सोमवार, 29 जून 2026


आलेख

उद्भूत गुण और जीवन 
 साधना

    धरती पर पानी इफरात है। धरती की ऊपरी सतह का दो-तिहाई से ज्यादा पानी से भरा हुआ है। इसके अलावा सतह के नीचे भी कुछ पानी है। धरती पर पानी की कुल मात्रा वही बनी हुई है पर मात्रा में वह काफी है। यह अलग बात है कि पीने योग्य पानी का संकट बढ़ता जा रहा है और कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।

    इसके बरक्स कार्बन डाई आक्साइड गैस धरती के वायुमंडल में काफी कम है-महज 0.04 प्रतिशत। इतनी कम मात्रा के बावजूद इसके बढ़ने से धरती पर तापमान के असामान्य ढंग से बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

    पानी और कार्बन डाई आक्साइड अत्यन्त सामान्य पदार्थ हैं। लेकिन इन सामान्य पदार्थों से ही धरती पर सबसे असामान्य चीजें पैदा हुई- जीवन। यह असामान्य चीज यानी जीवन इतनी असामान्य थी कि उन्नीसवीं सदी तक ज्यादातर वैज्ञानिक यह मानते थे कि धरती पर जीवन के पीछे कोई विशेष शक्ति (अपजंस वितबम) थी क्योंकि सामान्य रासायनिक क्रियाओं के जरिये जीवन पैदा नहीं हो सकता था। जैविक अणुओं को विशेष श्रेणी में रखा जाता था और माना जाता था कि वे सामान्य रासायनिक क्रियाओं से नहीं पैदा हो सकते। यह गौरतलब है कि जब डार्विन ने 1859 में अपनी किताब ‘प्रजातियों की उत्पत्ति’ प्रकाशित की तो उसमें उन्होंने स्वयं जीवन की उत्पत्ति के सवाल को छोड़ दिया। डार्विन के मुकाबले लामार्क ने पचास साल पहले यह प्रस्तावित किया था कि स्वयं पदार्थ में ही वह शक्ति है कि उससे अपने-आप जीवन उत्पन्न हो जाता है। लेकिन उसकी जो व्याख्या उन्होंने की वह बेहद असंतोषजनक थी और उचित ही वैज्ञानिकों में मान्यता हासिल नहीं कर पाई।

    पर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में क्रमशः यह स्पष्ट हो गया कि जैविक अणु भी अजैविक अणुओं की तरह उन्हीं रासायनिक नियमों से संचालित हैं। कुछ जैविक अणुओं को तो प्रयोगशाला में बना भी लिया गया। यह अलग बात है कि उन्हें मूलभूत तत्वों से नहीं बनाया गया था पर अब यह सिद्धान्त स्थापित हो गया कि जैविक अणु भी अजैविक अणुओं की तरह उन्हीं रासायनिक नियमों से बनते-बिगड़ते हैं।

    इतना सब होने पर भी जैविक अणुओं से स्वयं जीवन की उत्पत्ति एक रहस्य बना रहा। बीसवीं सदी में इस बारे में भांति-भांति के सिद्धान्त प्रस्तावित किये गये और प्रयोग भी किये गये। इस संबंध में ओपेरिन-हाल्डेन की अवधारणा तथा 1953 का स्टैनले मिलर का प्रयोग मील का पत्थर हैं। मिलर के प्रयोग में सामान्य अजैविक पदार्थों से वे अणु बनाये गये जिनसे फिर बड़े जैविक अणुओं का निर्माण होता है, मसलन प्रोटीन का।

