मंगलवार, 30 जून 2026

समसामयिक

ट्रांसजेंडर व्यक्ति संसोधन बिल और ट्रांसजेंडर समुदाय

- ऋृचा

    मार्च 2026 को भारतीय संसद में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन का एक बिल पास हुआ। इस बिल के पास होने के बाद से ही पूरे देश के ट्रांसजेंडर समुदाय में एक रोष की लहर दौड़ गई। जगह-जगह बिल के खिलाफ प्रदर्शन हुए किंतु भाजपा सरकार ने इन सारे प्रदर्शनों और असहमति को एक किनारे लगाकर कुछ ही दिन बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करवा कानून बना दिया। इस बिल के पास होने के साथ ही पूरे देश में ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर एक बहस चल पड़ी है। तीसरे जेंडर के रूप में देखे जाने वाले इस समुदाय के लिए कौन ट्रांसजेंडर है, कौन नहीं इत्यादि विषयों पर एक लंबी चर्चा चली।

ट्रांसजेंडर समुदाय हमारे समाज के लिए शुरु से ही एक ऐसा समुदाय है जिसे कभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया। हमारे समाज में ट्रांसजेंडर होना हमेशा से एक कलंक के रुप में देखा जाता है। एक बड़े हिस्से का तो यहां तक मानना है कि ट्रांसजेंडर होना एक अप्राकृतिक घटना है या फिर कोई मानसिक विकार है। इस लेख के माध्यम से हम ट्रांसजेंडर समुदाय को समझने तथा इस नए बने कानून से उन पर पड़ने वाले असर के बारे में चर्चा करेंगे।

क्या है ट्रांसजेंडर समुदाय-

वृहद परिभाषा के अनुसार ऐसा कोई भी व्यक्ति जो जैविक या हार्मोनल परिभाषा के अनुसार स्त्री या पुरुष के जेंडर में नहीं आएगा वह ट्रांसजेंडर कहलाएगा। इसमें दो वर्गीकरण महत्वपूर्ण हैं। एक ऐसे व्यक्ति जो लैंगिक आधार पर इन दोनों ही खांचों में नहीं बैठते और एक वह जो हार्मोनल तौर पर इन दोनों संरचना में नहीं बैठते।

इसमें एक तथ्य जो महत्वपूर्ण है वह यह समझना कि जैविक लिंग (ेमग) और लैंगिक पहचान (हमदकमत) हमेशा एक जैसे नहीं होते। इसी अंतर के कारण ट्रांसजेंडर पहचान उत्पन्न होती है। जैविक लिंग वह होता है जो जन्म के समय मनुष्य के शरीर की संरचना होती है। जबकि जेंडर एक सामाजिक पहचान है। स्त्री के जननांगों के साथ पैदा हुए बच्चे में स्त्री के गुण नैसर्गिक नहीं होते बल्कि उनको सामाजिक रुप से बनाया जाता है। जैविक रूप से लिंग कई कारकों से तय होता हैः

(प) गुणसूत्र (ब्ीतवउवेवउमे) - सामान्यतः ग्ग् महिला तथा ग्ल् पुरुष। लेकिन कुछ भिन्नताएँ भी होती हैं (जैसे ग्ग्ल्ए ग्व् आदि), जिन्हें पदजमतेमग अंतपंजपवदे कहा जाता है।

(पप) जननांग (ळमदपजंसपं) - बाहरी और आंतरिक जननांगों के आधार पर जन्म के समय लिंग निर्धारित किया जाता है।

(पपप) मस्तिष्क की संरचना (ठतंपद ेजतनबजनतम)-कुछ शोधों में पाया गया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मस्तिष्क के कुछ हिस्से उनकी अनुभूत लैंगिक पहचान के अनुरूप हो सकते हैं। हार्मोन शरीर के विकास और लैंगिक विशेषताओं को प्रभावित करते हैं:

(प) प्रमुख हार्मोन - टेस्टोस्टेरोन (ज्मेजवेजमतवदम)- पुरुष विशेषताएँ (दाढ़ी, भारी आवाज), एस्ट्रोजन (म्ेजतवहमद) . महिला विषेशताएँ (स्तन विकास, शरीर की बनावट)

