बालेन्द्र शाह: नया चेहरा नयी लफ्फाजियां
- कमल
सितंबर 2025 में जेन-जी आंदोलन ने नेपाल को हिलाकर रख दिया दिया था। जेन-जी का यह आंदोलन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, भ्रष्टाचार, वंशवाद, युवाओं की बेरोजगारी के खिलाफ था, जैन-जी ने पुरानी सत्ता को चुनौती दी। अन्याय, भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुके नेताआंे और बिलिं्डगों को युवाओं ने अपने आक्रोश का निशाना बनाया। 76 युवा भी इस आंदोलन में मारे गये। जेन-जी का यह आंदोलन भविष्य की आशा, बेहतर जीवन की उम्मीद के लिये किया गया था।
कुछ महीनों की उठा-पटक के बाद अंततः 27 मार्च 2026 को बालेन्द्र शाह (बालेन) प्रधानमंत्री बन गए। बालेन की नई-नई बनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने कुल 275 सीटों में से 182 सीटें जीती। इस तरह जेन जी आंदोलन की भावनाओं पर सवार होकर पूर्व मेयर बालेन शाह नेपाल की प्रधानमंत्री की कुर्सी में विराजमान हो गया।
चुनाव के वक्त बालेन शाह ने कई सुनहरे सपने दिखाये। उन्होंने वादा किया - 7 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि। 5 साल में 100 अरब डालर की अर्थव्यवस्था, 12 लाख़ नौकरियां, आईटी हब बनाना और डेवलपमेंट डिप्लोमेसी जैसे कई वायदे किये। पारदर्शिता, भ्रष्टाचार मुक्त, सुशासन की बातें कही। चुनाव जीतने के कुछ ही दिन बाद उन्होंने 100 दिन का प्लान भी रख दिया। इस प्लान की नेपाल में खूब चर्चा हो रही है। खासकर सोशल मीडिया पर। बालेन पूर्व में एक रैपर रहे हैं। सोशल मीडिया में अच्छी-खासी फालोइंग (लगभग 1.2 मिलियन) है। सोशल मीडिया में रैप और एआई वीडियो से एक ट्रेंड पैदा किया गया, जिसमें कहा जा रहा है कि नेपाल अब बहुत विकास करेगा। एक बहुत प्रभावशाली, क्षमतावान नेता (बालेन) सब समस्या हल कर देगा। एआई वीडियो में बालेन नेपाल का कायाकल्प करते हुए दिख रहे हैं। उनके उठाए गये कदमों का प्रोपेगेंडा ना सिर्फ नेपाल में हो रहा है, बल्कि भारत में भी बड़े पैमाने पर हो रहा है।
अब बात करते हैं बालेन शाह ने 100 दिन के प्लान में ऐसा क्या कर दिया? क्या उनके कामों को वाकई सराहा जा सकता है या फिर बालेन भी ‘चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात’ ही साबित होंगे?
