सोमवार, 29 जून 2026

अंतर्राष्ट्रीय
बांग्लादेष
मौजूदा छात्र-युवा विद्रोह और छात्र-युवा आंदोलन की विरासत
पंकज

12 दिसंबर, 2025 को शरीफ उस्मान हादी को दो नकाबपोश हमलावरों ने गोलियां मारी और 18 दिसंबर, 2025 को सिंगापुर के अस्पताल में उनकी मौत हो गयी। शरीफ उस्मान हादी शेख हसीना की भ्रष्ट और तानाशाह सरकार के विरुद्ध जन विद्रोह के उभरते हुए प्रमुख युवा नेता थे। शेख हसीना सरकार के पतन और उनके भारत पलायन के बाद बनी अंतरिम सरकार की पंूजीपरस्त नीतियों के विरुद्ध भी वे ‘इंकलाब मंच’ संगठन के माध्यम से बांग्लादेश की जनता विशेषकर छात्रों-युवाओं और मजदूर-मेहनतकश आवाम को जागृत और गोलबंद कर रहे थे। वे आगामी फरवरी में होने वाले चुनावों में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के बतौर लड़ना चाहते थे। वे स्थापित पूंजीवादी पार्टियों के विरोधी थे। यही कारण था कि स्थापित पूंजीवादी पार्टियों के शीर्ष नेता और पूंजीपति वर्ग उनको अशांति और मौजूदा व्यवस्था में गड़बड़ी फैलाने वाला समझते हैं।

जैसे ही उनका शव बांग्लादेश पहुंचा, हजारों लोग हवाई अड्डे पहुंच गये। 19 दिसंबर को न सिर्फ ढाका में बल्कि देश के अन्य शहरों और कस्बों में लाखों लोग हादी की हत्या के विरुद्ध सड़कों पर उतर पड़े। 19 दिसंबर को राजधानी ढाका में कफ्र्यू लगा दिया गया। इस हत्या के विरुद्ध विद्रोह चटगांव के औद्योगिक क्षेत्रों से लेकर राजधानी के विश्वविद्यालयों तक, सीमावर्ती जैसोर से लेकर सिलहट के चाय बागानों तक फैल गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस चैकियों, सरकारी कार्यालयों और देश के सबसे बड़े पूंजीवादी मीडिया घरानों को हमलों को निशाना बनाया। राजधानी ढाका में प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछारें डाली गईं, आंसू गैस के गोले दागे गये और डण्डों से पिटाई की गई। लेकिन उनके हौंसले को पस्त नहीं किया जा सका। प्रदर्शनकारियों ने ‘प्रथोम आलो’ और ‘डेली स्टार’ नामक दो पूंजीवादी अखबारों के मुख्यालयों को आग के हवाले कर दिया। इन इमारतों की तरफ बढ़ते हुए वे नारा लगा रहे थे ‘‘हादी को किसने मारा?’’, ‘‘अभिजात वर्ग का मीडिया, जनता का दुश्मन’’।

हादी की हत्या के बाद खड़ा हुआ यह जनउभार वस्तुतः अगस्त, 2024 के जन विद्रोह की निरंतरता है। वस्तुतः शेख हसीना की सत्ता को हटाने के बाद भी जन विद्रोह की बुनियादी मांगें पूरी नहीं हुई हैं। बुनियादी मांगों में बांग्लादेश की जनता की सत्ता में भागीदारी, नागरिक आजादी और पंूजी के विरुद्ध लड़ने में श्रमिकों के अधिकारों की मान्यता आदि बातें शामिल हैं।

जहां वर्तमान छात्र-युवा विद्रोह, अगस्त 2024 की ठीक निरंतरता में है, वहीं बांग्लादेश के छात्र-युवा आंदोलन का एक लंबा इतिहास है। मौजूदा आंदोलन उसी लंबी परंपरा की एक अगली कड़ी है। यह कड़ी ब्रिटिश भारत के बंग-भंग आंदोलन से आज तक जारी है। यहां सिर्फ पाकिस्तान बनने के बाद बने पूर्वी बंगाल (1955 से पूर्वी पाकिस्तान) और 1971 के बाद बने बांग्लादेश के प्रमुख छात्र-युवा आंदोलनों की चर्चा की गई है।

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद पूर्वी बंगाल में ढाका विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन की भूमिका सर्वप्रथम उभर कर सामने आई, जब पाकिस्तान की सरकार ने पूर्वी बंगाल की सरकारी भाषा उर्दू घोषित की। पूर्वी बंगाल के लोगों की भाषा बांग्ला थी। यहीं से भाषा आंदोलन शुरू हुआ। यह ढाका विश्वविद्यालय से शुरू हुआ और इसने अपने दायरे में व्यापक शहरी मध्यम वर्ग को समेट लिया। उस समय अधिकांश आबादी गांवों में बसती थी। उस समय के वामपंथी किसान आंदोलन ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया। इस आंदोलन के चलते 1952 में ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों की हत्या कर दी गयी। 1960 के दशक के शुरूआती वर्षों में छात्र आंदोलन शिक्षा नीति में लाये गये बदलावों के इर्दगिर्द केन्द्रित था। लेकिन यह जनवाद के वृहत्तर आंदोलन का वाहक भी था। इसके लिए मार्च, धरने और हड़तालें हुईं। 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में अन्य शहरी समूह जैसे औद्योगिक मजदूर, शहरी झुग्गी-झोपड़ी वाले और छोटे कामगार अक्सर छोटे कस्बों से इन आंदोलनों में शामिल हुए। उस समय सरकार, पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों के साथ भेदभाव करती थी। 1968-69 के दौरान वामपंथी छात्र संगठनों और श्रमिकों द्वारा स्वतंत्र बंगाल का नारा लगाया जाने लगा था। जन सभाओं में, प्रदर्शनकारियों ने ‘जाय बंगाल’ के नारे लगाये और कृषक-श्रमिक राज की मांग की। इसी दौरान पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही आ गयी और इसके विरुद्ध संघर्ष उठने लगे।

बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष के दौरान ढाका विश्वविद्यालय के छात्र; लोगों को गोलबंद करने में अहम भूमिका निभा रहे थे। वे आंदोलन के साथ भौगोलिक तौर पर और वर्गों को जोड़ने का काम कर रहे थे। चूंकि अधिकांश छात्र ग्रामीण इलाकों से आते थे, इसलिए यह काम उनके लिए आसान था। इसका परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तानी सत्ता ने ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों को हमलों का शिकार बनाया। ‘आपरेशन सर्चलाइट’ के जरिए विश्वविद्यालय में जनसंहार को अंजाम दिया गया। अन्य जगहों के छात्रों ने भी पाकिस्तानी सेना के विरुद्ध छापामार समूहों का गठन किया। ‘कादर वाहिनी’ स्कूल और कालेज के छात्रों का ऐसा ही एक समूह था।

इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि ढाका विश्वविद्यालय और बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष का गहरा संबंध रहा है और यहां के छात्र नेताओं के प्रति मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले लोगों में गहरा सम्मान रहा है। इसी विश्वविद्यालय से आगे अलग-अलग पार्टियों को राष्ट्रीय नेता मिलते रहे हैं। यही कारण रहा है कि ढाका विश्वविद्यालय मंे किसी भी तरह की उथल-पुथल जल्द ही समूचे देश की उथल-पुथल में तब्दील हो जाती है।

मुक्ति के बाद बने बांग्लादेश में सभी पूंजीवादी पार्टियों ने अपने-अपने छात्र-संगठन बनाये और सभी ने ढाका विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों में छात्र राजनीति पर अपना-अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की। 1971-75 तक शेख मुजीबुर्रहमान देश के प्रथम शासक रहे। उन्होंने अपना छात्र संगठन ‘अवामी छात्र लीग’ बनाया। बाद में अपने शासन काल में उन्होंने अपनी छात्र लीग के माध्यम से छात्र-राजनीति पर प्रभुत्व कायम कर लिया और विरोधी छात्र संगठनों को ताकत के जरिए समाप्त करने की कोशिश की। उन्होंने एकदलीय शासन व्यवस्था स्थापित की। छात्र लीग में गुण्डा तत्वों की भरमार थी। 1975 में उनकी हत्या हुई। 1977 में जिया उर रहमान की सैनिक तानाशाही स्थापित हुई। 1982 में जिया उर रहमान को हटाकर इरशाद की सैनिक तानाशाही रही। यह सैनिक तानाशाही 1990 तक चली। इरशाद की सैनिक तानाशाही के विरुद्ध छात्र संगठनों ने और विशेष तौर पर ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की।

1980 के दशक में ये छात्र ही थे जिन्होंने इरशाद की सैनिक तानाशाही के विरुद्ध सर्वप्रथम मोर्चा लिया। इन्होंने सर्व पार्टी छात्र संगठन(।सस च्ंतजल ैजनकमदज न्दपवद) का गठन किया। इसके माध्यम से सभी राजनीतिक पार्टियों का गठबंधन बना। ढाका विश्वविद्यालय में महत्वपूर्ण विरोध प्रदर्शन हुए। इरशाद की सैनिक तानाशाही के बर्बर दमन के चलते कई छात्र मारे गये और इससे ज्यादा घायल हुए। जब ढाका विश्वविद्यालय में एक डाॅक्टर की हत्या सरकार द्वारा कर दी गयी तो इससे इरशाद की सैनिक तानाशाही के विरुद्ध व्यापक जन आंदोलन भड़क उठा। इसका चरम उभार 1990 की 4 दिसंबर को हुआ, जब लाखों लोग ढाका की सड़कों पर उतर पड़े। इसके बाद सैनिक तानाशाह इरशाद को इस्तीफा देना पड़ा और उसकी सैनिक तानाशाही का अंत हुआ।

इसके बाद बारी-बारी से बांग्लादेश की दो पूंजीवादी पार्टियां- शेख मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना की पार्टी ‘अवामी लीग’ और जिया उर रहमान की पत्नी बेगम खालिदा जिया - की ‘बांग्ला राष्ट्रवादी पार्टी’ सत्ता में आती रही हैं। बेगम खालिदा जिया की 30 दिसंबर, 2025 में मृत्यु के बाद उनके पुत्र तारिक रहमान इस पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। एक पार्टी सैनिक तानाशाह इरशाद की भी है- जातीय पार्टी। इसके अतिरिक्त ‘जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश पार्टी’ है। यह कट्टर इस्लामी पार्टी है। यह बांग्लादेश में भारत में आर.एस.एस जैसी पार्टी है। अंतर यह है कि जमात-ए-इस्लामी सीधे राजनीति में आकर कट्टरवादी सांप्रदायिक राजनीति में लगी हुई है और भारत का आर.एस.एस. अपनी कट्टर हिन्दूवादी राजनीति अपने राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी के जरिये कर रहा है। इसके अतिरिक्त छोटे-छोटे ग्रुपों में बंटे कम्युनिस्ट समूह हैं।

इन सभी पूंजीवादी पार्टियों के अपने-अपने छात्र संगठन हैं। ये इन पार्टियों के युवा भर्ती केन्द्र हैं। इन सभी पूंजीवादी छात्र संगठनों में वर्चस्व की लड़ाई में बाहुबल और पैसों का खुलकर इस्तेमाल होता है। लेकिन जब भी कोई सैनिक तानाशाही के विरुद्ध लड़ने की बात आती है या बड़े पैमाने पर अन्याय या भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के विरुद्ध संघर्ष करने की बात आती है तो ये गुण्डा तत्व उनके हमले का निशाना बनते हैं या व्यापक छात्र आबादी के साथ आ खड़े होते हैं।

हालांकि 1990 के दशक में ढाका विश्वविद्यालय और अन्य स्थानों पर छोटे-बड़े छात्र आंदोलन होते रहे हैं। लेकिन इन आंदोलनों ने बांग्लादेश के समग्र राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित नहीं किया। बांग्लादेश के राजनीतिक पटल पर एक बड़ा आंदोलन 2013 में हुआ।

इस आंदोलन की शुरूआत उस समय हुई जब जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के एक वरिष्ठ नेता अब्दुल कादर मोल्ला को एक न्यायालय ने महज आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस व्यक्ति पर बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ देने के अपराधों का आरोप था। लोगों की मांग इसको फांसी देने की थी। सजा सुनाये जाने के बाद अपने समर्थकों के समक्ष मोल्ला ने ‘वी’ (ट) दिखाया। इसे उसने अपनी विजय बताया। इसके विरुद्ध लोगों का गुस्सा भड़क उठा। इसके जवाब में, हजारों और बाद में लाखों लोग इकट्ठा होने लगे। लोगों ने सरकार से फांसी की मांग की। जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। कुछ लोग इस आंदोलन की व्यापकता की तुलना ‘अरब बसंत’ से करते हैं। इस आंदोलन में छात्रों और नौजवानों की व्यापक भागीदारी थी। इस आंदोलन को आम तौर पर ‘‘शाहबाग आंदोलन’’ कहा जाता है। शाहबाग ढाका विश्वविद्यालय के उत्तर में नजदीक एक जगह है। इस व्यापक छात्र-युवा आंदोलन का असर यह हुआ कि न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सरकार ने अपील की और उसे फांसी की सजा दी गई।

इस दौरान बेगम हसीना की सत्ता अधिकाधिक निरंकुश होती गई। बांग्ला राष्ट्रवादी पार्टी पर दमन तेज करके उसे निष्प्रभावी बना दिया गया। अन्य विरोधी पार्टियों पर भी दमन तेज होता गया। लोगों को अपने गुस्से का इजहार करने का कोई वैध मंच नहीं रह गया था। सत्ता का आतंक बढ़ता गया।

