गुरुवार, 4 दिसंबर 2025


गाजापट्टी में फिलिस्तीनी जनता का नरसंहार और तबाही

-भूपाल

    इजरायल की बेंजामिन नेतन्याहू सरकार का पिछले दो साल से गाजा पट्टी पर हमला लगातार जारी है। इस साल जनवरी माह में युद्ध विराम पर समझौता हुआ था, जिसे अलग-अलग चरण में लागू किया जाना था। मगर इजरायली शासक कुछ वक्त के बाद ही समझौते से मुकर गए। हवाई, जमीनी हमले लगातार ही जारी हैं। युद्ध विराम के समझौते के दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की धमकियों और फिर गाजा के लिए विशेष योजना की बात करके जता दिया था कि युद्धविराम समझौते का क्या हश्र होगा।

    तब से अब तक गाजा पट्टी से फिलिस्तीनी जनता को खदेड़ने की मुहीम इजरायली हुक्मरानों ने चलाई है। इसी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर नरसंहार को अंजाम देने की कोशिश की जा रही है। गाजा पट्टी में जिस अभूतपूर्व मानवीय संकट को नेतन्याहू सरकार ने पैदा कर दिया है इसे दूसरा नकबा (विपदा) कहा जा रहा है। पहला नकबा 1948 के दौर में चला था जब अभी इजरायल को फिलिस्तीनी जमीन पर बसाया ही गया था। इसमें साढ़े सात लाख फिलिस्तीनी जनता को पड़ोसी देशों में शरण लेनी पड़ी।

    इजरायली शासकों ने गाजा पट्टी को खाली कराने के लिए हर तरह से बड़े हमले जारी रखे हैं। इस तरह गाजा पट्टी में जनता पर गोलियां बरसाकर मिसाइल गिराकर ‘सफाया अभियान’ चलाया जा रहा है।

    यह बर्बर हमला जमीनी और हवाई स्तर से हो रहा है। यह गाजा के बच्चों, युवाओं, गर्भवती महिलाओं के लिए भांति-भांति के संकट खड़ा कर रहा है। जो बचे हुए हैं उनके सामने यह भूख, विस्थापन, शारीरिक और मानसिक आघात के भयावह संकट के रूप में सामने आ रहा है।

    गाजा पट्टी दुनिया की सबसे ज्यादा घनी आबादी वाले इलाकों में है। दो साल पहले यहां 365 वर्ग किमी जमीन पर 22 लाख की आबादी रहती थी। यह पांच प्रशासनिक क्षेत्रों में बंटा हुआ है जिसमें छोटे बड़े 30-40 शहर हैं। इसके एक ओर भूमध्यसागर है दूसरी ओर मिश्र तो बाकी तरफ से इजरायल। इजरायली शासकों ने अमेरिकी और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की शह पर फिलस्तीन को निगलने का अभियान चलाया। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के लिए इजरायल पश्चिम एशिया में नियंत्रण और प्रभाव कायम रखने का जरिया है।

    इजरायली शासकों ने इन गुजरे दशकों में धीमे-धीमे फिलिस्तीनी जनता को गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक के एक छोटे हिस्से तक समेट दिया। फिलिस्तीनी जनता एक राष्ट्र के लिए तभी से संघर्षरत है। अपने ही देश में फिलिस्तीनी जनता देशविहीनता की स्थिति में रहने को बाध्य कर दी गई। हमास संगठन इस्लामिक राष्ट्र के रूप में प्रतिक्रियावादी राष्ट्र के गठन के लिए संघर्ष करता है। इस तरह चाहे-अनचाहे यह फिलिस्तीनी जनता की चाहत और आवाज बन गया।

    पिछले 20-25 सालों में हमास और इजरायल के बीच टकराव और समझौते के अलग-अलग दौर गुजरे। अक्टूबर 2023 से हमास के हमले की आड़ में इजरायल गाजा पट्टी में बड़े पैमाने के नरसंहार को आयोजित करने में लगा है।

