सोमवार, 29 जून 2026

हमारा कहना है

साम्राज्यवाद का नाश हो !

‘‘साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी के अलावा कुछ नहीं। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ न्यायालय एवं कानून का कत्ल करते हैं बल्कि भयंकर हत्याकांड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग जैसे खौफनाक अपराध भी करते हैं।’’ - शहीद भगत सिंह

अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने वेनेजुएला पर 3 जनवरी को सैनिक हमला किया। हमले में सैकड़ों लोगों के मारे जाने की बातें सामने आई हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस का अपहरण कर लिया। ड्रग माफिया आदि से संबंध की जो कहानी बनाई गई उसके इतर सब यह सच्चाई जानते हैं कि यह हमला वेनेजुएला के तेल स्रोतों पर कब्जे के लिए था। यह हमला वेनेजुएला के प्राकृतिक संसाधनों पर डाकेजनी के लिए है। निकोलस मादुरो, अमेरिकी साम्राज्यवादी तेल कंपनियों के बजाय अपने हितों के लिए वेनेजुएला के खनिज तेल का दोहन कर रहे थे। मादुरो अमेरिकी साम्राज्यवादियों के बजाय चीनी-रूसी साम्राज्यवादियों से करीबी संबंध बनाए हुए थे। अंतरराष्ट्रीय कानून और न्यायालय के नियमों के खिलाफ यह अमेरिकी खूनी हमला था। अमेरिकी साम्राज्यवादी और उनके लगुए-भगुए इन अंतरराष्ट्रीय कानूनों को जब-तब तोड़ते-मरोेड़ते रहे हैं।

साम्राज्यवादी गुलामी (उपनिवेशवाद) के दौर में 23 मार्च के शहीदों (भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु) ने शोषण, हत्याकांड, युद्ध का कारण साम्राज्यवाद को बताया था। साम्राज्यवाद की सटीक व्याख्या लेनिन ने ‘‘साम्राज्यवाद: पूंजीवाद की चरम अवस्था’’ में की। संभवत 23 मार्च के शहीद इससे परिचित रहे हों। साम्राज्यवादी लूट ने दो विश्व युद्धों की विभीषिका को मेहनतकश जनता पर थोपा। आज एक ओेर अमेरिकी साम्राज्यवादी हैं जो रूस-यूक्रेन युद्ध, फिलिस्तीन पर ढाये जा रहे इजरायली नरसंहार के मुख्य जिम्मेदार हैं। वहीं दूसरी तरफ चीनी-रूसी साम्राज्यवादी अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं। वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड (डेनमार्क का हिस्सा), ईरान आदि देशों को अमेरिकी साम्राज्यवादियों की धमकी प्रत्यक्ष है।

साम्राज्यवाद को पीछे धकेलने में दुनिया की मेहनतकश जनता के संघर्षों की महती भूमिका रही है। रूस-चीन की मेहनतकश जनता द्वारा समाजवाद की स्थापना इसका एक रूप था। भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों में चले राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों ने भी साम्राज्यवाद को पीछे धकेला। इससे प्रत्यक्ष-परोक्ष गुलामी के तमाम साम्राज्यवादी प्रयास धराशाही होते रहे हैं। रूस-चीन में समाजवादी व्यवस्था की वक़्ती पराजय ने पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को चुनौती मुक्त कर दिया। लूट के लिए पिछड़े देशों के शासकों को अपने प्रभाव में रखने की नीति पर साम्राज्यवादी चल रहे हैं।

आज जब पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया चहुंओर संकटग्रस्त हो रही है तो साम्राज्यवादियों के बीच कलह बढ़ रही है। शासक इस संकट का बोझ मेहनतकश जनता के ऊपर डालने में लगे हैं। मामूली से मामूली रियायतों को जनता से छीना जा रहा है। पूंजीवादी शासकों से लेकर साम्राज्यवादी इसी राह पर हैं। जनता पर सारा बोझ डालने के मामले में देशी शासकों से लेकर साम्राज्यवादी लुटेरों तक कोई फर्क नहीं है।

वेनेजुएला के हालिया मामले में भी यह जाहिर है। फिलहाल वेनेजुएला के शासक अमेरिकी आक्रामकता के दबाव में हैं। तेल-गैस पर अमेरिकी नियंत्रण को रोकने में असमर्थ हैं। मादुरो के बाद सत्ता संभालने वाले नेता अमेरिका को अपने तेल भंडार समर्पित भी कर रहे हैं। चीनी-रूसी साम्राज्यवादी अमेरिकी साम्राज्यवादियों से वेनेजुएला पर सीधे नहीं उलझ रहे हैं। जहां एक ओर दुनिया के तमाम देशों ने वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले की निन्दा की है वहीं अमेरिका परस्त भारतीय शासकों ने अमेरिका के खिलाफ कुछ भी बोलने से परहेज किया। अमेरिका समेत तमाम देशों में छात्रों-युवाओं-मेहनतकशों ने सड़कों पर उतर अमेरिकी आक्रामकता का विरोध किया है।

आज भले ही अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सीधे निशाने पर वेनेजुएला, ईरान, ग्रीनलैंड हैं पर टंªप टैरिफ के निशाने पर भारत समेत तमाम देश आते रहे हैं। कल को भारत समेत कोई भी गरीब देश साम्राज्यवादियों के निशाने पर आ सकता है। ऐसे में साम्राज्यवाद और उसके सहयोगी बने देशी पूंजीवादी शासकों से संघर्ष सभी मेहनतकशों, छात्रों-युवाओं का दायित्व है। भगत सिंह के दिखाये इंकलाब के रास्ते पर चलकर ही यह संघर्ष लड़ा जा सकता है।       

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें