शिक्षा जगत
स्कूलों के लिए नहीं है बजट
- राजेन्द्र
नई शिक्षा नीति 2020 लागू होने के बाद से लगातार प्राथमिक विद्यालयों को कम करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाए जा रहे हैं। चाहे फिर क्लस्टर योजना हो या फिर शिक्षा स्वयं सेवकों की तैनाती का मामला। अब सरकार उत्तराखंड में रेगुलर शिक्षक के स्थान पर शिक्षा सेवकों की तैनाती शुरू कर चुकी है।
नवीन मामला शिक्षा सत्र 2025-26 का है। प्रत्येक शिक्षा सत्र में विद्यालयों के संचालन के लिए विभिन्न मदों के अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय को धनराशि प्रदान की जाती है। इसमें ड्रेस तथा जूता बैग की धनराशि के अलावा विद्यालय विकास अनुदान-5000, इको क्लब-5000, खेल सामग्री-अनुदान 5000 व पुस्तकालय अनुदान-5000 प्रमुख है। विद्यालय विकास अनुदान विद्यालय के रखरखाव, रंग रोगन, विद्यालय में प्रयोग होने वाली स्टेशनरी, फोटो स्टेट प्रिंटिंग तथा परीक्षा खर्चों आदि में उपयोग किया जाता है। इस अनुदान की धनराशि 29 विद्यार्थियों तक 10,000 तथा 30 विद्यार्थियों से ऊपर 25,000 निश्चित है।
एक शोचनीय प्रश्न यह भी है कि 29 विद्यार्थियों तक वार्षिक खर्च केवल 10,000 है जबकि एक विद्यार्थी बढ़ने पर यही वार्षिक खर्च 25,000 प्रदान किया जाता है। ऐसे में विद्यालयों के प्रधानाध्यापक इस छोटे से आर्थिक अनुदान से विद्यालय को वर्ष भर चला रहे हैं, यह भी एक विचारणीय बिंदु है। क्योंकि यह अनुदान प्रति छात्र के हिसाब से भी नहीं प्राप्त होता बल्कि इसके लिए विद्यालय में निश्चित छात्र संख्या होनी चाहिए।
कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में छात्रों को धनराशि का अधिक अभाव झेलना पड़ता है। बजट आवंटन के इस तरीके (30 छात्र संख्या से अधिक) के कारण जर्जर बिल्डिंग में बैठकर छात्र पढ़ने को मजबूर हैं। यहां छात्रों को कम सुविधायें मिल पाती हैं। संसाधनों की अधिक कमी रहती है। जबकि कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को ही अधिक सहयोग की जरूरत होती है।
सरकार की प्राथमिक विद्यालयों के प्रति उपेक्षा जाहिर करने के लिए इतना ही काफी है कि शैक्षिक सत्र 2025-26 में इस विद्यालय विकास अनुदान को देने में भी शासन-प्रशासन द्वारा घोर कोताही बरती गई है। बल्कि संपूर्ण शैक्षिक सत्र में अन्य किसी भी प्रकार का कोई अन्य अनुदान भी विद्यालयों को प्रदान नहीं किया गया। इस प्रकार देखा जाए तो सत्र में विद्यालय को प्राप्त कुल अनुदान 5000 से 12,500 रुपए मात्र रहा। यह एक विचारणीय बिंदु है कि जहां प्राइवेट स्कूल एक विद्यार्थी से 5000 रुपए महीने की फीस वसूल रहे हैं। ऐसे में 5000 से 12,000 में एक राजकीय विद्यालय को वर्ष भर एक शिक्षक द्वारा चलाया जाना किस प्रकार संभव होगा?
समग्र शिक्षा एवं अन्य मदों में मिलने वाली विद्यालय विकास अनुदान की दूसरी किस्त 30 मार्च बीत जाने के बाद भी जारी नहीं की गई। योजना की 66.87 लाख रुपये की दूसरी किस्त को 31 मार्च की शाम पौने तीन बजे शासन से मंजूरी दी गई। विभाग द्वारा इस बजट को तुरंत खर्च करने के लिए शिक्षकों को आदेश भी दिया गया परंतु एक रात में यह हो पाना संभव नहीं था। जिस कारण यह पूरा बजट लैप्स हो गया। जबकि दूसरी किस्त का विद्यालयों को लंबे समय से इंतजार था। राज्य में 13 हजार से अधिक प्राथमिक विद्यालय हैं।
बजट देने में हो रही सरकारी लापरवाही से बच्चे और अभिभावक परिचित हों या न हों, वे समझ जाते हैं कि ये सरकारी स्कूल भी हमारे किसी लायक नहीं हैं। यहां हमारा कोई भविष्य नहीं है। इसलिए थोड़ी भी स्थिति होने पर वे पढ़ने के लिए किसी निजी स्कूल में ज्यादा फीस देकर पढ़ने को मजबूर हैं। शहरों की ही तरह यह स्थिति गांव के इलाकों में भी बनने लगी है। अप्रत्यक्ष तरीके से छात्रों और अभिभावकों को निजी स्कूलों की ओर धकेल दिया जाता है। जहां अपनी स्थिति के अनुसार निजी स्कूल अपने संचालन का बोझ बच्चों और अभिभावकों पर डालने को तत्पर हैं।
शिक्षा विभाग में स्कूलों के लिए समग्र शिक्षा और विद्यालय विकास निधि का बजट 31 मार्च को आखिरी मौके पर जारी किया गया।
विभिन्न विद्यालयों में शिक्षक बजट आने की उम्मीद में बजट आने से पूर्व कई बार अपनी जेब से भी विभिन्न मदों में धनराशि स्वयं खर्च कर चुके होते हैं। ऐसे में शिक्षा विभाग का संपूर्ण बजट जारी न होना शिक्षकों के लिए भी एक रोष का विषय बनता है।
साथ ही घटना सरकार और शासन-प्रशासन की राजकीय शिक्षा के प्रति बेरुखी को भी जाहिर करती है। जहां गरीब मेहनतकश मजदूर वर्ग के बच्चों की शिक्षा के प्रति उन्हें अपनी कोई जवाबदेही नहीं दिखाई देती और ना ही उनके भविष्य के प्रति कोई चिंता दिखाई देती है।
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