    गाजा पट्टी में प्राकृतिक गैस के भंडार भी हैं। इजरायल ने कभी यहां से गैस निष्कर्षण शुरू नहीं होने दिया। अब इजरायली शासकों की इस पर निगाह है। साथ ही गाजा पर कब्जे से भूमध्य सागर तक इसराइल की सीधी पहुंच हो जाएगी। यहां अकूत मुनाफा हासिल करने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। ट्रम्प प्रशासन की एक गुप्त योजना सामने आई है, जिसे 38 पन्नों के दस्तावेज में बताया गया है। इस योजना का नाम है ‘‘गाजा पुनर्गठन, आर्थिक विकास और बदलाव ट्रस्ट’’ (ळत्म्।ज्ज्)। इसका मकसद है गाजा को पूरी तरह बदल देना, यानी वहां फिर से निर्माण करना, रोजगार और व्यापार बढ़ाना। इसके लिए गाजा को भारत, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ने वाले बड़े व्यापारिक रास्ते (प्डम्ब् भारत मध्य पूर्व और यूरोप आर्थिक गलियारा) से जोड़ा जाएगा। यह गलियारा अमेरिकी शासकों के लिए चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का जवाब है।

    इजरायली और अमरीकी शासक इसे युद्धोत्तर पुनर्निर्माण की तरह देख रहे हैं। इसमें भारी पैमाने पर निवेश होना है। इजरायली उद्योगपति इसे लाॅजिस्टिक हब के रूप में विकसित करना चाहते हैं। इसे सऊदी अरब के 500 अरब डाॅलर के मेगा प्रोजेक्ट से जोडे़ जाने की योजना है।

    गाजा पट्टी में बीते दो साल में जो भीषण बर्बरता और तबाही फिलिस्तीनी जनता ने झेली है वह अन्य के लिए कल्पना से परे है। तथ्य, इस तबाही को बताते हैं मगर फिलिस्तीनी जनता की भीषण पीड़ा और मानसिक स्थिति का एहसास नहीं करा सकते।

    तथ्य बताते हैं कि इजरायली हमलों में अब तक 65,062 मौतें हुई हैं (मंत्रालय-ए-सेहत गाजा और इजराइली अधिकारियों के अनुसार) इसमें 28,205 बच्चे और 15,451 महिलाएं शामिल हैं। 1,65,697 घायल दर्ज किए गए हैं। गाजा में 19 लाख लोग (90 फीसदी से अधिक) गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। जून 2024 में खाद्य कीमतें 400 फीसदी तक बढ़ीं। कुछ रिपोर्टों में 2025 में यह युद्ध पूर्व से 1000 फीसदी तक ज्यादा बताई गई हैं। बाजारों में 60 फीसदी से अधिक दुकानों पर कोई खाद्य सामग्री नहीं। बच्चे और गर्भवती महिलाएं कुपोषण की चपेट में हैं।

    गाजा के 36 अस्पतालों में से केवल 13 आंशिक रूप से काम कर रहे हैं। 1,000 से अधिक स्वास्थ्य कर्मियों की मौत हो चुकी है दवाइयाँ और उपकरण बेहद सीमित हैं। 52,000 गर्भवती महिलाओं को देखभाल नहीं मिल पा रही। स्वास्थ्य ढांचा ध्वस्त कर दिया गया है। गाजा की 97 फीसदी आबादी के पास सुरक्षित पीने का पानी उपलब्ध नहीं। लाखों लोग मानसिक स्वास्थ्य संकट और मनोवैज्ञानिक आघात से पीड़ित हैं। गाजा में 75 फीसदी आबादी विस्थापित है। 2,900 से अधिक महिलाएँ और बच्चे अब भी गायब।

    गाजा की 625,000 स्कूली उम्र के बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। 100 फीसदी बच्चे शिक्षा से कट चुके हैं (कोई औपचारिक शिक्षा नहीं चल रही)। 75 फीसदी स्कूल क्षतिग्रस्त या पूरी तरह नष्ट कर दिए गए हैं। 50 फीसदी बच्चे (5 साल से छोटे) गंभीर कुपोषण से पीड़ित हैं। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं में भी गंभीर कुपोषण है।

    80 फीसदी से अधिक आबादी यानी 18 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। लाखों लोग भीड़भाड़ वाले अस्थायी शिविरों या खंडहर घरों में रहने को बाध्य कर दिए गए हैं। यहां भी मासूम बच्चों समेत लोग जब-तब मिसाइल, गोलों के हमले में मारे जा रहे हैं या घायल हो रहे हैं। गाजा पट्टी के बड़े हिस्से को मलवे के ढेर में बदल दिया गया है।