सबसे पहले बात शिक्षा और युवाओं की। जेन-जी के आंदोलन से पैदा हुए राजनीतिक शून्य ने बालेन को सत्ता के शीर्ष पर बैठाया लेकिन सत्ता पाते ही उसने जेन-जी के राजनीतिक अधिकारों पर ही हमला कर दिया। उसने नेपाल के भीतर छात्र राजनीति, संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया। 60 दिन के भीतर उन्हें अपने सारे आफिस आदि बंद करने का हुक्म सुना दिया गया। इसके विकल्प में 90 दिन के भीतर स्टूडेंट काउंसिल, वायस आफ स्टूडेंट बनाने का लक्ष्य लिया गया है। जाहिर तौर पर यह छात्रों की काउंसिल सरकार की हां में हां मिलाने के लिए ही बनायी जाएंगी। या फिर यह बालेन के इशारे पर नाचने वाली काउंसिल ही होगी।
पांचवी कक्षा तक तो परीक्षा नहीं, फ्राइडे बैग फ्री डे, निजी स्कूलों के नाम अंग्रेजी की जगह नेपाली भाषा में करने और नेता अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने को बाध्यकारी की बातें की गईं। इन सारे लोक लुभावन जुमलों का एक ही मतलब है कि शिक्षा का निजीकरण बंद नहीं किया जायेगा। बालेन शाह भले ही एआई जनित कितने ही एनिमेटेड वीडियों बना लें, जिससे वह सरकारी स्कूलों का सौन्दर्य निखार रहे हों। लेकिन हकीकत में वे समाज व शिक्षा मंे असमानता को खत्म नहीं करना चाहते हैं। ऐसा ही स्वास्थ्य सेवाओं मेें निजीकरण को स्वीकारते हुए कह दिया गया कि निजी अस्पताल 10 प्रतिशत बैड गरीब व्यक्तियों के लिए रखें।
इस तरह जन कल्याण के मामले में बालेन शाह ने बहुत ही मरियल सुधारों की घोषणा की है। बालेन शाह की स्थिति हिंदी मुहावरे ‘कबाड में बाबा न खाता न बही, जो लिखे सो झूठ’ जैसी है। यानी अपनी घोषणाओं को सोशल मीडिया के जरिये बहुत खास दिखाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वास्तव मेें यह ‘नून की डली’ जैसी नाजुक है।
नेपाल में एक बड़ी समस्या बेरोजगारी की है। हर साल सैकड़ों नेपाली मजदूर देश छोड़कर दूसरे देशों में काम की तलाश में जाते हैं। बहुुत खराब परिस्थितियों में काम करने को मजबूर होते हैं। नेपाल की अर्थव्यवस्था में 40 प्रतिशत विदेशों से आयी मुद्रा का है। इन भयावह स्थिति में बालेन शाह ने 12 लाख़ रोजगार देने की बात कही है। रोजगार पैदा करने के नाम पर पुरानी संस्था रोजगार-युवा सेवा केन्द्रोें को 60 दिन के भीतर बंद कर रोजगार कौशल व उद्यमिता के नये सेन्टर खोलने की बातें कही गयीं। स्टार्टअप, आईटी हब की बातें कही गयीं।
रोजगार देने की सारी बातें विदेशी निवेश और निजी क्षेत्र को सुरक्षा देने की नीति के आधार पर टिकी है। गौरतलब है, सितम्बर माह में जेन-जी आंदोलन में निजी क्षेत्र, विदेशी पूंजी संस्थानों को भी निशाना बनाया गया था। जिससे पूंजीपति डरे हुए हैं। और सुरक्षा की गारंटी चाहते हैं। बालेन शाह निजी पूंजी, विदेशी पूंजी को निरंतर आश्वस्त कर रहे हैं। और सुरक्षा की पूरी नीति बनाने का संकल्प ले रहे हैं। पूंजीपतियों को अपने इरादों की दृढ़ता दिखाते हुए बालेन शाह सरकार ने ट्रेड यूनियनों को भी प्रतिबंधित कर दिया है। सस्ता मजदूर और नो ट्रेड यूनियन पूंजीपतियों की मनचाही मुराद है।
नेपाली अस्मिता, नेपाली सम्मान, नेपाल अपने पैरों पर खड़ा होगा आदि जुमलेबाजी करते हुए बालेन शाह नेपाल के विकास के लिये पूरी तरह विदेशी पूंजी पर निर्भर बन रहे हैं। नेपाली जन की शक्ति से अधिक उन्हें विदेशी धन की शक्ति पर विश्वास है।
नेपाल को विदेशी ताकतें अपने-अपने हिसाब से लूटती रही है। खास तौर पर भारत। भारत तो नेपाल पर कई असमान संधि थोपता रहा है। जिसके खिलाफ नेपाल में हमेशा से ही आवाज उठती रही है। पिछले वर्षों में चीन और अमेरिका भी इस क्षेत्र में सक्रिय हुए हैं।
बालेन शाह के तो मेयर बनने से पहले से ही अमेरिका के साथ सम्बन्ध गहराते गये हैं। बालेन के मेयर बनने से पहले 2019 में ही न्ै।प्क् के एक प्रोग्राम के तहत शाह को परिवर्तनकारी नागरिक नेता के रूप में नामित किया गया। यह सब नेपाल में लोकतंत्र, सिविल सोसाइटी, युवा नेतृत्व को मजबूत करने के नाम से किया गया। इसके बाद मेयर बनने के बाद बालेन-अमेरिकी गठजोड़ और मजबूत हुआ। अमेरिकी एम्बेसडर से निरंतर मुलाकातें होती रही। फरवरी 2024 में बालेन शाह अमेरिका भी गये। बालेन के प्रधानमंत्री बनते ही अमेरिका ने तुरंत बधाई दी और क्षेत्रीय सहयोग स्थायित्व के लिये आपसी सहयोग की बात कही।
गौरतलब है पिछले कुछ सालों में पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने चीन से अपनी नजदीकियां बढ़ाई थी। उस समय भारत से भी नेपाल के रिश्ते तल्ख हुये थे। इसी पृष्ठभूमि में यदि अमेरिका नेपाल के रिश्तों और सत्ता परिवर्तन को देखें तो बहुत आश्चर्य नहीं होता।
भ्रष्ट पूंजीवादी नेताओं के प्रति स्वाभाविक क्षेत्रीय व क्षुब्धता को अमेरिका पहले भी अपने हितों में इस्तेमाल करता रहा है। अनुदान देना, खुफिया नेटवर्क, विरोधी नेता खड़ा करना और मौका मिलने या मौका बनाकर अपने पसंद के लोगों को सत्ता पर बैठाने में अमेरिका काफी सिद्धहस्त है। वेनेजुएला इसका ताजा उदाहरण है।
इस तरह देखा जाए तो साफ है कि बालेन शाह नेपाल में विदेशी पूंजी, निजी पूंजी और अमेरिका का सहयोगी है। उसका 100 दिन का प्लान कहीं से भी इन लुटेरे समूहों को नाराज नहीं करता है। उन्हें खुश ही करता है।
आज की देश-दुनिया की परिस्थिति में पूंजीवाद बालेन शाह जैसे ‘‘बौने’’ नायक ही पैदा कर सकता है। बालेन शाह को ट्रम्प, मोदी का एक ‘‘बौना’’ नेपाली संस्करण ही कहा जा सकता है। सत्ता पाते ही छात्र संघ, ट्रेड यूनियन खत्म कर दी और एक यूट्यूबर ने विरोध में वीडियो बनाया तो उसे गिरफ्तार कर लिया। जेन-जी के विरोध के बाद मजबूरन उसे छोड़ना पड़ा।
आज जब पूरी दुनिया में आर्थिक संकट छाया है। साम्राज्यवादी अपने प्रभाव के लिये छटपटा रहे हों। युद्धों तक को आमादा हो जा रहे हों। साम्राज्यवाद के ऐसे युग में जनवाद, जनवाद के विस्तार की बात वह भी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दायरे से एक कोरी बकवास ही है। आज कोई भी बदलाव क्रांति अपने देश के पूंजीवादी शासकों और साम्राज्यवाद के खिलाफ ही हो सकती है। इनके खिलाफ लक्षित न होने वाला कोई भी विरोध, बगावत, अंधेरी गलियों में भटकने या शासकों का एक टूल बन जाने को अभिशप्त होगा।
नेपाल के युवाओं को भी समझना होगा कि बालेन शाह कोई भविष्य नहीं है। बल्कि यह तो पुरानी व्यवस्था का ही बस एक नया चेहरा है। नेपाली युवाओं का भविष्य पूंजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी मजदूर क्रांति में है। जहां युवाओं को अपनी किस्मत खुद लिखने का मौका होगा।
बालेन शाह के सत्ताशीन हो जाने से जेन-जी आंदोलन व्यर्थ नहीं कहा जा सकता है। इस आंदोलन ने एक बार फिर शासकों को युवाओं के तूफान को दिखाया है। और देश ही नहीं दुनिया के शासकों को खौफजदा किया है। बस इस तूफान को मजदूर वर्ग के साथ, मजदूर क्रांति; समाजवाद; से जोड़ने की जरूरत है।
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