बदलना एक तानाशाह का मिट्टी के लौदे में
11 अप्रैल, 2019 का दिन सूडान के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। दर्ज हो भी क्यों नहीं। इस दिन सूडान का एक तानाशाह जो तीस सालों से अपना क्रूर शासन चला रहा था, सूडान की सत्ता छोड़ने को मजबूर हो गया। उसे सत्ता छोड़ने को मजबूर किया। देश के मजदूरों, युवाओं, औरतों और बुद्धिजीवियों ने। और 11 अप्रैल के दिन सूडान की सेना के सिपाही और आम जन एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। सड़कों पर जश्न का माहौल था और कईयों ने कहा ऐसी खुशी उन्हें अपनी जिंदगी में कभी भी नहीं मिली थी।
सूडान के तानाशाह ओमार-अल-बशीर के खिलाफ जनता का गुस्सा सालों से पनप रहा था। वह विस्फोटक रूप लेता जा रहा था। पिछले वर्ष के दिसंबर की 19 तारीख से सूडान की जनता सड़कों पर थी। पुलिस-सेना से संघर्ष के दौरान दर्जनों लोगों मारे गये और सैकड़ों को जेलों में डाल दिया गया। बशीर ने अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए वह सब कुछ किया जो कर सकता था। आपातकाल लगाकर उसने पूरे सूडान को एक जेल में बदलने की कोशिश की। और जनता ने आपातकाल का जवाब उग्र प्रदर्शनों से दिया। और जनता के सामने यह तानाशाह मिट्टी का लौदा साबित हो गया।
पिछले 4 माह से स्कूल-विश्वविद्यालय में छात्र धरने पर बेखौफ बैठ गये थे। एक तरह से स्कूल-विश्वविद्यालय जंग के मैदान बन गये। मजदूरों ने पूरे देश में हड़ताल कर दी। लाल सागर के किनारे पर स्थित सूडान बंदरगाह में भी हड़ताल के कारण काम-काज ठप्प हो गया था। सूडान की बहादुर औरतों ने सड़कों पर मोर्चा संभाल लिया था। वे सैनिकों के सामने इतनी बहादुरी से खड़ी थी कि सैनिकों की हथियारों पर पकड़ ढीली पड़ती गयी। वे जनता का दमन करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। बशीर की सत्ता पर पकड़ खत्म होती जा रही थी और 11 अप्रैल के दिन उसने सत्ता से हटने के बाद सेना के एक जनरल आफ ने सत्ता संभाली पर जन आक्रोश के सामने वह दो दिन भी सत्ता नहीं संभाल सका। जनता ने सैन्य मुख्यालय घेरा हुआ था और वह बशीर के किसी चेले को देश का शासन नहीं संभालने देना चाहती थी। जिस वक्त यह लेख लिखा जा रहा है उस वक्त भी सेना के मुख्यालय को सूडान के औरतों और मर्दों ने घेरा हुआ है और उनकी मांग है कि तुरंत नागरिकों के नेतृत्व में एक गैर सैन्य अंतरिम सरकार कायम हो। और यह सरकार देश में आम चुनाव कर नयी सरकार का गठन करवाये। जनरल आफ के बाद सत्ता संभालने वाले जनरल अब्दुल रहमान की स्थिति सांप-छछूंदर की सी है। उन्हें कहना पड़ रहा है कि सेना ‘‘प्रदर्शनकारियों पर हमला नहीं करेगी। और जनता को कहीं भी प्रदर्शन करने का अधिकार है। और वे प्रदर्शनकारियों से नागरिक शासन के लिए समझौता करने को तैयार हैं। और सेना शीघ्र ही अपनी बैरकों में वापस चली जायेगी।’’
सेना के मुख्यालय का 6 अप्रैल से प्रदर्शनकारियों ने घेराव किया हुआ है। वे वहीं हर दम जमे रहते हैं। कई महिला प्रदर्शनकारी सार्वजनिक रसोई को संभाले हुए हैं। प्रदर्शनकारियों को सेना के जनरल पर भरोसा नहीं है। 11 अप्रैल से तानाशाह बशीर गायब है और प्रदर्शनकारी मानते हैं कि सेना बशीर को बचाने की कोशिश कर रही है।
तानाशाह बशीर की स्थिति इस समय धोबी के कुत्ते की तरह की हो गयी है। वह न घर का है, न घाट का। सूडान की जनता ने उसे उसके तख्त से उछाल कर फेंक दिया है और पश्चिम साम्राज्यवादी देशों के हितों को साधने वाले अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) ने उसे युद्ध अपराधी घोषित किया हुआ है। वे उसे दार्फूर में किये गये कत्लेआम की सजा सुनाना चाहते हैं। एक सेना ही है जो अपने पुराने बॉस को बचा सकती है। और सेना ऐसा न कर पाये इसके लिए जनता की अपनी वजह है। और अपने तथाकथित न्याय कर पाने के लिए आईसीसी की अपनी वजह है। फिलहाल बशीर का अता-पता नहीं है।
अमेरिकी साम्राज्यवादियों सहित पश्चिम साम्राज्यवादी सूडान के घटनाक्रम पर सतर्क निगाह रखे हुये हैं। वे 2011 के मिस्र के जनविद्रोह की तरह चाहते हैं, कि कोई अल-सीसी की तरह जनाक्रोश की दिशा मोड़ दें। 2011 में मिस्र के सैन्य तानाशाह होस्नी मुबारक को सत्ता छोड़ने को जनाक्रोश ने मजबूर कर दिया था। होस्नी मुबारक के बाद हुये आम चुनाव में एक उग्र इस्लामिक नेता मोहम्मद मुर्सी ने सत्ता संभाली थी। और, मुर्सी ने भारी जनविरोध के बीच इस्लामिक कानून लागू करने की कोशिश की तो साम्राज्यवादियों और मिस्र के पूंजीपति वर्ग ने सेना के सैन्य प्रमुख अल-सीसी की सैन्य वर्दी को उतारकर सिविल पोशाक पहनाकर देश का राष्ट्रपति बनवा दिया। और अब वह नया होस्नी मुबारक बन गया है। और अब 2030 तक राष्ट्रपति बने रहने के लिए उसने मत संग्रह भी करवा लिया है। सूडान की जनता का सैन्य मुख्यालय का वर्तमान घेराव का मकसद यही है कि बशीर का कोई लगुवा-भगुवा सत्ता न हथिया ले। कोई नया ‘अल-सीसी’ ना पैदा हो जाये।
अमरिकी साम्राज्यवादियों ने अपने षडयंत्र में 2011 में तब कामयाबी पा ली थी जब उन्होंने सूडान का विभाजन करवा दिया था। तेल सम्पन्न द.सूडान जिसमें ईसाई बहुल आबादी थी को एक नये देश के रूप में अस्तित्व में आने में पूरी मदद की थी। द.सूडान और सूडान एक देश के दो टुकडे़ हैं। भारत और पाकिस्तान के विभाजन की तरह यहां भी साम्राज्यवादियों ने धार्मिक विभाजन को आधार बनाया था। सूडान मुस्लिम बहुल है तो द.सूडान ईसाई बहुल। और इस तरह द.सूडान के तेल व गैस के भंडारों पर पश्चिमी साम्राज्यवादियों का कब्जा बरकरार हो गया। तब बशीर ने अपने शासन को कायम रखने के लिए सेना के जरिये भारी दमन किया था। और अपने शासन को कायम रखने के लिए सूडान की जनता की हर मांग को दबा दिया था। आज भी सूडान अपने पड़ोसी देशों से युद्ध में उलझा रहता है।
2011 के बाद से ही सूडान में बशीर के खिलाफ गुस्सा था। इसने तीव्रता तब पकड़ी जब दिसम्बर 2018 में देश की खस्ता हाल के बीच बशीर ने रोटी (ब्रेड) के दाम बढ़ा दिये। पेट्रोल-गैस के दाम बढ़ा दिये। पहले से ही गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई की मार झेल रही जनता ने बशीर के शासन के खिलाफ कमर कस ली। वह सड़कों पर उतर आयी। महंगाई के खिलाफ फूटे आक्रोश ने शीघ्र ही सैन्य तानाशाही से मुक्ति की मांग का रूप धारण कर लिया। ‘‘क्रांति’’ का नारा भी लगाया जाने लगा। जनवाद, समाजवाद शब्द चर्चा का विषय बन गये।
सूडान की सैन्य तानाशाही के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व डाक्टरों, इंजीनियरों, वकीलों, शिक्षकों आदि से मिलकर बनी प्रोफेशनल एसोसियेशन कर रही थी। इसके पीछे सूडान की विपक्षी पार्टियों के अलावा सूडानी कम्युनिस्ट पार्टी भी थी। यद्यपि मुख्य ताकत मजदूर, युवा और औरतें हैं। औरतों की सक्रीय भागीदारी पूरे अफ्रीका महाद्वीप में नयी सुबह की तरह है। औरतों का राजनैतिक आंदोलन में इतने बड़े पैमाने पर भागीदारी भविष्य के लिए आशा जगाने वाली है।
सूडान इस वक्त दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ मेहनतकश जनता की जो आंकाक्षाएं हैं वे सिर्फ और सिर्फ समाजवाद में पूरी हो सकती हैं। परंतु उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक तैयारी का अभाव है। दूसरी तरफ सूडान के शासक, सेना के जरनल, साऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के शेख किसी तरह से जनाक्रोश को ठंडा कर अपने हाथ में सत्ता रखना चाहते हैं। साऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के पीछे साम्राज्यवादी खड़े हैं वे किसी भी तरह नहीं चाहेंगे कि सूडान में ऐसा कुछ हो जो उनके लिए मुसीबत खड़ा कर दे।
सूडान की जनता सैन्य शासन से आजादी चाहती है। वह बराबरी भी चाहती है। वह रोटी भी चाहती है। वह रोजगार भी चाहती है। वह सब कुछ चाहती है जो इक्कीसवीं सदी में मेहनतकशों, नौजवानों, औरतों की मांग है। और इस मांग का व्यवहारिक अर्थ है पूंजीवाद की कब्र खोदना और समाजवाद की स्थापना करना।

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