ऐसे ही समय में 2018 के चुनावी वर्ष में दो आंदोलन हुए। इन दोनों आंदोलनों का नेतृत्व छात्रों और नौजवानों ने किया। एक आंदोलन तो सिर्फ प्राइवेट बसों द्वारा अंधाधुंघ बस चलाने के चलते छात्र की मौत से शुरू हुआ। यह 200 से ज्यादा बस आपरेटर कंपनियों के विरुद्ध और हसीना सरकार के परिवहन मंत्री के विरुद्ध व्यापक आंदोलन में तब्दील हो गया। जगह-जगह छात्रों के समूह बसों को रोककर चालक के लाइसेंस की जांच करने लगे। उन्होंने अपनी जांच के दायरे में पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को खींचा। इस मामले में भारी अनियमिततायें पायी गईं। इस व्यापक आंदोलन के समक्ष सरकार को पीछे हटना पड़ा। छात्रों की मांगें माननी पड़ी।

2018 में सरकारी नौकरियों में बांग्लादेश सरकार की आरक्षण नीति के विरुद्ध एक छोटे से समूह द्वारा आंदोलन शुरू हुआ। इस छोटे से छात्र समूह ने ‘बांग्लादेश साधारण छात्र अधिकार संरक्षण परिषद’ का गठन किया। यह किसी भी राजनीतिक पार्टी से संबद्ध नहीं था। इसने ढाका विश्वविद्यालय में अपना विरोध आंदोलन शुरू किया। चूंकि नौजवानों में बेरोजगारी बहुत ज्यादा थी। पढ़े-लिखे नौजवान सरकारी नौकरियों हेतु प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने की तैयारी करते थे। लेकिन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के बेटों और पोते/पोतियों के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। इसके अतिरिक्त 10 प्रतिशत महिलाओं के लिए, 10 प्रतिशत पिछड़े जिलों के लिए, 5 प्रतिशत जनजाति अल्पसंख्यकों के लिए और 1 प्रतिशत विक्लांग लोगों के लिए आरक्षण था। इस प्रकार 44 प्रतिशत ही आम छात्रों के लिए पद बचते थे। छात्रों का विरोध 30 प्रतिशत स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के आरक्षण पर था। वे इसे घोर अन्याय समझते थे। ढाका विश्वविद्यालय से शुरू हुआ यह आंदोलन तेजी से फैल गया। इस आंदोलन के आग में घी डालने का काम एक मंत्री के बयान ने किया। उक्त मंत्री ने आंदोलनकारियों को ‘‘रजाकारों की औलाद’’ कहा। रजाकार वे लोग थे जो बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी सेना की तरफ से लड़ रहे थे। इससे आंदोलन और तीव्र हो गया। देश के अलग-अलग जगहों में विश्वविद्यालय, कालेज और स्कूल स्तर की कमेटियां बनने लगीं और आंदोलन देशव्यापी हो गया। इस आंदोलन के विरोध में सत्ताधारी पार्टी आवामी लीग ने अपने छात्र संगठन ‘आवामी छात्र लीग’ के जरिये आंदोलनकारियों पर हमला करवाया। अफवाहें फैलायीं और आंदोलन को बदनाम करने की कोशिशें की।

अंततः दोनों ही मामलों में सरकार को पीछे हटना पड़ा।

यही आरक्षण का आंदोलन 2024 में फिर उस समय शुरू हुआ, जब न्यायालय ने फिर से ‘स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों के आश्रितों’ के लिए आरक्षण को बहाल कर दिया। यह आंदोलन फिर से देशव्यापी बन गया और हसीना की भ्रष्ट सरकार के पतन का कारण बना।

आज छात्र-युवा आंदोलन ऐसे मुकाम पर है कि व्यवस्था पोषक ताकतें उसे व्यवस्था के दायरे में समेटना चाहती हैं और परिवर्तनकामी ताकतें उसे व्यवस्था परिवर्तन के लिए आगे ले जाना चाहती हैं। आज के छात्र-युवा आंदोलन यदि व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी के संघर्षों से एकजुट होकर पूंजी की सत्ता के विरुद्ध एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार होता है और देशी-विदेशी मगरमच्छों के विरुद्ध अपनी लड़ाई को केन्द्रित करता है तो वह अपने इतिहास और विरासत के साथ आगे बढ़ सकता है।

देर-सबेर उसे इसी रास्ते पर आगे बढ़ना होगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें