उत्तराखंड पेपर लीक
छात्र आंदोलन के आगे झुकी सरकार
-महेश
21 सितंबर 2025 को UKSSSC (उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग) ने स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा ग्रेजुएट लेवल के 416 पदों के लिए पटवारी, लेखपाल आदि पदों की परीक्षाएं आयोजित की। परीक्षाएं शुरू होने के आधे घंटे बाद ही निजी ट्रस्ट के तहत आने वाले आदर्श बाल सदन इंटर काॅलेज हरिद्वार से पेपर लीक की घटना सामने आ गई। छात्र अन्दर परीक्षा केन्द्रों में परीक्षा दे रहे थे। बाहर सोशल मीडिया में पेपर लीक की खबरें दौड़ रही थी। छात्र परीक्षा देकर बाहर आए तो इसने छात्रों को आक्रोशित कर दिया।
22 सितंबर को देहरादून के परेड ग्राउंड में हजारों छात्र अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जाते हैं। यह आक्रोश पूरे राज्यभर में फैल गया। 25 सितंबर से हल्द्वानी में अनिश्चितकालीन धरने प्रदर्शन सहित भूख हड़ताल शुरू कर दी गई। छात्रों ने ‘पेपर चोर, गद्दी छोड़’ ‘हम करें पढ़ाई, हाकम खाए मलाई’ जैसे नारे दिए। छात्रों की मांग साफ थी 21 सितम्बर पेपर लीक और पुराने मामलों की सीबीआई जांच कराई जाए। इस पेपर को निरस्त कर दोबारा करवाया जाए। UKSSSC/UKPSC (उत्तराखंड लोक सेवा आयोग) जैसे आयोग के गठन में पारदर्शिता लाई जाए।
छात्रों के इस न्यायपूर्ण आंदोलन को उत्तराखंड सरकार ने तमाम तरह से बदनाम करने की कोशिश की। पहले पुष्कर सिंह धामी, आयोग के अध्यक्ष और भाजपा समर्थक ‘पेपर लीक नहीं है’ की बात बोलते रहे। छात्र अपने संघर्ष में डटे रहे। फिर ‘पेपर के तीन पन्ने बाहर आए हैं’ की बात स्वीकारने लगे। इसे उन्होंने पेपर लीक के बजाय नकल का मामला बताया। फिर इसे ‘पेपर जिहाद’ कहने लगे। तमाम हमलों का मुकाबला करते हुए छात्रों का राज्य भर में विरोध प्रदर्शन जारी रहा। छात्रों को नहीं दबते देख मुख्यमंत्री पुष्कर धामी 25 सितंबर को SIT (स्पेशल इन्वेस्टिंग एजेंसी) की जांच करने को तैयार हुए। आंदोलनकारी छात्र जानते थे सरकार की SIT जांच एक झुनझुना है। तब भी छात्रों ने सरकार द्वारा नियुक्त जस्टिम बीएस वर्मा की जगह SIT के लिए पूर्व जज यूसी ध्यानी को पर्यवेक्षक नियुक्त करने का दबाव बनाया।
भाजपा ने अपने समर्थकों से साफ सुथरी परीक्षा करवाने के लिए सरकार का धन्यवाद अदा करवाया। इसके समर्थन में प्रदर्शन आयोजित करवाए। एक असिस्टेंट प्रोफेसर को निलंबित किया। तथाकथित आरोपी बनाये गये खालिद की दुकान पर बुलडोजर चलाया। परीक्षा केंद्र के सेक्टर मजिस्ट्रेट को निलंबित किया।
पिछले 10-12 सालों से केंद्र में बैठी मोदी सरकार के आने के बाद यह पहली घटना है जहां कोई मुख्यमंत्री छात्रों की मांग के आगे धरना स्थल पर आकर मांगें मानने और लिखित में देने पर मजबूर हुआ। यह छात्र आंदोलन की बड़ी जीत है। साथ ही यह भविष्य के संघर्षों के लिए भी एक संदेश है।
मुख्यमंत्री धामी 2024 में ‘नकल रोकथाम कानून’ लेकर आए थे। दावा किया कि देश का पहला कठोर और सख्त नकल विरोधी कानून उत्तराखंड ने पारित किया। कानून से न नकल ने रुकना था, न रूकी। बल्कि एक मायने में नकल माफियाओं और सरकार का गठजोड़ ज्यादा गहरा हो गया।
पेपर लीक की घटनाएं देशव्यापी परिघटना बन चुकी हैं। साफ सुथरी परीक्षाएं कराना आज सरकारों के बस की बात नहीं रह गई है। पिछले 5 सालों में देश में लगभग 70 से अधिक पेपर लीक हुए हैं। भयावह बेरोजगारी के संकट में लाखों रुपए में पेपर लीक कर बेचे जाने का आधार है। मंत्रियों-अधिकारियों की सहमति के बिना पेपर लीक होना संभव नहीं है। सरकारी तंत्र, नकल माफिया आदि के गठजोड़ से आम छात्र अपने आप को ठगा महसूस करता है।
पेपर कराने वाले आयोग के पास में अपने स्थाई कर्मचारी तक नहीं हैं। वह बाहर की कंपनियों को ठेका देकर पेपर करवाते हैं। अन्य संसाधनों का अभाव बनाकर रखा जाता है जिससे परीक्षा ईमानदारी से होना संभव ही नहीं रह जाता है।
छात्र संघर्ष से सरकार SIT के आधार पर परीक्षा रद्द कर पुनः परीक्षा के लिए व मामले की सीबीआई जांच कराने को मजबूर हुई। वर्तमान में सीबीआई जांच जारी है। देखना होगा कि सीबीआई असली गुनहगारों को पकड़ पाती है या नहीं।
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