सोमवार, 12 सितंबर 2016

छात्रों के जनवादी हकों को कुचलने वाली सुब्रमण्यम कमेटी की सिफारिशों का विरोध करो!

-राजू

        नई शिक्षा नीति के प्रारूप को गठित करने के लिए टी. एस. आर. सुब्रमण्यम कमेटी का गठन किया गया था। पूर्व कैबिनेट सचिव टी. एस. आर. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में गठित इस कमेटी ने अपनी सिफारिशें दी हैं। इन सिफारिशों में शैक्षिक संस्थानों को राजनीति विहीन बनाने की पुरजोर वकालत की गयी है। सरकारें पिछले समय से निरंतर छात्र राजनीति को कुंद करने, उस पर लगाम लगाने के लिए तरह तरह की कोशिशों में लगी हुई हैं।
        कमेटी का कहना है कि कैंपसो में राजनीतिक गतिविधियों को बंद किया जाना चाहिये। इसके अलावा जाति व धर्म पर आधारित छात्र संगठनों को कालेज कैंपसों में बैन कर दिया जाना चाहिये। कमेटी यहां तक कहती है कि कालेजों का माहौल बिगाड़ने में उन छात्रों का हाथ रहता है जो लंबे समय तक कालेजों में बने रहते है। इसलिए कमेटी यह सिफारिश करती है कि हाॅस्टलों-कालेजों में छात्रों के रहने की अधिकतम समय सीमा को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
        कमेटी की इन सिफारिशों को सुनकर साफ पता चलता है कि देश का शासक वर्ग स्कूलों-कालेजों को राजनीति विहीन बनाकर ऐसा माहौल बनाना चाहता है कि वह अपनी मनमर्जी चला सके। सुब्रमण्यम कमेटी की यह सिफारिशें सन 2000 में आयी बिरला-अंबानी की रिपोर्ट की सिफारिशों की ही तरह है। बल्की उसका ही आगे बढ़ा हुआ कदम है। बिरला-अंबानी की रिपोर्ट भी छात्र संघ चुनाव को कैम्पसों में खत्म करने की बात करती है। बिरला-अंबानी रिपोर्ट का कहना था कि छात्र संघ शिक्षा का व्यवसायीकरण करने के मार्ग में बाधा हैं। 2006 में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को कालेज कैंपसों में लागू कर सरकार ने छात्र संघों को कमजोर व पालतू बनाने का प्रयास किया है। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के बाद छात्र संघ तो बना हुआ है लेकिन वह बहुत कमजोर हो गया है।
        शिक्षा के निजीकरण के 2 दशक से ज्यादा के सफर के बाद आज आधे से अधिक संस्थान निजी हैं। इन निजी संस्थानों में छात्र संघ नहीं है। और न ही यहां पर कोई जनवादी माहौल है। छात्र निजी संस्थानों की तानाशाही झेलने को मजबूर हैं। अथाह लूट उत्पीड़न के सामने इन संस्थानों के छात्र बेबस से है। चंद सरकारी कालेजों में नख-दंत विहीन छात्र संघ भी सरकार को नहीं भा रहे हैं। सरकारें इन सरकारी संस्थानों में छात्रों के जनवादी अधिकारों को छीनने पर आमादा हैं। वे इन छात्रों से विरोध करने, अपनी बात को कहने के लिए उपलब्ध सीमित मंचों को भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। अपने को दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र कहने वाले भारत के शासक वर्ग की यही सच्चाई है कि वह छात्रों के सीमित जनवाद को भी छीन लेना चाहता है।
