सोमवार, 29 जून 2026

व्यक्तित्व

वाल्टर रोड्नी: एक क्रांतिकारी बुद्धिजीवी

मेहराज

‘‘23 मार्च’’ का हमारे देश के इतिहास में विशिष्ट स्थान है। यह विशिष्ट स्थान शासकों के लिये भले ही न हो परन्तु आम भारतीयों व क्रांतिकारियों के लिए तो है ही। ‘‘23 मार्च’’ की जब भी चर्चा होती है तो हमारी आंखों के सामने फांसी चढ़ते, ‘‘इंकलाब जिन्दाबाद!’’ ‘‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!’’ का नारा लगाते हुए भगत सिंह और उनके साथी राजगुरू व सुखदेव की तस्वीरें नाच उठती हैं।

ऐसे ही हमें ‘‘23 मार्च’’ इसलिए भी याद आता है कि इस दिन शहीद भगत सिंह को अपना आदर्श मानने वाले इंकलाबी कवि अवतार सिंह ‘पाश’ भी शहीद हुए थे। 23 मार्च 1988 को खालिस्तानी आतंकवादियों ने पाश की निर्मम ढंग से हत्या कर दी थी। पाश शहीद हो गये और उनकी इंकलाबी कविताएं सताये हुए लोगों को राह दिखाने लगीं।

‘‘23 मार्च’’ का संबंध दुनिया के एक मशहूर क्रांतिकारी बुद्धिजीवी वाल्टर रोड्नी से भी है। वाल्टर रोड्नी हमारे देश से हजारों मील दूर एक देश गुयाना में इसी दिन जन्मे थे। वाल्टर रोड्नी का जन्म 23 मार्च 1942 को गुयाना की राजधानी जार्जटाउन में एक मेहनतकश परिवार में हुआ था। उनके पिता एक दर्जी थे। और उनकी मां भी सिलाई का काम करती थीं। मेहनतकश परिवार में जन्मे वाल्टर रोड्नी का जीवन भर मजदूर-मेहनतकशों से जीवंत सम्बन्ध बना रहा। और ठीक इसी कारण से उनकी निर्मम हत्या भी कर दी गयी थी।

वाल्टर रोड्नी का जन्म गुलाम गुयाना में हुआ था। गुयाना उस समय हमारे देश की तरह अंग्रेजों का गुलाम था। ब्रिटिश उपनिवेशवादी जिस तरह भारत का भीषण शोषण-दमन कर रहे थे, ठीक उसी तरह गुयाना का भी कर रहे थे। भारत की तरह गुयाना भी अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था। भारत में, 1942 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए, ‘‘भारत छोड़ो’’ (‘क्विट इण्डिया मूवमेंट’) आन्दोलन चल रहा था। ठीक उसी तरह गुयाना भी अपनी आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था। वाल्टर के पिता ‘पीपुल्स प्रोग्रेसिव पार्टी’ (च्च्च्) से जुड़े हुए थे। यह पार्टी गुयाना के बहुरंगी समाज का प्रतिनिधित्व करती थी। यह पार्टी ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल (ब्रिटिश कामनवेल्थ) से बाहर एक ऐसे राष्ट्र का ख्वाब देखती थी जो हर मामले में स्वतंत्र हो। इस तरह से वाल्टर रोड्नी का बचपन घोर राजनैतिक माहौल में बीता था।

गुयाना और हमारे देश में यही समानता थी कि उस वक्त हम दोनों ही देश ब्रिटिश उपनिवेशवाद से शोषित-पीड़ित थे। यह भी एक खास बात थी कि यहां की आबादी में भारतीय मूल के लोगों का बहुमत है। हमारे देश से हजारों हजार आदमियों को ‘गिरमिटिया मजदूरों’ के रूप में गुलाम बनाकर (गिरमिटिया-एग्रीमेंट लेबर (एग्रीमेंटिया) का अपभ्रंश से बना था) ले गये थे। आज भी गुयाना का सबसे बड़ा समुदाय भारत से लाये गये लोगों से बना हुआ है। (कृपया बाक्स देखें)

वाल्टर रोड्नी का देश बहु नृजातीय व धार्मिक समूहों से मिलकर बना है। वाल्टर रोड्नी की पक्षधरता किसी नृजातीय या धार्मिक समूह के प्रति न होकर गुयाना के मजदूरों-मेहनतकशों के प्रति थी।

वाल्टर रोड्नी की प्रारम्भिक शिक्षा जार्जटाउन में हुयी थी। गुयाना में उच्च शिक्षा पाने का मौका हर किसी को नहीं मिलता था। एक मेहनतकश परिवार का बच्चा तो उच्च शिक्षा, अपने दम पर हासिल तभी कर सकता है, जब वह पढ़ने में अव्वल हो और किसी तरह की स्कालरशिप हासिल कर लें। वाल्टर ने इसी तरह स्कालरशिप हासिल कर जार्जटाउन के क्वींस कालेज में शिक्षा हासिल की। इस तरह के विद्यार्थियों को ‘‘स्कालरशिप बाॅय’’ के नाम से जाना जाता था। इसके बाद वे अपनी मेहनत के बल पर एक और स्कालरशिप हासिल करने में सफल रहे। और इस तरह उन्होंने 1963 में जमैका के एक विश्वविद्यालय (यूनिवर्सिटी काॅलेज आफ वेस्ट इण्डीज) से प्रथम श्रेणी में इतिहास में आॅनर्स की डिग्री हासिल की। 24 साल की उम्र में उन्होंने अफ्रीका के इतिहास पर लन्दन के एक विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की।

वाल्टर रोड्नी को पहली प्रसिद्धी दासों के व्यापार पर किये गये उनके अध्ययन व लेखन में मिली। ‘स्लेव ट्रेड आन दि अपर गुयाना कोस्ट’ 1970 में आक्सफोर्ड प्रेस से प्रकाशित हुयी। रोड्नी एक क्रांतिकारी बुद्धिजीवी के रूप में दुनिया भर में जाने जाने लगे। वे पूंजीवाद के कटु आलोचक थे। उन्होंने कहा ‘‘अफ्रीका; साम्राज्यवाद के चंगुल से समाजवाद के बैनर तले मजदूर वर्ग के नेतृत्व में ही बाहर आ सकता था।’’ उनकी बात सौलह आने सच थी।

1972 में उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘‘यूरोप ने अफ्रीका को कैसे अविकसित रखा’’ (हाउ यूरोप अण्डरडेवलप्ड अफ्रीका) प्रकाशित हुयी। इस कृति में वाल्टर रोड्नी ने ‘विकास क्या है?’ का सैद्धान्तिक प्रश्न खड़े करते हुए बताया कि यूरोप ने एक सम्भावनाशील अफ्रीकी समाज को विनाश के कगार में पहुंचाते हुए, उसके प्राकृतिक संसाधनों के दोहन व मनुष्यों के शोषण के जरिये यूरोप का विकास किया। मानव जाति के इतिहास के सबसे काले पृष्ठों में से एक दासों के व्यापार के भयानक क्रूर कारनामे को अन्जाम दिया। अफ्रीका की तबाही से यूरोप ने अपना विकास किया।

अपनी हत्या से पहले वाल्टर रोड्नी ने अनेकों महत्वपूर्ण लेख, निबन्ध व पुस्तकें लिखी। इनमें प्रमुख हंै: ‘अफ्रीका का साम्राज्यवादी विभाजन, 1970’ (ज्ीम प्उचमतपंसपेज च्ंतजपजपवद व ि।तिपबं); ‘तंजानिया उजमास एण्ड साइंटिफिक सोशलिज्म’ 1972; ‘अफ्रीका की क्रांति’ (दि अफ्रीकन रिवोल्यूशन 1972); ‘माक्र्सवाद और अफ्रीका की मुक्ति’ (माक्र्सिज्म एंड अफ्रीकन लिबरेशन); ‘तंजानिया में वर्ग अन्तरविरोध’; ‘जन की सत्ता, तानाशाह नहीं’ (पीपुल्स पावर, नो डिक्टेटर) 1979; ‘समय के चिन्ह’ (साइन आफ टाइम्स) 1980।

वाल्टर रोड्नी का जीवन उथल-पुथल से भरा रहा है। वे लगातार शासकों के निशाने पर रहे। 1968 में जमैका की सरकार ने उन्हें ‘अवांछित तत्व’ (परसोना नान ग्रेटा) घोषित कर दिया और जमैका में वापस आने पर प्रतिबंध लगा दिया। उस वक्त वे जमैका की उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे थे जिसमें उन्होंने शिक्षा पायी थी। जमैका में उनके समर्थन में व्यापक प्रदर्शन हुये। उनकी लोकप्रियता न केवल छात्रों-शिक्षकों में थी बल्कि वे मेहनतकशों में भी लोकप्रिय थे। जमैका की सरकार ने इसे ‘रोड्नी राइट्स’ (रोड्नी दंगा) की संज्ञा दी थी। सरकारी दमन में कई लोग मारे गये और सम्पत्ति का नुकसान हुआ था। छात्र-शिक्षक-मेहनतकश रोड्नी की जमैका में वापसी चाहते थे। सरकार रोड्नी को इस सबके लिये जिम्मेदार मानती थी।

वाल्टर रोड्नी महान शिक्षा विज्ञानी थे। उन्होंने उपनिवेशकालीन शिक्षा की कटु आलोचना की। उन्होंने लिखा था, ‘‘अंतिम विश्लेषण में वास्तव में औपनिवेशिक शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त पूंजीवादी व्यक्तिवाद था... अफ्रीका में, उपनिवेश के औपचारिक विद्यालयी व्यवस्था और औपचारिक नैतिक मूल्य व्यवस्था ने सामाजिक भाईचारे को नष्ट कर दिया और अलगाववादी व्यक्तिवाद के उस सबसे बुरे रूप को स्थापित किया जिसकी कोई सामाजिक जिम्मेदारी नहीं थी।’’

वाल्टर रोड्नी की बात एकदम ठीक है। जो अफ्रीका महाद्वीप के औपनिवेशिक अतीत में हुआ वही हमारे देश में औपनिवेशिक काल में शिक्षा के क्षेत्र में हुआ। मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने ऐसे कई-कई भारतीयों का निर्माण किया था जो घोर स्वार्थी और समाज के हितों के खिलाफ अंग्रेजों के साथ खड़े थे। आजादी की लड़ाई में व्यवधान डालने वाले थे।

वाल्टर रोड्नी ने 1966 से अध्यापन का कार्य शुरु किया था। 1966-1967 में उन्होंने तंजानिया के दार-ए-सलेम विश्वविद्यालय में पढ़ाया। फिर 1968 में वे जमैका में शिक्षक रहे। जमैका से निकाले जाने के बाद वे तंजानिया वापस लौट आये और वहां दार-ए-सलेम विश्वविद्यालय में पुनः अध्यापन करने लगे। 1974 तक वे तंजानिया में रहे। फिर उन्हें अपने देश गुयाना के ‘गुयाना विश्वविद्यालय’ में इतिहास का प्राध्यापक व इतिहास विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यहां फिर रोड्नी की क्रांतिकारी गतिविधियां व प्रसिद्धी आड़े आयीं। सरकार ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी और उनके पीछे पड़ गयी। वाल्टर रोड्नी ने गुयाना में ही रहने का फैसला किया। और वे ‘वर्किंग पीपुल्स एलायन्स’ (डब्ल्यू पी ए) नामक राजनैतिक संगठन में सक्रिय हो गये। यह संगठन सरकार की निरंकुशशाही के खिलाफ बेबाकी से लड़ रहा था। वे पूरे देश में घूम-घूम कर राजनैतिक प्रचार व संगठन कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण लेख लिखे और अपने विचारों को धार दी। वाल्टर रोड्नी की आवाज को दबाने के लिए सरकार षड्यंत्र रचने लगी।

