उत्तराखंड के 25 साल
शिक्षा और रोजगार की बुरी स्थिति
-महेश
9 नवंबर 2025 को उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के 25 साल पूरे हो जाएंगे। 25 वें साल में प्रवेश करने पर उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने इसे रजत जयंती वर्ष के रूप में मनाया। राज्य की धामी सरकार ने इस अवसर पर उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करवाए। उत्तराखंड राज्य बनने की प्रमुख वजहों में शिक्षा और रोजगार भी प्राथमिक सवाल बने रहे। राज्य बनने के बाद यहां के निवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप राज्य का निर्माण नहीं हुआ और सत्ता में बारी-बारी से बैठी भाजपा-कांग्रेस ने मलाई खाई। उत्तराखंड के मामले में बात करने के लिए तो बहुत कुछ है परंतु यहां पर आगे हम शिक्षा और रोजगार के मामले में कुछ हालातों को रखेंगे।
शिक्षा- उत्तराखंड में शिक्षा की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है। राज्य का बड़ा क्षेत्र पहाड़ी होने के कारण विषम भौगोलिक परिवेश का है। मैदानी इलाकों में भी सुविधायें नाममात्र की हैं। देश में च्ळप् (परफाॅर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स) की 2020-21 की रिपोर्ट के अनुसार स्कूली शिक्षा में 37 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की रैंक में राज्य को 35 वां स्थान मिला।
राज्य गठन के बाद जहां एक तरफ सरकारी काॅलेज-विश्वविद्यालयों की संख्या नाममात्र बढ़ी, वहीं दूसरी तरफ निजी स्कूल-काॅलेज और विश्वविद्यालयों की भरमार हुई है। 2005 में उत्तराखंड सरकार ने निजी विश्वविद्यालय अधिनियम लागू किया। जिसके तहत प्राइवेट (काॅर्पोरेट) और ट्रस्ट आधारित निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना तेजी से हुई। छोटे से राज्य में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या 27 के पार है। राज्य की बड़ी मजदूर-मेहनतकश आबादी के लिए शिक्षा प्राप्त करना बहुत मुश्किल होता गया है। इनके पास निजी स्कूल-काॅलेज में जाने की आर्थिक क्षमता नहीं है। ऐसे में यह सरकारी स्कूलों-काॅलेजों के ही भरोसे शिक्षा प्राप्त करने की उम्मीद देखते हैं। लेकिन इन सरकारी स्कूल-काॅलेजों में शिक्षा के हालात बहुत खराब हैं।
जुलाई 2025 में शिक्षा विभाग के एक आंकड़े के अनुसार आज भी प्रदेश में करीब 2,210 स्कूलों की स्थिति जीर्ण-क्षीर्ण है। इसके साथ ही 547 स्कूलों में छात्र शौचालय, 361 स्कूलों में छात्रा शौचालय और 130 स्कूलों में पीने के पानी की कोई सुविधा नहीं है। कई स्कूल ऐसे हैं जहां बरसात में छत से टपकता पानी पाठ्यक्रम से ज्यादा ध्यान खींचता है। कहीं दीवारें दरकी हैं, तो कहीं छतें किसी भी वक्त गिर सकती हैं और ये कोई अपवाद नहीं, बल्कि 900 से अधिक सरकारी स्कूल इसी दंश को झेल रहे हैं। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में स्थिति और भी खराब है। कई डिग्री काॅलेजों के पास अपने भवन तक नहीं हैं।
बीते पांच सालों में स्कूलों में छात्र संख्या छह प्रतिशत यानी 60 हजार तक कम हो गई। इससे पहले केंद्र सरकार द्वारा कराए गए राष्ट्रीय शैक्षिक प्रदर्शन सूचकांक और परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण में भी उत्तराखंड की स्थिति काफी कमजोर पाई गई थी।
राज्य के स्कूल प्रधानाचार्य विहीन हो रहे हैं। राजकीय शिक्षक संघ के मुताबिक गढ़वाल मंडल में 1311 सरकारी माध्यमिक विद्यालय में से 1246 में प्रधानाचार्य नहीं हैं।
2020 में जारी की गई छात्र विरोधी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को उत्तराखंड ने अपने यहां सबसे पहले लागू किया। इसी शिक्षा नीति के तहत राज्य में स्कूल काॅम्प्लेक्स यानी क्लस्टर योजना लागू की जा रही है। इससे बड़ी संख्या में स्कूल बंद होने हैं। शिक्षक प्रधानाचार्य की भर्ती, प्रमोशन करने, ट्रांसफर नीति को पारदर्शी बनाने सहित तमाम मांगों को लेकर संघर्षरत हैं।
भाजपा सरकार अपने हिंदुत्व के एजेंडे के तहत काम कर रही है। रामायण, गीता जैसी धार्मिक पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल की जा रही हैं। राज्य में धार्मिक शिक्षा के लिए पहले से ही संस्कृत विश्वविद्यालय से लेकर तमाम जगहों में संस्कृत विद्यालय हैं। जिनमें वैदिक कर्मकांड से लेकर धार्मिक शिक्षा प्रदान की जाती है। छम्च् 2020 के तहत शिक्षा पर एक बड़ा हमला पाठ्यक्रम के भगवाकरण का भी है।
कैसे राज्य में शिक्षा का बट्टा लगाया जा रहा है इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्याल के छात्र-छात्राओं को सहकारिता मेले में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के मौके पर उपस्थित होने के लिए दबाव डाला गया। इसी तरह स्कूल-काॅलेज-विश्वविद्यालय नेताओं की भीड़ बढ़ाने और उनकी जय-जयकार करने के लिए इस्तेमाल किये जा रहे हैं।
रोजगार- रोजगार के हालात भी राज्य में शिक्षा से बहुत जुदा नहीं हैं। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। 2024 में होमगार्ड प्रशिक्षक के सिर्फ 24 पदों के लिए 21,000 से ज्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया है। इनमें से लगभग 70 प्रतिशत आवेदकों के पास स्नातकोत्तर डिग्री है। इनमें एम.टेक, एम.एससी, बी.एससी और विभिन्न अन्य विषयों के स्नातक शामिल हैं।
विभागों में खाली पदों की संख्या भरमार है। चतुर्थ श्रेणी के पद ही समाप्त कर दिए गए हैं। रोजगार देने की जिम्मेदारी वाले सेवायोजन विभाग की बात करें तो उसमें ही 60 फीसदी पद खाली हैं। स्वीकृत 365 के सापेक्ष 219 अधिकारियों-कर्मचारियों के पद खाली हैं।
प्रदेश के सेवायोजन कार्यालयों में 8,83,346 बेरोजगार पंजीकृत हैं। उत्तराखंड में 2024 में 18 से लेकर 39 साल तक की उम्र के 40,33,278 युवा मतदाता थे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देखें तो उत्तराखंड में लगभग 22 फीसदी युवा बेरोजगार हैं। सभी रोजगार दफ्तर में अपना रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं और सही से आंकड़ें जुटाए भी नहीं जाते। यानी वास्तविक तस्वीर और अधिक खराब है।
पिछले समय में भाजपा सरकार और पेपर माफियाओं का गठजोड़ सामने आया है। इसके खिलाफ छात्रों-युवाओं के निरंतर संघर्ष रहे हैं। पिछले कुछ सालों में अपनी छवि को चमकाने के लिए मुख्यमंत्री धामी 1000 करोड़ से अधिक के विज्ञापन मीडिया में दे चुके हैं। इस दौरान धामी ने अपनी छवि और चमकाने के लिए 26,000 नौकरियों देने की बात कही। उसमें ठेका, संविदा, उपनल, आउटसोर्स के तहत अस्थाई और असुरक्षित नौकरियां हैं।
अंत में- उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन की प्रमुख वजहों में शिक्षा और रोजगार रहा। इन्हीं वजहों से पहाड़ी इलाकों से पलायन बहुत ज्यादा है। बेहतर शिक्षा या रोजगार के लिए उत्तराखंड से महानगरों के लिए रुख किया जा रहा है। राज्य बनने से पूर्व कौशिक समिति की रिपोर्ट में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र (आज के उत्तराखंड) में सरकारी स्कूल-काॅलेज की संख्या बढ़ाने, विशेष बजट की मांग और रोजगार हेतु स्थानीय रोजगार के लिए विशेष योजनाएं बनाने की बात कही गई थी। राज्य का गठन तो किया गया परंतु जन आकांक्षायें पूरी नहीं की गई।
देश के अन्य राज्यों में भी शिक्षा और रोजगार के हालात बुरे ही हैं। वहां कुछ समानतओं के अलावा जनता की उम्मीदें अलग तरीके से तोड़ी गयी हैं यही फर्क है। त्यौहारों से लेकर फसलों के समय ऐसे प्रवासी मजदूर और छात्र देशभर से अपने घरों को या अपने घरों से अपने कार्यस्थल और काॅलेज-विश्वविद्यालय को जाते हुए देखे जा सकते हैं। हमारे देश की यह सच्चाई हमें प्रेरित करती है कि शिक्षा-रोजगार के सवाल पर देशव्यापी संघर्ष किया जाये। जिसमें केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा मेहनतकश जनता के सुनहरे भविष्य के सपनों को जमींदोज करने का हिसाब किया जाये। उत्तराखंड के सुनहरे भविष्य के लिए लड़ते हुए भी हमें याद रखना होगा कि देश के हालात सुधरे बिना हमारे शिक्षा-रोजगार में भी खास सुधार नहीं हो सकता। शिक्षा, रोजगार के लिए देश की जनता का व्यापक एकजुट संघर्ष ही कुछ संभावना पैदा करेगा। इसकी गारण्टी तब की जा सकती है जब यह संघर्ष पूंजीवादी व्यवस्था की सीमाओं को लांघते हुए समाजवादी व्यवस्था तक भी जाने के लिए तैयार हो।
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