    आज भी धरती पर जीवन की उत्पत्ति के मामले में वैज्ञानिकों में एकमत नहीं है और बहुत सारे सवाल अनुत्तरित हैं। पर एक बात पर सारे वैज्ञानिक एकमत हैं। वह यह कि धरती पर जीवन उन्हीं भौतिक और रासायनिक नियमों से पैदा हुआ जिनसे अजैविक जगत विद्यमान है। इसके अलावा जीवन की उन बहुत सारी भौतिक और रासायनिक क्रियाओं के बारे में भी वैज्ञानिकों में एकमत है जिनसे जीवन चलता है। इनके जरिये वैज्ञानिकों में यह धारणा भी स्थापित हुई है कि ऊपर के स्तर पर वे गुण पैदा हो जाते हैं जो नीचे के स्तर पर नहीं होते। या दूसरे शब्दों में कहें तो किसी चीज में वे गुण पैदा हो जाते हैं जो उसे बनाने वाले उसके घटक तत्वों में नहीं होते। इस तरह समग्र अपने घटक अंशों के सरल योग से गुणात्मक तौर पर भिन्न होता है। इसी कारण जीवन में वे चीजें आ जाती हैं जो उसके घटक अजैविक तत्वों या क्रियाओं में नहीं होतीं। इसी कारण निर्जीव से सजीव पैदा हो जाता है। विज्ञान और दर्शन में इसे उद्भूत गुण (मउमतहमदज चतवचमतजल) कहा जाता है। उद्भूत गुण वह होता है जो किसी चीज में समग्रता में तो होता है पर उसके घटक तत्वों में नहीं।

    वैसे तो रसायन विज्ञान स्वयं उद्भूत गुणों का ही विज्ञान है पर पहले किसी ने इस हद तक नहीं सोचा कि स्वयं जीवन उद्भूत गुण हो सकता है। आखिर पानी अपने घटक तत्वों यानी आक्सीजन और हाइड्रोजन से बिलकुल भिन्न है। इसी तरह कार्बन डाई आक्साइड भी अपने घटक तत्वों कार्बन और आक्सीजन से बिलकुल भिन्न है। रसायन विज्ञान में इस सत्य की मान्यता की वजह से ही एक लम्बे समय तक तो लोग अन्य रासायनिक पदार्थों से सोना बनाने के प्रयास में लगे रहे। केवल बीसवीं सदी में जाकर ही यह स्पष्ट हो पाया कि इस विधि से सोना नहीं बनाया जा सकता, जब पदार्थों की न केवल आणविक बल्कि परमाणविक संरचना भी पता चल गई।

    आज विज्ञान बहुत बारीकी और विस्तार से जीवन के चार प्रमुख अणुओं के बारे में जानता है- कार्बोहाइड्रेड, लिपिड या वसा, प्रोटीन और डीएनए-आरएनए। ये ही जैविक अणु धरती पर सारे जीवन के बुनियादी अणु हैं। इन्हीं से जीवों के पांचों जगत बने हुए हैं: बैक्टीरिया, आर्किया, फन्गी या फफंूद, वनस्पति और जन्तु। इस मामले में धरती पर समूचे जीवन में एक मूलभूत एकता है। यदि इस मूलभूत एकता के ऊपर विविधता है तो उस उद्भूत गुण के कारण जो अलग-अलग स्तर पर जीवन में पैदा हो जाती है।

    बैक्टीरिया और आर्किया सबसे शुरुआती और सरल एक कोशिकीय जीव हैं जिन्हें प्रोकार्येटिक (बिना केन्द्रक के) कहते हैं क्योंकि उनका डीएनए किसी केन्द्रक में नहीं बल्कि कोशिका द्रव्य में ही होता है। बाकी तीनों जगत ज्यादा जटिल कोशिकाओं वाले हैं (पहले वालों से आकार में करीब पन्द्रह हजार गुना ज्यादा बड़े आयतन में) जिन्हें यूकार्योटिक (केन्द्रक वाले यानी जिनमें डीएनए एक झिल्ली से बने केन्द्रक में रहता है) कहते हैं। आज माना जाता है कि सभी यूकार्योटिक कोशिकाओं में जो ऊर्जा की भट्टी वाला माइट्रोकान्ड्रिया है वह कभी स्वतंत्र बैक्टीरिया था जो बाद में दूसरे बैक्टीरिया या आर्किया में समाहित हो गया। उससे गुणात्मक तौर पर भिन्न यूकार्योटिक कोशिका की शुरुआत हुई। इसी तरह यह भी माना जाता है कि सभी वनस्पतियों में सूरज की ऊर्जा के अणु बनाने की जो व्यवस्था है (फोटोसिन्थिसिस) उसका यंत्र यानी क्लारोप्लास्ट कभी स्वतंत्र फोटोसिन्थेटिक बैक्टीरिया था जो शुरुआती यूकार्योटिक कोशिका में समाहित हो गया। इससे फिर गुणात्मक तौर पर भिन्न वनस्पति कोशिकाओं की शुरुआत हुई जिनसे आज सारा वनस्पति जगत बना हुआ है।

    यूकार्योटिक कोशिकाओं के अस्तित्व में आ जाने के बाद बहुकोशिकीय जीवों का अस्तित्व में आना संभव हो गया। बैक्टीरिया या आर्किया लाखांे-करोड़ों की संख्या में इकट्ठा होकर ‘कालोनी’ तो बना सकते हैं पर बहुकोशिकीय जीवन नहीं। इस तरह की ‘कालोनी’ में कुछ उद्भूत गुण पैदा हो जाते हैं पर बहुकोशिकीय जीव जैसे गुण नहीं। बहुकोशिकीय जीवों में कोशिकाओं में श्रम-विभाजन हो जाता है और इसी कारण विशेषीकृत कोशिकाएं पैदा हो जाती हैं। उदाहरण के लिए इंसान में दो सौ से ज्यादा किस्म की कोशिकाएं हैं जो मूलभूत तौर पर एकसमान होते हुए भी अपनी बनावट और कार्य में विशिष्ट होती हैं। जैसे-जैसे सरल से जटिल जीव पैदा होते जाते हैं वैसे-वैसे कोशिकाओं के विशिष्टीकरण और फिर उनसे विशिष्ट अंगों के निर्माण के द्वारा नये-नये उद्भूत गुण पैदा होते जाते हैं। इसी से उच्चतर प्रजातियों में नये-नये गुण पैदा होते जाते हैं। इसका चरम इंसान तक पहुंचता है।

    इतना ही नहीं, नयी-नयी प्रजातियों की उत्पत्ति के साथ, सरल जीवों की उत्पत्ति के साथ स्वयं एक कोशिका से बहुकोशिकीय जीव के विकास की मशीनरी भी विकसित होती जाती है। जिसे आज भ्रूण विज्ञान कहा जाता है वह इसी मशीनरी का अध्ययन करता है। शुक्राणु और अंडाणु के मिलने से बने एक कोशिकीय जाइगोट से पूर्ण इंसानी शिशु का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया के तहत होता है। इस मशीनरी की जरूरत और इसका विकास स्वयं जीवन का उद्भूत गुण है जो प्रोकार्योटिक कोशिकाओं की ‘कालोनी’ में अनुपस्थित होता है। करोड़ों बैक्टीरिया की ‘कालोनी’ में यह नहीं होता पर 969 कोशिकाओं वाले सी एलीगान्स में यह होता है। (सी एलीगान्स करीब एक मिलीमीटर का कृमि होता है जो जेनेटिक अध्ययन का एक प्रमुख जन्तु है)

    जीवन के उच्चतम स्तर से फिर बुनियादी स्तर पर लौटें। बुनियादी स्तर पर चार प्रमुख अणु हैं और सारे जीव इन्हीं से बने हैं। पर इन्हीं के साथ एक बुनियादी अणु और भी है जो सारे जीवों में ऊर्जा के सिक्के का काम करता है। यह है एटीपी या एडिनोसीन ट्राई फास्फेट। जीवों की सारी रासायनिक क्रियाओं में या तो ऊर्जा लगती है या ऊर्जा निकलती है। एटीपी सभी में एक या दूसरी भूमिका में होता है। या तो एटीपी ऊर्जा देकर एडीपी (एडिनोसीन डाई फास्फेट) में बदल जाता है या फिर एडीपी ऊर्जा ग्रहण कर एटीपी में बदल जाता है।

    जीवन के ये पांचों बुनियादी अणु घटक तत्वों से बने होते हैं। कार्बोहाइड्रेड का घटक तत्व है ग्लूकोज, वसा का घटक तत्व है लिपिड एसिड, प्रोटीन के घटक तत्व हैं अमीनो एसिड और डीएनए-आरएनए के घटक तत्व हैं न्यूक्लिटाइड/एटीपी का भी घटक तत्व है न्यूक्लिटाइड। न्यूक्लिटाइड खुद अमीनो एसिड और ग्लूकोज से बने होते हैं।

    आज विज्ञान जानता है कि पानी और कार्बन डाई आक्साइड से कई चरणों में ग्लूकोज बनता है। इन्हीं चरणों में कुछ ऐसे अणु बनते हैं जो फिर फैटी एसिड और अमीनो एसिड का आधार बनते हैं। अंत में अमीनो एसिड और ग्लूकोज से न्यूक्लिटाइड बनते हैं। ग्लूकोज बनने में सूरज की ऊर्जा ग्लूकोज में कैद होती है जो ग्लूकोज अणु के टूटने पर निकलती है और एटीपी में कैद हो जाती है। एटीपी से फिर अन्य रासायनिक क्रियाओं में ऊर्जा का इस्तेमाल होता है। जो अपने में कैद ऊर्जा को त्यागकर एडीपी में बदल जाता है। यह महत्वपूर्ण है कि पानी और कार्बन डाई आक्साइड से ग्लूकोज अणु बनने की क्रिया (जिसमें ऊर्जा कैद होती है) तथा ग्लूकोज अणु के टूट कर फिर पानी और कार्बन डाई आक्साइड बनने (जिसमें कैद ऊर्जा मुक्त होती है) की रासायनिक क्रिया रसायन विज्ञान की भाषा में ‘रिवर्सिबल’ है यानी एक से दूसरा बनने तथा दूसरे से पहले तक लौटने की प्रक्रिया अपने चरणों में एक जैसी है। जीव विज्ञान में पहले को फोटोसिन्थेसिस तथा दूसरे को रेस्पिरेशन कहा जाता है।

    यहां गौर करने की बात है कि जीवन के सारे संरचनात्मक और क्रियात्मक आणविक घटक एक ही प्रक्रिया से पैदा होते हैं या ज्यादा सही कहें तो उनके शुरुआती आणविक घटक एक ही ्रक्रिया से पैदा होते हैं। अंत में ग्लूकोज, फैटी एसिड, अमीनो एसिड तथा न्यूक्लिटाइड बन जाते हैं। इनसे फिर कार्बोहाइड्रेड, वसा, प्रोटीन, डीएनए-आरएनए और एटीपी बनते हैं। हर स्तर पर नये-नये गुण उद्भूत होते जाते हैं। अंत में कार्बोहाइड्रेड कोशिकाओं की दीवार बनाता है। वसा से कोशिकाओं की झिल्ली बनती है। प्रोटीन से कोशिकाओं के भीतर की सारी मशीनरी तथा सारे उत्प्रेरक अणु बनते हैं जिनसे रासायनिक क्रियाएं सम्पन्न होती हैं तथा डीएनए-आरएनए जेनेटिक कोड का काम करते हैं। ऊर्जा के सिक्के के तौर पर काम करने वाले एटीपी अणु की तो पहले ही बात हो चुकी है।

    इन अणुओं के ये विशिष्ट उद्भूत गुण इनकी विशिष्ट संरचना से पैदा होते हैं। इनके घटक परमाणु वही हैं- कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा सूक्ष्म मात्रा में कुछ और। पर इनसे बने अणुओं में भारी विशिष्टता होती है जिनसे वे गुण उद्भूत होते हैं जिनके फिर संयोजन से जीवन पैदा होता है। चारों या पांचों प्रमुख अणु जीवन नहीं हैं पर इनका विशिष्ट संयोजन जीवन पैदा कर देता है। इनके विशिष्ट संयोजन से जीवन का गुण उद्भूत हो जाता है। आज विज्ञान इन अणुओं तथा इनके विशिष्ट संयोजन के बारे में काफी कुछ जानता है पर शुरुआत में ये अणु और उनका विशिष्ट संयोजन कैसे विकसित हुए यह स्पष्ट नहीं है। कम से कम वैज्ञानिक इनके बारे में एकमत नहीं हैं।

    जीवन में सूक्ष्म स्तर पर रासायनिक क्रियाओं से भी नीचे एक स्तर भौतिकी का है। जिस गुण की वजह से तेल पानी पर गिरने के साथ उसमें घुलता नहीं बल्कि एक पतली परत के रूप में पानी पर फैल जाता है। ठीक उसी गुण की वजह से वसा का अणु एक दोहरी परत बना लेता है जिससे कोशिका की सभी झिल्लियों का निर्माण होता है। इसीलिए कोशिका झिल्ली को ‘लिपिड बाइलेयर’ कहा जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि वसा अणु का एक सिरा पानी से दूर भागता है जबकि दूसरा सिरा पानी के संपर्क में रह सकता है। पानी से दूर भागने वाले सिरे आपस में सट कर वसा अणुओं की दोहरी कतार बना लेते हैं जिनसे फिर कोशिका झिल्ली का निर्माण संभव हो जाता है। इस तरह वसा अणुओं से कोशिका झिल्ली के निर्माण का उद्भूत गुण उतना रहस्यमय नहीं रह जाता।

    इससे बहुत जटिल और मजेदार है ऊर्जा के सिक्के यानी एटीपी के निर्माण की प्रक्रिया या ज्यादा सही कहें तो एडीपी के साथ एक फास्फेट समूह को जोड़कर एटीपी बनाने की प्रक्रिया। यह कैसे सम्पन्न होती है आज विज्ञान इसे जानता है पर यह शुरुआत में कैसे अस्तित्व में आई होगी यह विवाद का विषय है।

    एडीपी से एटीपी बनाने का काम एटीपी सिन्थेज नामक एन्जाइम (उत्प्रेरक) करता है। सारे एन्जाइम की तरह यह भी प्रोटीन अणुओं से बना है। पर इसकी खासियत है कि यह एक जटिल मशीन की तरह काम करता है- शाब्दिक अर्थों में मशीन की तरह। इसका एक हिस्सा झिल्ली में फंसा स्थिर होता है। दूसरे हिस्से में घूमने वाले घटक होते हैं जो फिर अन्य घटकों को खास तरह से खोलते और बन्द करते हैं। एडीपी और फास्फेट समूह इन खुलने और बन्द होने वाले खांचों में घुसते हैं और एटीपी के रूप में बाहर निकलते हैं। इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि घूमने वाले घटक प्रोटीन को घुमाने का काम प्रोटान करते हैं जो झिल्ली से बाहर होते हैं। एक जटिल प्रक्रिया के तहत पानी के अणु को तोड़कर हाइड्रोजन को अलग कर दिया जाता है। फिर इसके भी घटक प्रोटान और इलेक्ट्रान अलग कर दिये जाते हैं। इलेक्ट्रान झिल्ली में फंसे प्रोटीन अणुओं की एक श्रृंखला से गुजरते हैं और ऐसा करते हुए प्रोटान को झिल्ली से बाहर भेज दिया जाता है। अब झिल्ली के बाहर प्रोटान की ज्यादा संख्या की वजह से बाहर-भीतर काफी बड़ा विभवान्तर पैदा हो जाता है (आसमानी बिजली जितनी शक्ति वाला)। इसी विभवान्तर की वजह से जब प्रोटान एटीपी सिन्थेज से गुजरता है तो उसे घुमा देता है। और इसके घूमने से पूरी मशीन गतिमान हो जाती है तथा एडीपी एटीपी में बदलने लगता है। यहां जिस झिल्ली की बार-बार चर्चा है वह है प्रोकार्योटिक कोशिकाओं में माइटोकान्ड्रिया की झिल्ली। (आजकल यूट्यूब पर एटीपी सिन्थेज की क्रिया का अच्छा एनिमेशन मौजूद है जो काफी रोमांचक है।)

    जीवों में हाइड्रोजन के परमाणु की भौतिक संरचना का ऊर्जा के सिक्के को ढालने में यह इस्तेमाल अद्भुत है। अचरज नहीं कि वैज्ञानिक आज भी इस प्रक्रिया की उत्पत्ति पर इतने आश्चर्यचकित हैं। यह प्रक्रिया इस बात का अच्छा उदाहरण है कि कैसे उद्भूत गुण अस्तित्व में आते हैं।

    उद्भूत गुण प्रकृति की आम विशेषता हैं। यह अजैविक जगत, जैविक जगत तथा मानव समाज सब जगह देखने को मिलता है। गैसों के उसी गुब्बारे से सूरज भी बना तथा आठों ग्रह और उनके उपग्रह भी। फर्क बस गैसों की मात्रा का रहा। मानव समाज की बात करें तो जब फासीवादी लंपटों की भीड़; भीड़ हत्या करती है; तब लंपटों का समूह वह कर रहा होता है जो अकेला लंपट शायद न करे। कम से कम आम लोगों की भीड़ जब ऐसा करती है तब तो यही होता है।

    जैव जगत में यह हर स्तर पर देखने को मिलता है। आज से करीब पौने चार सौ करोड़ साल पहले जीवन के बुनियादी अणु अस्तित्व में आये और फिर बैक्टीरिया और आर्किया के रूप में जीवन की शुरुआत हो गई। फिर करीब दो सौ करोड़ साल पहले यूकार्योटिक कोशिकाएं अस्तित्व में आयीं। इनसे फिर करीब एक सौ करोड़ साल पहले बहुकोशिकीय जीवों की शुरुआत हो गई जो आज से करीब बीस लाख साल पहले मानव तथा अंत में करीब तीन लाख साल पहले आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स) तक पहुंचा। हर स्तर पर नये-नये गुण उद्भूत होते रहे। इसके अंतिम उत्पाद आधुनिक मानव ने तो स्वयं को इतना विशिष्ट माना कि खुद को स्वयं ईश्वर की अनुकृति घोषित कर दिया। अब विज्ञान बता रहा है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। कि इंसान उन्हीं भौतिकी, रासायनिक और जीव वैज्ञानिक नियमों का उत्पाद है जिनसे बाकी जीव पैदा हुए हैं। ईश्वर आधुनिक मानव की अनुकृति है यानी इंसान ने अपनी कल्पना में अपने जैसा ही ईश्वर गढ़ लिया और फिर उसके जिम्मे वह सब मढ़ दिया जो दरअसल प्राकृतिक नियमों का उत्पाद है।

    पुराने किस्म के कवि हृदय लोग अभी भी मासूमियत से सवाल करते हैं कि फूल क्यों खिलते हैं और भौंरे क्यों गुनगुनाते हैं? विज्ञान का यह खुरदरा सा जवाब है कि ये भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के आम नियमों का परिणाम हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि यह सवाल और उसे करने वाले उन्हीं आम नियमों के परिणाम हैं। पर विज्ञान के इस खुरदरे जवाब से फूलों की खूबसूरती कम नहीं हो जाती क्योंकि इंसान को फूलों की खूबसूरती का एहसास भी उन्हीं नियमों का परिणाम है, ठीक उसी तरह जैसे इंसान द्वारा विज्ञान के खुरदरे जवाब तक पहुंचना। इसी वजह से यह संभव होता है कि वैज्ञानिक खुरदरा सा जवाब देते हैं और खूबसूरती का लुत्फ भी उठाते हैं।

    उद्भूत गुणों की जय हो!                                                                                                                ऽऽऽ


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें