शिक्षा जगत
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025
एक तीर से कई निशाने
महेन्द्र
मोदी सरकार के केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के द्वारा 15 दिसंबर, 2025 को लोकसभा में एक विधेयक पेश किया गया। इस विधेयक का नाम ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025’ है। पहले इसका नाम ‘भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’ था। तब इसका काफी विरोध हुआ था। नाम बदलने के लिए मोदी सरकार पहले से ही कुख्यात है। नामों को बदलकर ये यह संदेश देना चाहते हैं कि अब भारत देश का काया कल्प होने वाला है। ये एक अच्छा नाम या मुस्लिम नाम की जगह हिंदू नाम या फिर आक्रामक नाम की जगह शाकाहारी नाम रखने से जनता को भ्रम में डालना चाहते हैं। इस विधेयक का नाम बदलने के पीछे भी इनकी यही रणनीति है। इस विधेयक का नाम बदल कर ये यह भ्रम पैदा करना चाहते हैं कि अब भारत विकसित होने वाला है। लेकिन नाम बदलने के पीछे एक प्रमुख कारण यह भी है कि ये अपने काले और खतरनाक मंसूबों को खुल कर पेश करने से डरते हैं। इसीलिये ये एक सुंदर नाम अपनी हर हरकत को देने पर मजबूर हैं।
खैर अगर इस विधेयक की बात की जाए तो इसे मोदी सरकार की कैबिनेट ने पास कर लोक सभा में रख दिया है। फिलहाल यह संयुक्त संसदीय समिति (जे.पी.सी.) के पास भेज दिया गया है।
अब तक भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था अलग-अलग संस्थानों द्वारा निर्देशित और वित्त पोषित होती आई है। जैसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी); सामान्यतः (गैर-तकनीकी) उच्च शिक्षा को देखता है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा आयोग (एआईसीटीई); इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा संभालता है। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई); शिक्षक ट्रेनिंग और शिक्षकों की शिक्षा का काम देखता है। लेकिन इस विधेयक मंे इन सबकों भंग कर एक एकल नियामक (सुपर रेगुलेटरी) आयोग बनाने का प्रस्ताव है।
एक और झूठ जो इस मामले में बोला जा रहा है वह यह है कि यह विधेयक राष्ट्रीय शिक्षा नीति (नेप) में प्रस्तावित सुझाव है। असल बात यह है कि मोदी सरकार उच्च शिक्षा का केंद्रीकरण करने और सारी शक्ति केंद्र के हाथों में रखने वाले विधेयक को 2018 में भी रख चुकी है। तब पेश भारतीय उच्च शिक्षा आयोग विधेयक में केवल उच्च शिक्षा आयोग को बदलने का प्रावधान था। एआईसीटीई और एनसीटीई को उस माडल में शामिल नहीं किया गया था। बल्कि उनके अध्यक्षों को आयोग का सदस्य बनाए जाने का प्रावधान था। लेकिन मौजूदा विधेयक और भी खतरनाक मंसूबों से भरा पड़ा है। इस विधेयक को अगर राजनीतिक-आर्थिक नज़र से देखें तो यह सिर्फ़ ‘‘टेक्निकल रेगुलेटर रिफार्म’’ नहीं, बल्कि पूरे उच्च शिक्षा के चरित्र को बदलने वाली कुटिल चाल है। यह अब तक के हासिल पर मिटटी डालना है। यह केंद्रीकरण (जो मोदी सरकार का मुख्य एजेण्डा है) बाज़ारीकरण (जिसके लिए संघ भाजपा को एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग द्वारा सत्ता में बैठाया गया है) और संघ-भाजपा के फासीवादी वैचारिक नियंत्रण तीनों को एक साथ साधने का यंत्र है। यह कार्यपालिका का उच्च शिक्षा पर हावी होने का एक दस्तावेज है। यह शैक्षणिक स्वतंत्रता की हत्या करता है और कमजोर सामाजिक-आर्थिक समूहों के छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा से बाहर करने की परियोजना है।
उच्च शिक्षा संस्थानों पर दंडः नियामक परिषद कानून के उल्लंघन के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों पर दंड लगा सकती है। दंड 10 लाख रुपए से 70 लाख रुपए तक हो सकता है। नियामक परिषद केंद्र या राज्य सरकारों को निम्नलिखित सुझाव भी दे सकती हैः (प) दोषी व्यक्ति को नौकरी से हटाना (पप) उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता के स्तर की समीक्षा और संशोधन करना (पपप) अनुदान रोकना (पअ) डिग्री प्रदान करने के अधिकार में संशोधन करना (अ) संबद्धता रद्द करना या (अप) उच्च शिक्षा संस्थान को बंद करने का आदेश देना। पूर्व अनुमति के बिना विश्वविद्यालय की स्थापना कम से कम दो करोड़ रुपए से दंडनीय होगी। नियामक परिषद केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित तरीके से एक अधिनिर्णय (एडजुडिकेटरी) तंत्र स्थापित करेगी।
केंद्रीकरण और संघीय ढांचे पर हमला - सरकार और चाटुकार मीडिया के प्रचार से यह प्रतीत होता है कि यह बिल एकरूपता लाने का प्रयास है। लेकिन असल में यह केंद्र सरकार को असीमित शक्तियां प्रदान कर केंद्रीकरण को बढ़ावा देता है, जिससे राज्यों की स्वायत्तता खतरे में पड़ जाती है। विधेयक केंद्र को नीतिगत निर्देश जारी करने, अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति करने तथा आयोग या परिषदों को भंग करने का अधिकार देता है, जो निर्णय-प्रक्रिया को पूरी तरह केंद्रीकृत कर देता है। एक शीर्ष नकाय के माध्यम से विनियमन, प्रत्यायन और मानक निर्धारण को एकीकृत कर तीन स्वतंत्र परिषदें बनाने का प्रावधान राज्य-विशिष्ट विविधताओं को नजरअंदाज करता है। जिससे 80 प्रतिशत नामांकन वाले राज्य विश्वविद्यालय केन्द्र सरकार के इशारों पर चलने पर मजबूर कर दिये जायेंगे। 10 लाख से 2 करोड़ तक जुर्माने की भारी दंड व्यवस्था साफ-साफ यह संकेत दे देती है कि राज्यों, खासकर विपक्षी पार्टियों की सरकारों को केन्द्र यानी मोदी सरकार के हिसाब से ही चलना होगा। यह ईडी, सीबीआई की धमकी/कार्यवाही से कहीं ज्यादा खतरनाक है। इसके अलावा अनुदान रोकना या संस्थान बंदी केंद्र के इशारों पर राज्यांे को चलाने का हथियार नहीं बनेंगी तो और क्या होगा?
शिक्षा समवर्ती सूची का विषय होने के बावजूद, विधेयक में राज्य प्रतिनिधित्व न्यूनतम रखा गया है। जिससे राज्य उच्च शिक्षा परिषदें अप्रासंगिक हो जाएंगी और केंद्र-राज्य विवाद बढ़ेंगे। जो कुछ भी हो इसका सबसे ज्यादा असर हाशिये के छात्रों पर होगा।
कैसे यह विधेयक सार्वजनिक शिक्षा के स्थान पर शिक्षा के निजीकरण को बढ़ाता है- बिल का ढांचा नेप की उस सोच से जुड़ता है जहाँ विश्वविद्यालय को मुख्यतः ‘‘रोजगारपरकता’’ और ‘‘कौशल’’ पैदा करने वाली फैक्ट्री की तरह देखा जाता है, जबकि आलोचनात्मक, मानवीय और राजनीतिक शिक्षा पीछे धकेली जाती है। इससे उच्च शिक्षा को सीधे कारपोरेट सेक्टर की मांगों के मुताबिक ढालने का षड़यंत्र उजागर होता है। 2020 का नेप का दस्तावेज पहले ही ‘‘फिलांथ्रोपिक प्राइवेट’’ और ‘‘फंडिंग में विविध स्रोत’’ जैसे आइडिया के ज़रिये उच्च शिक्षा को पूंजीपतियों के हवाले करने की पूर्वपीठिका दर्ज कर चुका है। और अब यह विधेयक इस बात को और पक्का कर देता है।
यह प्राइवेट संस्थान को उच्च फीस, लोन आधारित शिक्षा और ‘‘सेवा’’ की जगह ‘‘प्रोडक्ट’’ माडल की तरफ और तेज़ी से जाने का रास्ता सुगम करता है।
वैचारिक नियंत्रण और अकादमिक स्वतंत्रता- एक केंद्रीकृत नियामक संस्था के पास पाठयक्रम, मानक और मान्यता की चाबी होने से सरकारों के लिए असहमति, वैचारिकी, लिंग, जाति, वर्ग, और सांप्रदायिकता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर दबाव डालना व अपने मनमुताबिक बातों व तथ्यों को पेश करना सरल हो जाता है, भले बिल की भाषा ‘‘गुणवत्ता’’ और ‘‘राष्ट्रीय हित’’ की हो। मान्यता और फंडिंग (भले अप्रत्यक्ष) को कंट्रोल करने का मतलब यह भी है कि ‘‘अनचाहे’’ रिसर्च टापिक, विरोधी राजनीतिक आवाज़ें, या छात्र-शिक्षक आंदोलन को ‘‘अनुशासन’’ के नाम पर टारगेट किया जा सकता है।
कौन से संस्थान बंद किये जायेंगे?- ऐसे संस्थान जो अच्छा परिणाम नहीं दे रहे हैं, जो ‘‘कम प्रर्दशन’’ कर रहे हैं, वे बंद कर दिये जायेंगे। लेकिन हरेक कम प्रदर्शन करने वाले संस्थान सरकार की काहिली के कारण ही कम प्रदर्शन करते हैं। क्योंकि उन्हें फंड नहीं मिलता। गांवों में चलने वाले कालेज, महिला कालेज, अल्पसंख्यक संस्थान और गरीब क्षेत्रों के राज्य विश्वविद्यालय और कालेज इसका शिकार होंगे। यह गौर करने वाली बात है कि ये ही वे संस्थान हैं जो भारत देश की बहुसंख्यक आबादी को उच्च शिक्षा का स्वाद चखाते हैं। उदारीकरण के इस दौर मंे ऐसे संस्थानों को बजट न देकर मरने के लिए छोड़ दिया गया। और अब यह विधेयक इनकी कब्र पर पत्थर रखने का काम करेगा। एक झटके में यह भारत की एक बड़ी आबादी को यह बतायेगा कि तुम इसलिए उच्च शिक्षा नहीं ले सकते क्योंकि तुम्हारा संस्थान कमजोर है।
इस आयोग के गठन के बाद ऐसा हो सकता है कि महानगरों में कुछ संस्थान फल-फूल सकते हैं, जिन्हें राज्य या केन्द्र का भरपूर सहयोग मिल रहा हो। लेकिन हजारों गांव-देहातों के संस्थानों के बंद होने और उनकी कब्र पर ही ऐसे संस्थान खड़े होंगे।
अगर विरोध नहीं करेंगे तो उच्च शिक्षा को नहीं बचा पायेंगे- इस विधेयक को पेश करने के बाद सरकार बिना सहमति के आगे बढ़ने पर तुली हुई है। यह विधेयक दशकों के संघर्ष के बाद हासिल किए गए सार्वजनिक शिक्षा के सामाजिक अधिकार को खत्म करने पर आमादा है। इस विधेयक का शिकार आम मेहनतकश छात्र-छात्रा होंगे, जिनके लिए शिक्षा गरीबी से बाहर निकलने का एक कमजोर जरिया है। इसका सीधा असर ग्रामीण युवाओं पर पड़ेगा, जिनके कालेज पहले से ही अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसका असर छात्राओं पर पड़ेगा, जो सबसे बाद में गिनती में आती हैं। इसका असर ग्रामीण, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ेगा, जिनके लिए सार्वजनिक विश्वविद्यालय गतिशीलता और अभिव्यक्ति के दुर्लभ स्थान है। इसका असर अस्थिर रूप से कार्यरत शिक्षकों पर पड़ेगा, जिनकी आजीविका आदेशों का पालन करने पर निर्भर करती है। और इसका असर उन सभी सरकारी संस्थानों पर पड़ेगा जिनका राजनीतिक प्रभाव नहीं है।
इसलिए, इस विधेयक का विरोध करना विश्वविद्यालयों को मोदी सरकार की प्रशासनिक चैकियों में परिवर्तित करने के प्रतिरोध का कार्य है। सार्वजनिक शिक्षा के नवउदारवादी माडल का प्रतिरोध है। और स्वयं ज्ञान पर सत्ताधारियों के कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध का एक निशान है।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक की खास बातें
इसके तहत उच्च शिक्षा के लिए सर्वोच्च रेगुलेटरी निकाय के रूप में विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (आयोग) की स्थापना की गई है। आयोग में निम्नलिखित तीन परिषदें होंगीः (1) नियामक परिषद, जो उच्च शिक्षा के लिए एक सामान्य रेगुलेटर के रूप में कार्य करेगी। (2) प्रत्यायन परिषद, जो प्रत्यायन, यानी एक्रेडेशन प्रणाली की देखरेख करेगी। (3) मानक परिषद, जो शैक्षणिक मानकों का निर्धारण करेगी।
आयोग के कार्यों में निम्नलिखित शामिल हैंः (1) उच्च शिक्षा और अनुसंधान के लिए रणनीतिक दिशा प्रदान करना। (2) उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआईज़) को बड़े बहु-विषयक शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों में बदलने के लिए एक रोडमैप विकसित करना। (3) शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए योजनाओं का सुझाव देना।
वर्तमान में यूजीसी विश्वविद्यालयों और कालेजों को अनुदान भी देता है। विधेयक के तहत, आयोग या उसकी परिषदों के पास उच्च शिक्षा संस्थानों के वित्तपोषण के संबंध में कोई अधिकार नहीं होंगे।
परिषदों की संरचना: प्रत्येक परिषद का नेतृत्व एक अध्यक्ष करेगा और परिषद में अधिकतम 14 सदस्य होंगे। परिषदों के अध्यक्ष उच्च शिक्षा या अनुसंधान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित और प्रख्यात व्यक्ति होंगे और उनके पास कम से कम 10 वर्षों का प्रोफेसर के समकक्ष अनुभव होना अनिवार्य है। परिषदों के सदस्यों में प्रख्यात विशेषज्ञ, केंद्रीय उच्च शिक्षा विभाग द्वारा नामित एक सदस्य और अन्य दो परिषदों द्वारा नामित सदस्य शामिल होंगे। नियामक परिषद और मानक परिषद में राज्य सरकारों द्वारा बारी-बारी से एक-एक नामित सदस्य भी शामिल होंगे।
परिषद के अध्यक्षों और पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक खोज एवं चयन समिति की अनुशंसाओं के आधार पर की जाएगी। समिति में दो प्रख्यात विशेषज्ञ और केंद्र सरकार के उच्च शिक्षा सचिव शामिल होंगे। प्रख्यात विशेषज्ञों में से एक समिति का नेतृत्व करेगा।
आयोग की संरचना: आयोग में एक अध्यक्ष और 12 सदस्य होंगे। अध्यक्ष की नियुक्ति मानद क्षमता में की जाएगी। आयोग के सदस्यों में शामिल होंगेः (1) तीनों परिषदों के अध्यक्ष (2) केंद्र सरकार के उच्च शिक्षा सचिव (3) पांच प्रख्यात विशेषज्ञ (4) राज्य के उच्च शिक्षा संस्थानों के दो प्रख्यात शिक्षाविद। अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार की अनुशंसाओं पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
सेवा की शर्तें: आयोग के अध्यक्ष और परिषदों के अध्यक्षों की नियुक्ति प्रारंभ में तीन वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी, जिसे पांच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। आयोग और परिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति तीन वर्ष के लिए की जाएगी। ये सभी सदस्य एक और कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्ति के पात्र होंगे। इसके अतिरिक्त, आयोग के अध्यक्ष को छोड़कर सभी मामलों में आयु सीमा 70 वर्ष होगी। राज्य सरकारों द्वारा नियामक एवं मानक परिषदों के लिए नामित व्यक्तियों की नियुक्ति एक वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी। केंद्र सरकार वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें निर्धारित करेगी। आयोग के प्रत्येक नये नियम के लिए केन्द्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। ऽऽऽ
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