11 जुलाई 1979 को वाल्टर रोड्नी को सरकारी इमारत जलाने के झूठे आरोप में उनके सात साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। गुयाना के भीतर और बाहर सभी जानते थे कि यह एक षड्यंत्र था। तानाशाह बुरन्हम की सरकार ने वाल्टर रोड्नी के संगठन के बढ़ते प्रभाव से डरकर यह षड्यंत्र रचा था। बुरन्हम सरकार द्वारा डब्ल्यू पी ए के कार्यकत्र्ताओं व नेताओं की हत्या कर दी गयी थी। मई 1980 में वाल्टर रोड्नी किसी तरह जेल से बाहर आये। उन्होंने कई सभाओं को जार्जटाउन व अन्य स्थानों पर सम्बोधित किया। उनकी जान पर खतरा मण्डरा रहा था। 2 जून 1980 को आगजनी का मुकदमा अमेरिका, इंग्लैण्ड, कैरिबियन देशों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में फिर से शुरू हुआ। जल्द ही स्पष्ट हो गया सरकार के पास कोई ठोस सबूत नहीं हैं। केस पूरी तरह झूठा है। 20 अगस्त तक के लिये अदालती कार्यवाही रोक दी गयी।

बुरन्हम की तानाशाह सरकार जो कि अमेरिकी साम्राज्यवाद की सरपरस्ती में चल रही थी, उसका मंसूबा कुछ और ही था। 13 जून, 1980 को जब वाल्टर रोड्नी अपने भाई के साथ कार में कहीं जा रहे थे तो एक बम धमाके से उनकी हत्या कर दी गयी। इस तरह गुयाना की तानाशाह सरकार ने वाल्टर रोड्नी की आवाज को हमेशा के लिए चुप कराने की कोशिश की। वाल्टर रोड्नी शहीद हो गये थे परन्तु उनका जीवन, उनका लेखन पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का एक स्रोत बन गया। इस तरह मर के भी वे अमर हो गये।

वाल्टर रोड्नी ने महज 38 साल का जीवन पाया परन्तु उन्होंने पूरी दुनिया को दिखला दिया कि एक क्रांतिकारी बुद्धिजीवी कैसा होता है।

गुयाना: एक परिचय

गुयाना दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में एक छोटा सा देश है। यहां अंग्रेजों से पहले डचों का कब्जा था। डचों ने यहां 1667 से लेकर 1815 तक क्रूर ढंग से औपनिवेशिक शासन किया। बाद में ब्रिटेन ने गुयाना पर कब्जा कर लिया।

भारत की तरह गुयाना पर भी अंग्रेजों का लम्बे समय तक (1831 से 1966 तक) कब्जा रहा। 26 मई 1966 को गुयाना आजाद हुआ। औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने के बाद वह एक तरह से नव-उपनिवेश बना रहा। 23 फरवरी 1970 को गणराज्य (रिपब्लिक) की स्थापना हुई।

गुयाना का भारत से विशेष सम्बन्ध है। विकिपीडिया के अनुसार 39.8 फीसदी लोग भारतीय मूल के हैं। इन्हें अंग्रेज जबरदस्ती गुयाना में खेतों-बागानों में कार्य करने व नहर-सड़क आदि के निर्माण के लिये लाये थे। इसी तरह भारत के अलावा अफ्रीका के अपने उपनिवेशों से गुलाम लाये गये थे। भारत के बाद यहां सबसे बड़ा समूह अफ्रीकियों (29.3 फीसदी) का है। यहां की आबादी में 63.9 फीसदी ईसाई, 24.8 फीसदी हिन्दू व 6.5 फीसदी इस्लाम को मानने वाले हैं।

वर्ष 2017 में गुयाना की करीब 41 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन जी रही थी।

2017 में गुयाना में खनिज तेल व गैस के विशाल भण्डारों का पता लगा। 11 बिलियन बैरल तेल भण्डार ने गुयाना को अंतर्राष्ट्रीय तेल व गैस बाजार में एक बड़ी भूमिका में पहुंचा दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा व बाह्मास के बाद गुयाना प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के मामले में दोनों अमेरिका महाद्वीप में चैथा स्थान रखता है।

आज गुयाना साम्राज्यवाद के साथ आर्थिक नव औपनिवेशिक सम्बन्धों में बंधा हुआ है।
                                                                                                                                                                ऽऽऽ

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