(पप) गर्भावस्था के दौरान हार्मोन - भ्रूण के विकास के समय हार्मोनल स्तर मस्तिष्क और शरीर दोनों को प्रभावित करते हैं।

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि इस दौरान हार्मोनल प्रभाव ‘‘सामान्य’’ पैटर्न से अलग हो तो व्यक्ति की लैंगिक पहचान भी अलग विकसित हो सकती है।

(पपप) हार्मोनल असंतुलन और विविधता - हार्मोन का स्तर हमेशा स्थिर नहीं होता- यह व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग होता है।

यही विविधता लैंगिक पहचान और अभिव्यक्ति (हमदकमत मगचतमेेपवद) को प्रभावित कर सकती है।

(पअ) ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स में अंतर

ट्रांसजेंडर ! पहचान (पकमदजपजल) का प्रश्न

इंटरसेक्स ! जैविक-शारीरिक भिन्नता

दोनों एक ही चीज नहीं हैं, लेकिन कभी-कभी इसमें दोहराव हो सकता है।

इस तरह हम देखते हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय में भी कई तरह के वर्गीकरण होते हैं। एक वे व्यक्ति जो जैविक रुप से न स्त्री लिंग में आते हैं ना पुरुष; जिनको इंटरसेक्स कहा जाता है। इन्हें हमारे समाज में हिजड़ा, किन्नर इत्यादि नामों से जाना जाता है।

वे व्यक्ति जो जैविक रुप से तो स्त्री या पुरुष के लिंग में आते हैं, लेकिन उनकी अनुभूति उनके लिंग के विपरीत होती है ऐसे लोगों को हम सामान्यतः ट्रांसजेंडर मानते हैं। ट्रांसजेंडर समुदाय अपने आप में कई तरीके की विभिन्नताएं लिये होते हैं।

इस समुदाय को एलजीबीटीक्यूए समुदाय के रूप में भी जाना जाता है। स्ळठज्फ। को हिंदी में आमतौर पर ‘‘यौनिक और लैंगिक विविधताओं का समुदाय’’ कहा जाता है। यह शब्द अलग-अलग पहचान (पकमदजपजल) और अभिविन्यास (वतपमदजंजपवद) वाले लोगों को शामिल करता है। इसे निम्नवत तरीके से समझा जा सकता हैः

स् दृ स्मेइपंद (लेस्बियन) - ऐसी महिला जो भावनात्मक-यौन रूप से दूसरी महिलाओं की ओर आकर्शित होती है।

ळ दृ ळंल (गे) - आमतौर पर ऐसे पुरुष जो पुरुषों की ओर आकर्षित होते हैं (कभी-कभी यह शब्द पूरे समलैंगिक समुदाय के लिए भी प्रयोग होता है)।

ठ दृ ठपेमगनंस (बाइसेक्सुअल) - ऐसे व्यक्ति जो पुरुष और महिला दोनों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

ज् दृ ज्तंदेहमदकमत (ट्रांसजेंडर) - ऐसे लोग जिनकी लैंगिक पहचान (हमदकमत पकमदजपजल) जन्म के समय निर्धारित लिंग से अलग होती है।

फ दृ फनममत (क्वियर) - एक व्यापक शब्द, जो उन सभी लोगों को शामिल करता है जो पारंपरिक लैंगिक-यौन पहचान के ढांचे में फिट नहीं होते।

। दृ ।ेमगनंस (एसेक्सुअल) - ऐसे लोग जिनमें यौन आकर्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता।

संक्षेप में स्ळठज्फ। एक ऐसा समावेशी शब्द है जो समाज में मौजूद विभिन्न यौनिक पहचान (ेमगनंस वतपमदजंजपवद) और लैंगिक पहचान (हमदकमत पकमदजपजल) को दर्शाता है।

ट्रांसजेंडर समुदाय की सामाजिक स्थिति

अपनी इन तमाम यौनिक विभिन्नताओं की वजह से यह समुदाय समाज में एक बहिष्कृत स्थिति में रहता है। ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर समाज में इस स्तर पर घृणा तथा अवमानना है कि बहुत से घरों में यदि कोई बच्चा अविकसित लिंग के साथ पैदा होता है तो परिवार उसको किन्नरों के दरवाजे पर छोड़ जाते हैं। भारतीय समाज में इस समुदाय के लोग वंचना तथा निरादर इस हद तक झेल रहे हैं कि उनके लिए मुख्यधारा के साथ सम्मिलन लगभग असम्भव हो जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे तमाम अवसर उनके लिए अनुपलब्ध होते हैं।