    मार्च से ही इजरायली सरकार ने भूख से तड़पते लोगों तक पहुंचाई जा रही राहत सामग्री को रोक दिया। रेड क्राॅस, यूनाइटेड नेशन और अन्य संस्थाओं को राशन वितरण से रोक दिया गया। इसकी जगह अमेरिकी और अपने एजेंट गाजा ह्यूमेटेरियन फाउंडेशन (ळभ्थ्) को राहत वितरण का जिम्मा सौंप दिया। इसमें हजारों भूखे लोग भोजन लेने के लिए राहत के केन्द्रों पर इकट्ठा किये गये। लेकिन यह दावा करके कि इसमें हमास के लड़ाके छुपे हैं ड्रोन और स्नाइपर से हमला कर दिया। इस तरह 1000 से अधिक फिलिस्तीनियों की हत्या कर दी। भूख को हथियार बनाकर जनता को निशाना बनाया गया। यह इजरायली नस्लवादी सरकार और नेतन्याहू की मानवता विरोधी फासीवादी मानसिकता को दिखाता है।

    इजरायली शासकों के घृणित अपराध में अमेरिकी साम्राज्यवादियों समेत दुनिया भर के कई पूंजीवादी शासक खड़े हैं। जिनका विरोध है भी, तो केवल सौदेबाजी के लिए है या फिर उनके अपने अंतर्विरोध हैं, अपने फायदे के समीकरण हैं।

    एक तरफ यह सब कुछ हो रहा है तो दूसरी तरफ दुनिया भर की युवा आबादी, मजदूर मेहनतकश आबादी फिलिस्तीनी जनता और मासूम बच्चों के पक्ष में सड़कों पर उतर आती है। अमेरिका से लेकर यूरोप और भारत तक कम या ज्यादा मात्रा में युवा सड़कों पर बार-बार आते हैं।

    अगस्त 25, में अलशिफा अस्पताल में इजरायली हमले में 17 बच्चे मारे गए। इसी तरह जब मई में इजरायल ने फिलिस्तीनी जनता को गाजा से खदेड़ने के लिए भूख का हथियार की तरह इस्तेमाल किया तब 147 बच्चे मारे गए। मासूम बच्चों, शिशुओं को निशाना बनाने का यह सिलसिला शुरू से ही है। यह बदस्तूर जारी है।

    इन मासूम बच्चों के मारे जाने और इनकी तस्वीरें सामने आई तो इसने दुनिया भर में युवा नौजवान आबादी को झकझोर दिया। इजरायली शासकों के हमलों के खिलाफ कई देशों में युवा आबादी सड़कों पर आ गई। यह अमेरिका और इजरायल के भीतर भी हुआ। अमेरिकी काॅलेजों में इन हत्याओं के खिलाफ विशाल प्रदर्शन छात्र नौजवानों ने किए। अप्रैल 2024 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी में छात्रों ने एक ‘‘गाजा साॅलिडैरिटी एनकैंपमेंट’’ (शिविर) की स्थापना की। इसके बाद यह आंदोलन देश भर के 130 से अधिक काॅलेजों और 45 अमेरिकी राज्यों में फैल गया था। इस आंदोलन को वियतनाम पर किए हमले के विरोध में युद्ध विरोधी प्रदर्शन की श्रेणी में रखा गया। स्पेन में हुए एक प्रदर्शन में 18,500 से अधिक मारे गए बच्चों के नाम पढ़े गए। इस साल अप्रैल माह में इजरायल की राजधानी तेल अवीव में बच्चों की हत्याओं के खिलाफ प्रदर्शन हुए।

    एक ओर इजरायली शासकों द्वारा फिलिस्तीनी जनता का नामोनिशा मिटा देने का बर्बर अभियान जारी है जिसे अमेरिकी शासकों का हर तरह का सहयोग हासिल है तो वहीं दूसरी ओर भविष्य है, एक उजली किरण है जो नौजवान युवाओं की न्याय के पक्ष में उनकी संवेदनशीलता को दिखाती है जो अपने भविष्य की परवाह किए बगैर अन्याय, उत्पीड़न, हत्याओं के उन्माद के विरोध में हर तरह से खड़े हैं। निश्चित तौर पर नौजवानों, छात्रों का यह चरित्र इस अंधेरे के बीच मानवता के उज्ज्वल भविष्य को भी दिखाता है।

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