूक्लिटाइड अणुओं की श्रृंखला होते हैं। इनमें से कोई भी तीन न्यूक्लिटाइड एक अमीनो एसिड का कोड होते हैं। इसीलिए किसी जीव में पाए जाने वाली न्यूक्लिटाइड श्रृंखला को क्रम से पढ़कर तथा तीन-तीन को देखकर अमीनो एसिड की श्रृंखला तय की जा सकती है।

यह सब जानने के बाद जीन नियतत्ववाद पक्का हो गया। आखिर प्रोटीन जीवों का प्रमुख संरचनात्मक अणु है। इससे भी ज्यादा वह जीवन की सारी जैव-रासायनिक क्रियाओं को संचालित करता है- उत्प्रेरक के तौर पर। जैव जगत में जैव-रासायनिक क्रियाओं में एंजाइम उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं और प्रोटीन या तो स्वयं एंजाइम होता है या एंजाइम का मुख्य घटक होता है। ऐसे में प्रोटीन अणु को नियंत्रित करने से सारा जीवन नियंत्रित हो जाता है। और जीन प्रोटीन अणु की श्रृंखला का कोड होने के चलते उसे नियंत्रित करता है।

जीन नियतत्ववाद का सबसे मुखर रूप रिचर्ड डाकिंस के ‘सेल्फिश जीन्स’ में मिलता है। इसके अनुसार जीव और कुछ नहीं बल्कि जीन के वाहक मात्र हैं जिसे जीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वयं के प्रसार के लिए इस्तेमाल करता है।

ऐसा नहीं है कि इस जीन नियतत्ववाद के खिलाफ कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। बहुत पहले 1940 के दशक में ही ब्रिटिश माक्र्सवादी जीव वैज्ञानिक काॅनराड वेडिंग्टन ने इसके खिलाफ ‘एपिजेनेटिक्स’ का सिद्धांत पेश किया था। एपिजेनेटिक्स शब्द उन्हीं का गढ़ा हुआ है जिसका मतलब है जीन से परे या उसके ऊपर। उनके अनुसार व्यक्तिगत जीन आधार मात्र होते हैं। असल में जीव की कोई भी संरचना बहुत सारे जीन की जटिल क्रिया- प्रतिक्रिया और उससे बनने वाले ताने-बाने का परिणाम होती है। इसे उन्होंने ‘जेनेटिक लैंडस्केप’ का नाम दिया था। एक कोशिकीय युग्मनज से शुरू करके जब भ्रूण का विकास होता है तो विभिन्न किस्म की कोशिकाएं पैदा होती हैं जो जीव की विभिन्न संरचनाओं का निर्माण करती हैं। एक किस्म की कोशिका का तय होना कुछ वैसा ही है जैसे पहाड़ी लैंडस्केप में कोई पत्थर पहाड़ियों की चोटी से एक घाटी में पहुंच जाये। घाटी से पत्थर को फिर ऊपर चढ़ा कर दूसरी घाटी में धकेलना काफी मुश्किल है। भ्रूण विकास में पहले सारी कोशिकाएं पहाड़ की चोटी पर व एक जैसी होती हैं फिर वे विभिन्न घाटियों में पहुंचकर विभिन्न तरह की कोशिकाएं बन जाती हैं।

अपने समय के जीन विज्ञान की तरह वेडिंग्टन का एपिजेनेटिक्स का सिद्धांत भी तब सामान्य अवधारणा ही थी। तब तक आणविक संरचना के स्तर पर जीवों का पता नहीं था। हां, वेडिंग्टन ने भ्रूण विज्ञान के अपने प्रयोगों के जरिए अपनी अवधारणा को प्रमाणित किया था पर तब जीन नियतत्ववाद के हावी होने के चलते उन्हें अपेक्षित मान्यता नहीं मिली।

पर समय बदला और 1980 के दशक से आणविक संरचना के स्तर पर जानकारी से एपिजेनेटिक्स को मान्यता मिलनी शुरू हुई। पता चला की मिथाइलेशन और एसिटाइलेशन के जरिए जीन ‘एक्टिवेट’ या ‘डी-एक्टिवेट’ हो जाता है यानी या तो सक्रिय हो जाता है या निष्क्रिय। विभिन्न किस्म की कोशिकाओं में यह अलग-अलग होता है और स्थाई होता है। इसीलिए विभिन्न कोशिकाओं में विभिन्न जीन सक्रिय या निष्क्रिय होते हैं। इसी से कोशिकाओं का प्रकार तय होता है। इससे कोशिकाओं के जेनेटिक लैंडस्केप की घाटी में पहुंचने की वह प्रक्रिया आणविक तौर पर स्पष्ट हो गई जिसका प्रस्ताव वेडिंग्टन ने किया था। स्वयं जेनेटिक लैंडस्केप का निर्माण कैसे होता है यह आणविक तौर पर आधिकाधिक स्पष्ट होता गया जब भ्रूण के युग युग्मनज से आगे का विकास जैव-रासायनिक तौर पर स्पष्ट होता गया। आज भ्रूण विज्ञान में ‘प्रोटीन ग्रेडियएंट’ और ‘इलेक्ट्रिक पोटेंशियल ग्रेडिएंट’ की धारणाएं आम बात हैं।