हालांकि पूंजीवादी समाज के अपने वर्गीय चरित्र के अनुसार यह समुदाय भी अपनी वर्गीय पृष्ठभूमि के हिसाब से समाज में अपनी स्थिति ग्रहण करता है। जहां उच्च मध्यमवर्गीय तथा उच्च वर्ग के लोगों को सभी अवसर उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब आबादी से आने वाले ट्रांसजेंडर इन अवसरों के अभाव में ज्यादातर दान पर अपना जीवन बसर करते हैं। इस समुदाय के लिए स्वास्थ्य की स्थिति भी अत्यंत दयनीय है। इस समुदाय की प्रमुख नेत्री लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के अनुसार इस समुदाय को अपनी जैविक बनावट की वजह से तमाम सर्जरी की जरूरत होती है जो अत्यंत मंहगी होती हैं तथा इनकी पहुंच से बाहर होती हैं।

ट्रांसजेंडर समुदाय की इस स्थिति को लेकर सरकार द्वारा हमेशा एक बेरुखी का पक्ष दिखा है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि इस समुदाय की बेहतरी के लिए आवंटित कोष का बहुत ही कम हिस्सा हर साल खर्च होता है।

अपनी इस स्थिति को लेकर यह समुदाय हमेशा से संघर्ष करता रहा है। एक लंबे संघर्ष के बाद सरकार द्वारा छंजपवदंस स्महंस ैमतअपबमे ।नजीवतपजल . न्दपवद व िप्दकपं (छ।स्ै। बंेम) के फैसले के बाद ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन आॅफ राइट्स) एक्ट, 2019 लाया गया। जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी तथा स्व-पहचान ;ेमस.िपकमदजपपिबंजपवदद्ध को मौलिक अधिकार बताया। भेदभाव के निषेध तथा स्व-पहचान के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं के प्रावधान दिए गए तथा एक बोर्ड की स्थापना की गई। हालांकि मौजूदा व्यवस्था में जो स्थिति तमाम कानूनों की होती है लगभग वही स्थिति इस कानून की भी है।

ऐसा भी नहीं है कि इस कानून ने ट्रांसजेंडर समुदाय को उसके तमाम अधिकार दे ही दिए। उदाहरण के लिए यह कानून समलैंगिकों के विरुद्ध यौन अपराधों के लिए महज 6 महीने से 2 साल की सजा निर्धारित करता है। इस समुदाय के बहुलांश सदस्य अपने परिवारों के साथ हिंसा और उत्पीड़न के डर से नहीं रहते। पर यह कानून ‘परिवार का अधिकार’ के नाम पर इस समुदाय के नाबालिग लोगों को परिवार के साथ रहने पर मजबूर कर उनके उत्पीड़न को ही बल देता है।

इस कानून के बावजूद ट्रांसजेंडर समुदाय का अधिकांश हिस्सा अभी भी वंचना और अवमानना का शिकार है। और ऐसे में मोदी सरकार ट्रांसजेंडर बिल 2026 लेकर आ गई जिसे कुछ ही दिनों में कानून बना दिया गया।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन कानून, 2026 भारत में 2019 के कानून में भारी बदलाव करता है। यह ट्रांसजेंडर पहचान और अधिकारों के कानूनी ढांचे को पुनर्परिभाषित करना है। इस कानून के तहत सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि पहले जहाँ स्व-पहचान (ेमस.िपकमदजपपिबंजपवद) के आधार पर ट्रांसजेंडर पहचान को मान्यता दी जाती थी, वहीं अब पहचान के लिए चिकित्सा बोर्ड की सिफारिश और प्रशासनिक प्रमाणन अनिवार्य किया गया है। छंजपवदंस स्महंस ैमतअपबमे ।नजीवतपजल . न्दपवद व िप्दकपं के फैसले में दिए गए स्व-पहचान के अधिकार से यह बिल विचलन करता है। साथ ही, ‘‘ट्रांसजेंडर’’ की परिभाषा को संकीर्ण किया गया है, जिससे कई जेंडर-फ्लुइड और गैर-द्विआधारी व्यक्तियों को बाहर किया जा सकता है।

यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय की स्वायत्तता, गरिमा और निजता पर आघात करता है। चिकित्सा प्रमाणन की अनिवार्यता को ‘‘क्लिनिकल गेटकीपिंग’’ माना जा रहा है, जिससे राज्य द्वारा शरीर और पहचान पर नियंत्रण बढ़ता है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का तर्क है कि यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के ‘‘जीवन के अनुभव’’ की बजाय जैविक निर्धारण को प्राथमिकता देता है और इस प्रकार विविध लैंगिक पहचान को सीमित करता है। इसके अलावा, यह भी कहा जा रहा है कि यह संशोधन पूर्व के अधिकारों को कमजोर कर ‘‘पिछड़े कदम’’ (तमहतमेेपअम ेजमच) के रूप में उभरता है और संवैधानिक अधिकारों- विशेषकर समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता- के विपरीत जाता है।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन कानून, 2026 के पक्ष में सरकार और समर्थकों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि पहचान के लिए चिकित्सा और प्रशासनिक सत्यापन आवश्यक है ताकि ‘‘दुरुपयोग’’ रोका जा सके, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुँचे, और एक ‘‘मानकीकृत’’ प्रक्रिया स्थापित हो। सरकार द्वारा दिया जा रहा यह तर्क इसी बात से साफ हो जाता है कि कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटित कोष का अत्यंत कम हिस्सा खर्च हो पा रहा है दुरुपयोग तो दूर की बात है।

सरकार का कहना है कि इन योजनाओं का फायदा उठाने के लिए नकली ट्रांसजेंडर कार्ड बनाए जा रहे हैं। जबकि आंकड़ों के अनुसार अभी तक महज 36,000 ट्रांसजेंडर कार्ड बनाए गए हैं। जो कि मौजूदा ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक संख्या से काफी कम है।

ट्रांसजेडर समुदाय द्वारा अपनी पहचान के लिए किसी मेडिकल बोर्ड से सत्यापन करवाना न सिर्फ उनकी गरिमा पर चोट है बल्कि पहचान के अधिकार के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है। यह निजता ही नहीं मानवीय गरिमा का भी हनन है।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन कानून, 2026 मौजूदा सरकार की फासीवादी प्रवृत्तियों को ही उजागर करता है। जिसके तहत समाज में किसी भी तरह की विभिन्नता को फिर चाहे वह नस्ल हो, धर्म हो, जाति हो या फिर लिंग हो को पूरी तरह से नष्ट कर, प्रत्येक नागरिक के अधिकारों को राज्य के अधिकार क्षेत्र के तहत रख दिया जाता है। यह कानून समान नागरिक संहिता, सीएए, एनआरसी जैसे तमाम कानूनों की तरह अल्पसंख्यकों तथा वंचितों को अपराधी सिद्ध करते हुए उनका उत्पीड़न करता है।

इन तमाम पक्षों के साथ-साथ मोदी सरकार की इस विधेयक को पेश करने तथा उसके कानून बनाने की तत्परता पर भी सवाल उठता है। एक ऐसे समय में जब देश युद्ध की वजह से गैस सिलेंडर से लेकर तमाम तरह के संकटों से जूझ रहा है ऐसे समय मे आम जनता के संकटों को हल करने के बजाय मोदी सरकार यह बिल लेकर आती है। युद्ध की वजह से देश में पैदा हुए संकटों और उनको हल करने में सरकार की अनिच्छा को ढंकने के लिए मोदी सरकार द्वारा यह बिल लाया गया। यह कानून उसकी मंशा को पूरी तरह से स्पष्ट करता है।

ट्रांसजेंडर के अधिकारों पर यह हमला पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा देश की मजदूर-मेहनतकश आबादी, वंचितों तथा कमजोर तबकों के अधिकारों पर हमले का ही एक हिस्सा है और इसका भी वही जवाब है जो इस व्यवस्था के तमाम शोषण-उत्पीड़न का है। और वह है मजदूर राज समाजवाद।

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