सोमवार, 12 सितंबर 2016

बंगलुरु में गारमेंट मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल

-शिप्रा

        अप्रैल माह की 18-19 तारीख को बंगलुरु के गारमेण्ट मजदूरों ने ऐतिहासिक हड़ताल की। इस हड़ताल में महिलाओं की भूमिका प्रमुख थी। इसने केन्द्र सरकार को पी.एफ. के फरवरी 2016 के नोटिफिकेशन को वापस लेने पर मजबूर कर दिया।
        केन्द्र की मोदी सरकार ने 10 फरवरी 2016 को पी.एफ. पर एक नोटिफिकेशन जारी किया। इसके तहत 1 मई 2016 के बाद कोई भी मजदूर भविष्य निधि (पी.एफ.) कोष में से केवल अपने वाले हिस्से को ही निकाल सकता है। कम्पनी द्वारा जमा किया गया हिस्सा वह 58 साल की उम्र के बाद ही निकाल सकता था। केन्द्र सरकार का यह फैसला पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने वाला कदम था। जिसमें पूंजीपति मजदूर को दिए जाने वाले उसके हक से भी कटौती कर फायदा कमाते वहीं दूसरी तरफ मजदूर अपने कई जरूरी काम मसलन बच्चों की पढ़ाई, शादी, बीमारी आदि मौकों पर अपने इस सुरक्षित धन से वंचित हो जाते। यही थी 18-19 अप्रैल में मजदूरों को आक्रोशित कर देने वाली चिंगारी।

        वैसे तो सारे ही मजदूरों पर यह घातक हमला था लेकिन गारमेंट उद्योग में मजदूरों की पहले से ही दयनीय स्थिति पर यह वज्रपात था। बंगलुरु में 1200 से अधिक गारमेंट फैक्ट्रियों में लगभग 5 लाख मजदूर काम करते हैं। इनमें महिला मजदूरों की संख्या 85 प्रतिशत तक है। मौजूदा स्थिति में 8 घंटे काम की औसतन मजदूरी 7066 रु. है। पी.एफ. कटने के बाद उनके हाथ में इससे कम रकम ही आती है। अगर पूरे परिवार की आय देखें तो वह औसतन 13816 रु. बनती है। 2015 के एक सर्वे के अनुसार वे राशन में 3754.54 रु., शिक्षा पर 601.34 रु. व स्वास्थ्य पर 311.38 रु. औसतन खर्च कर रहे थे। महंगाई बढ़ने के बावजूद राशन व स्वास्थ्य के खर्चे में गिरावट दिखलाती है कि वास्तव में उनका जीवन स्तर गिर रहा है। इन परिस्थितियों में पी.एफ. बुरे वक्त का कितना बड़ा सहारा होगा, यह खुद ही समझ में आता है।
        यह तो बंगलुरु में गारमेंट क्षेत्र के मजदूरों की आम स्थिति है चूंकि महिला मजदूरों की संख्या अधिक है तो स्वाभाविक तौर पर उनके लिए यह आक्रोश का कारण ज्यादा बना। इस भयंकर आर्थिक शोषण के अलावा काम के दौरान महिलाओं का मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न भी बहुत अधिक है। काम के दौरान अश्लील फब्तियां, अभद्र गालियां आदि आम बात हैं। काम के दौरान टाॅयलेट जाने पर भी रोक, टाॅयलेट के पास गार्ड जो थोड़ी भी देर होने पर गालियां देते हुए दरवाजा खटखटाता है। टारगेट पूरा न होने पर सबके सामने बेइज्जत करना और जिसमें टारगेट पूरा करके ही जाया जा सकता है। लगातार मशीनों पर थका देने वाला काम करने से महिलाओं में कमर दर्द, पीठ दर्द, अस्थमा, एलर्जी आदि बीमारियां आम हैं। इसके अलावा बाहर से काम आयी अधिकांश महिलाएं हाॅस्टल में ही रहती हैं, यहां भी वार्डन, सुपरवाईजरों का व्यवहार जेलरों जैसा ही होता है। सभी हाॅस्टलों का कम्पनियों से लिंक रहता है जिसमें महिला किस समय काम से छूटी और कब हाॅस्टल पहुंची सबकी निगरानी की जाती है। साल मे केवल एक बार ही 15-20 दिन की छुट्टियां मिलती हैं। काम के ऐसे घुटन भरे जानलेवा माहौल के बाद जब सरकार के पी.एफ. नोटिफिकेशन की खबर महिलाओं में फैली तो स्थिति बर्दाश्त से बाहर हो गयी।
        इस स्वतःस्फूर्त हड़ताल की शुरुआत 16 अप्रैल 2016 को कर्नाटक के एक दैनिक अखबार ‘विजय कर्नाटक’ के लेख से हुई। जिसमें केन्द्र सरकार के 10 फरवरी 2016 के नोटिफिकेशन के 1 मई से लागू होने की बात लिखी गई थी। यह लेख फोटो कापी एवं वाट्स ऐप के जरिये तेजी से मजदूरों में फैल गया। 16 अप्रैल को लेख छपने के बाद 18 अप्रैल, सोमवार के दिन जब मजदूर काम पर गए तो शाही एक्सपोर्ट के 4 प्लांट में से एक प्लांट के मजदूर स्वतःस्फूर्त ढंग से कम्पनी से बाहर आ गए। देखते ही देखते अन्य फैक्ट्रियों से भी मजदूर बाहर आ गए। जब यह खबर फोन तथा वाट्स ऐप से आस-पास की अन्य औद्योगिक इकाईयों तक पहुंची तो सड़कों पर हजारों की संख्या में मजदूर हो गए। विभिन्न अनुमानों के अनुसार इन मजदूरों की संख्या 60 हजार से 1 लाख के बीच थी। इस हड़ताल में मजदूर; पीनिया, बोमनहल्ली क्षेत्र की ईकाईयों के मजदूर से भारी संख्या में थे। मजदूरों के सड़क पर आ जाने से मैसूर रोड, तुमकुर रोड, होसुर रोड में बड़ा जाम लग गया। होसुर रोड के जाम ने इलैक्ट्रोनिक सिटी की आवाजाही ठप कर दी। मजदूरों के ये प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे लेकिन पुलिस ने मजदूरों को घेरकर भयंकर लाठीचार्ज किया। जिसमें महिलाओं को भी पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा बुरी तरह पीटा गया। मजदूरों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए। जिसके जवाब में मजदूरों ने भी पुलिस पर पथराव किया और चप्पलें फेंकी। 
        18 अप्रैल के इस भारी दमन के विरोध में 19 अप्रैल को ज्यादा बड़ी संख्या में मजदूर सड़कों पर उतरे। इस दिन थाने में, बसों में तथा शाही एक्सपोर्ट के एक प्लांट में तोड़-फोड़ और आगजनी की घटनाएं भी हुई। इन घटनाओं को 8-10 मुंह पर कपड़ा बांधे लोगों ने अंजाम दिया। जिसके बारे में मजदूरों ने कहा गुण्डा तत्वों को हड़ताल में तोड़-फोड़ के मकसद से प्रशासन ने घुसाया। लेकिन इन घटनाओं को ऐसे प्रसारित किया गया मानों मजदूरों ने ही यह किया।
        पुलिस का दमन चक्र अगले 4 दिनों तक चलता रहा। 400 मजदूरों को 18-19 अप्रैल को ही गिरफ्तार कर लिया गया और गिरफ्तारी का यह सिलसिला 22 अप्रैल तक जारी रहा। गिरफ्तारी करते हुए पुरुष मजदूरों को अधिक गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा मजदूर बस्तियों से छात्रों को भी उठाया गया। बुरी तरह पीटा गया, धमकाया गया और परिजनों से 50-50 हजार रुपये लेकर उन्हें छोड़ा गया। 280 मजदूरों पर धारा 307 के तहत मुकदमा किया गया। पुरुष मजदूरों को नंगा करके मारा गया, अंगुलियां मोड़ी गयी। मजदूरों के बीच एक खौफ का माहौल बनाया गया। 
        बंगलुरु के गारमेंट मजदूरों के इस जुझारु संघर्ष ने सरकार को पहले पी.एफ. नोटिफिकेशन 3 माह के लिए टालने और अंततः उसे वापस लेने को मजबूर किया। मजदूरों के विशेषकर महिला मजदूरों के इस ऐतिहासिक संघर्ष ने मजदूर आंदोलन में एक मील का पत्थर कायम किया है। 
        बंगलुरु के 5 लाख मजदूरों के बीच किसी भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन सेंटर की कोई यूनियन नहीं है। यहां मुख्यतः तीन ट्रेड यूनियनें गारमेंट एण्ड टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन, गारमेण्ट लेबर यूनियन और कर्नाटक गारमेण्ट वर्कर्स यूनियन हैं। ये ट्रेड यूनियनें एन.जी.ओ. द्वारा संचालित हैं तथा इनके इर्द-गिर्द 10-12 हजार मजदूर संगठित हैं। यहां मजदूरों को बड़ी संख्या में यूनियनें बनाने और उसमें ज्यादातर लोगों को संगठित करने की जरुरत है। व्यवस्था परस्त एन.जी.ओ. एवं ट्रेड यूनियन सेंटर यह काम नहीं कर सकते यदि करेंगे भी तो मजदूरों को भी व्यवस्था परस्त बनाने के मकसद से।
        बंगलुरु के गारमेण्ट मजदूरों की हड़ताल ने सरकारों को साफ इशारा कर दिया है कि यदि सरकारें आर्थिक संकट का बोझ मजदूरों पर डालेंगी तो खुद भी नहीं बच पाएंगी और सरकार को मुंह की खानी पड़ेगी।

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