        दरअसल पिछले लंबे समय से भारत के कैम्पसों के छात्र-नौजवानों ने सरकार की जनविरोधी नीतियों, शिक्षा मद में कटौती व शिक्षा के भगवाकरण की मुहिम का तीखा प्रतिवाद किया है। जे.एन.यू., एफ.टी.आई.आई., एच.सी.यू., पुणे व जादवपुर यूनि., आदि ऐसे संस्थान हैं जिन्होनें मोदी सरकार को अपनी मनमर्जी नहीं करने दी। शिक्षा के भगवाकरण, फासीवादी मुहिम का इन संस्थानों के छात्रों ने पुरजोर विरोध किया। अब सरकार छात्र राजनीति को ही प्रतिबंधित कर विरोध को दबाने की तैयारी कर रही है। सुब्रमण्यम कमेटी की सिफारिशोें को इस दिशा में बडे़े कदम के रूप में देखा जाना चाहिए।
        याद करना होगा कि भाजपा नेता वैकेया नायडू ने जे.एन.यू.छात्रों से यहां तक कह दिया था कि अगर उन्हें राजनीति करनी है तो वे कालेज कैंपस छोड़ दें। अब यही बात सुब्रमण्यम कमेटी भी कहती है। भाजपा के एजेण्डे को कमेटी की सिफारिशों में साफ देखा जा सकता है। आर.टी.आई. के तहत निजी संस्थानों को 25 प्रतिशत सीटों को आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए रखे जाने का प्रावधान है लेकिन अल्पसंख्यक कालेजों को इससे छूट दी गयी थी। लेकिन अब सुब्रमण्यम कमेटी इसे अल्पसंख्यक कालेजों में भी लागू करना चाहती है।
        यह जगजाहिर है छात्र राजनीति को प्रतिबंधित करने, जाति व धर्म आधारित छात्र संगठनों को बैन करने की बात करने वाली यह कमेटी देश के गरीब मेहनतकश छात्रों-नौजवानों के जनवादी हकों को कुचलना चाहती है। अल्पसंख्यकों व दलितों के संगठनों को कैंपसों में बैन करके यह कमेटी उनको अपनी आवाज उठाने से रोकना चाहती है। जाहिर है कि इससे कैंपसों में अल्पसंख्यकों दलितों के उत्पीडन के खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं होगा। जाति व धर्म आधारित संगठनों को प्रतिबंधित करके कमेटी उत्पीड़ित व वंचित तबके को राजनीति से बाहर कर देना चाहती है। संघ भाजपा की सरकार में सवर्ण हिन्दू मानसिकता से ग्रस्त ए.बी.वी.पी. जैसे लम्पट छात्र संगठन इस जाल में नहीं फसेंगे। वे अपनी मनमर्जी, गुण्डागर्दी व दलित अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलना जारी रखेंगे। समझ में आने वाली बात है कि इसका निशाना प्रगतिशील, वामपंथी, दलित व अल्पसंख्यक छात्र संगठन ही बनेंगे। और आज यहीं संगठन संघी सरकार की फासीवादीकरण की मुहिम, भगवाकरण की मुहिम का किसी न किसी स्तर पर विरोध कर रहे हैं। विरोध के किसी भी स्वर को कुचल देने की यह मुहिम शासकों की तानाशाही व जनवादविरोधी होने का परिचायक है। इससे पूर्व की कांग्रेस सरकार भी इसी दिशा में अग्रसर थी। अब संघी सरकार उससे भी 2 कदम आगे बढ़कर इस काम को अंजाम दे रही है। सरकार का विरोध करने वाली छात्र राजनीति को खत्म कर शासक वर्ग अपनी राजनीति को थोपना चाहता है। ऐसा कर वह अपने जनविरोधी, फासीवादी कृत्यों को बगैर अड़चन के आगे बढ़ाना चाहता है। 
        इसलिए यह जरूरी है कि छात्रों के जनवादी अधिकारों को कुचलने की इस मुहिम का पुरजोर विरोध होना चाहिए। छात्र-नौजवान सुब्रमण्यम कमेटी की इन सिफारिशों का विरोध कर ही कैंपसों में बचे सीमित जनवाद को भी बचा जा सकते हैं। इसके बहाने शिक्षा का भगवाकरण करने की इस नयी योजना का पर्दाफाश जरूरी है।    

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