बीसवीं सदी के पहले दशक तक एपिजेनेटिक्स इतना चमका कि उसने लगभग उसी तरह फैशन का रूप धारण कर लिया जैसे कभी जीव विज्ञान ने किया था। स्थिति वहां पहुंच गई जहां रिचर्ड डाकिंस ने चिढ़ कर कहा था कि एपिजेनेटिक्स को अपनी 15 मिनट की लोकप्रियता का लुफ्त उठा लेने दो। आशय यह था कि फैशन का यह ज्वार जल्दी ही उतर जाएगा।

लेकिन रिचर्ड डाकिंस के दुर्भाग्य से एपिजेनेटिक्स का यह ज्वार उतरा नहीं, बल्कि चढ़ता ही गया। और अब इसे नई सदी का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत बताया जा रहा है। आज जीव विज्ञान के अनेक क्षेत्रों मसलन उद्विकास (मअवसनजपवद), भ्रूण विज्ञान इत्यादि में एपिजेनेटिक्स के बिना कोई बात नहीं हो सकती।

एपिजेनेटिक्स ने न केवल यह स्पष्ट किया कि कुछ सरल से जीनों से इतने जटिल और विविध जीवों का निर्माण कैसे होता है, उससे यह भी स्पष्ट हुआ कि वातावरण या परिवेश का जीव पर प्रभाव कैसे पड़ता है। कैसे भोजन की पर्याप्तता या अभाव जीव के विकास को प्रभावित करता है? कैसे सामान्य से ज्यादा गर्मी या सर्दी जीव के विकास को प्रभावित करती है?

इतना ही नहीं यह भी स्पष्ट हुआ कि कैसे परिवेश स्वयं उद्विकास को प्रभावित करता है। यानी परिवेश केवल एक पीढ़ी में जीवों के विकास को प्रभावित नहीं करता बल्कि यह प्रभाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित हो जाता है और इस तरह आनुवांशिकता का हिस्सा बन जाता है। अंततः स्वयं जीन में परिवर्तन हो जाता है।

एपिजेनेटिक्स के विकास से जीवों के विकास और उद्विकास में आंतरिक और वाह्य की अंतरक्रिया स्पष्ट हो गई। स्पष्ट हो गया कि मामला आंतरिक से वाह्य की ओर इकतरफा नहीं है। बल्कि यह दो तरफा है यानी वाह्य पलट कर आंतरिक को न केवल प्रभावित करता है बल्कि बदल भी देता है। अब आणविक विज्ञान का मूलभूत केंद्रीय विचार (बमदजतंस कवहउं) बेहद सरलीकृत नजर आने लगा जिसके अनुसार जीन का कोड प्रोटीन की संरचना तय करता है। अब स्पष्ट हो गया कि कोड को बनाने, बदलने, पढ़ने, सक्रिय या निष्क्रिय करने और इसके अनुरूप अमीनो एसिड की श्रृंखला बनाने का सारा काम प्रोटीन करते हैं। प्रोटीन स्वयं अपना निर्माता है और उन्होंने सुविधा के लिए बीच में जीन के रूप में कोड की व्यवस्था की रचना कर रखी है। परिवेश को संज्ञान में लेने तथा तदनुरूप जीवन में बदलाव की भी इसमें व्यवस्था है, बदलाव चाहे एक पीढ़ी का हो या पीढ़ी-दर-पीढ़ी का। इसलिए जीवन में यदि कोई प्रधान है तो वह है प्रोटीन, जीन नहीं। प्राटियोम (प्रोटीन का समुच्चय) ही जीवन का मूल तत्व है, जीनोम (जीन का समुच्चय) नहीं।

कोई आश्चर्य नहीं कि एपिजेनेटिक्स की आज इतनी शोहरत है। इसका विकास जीवन के रहस्यों को और बारीक स्तर पर खोलता जाएगा और इस तरह जीवन की और ज्यादा बेहतर समझ प्रस्तुत करता जाएगा।

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