छात्र जगत
दिल्ली विष्वविद्यालय का अनुमति नोटिस: असहमति का गला घोंटती तानाषाही
- महेन्द्र
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) का प्रशासन एक ऐसा नोटिस जारी कर चुका है जिसमें प्रदर्शन, सभा या कोई कार्यक्रम आयोजित करने से पहले 72 घंटे का पूर्वानुमोदन अनिवार्य कर दिया गया है। 23 मार्च 2026 को प्राक्टर कार्यालय द्वारा जारी यह नोटिस ‘कैंपस व्यवस्था’ के नाम पर लिया गया, लेकिन वास्तव में यह छात्रों और शिक्षकों की असहमति को दबाने की सुनियोजित साजिश है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार को खत्म कर देता है। यह नोटिस बिना स्पष्ट अपील प्रक्रिया के मनमानी को बढ़ावा देता है, जो लोकतंत्र-विरोधी है।
यह नोटिस फरवरी 2026 के यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस (2026) समर्थक प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों द्वारा की गई हिंसा का सीधा परिणाम है। हिंसा उपद्रवियों ने की और सजा आम छात्रों को दी गई। 13 फरवरी को नार्थ कैंपस में वामपंथी छात्र संगठनों की ‘अधिकार रैली’ के दौरान यूट्îूबर रुचि तिवारी ने ,खुद कार्यकर्ताओं पर हमला किया और हिंसा का आरोप कार्यकर्ताओं पर लगाया। इसके बाद एबीवीपी ने जातिगत गालियों और महिलाओं पर हिंसा करने के उद्देश्य से भड़काऊ नारे लगाये। इसके बाद डीयू ने 17 फरवरी से एक महीने का पूर्ण प्रदर्शन-बैन लगाया, और बैन हटते ही यह अनुमति नोटिस आया।
वीसी योगेश सिंह ने इस उत्पात के बाद छात्र संगठनों पर सीधा हमला बोला। उन्होंने 14 फरवरी को बयान जारी कर ‘सामंजस्य बनाए रखने’ की अपील की, लेकिन असल में लेफ्ट-समर्थित संगठनों को हिंसा का जिम्मेदार ठहराया। एबीवीपी ने इसका समर्थन किया। यह घटनाक्रम दिखाता है कि प्रशासन कैसे एक घटना को बहाना बनाकर सभी छात्र संगठनों पर सामान्यीकरण करता है, असहमति को ‘अव्यवस्था’ का पर्याय बना देता है।
यह नोटिस डीयू के पुराने पैटर्न का विस्तार है। 2024 के एनईपी के विरोध में हुए प्रदर्शन में वामपंथी छात्र संगठनों को पुलिस द्वारा खदेड़ा गया, जबकि एबीवीपी को छूट मिली।
यह न सिर्फ छात्र संगठनों, शिक्षकों के अपनी जायज मांगों के लिए होने वाले प्रदर्शनों को रोकने की साजिश है बल्कि आम छात्रों के विभिन्न कार्यक्रमों को भी रोकने की साजिश है। अनुमति के लिए गई हर चिट्ठी का फैसला संघी वीसी व उसके कारकून करेंगे। जैसा कि इस समय डीयू में हो रहा है। एबीवीपी या संघ से जुडे़ धार्मिक कार्यक्रम खुलेआम और आम छात्रों को परेशानियों में डालते हुए भी हो रहे हैं। लेकिन छात्रों की समस्याओं और सरकार के विरोध में होने वाले कार्यक्रमों को इस नोटिस के द्वारा रोकने की कोशिश हो रही है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि जब-जब सत्ता आम जन के संघर्षों को रोकने की कोशिश करती है तब-तब यह संघर्ष और भी ज्यादा शक्ति से अपने को सामने लाते हैं। और तब ऐसे नोटिस हवा में उड़ा दिये जाते हैं। जब समस्याओं का समाधान नहीं होता और उल्टे शिकायतों को भी सुनने से इंकार किया जाता है तो ऐसे में कोई नोटिस या कोई प्रतिबंध छात्रों-शिक्षकों को रोक नहीं सकता।
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