विपरीतों का अंतप्र्रवेशः रूप और अंतर्वस्तु
-मनीष
जैन पुराणकथाओं के अनुसार उनके तीर्थांकरों की लंबाई क्रमशः घटती गई है। पहले तीर्थांकर रिषभनाथ की लंबाई 1500 मीटर थी। उनके मुकाबले तेईसवीं तीर्थांकर पाश्र्वनाथ की लंबाई घटकर महज 13.5 फूट रह गई थी। चैबीसवें और अंतिम तीर्थांकर महावीर तो बस 6 फूट के थे।
हिन्दू पुराण कथाओं के हिसाब से भी इंसानों की लंबाई युग के साथ घटती गई है। सतयुग में लोग 21 से 32 फूट वाले लम्बे होते थे जबकि त्रेता युग में 14 से 21 फूट लम्बे। लम्बाई द्वापर में और भी घटकर महज 7 से 14 फूट रह गई। कलयुग में तो बस बौने रह गये- 5 से 6 फूट लम्बे इंसान।
पुराण कथाओं से इतर यदि वैज्ञानिक प्रमाण के आधार पर बात करें तो अभी तक सबसे लंबा पुरूष 8 फूट 11 इंच तथा सबसे लंबी औरत 8 फूट 1 इंच की रही है। ये दोनों आधुनिक काल के हैं। प्राचीन काल के मानवीय अवशेषों में कोई भी इनसे ज्यादा लंबा नहीं मिला है।
पुराण कथाओं में इतने लंबे इंसानों की कल्पना आम तौर पर ही इनमें अतिश्योक्तिपूर्ण कपोल-कल्पनाओं का एक उदाहरण मात्र है। जैन तीर्थांकरों के जो समय काल उनकी पुराण कथाओं में बताये गये हैं वे तो रिषभनाथ को लगभग अनंत काल में ले जाते हैं। कम से कम उसके पहले तो जरूर ही जिसे आजकल वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का काल मानते हैं। जब पुराण कथाओं में इतने लंबे इंसानों की कल्पना की गई तो कल्पना करने वालों को एक वैज्ञानिक सत्य का ज्ञान नहीं था। वह सत्य यह था कि जीवों की लंबाई मनमाने तरीके से नहीं बढ़ाई जा सकती। लंबाई समेत जीवों के आकार के अपने नियम होते हैं जिनसे ये तय होते हैं। उदाहरण के लिए, दस फूट से ज्यादा इंसान की पांव की हडिडयां शरीर के वजन से चूर-चूर हो जायेंगी। इससे बचने के लिए पांव की हडडी को काफी मोटा होना पडे़गा जिससे चलने में उसी तरह की समस्या पैदा हो जायेगी जैसे हाथी को होती है। हाथी ठीक से दौड़ नहीं सकता। भारी-भरकम होने के चलते हाथी तो शिकारी जानवरों से बच गया पर इंसान नहीं बच सकता था।
इंसान की लंबाई की सीमा रूप और अंतवस्र्तु के संबंध का नतीजा है। इंसान के पांव शरीर के सारे वजन को सहते हुए उसे जमीन में स्थानांनतरित करते हैं। और उन्हें यह स्थिर खड़े होते हुए ही नहीं बल्कि चलते और दौड़ते हुए भी करना होता है। ये दोनों ही जरूरतें-वजन को सहना और चलना और दौड़ना- पांव की अंतवस्र्तु को तय करती हैं। हड्डी और मांसपेशियों को उसी के हिसाब से विकसित होना होता है। लेकिन ये ही उसके रूप को भी तय करती हैं। पांव के पतले होने से चलना और दौड़ना आसान होता है पर पतले पांव की वजन सहने की काफी सीमा होगी। यह सीमा हड्डी की ताकत से तय होती है। जैसे इस्पात या कंक्रीट की दबाव सहने की एक सीमा होती है वैसे ही हड्डी की दबाव सहने की एक सीमा होती है। इससे ज्यादा दबाव होने पर हड्डी चूर-चूर हो जायेगी। हड्डी की यह सीमा (अंतवस्र्तु) पांव की मोटाई (रूप) तय करती है जो अपनी बारी में पूरे शरीर की लंबाई को तय कर देती है क्योंकि शरीर की लंबाई का उसके बाकि आकार तथा इस तरह पूरे वजन से संबंध होता है। इसी संबंध की वजह से आजकल डाक्टरों के यहां लंबाई के अनुसार वजन का चार्ट देखने को मिल जाता है।
इंसानी शरीर की लंबाई और उसका वजन बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं। एक को मीटर या फूट में नापा जाता है तो दूसरे को किग्रा. में। लेकिन तब भी दोनों के बीच इस तरह का संबंध होता है कि इंसानी शरीर के वजन का उसकी लंबाई के हिसाब से चार्ट बनाया जा सकता है। दोनों एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। वजन अंतर्वस्तु का द्योतक है तो लंबाई रूप का। यहां रूप और अंतर्वस्तु दोनों एक-दूसरे को तय कर रहे होते हैं।
बात केवल इतनी नहीं है कि रूप और अंतर्वस्तु एक-दूसरे सें बंधे हुए होते हैं और एक-दूसरे को तय करते हैं। बात इससे भी आगे की है। रूप अंतर्वस्तु में तथा अंतर्वस्तु रूप में प्रवेश कर जाता है।
इंसान जिन वानरों से विकसित हुआ वे चार पैरों पर चलने वाले जन्तु थे जबकि इंसान दो पांवों पर चलता है। वानरों के आगे वाले दोनों पांव इंसान में हाथ के रूप में रूपांतरित हो गये। यह रूपांतरण एक लंबे समय में तथा कई चरणों में हुआ। लेकिन इससे शरीर की बाकि संरचना में भी भारी परिवर्तन आया।
जानवरों का चार पांवों पर चलना शरीर के संतुलन तथा चलने-दौड़ने के लिए ज्यादा अनुकूल है। इसके मुकाबले दो पांवों पर चलना-दौड़ना अपेक्षाकृत मुश्किल है। दो पांवों पर चलने के कारण कूल्हे की हड्डी का खास तरीके से विकास हुआ। इसने अपनी बारी में अन्य प्रभाव उत्पन्न किये।
मां के गर्भ से बच्चे के बाहर आने का रास्ता कूल्हे की हड्डी के बीच छेद से होता है। यह छेद जितना बड़ा होगा कूल्हे का कुल आकार उतना ही बड़ा होगा। लेकिन बड़ा कूल्हा चलने और खासकर दौड़ने में समस्या पैदा करेगा। इसलिए कूल्हे का आकार सीमित होना चाहिए। यह फिर इसके बीच के छेद के आकार की सीमा बांध देता है। यह अपनी बारी में पैदा होने वाले बच्चे के सिर के आकार की सीमा बांध देता है। अंत में यह पैदा होने वाले बच्चे के विकास की गति को प्रभावित करता है।
इन्हीं सब कारणों से यह हुआ कि इंसानों में बच्चे के पैदा होने के समय उसके दिमाग का आकार पूर्ण विकसित दिमाग का महज चैथाई होता है जबकि बाकि स्तनधारी जीवों में यह आधा होता है। आधे से चैथाई होते हुए इंसानी स्त्री के कूल्हे के आकार को इतना छोटा रखा जा सका कि चलना-दौड़ना एकदम मुश्किल न हो जाये। लेकिन तब इसका परिणाम यह भी निकला कि पैदा होने के बाद शिशु के विकास का काल ज्यादा लंबा हो गया। शिशु अपने मां-बाप पर ज्यादा समय तक निर्भर रहने लगा। वैसे इंसानों के मामले में इसका एक फायदा भी हुआ। इंसान सामाजिक प्राणी है। समाज की अपनी नैतिकताएं और नियम-कानून होते हैं। ज्यादा लंबे शिशु काल ने इंसानी शिशु को समाज का एक व्यक्ति बनने में ज्यादा सक्षम बनाया।
उपरोक्त सब का रूप और अंतर्वस्तु के मसले से क्या लेना-देना है? चार पांवों के बदले दो पांवों पर चलना जितना रूप का मसला है उतना ही अंतर्वस्तु का मसला भी है। बल्कि कहीं ज्यादा। इसने इंसान को इंसान बनाया। इसने आगे के दो पांवों को स्वतंत्र कर दिया, जिससे वे हाथ के रूप में विकसित हो सकें। इससे इंसान श्रम करने में सक्षम हुआ जिसने अपनी बारी में इंसानी दिमाग को बदल डाला। यानी इंसानी अंतर्वस्तु इंसानी रूप (दो पांवों पर चलना तथा आगे दो पांव का हाथों में रूपांतरण) से इस तरह संबद्ध है कि रूप ने अंतर्वस्तु को जन्म दिया और अंतर्वस्तु ने रूप को। अक्सर इंसान को उसके दिमाग और चेतना के कारण बाकि जीवों से अलग माना जाता है। ये इंसान की विशेष अंतर्वस्तु है। पर यह अंतर्वस्तु इंसान को दो पांवों पर खड़े होने का यानी रूप का उत्पाद है। यहां रूप अंतर्वस्तु में बदल गया। लेकिन इसका उल्टा भी हुआ। अंतर्वस्तु ने अगले पांवोें के रूप को बदल डाला। अब वे हाथ बन गये। उनकी बनावट एकदम बदल गई। पर इस नयी बनावट के साथ उन्होंने नई अंतर्वस्तु भी हासिल कर ली। वे चलने-फिरने के बदले श्रम के काम आने लगे।
ध्यान से देखने पर यहां रूप के अंतर्वस्तु में तथा अंतर्वस्तु के रूप में संक्रमण के कई चरण मिलंेगे। बल्कि ये संक्रमण ही इंसान के उद्विकास के अलग-अलग चरणों के क्रम तय करते हैं।
अगर कूल्हे की हड्डी तथा इंसानी शिशु के दिमाग की जो चर्चा की गई है वह भी रूप और अंतर्वस्तु के इसी संबंध को दिखाता है। कूल्हे का आकार न केवल उसकी अंतर्वस्तु को तय करता है बल्कि वह शिशु के दिमाग के आकार को भी तय करता है। और चूंकि शिशु के दिमाग के आकार का सीधा संबंध उसकी अंतर्वस्तु से है तो इस तरह रूप अंतर्वस्तु में प्रवेश कर जाता है। इसका उल्टा भी होता है। दिमाग का यह कम विकास शिशु के हाथ-पांव के कम विकास में परिणत हो जाता है। गाय-भैंस या भेड़-बकरी के बच्चे पैदा होने के कुछ मिनट बाद ही चलने-फिरने लगते हैं पर इंसानी बच्चे को एक-डेढ़ साल का समय लग जाता है।
जैव जगत में रूप और अंतर्वस्तु का यह संबंध कभी-कभी ऐसा होता है कि दोनों एक हो गये लगते हैं। डीएनए अणु की संरचना ऐसी ही है। डीएनए अणु की ‘डबल हेलिक्स’ संरचना में ही उसकी अंतर्वस्तु छिपी हुई है। जैसे ही इस संरचना का पता चला वैसे ही स्पष्ट हो गया कि डीएनए अणु कैसे काम करता है। जैव जगत में रूप और अंतर्वस्तु में इतना साम्य हमेशा नहीं होता। बल्कि अक्सर ही दोनों के बीच कम या ज्यादा फर्क होता है। उदाहरण के लिए पक्षियों के पंख को लिया जाये। पंख की बनावट (रूप) का उसकी अंतर्वस्तु (उड़ना) से एक संबंध होता है। पर इस मामले में काफी विविधता पाई जाती है। कुछ पक्षी घंटों या यहां तक कि कई दिनों तक उड़ सकते हैं जबकि कुछ महज कुछ मिनट। कुछ पक्षी तो उड़ना ही भूल चुके हैं।
आम तौर पर कहा जाये तो रूप और अंतर्वस्तु एक ही अंतर्विरोध के दो पहलू हैं। दोनों को एक-दूसरे से जुदा नहीं किया जा सकता। हर रूप की कोई न कोई अंतर्वस्तु होगी ही। इसी तरह कोई भी अंतर्वस्तु किसी रूप के बिना विद्यमान नहीं हो सकती। अक्सर ही दोनों के बीच एक दूरी होती है। कभी रूप पीछे छूट जाता है तो कभी अंतर्वस्तु। आम तौर पर अंतर्वस्तु प्रधान होती है पर किन्हीं विशेष परिस्थितियों में रूप भी प्रधान हो जाता है। चीजों के विकास के दौरान रूप अंतर्वस्तु में प्रवेश कर जाता है तो अंतर्वस्तु रूप में।
संगठन के मामले में देखें तो यहां भी रूप और अंतर्वस्तु का उपरोक्त संबंध स्पष्ट नजर आता है। पूंजीवादी संगठन का एक रूप होगा तो क्रांतिकारी संगठन का दूसरा। यह इसलिए कि पूंजीवादी संगठन की एक अंतर्वस्तु होगी और जबकि क्रांतिकारी संगठन की दूसरी। एक का लक्ष्य पूंजीवादी व्यवस्था को चलाना होता है तो दूसरे का लक्ष्य उसे खत्म करना। यह लक्ष्य उनके रूप को तय करेगा। पूंजीवादी संगठन के लिए उस स्तर की चेतना और अनुशासन की जरूरत नहीं होगी जितना क्रांतिकारी संगठन के लिए। पूंजीवादी संगठन में नेता और भीड़ का संबंध चल सकता है पर क्रांतिकारी संगठन में नहीं। यहां सचेत कार्यकर्ता जरूरी तत्व हैं। जिनका नेताओं से अंध भक्ति का संबंध नहीं हो सकता।
क्रांतिकारी संगठनों में भी संगठन के एक स्तर पर तथा विभिन्न स्तरों के बीच रूप और अंतर्वस्तु का द्वन्द्व काम करता है। किसी एक स्तर की समिति में शामिल सारे सदस्यों का एक न्यूनतम स्तर होगा। लेकिन साथ ही अलग-अलग सदस्यों के स्तर में फर्क भी होगा। इससे एक समूह के तौर पर उस समिति का स्तर (अंतर्वस्तु) तय होगा जो उस समिति के घोषित स्तर से कम या ज्यादा होगा। इस तरह एक व्यक्ति के मामले में भी तथा पूरे समूह के मामले में भी रूप और अंतर्वस्तु के बीच फर्क होगा। यदि यह फर्क बहुत ज्यादा हो जायेगा तो किसी एक को दूसरे के अनुरूप ढलना होगा। व्यक्ति को समिति के ऊपर या नीचे ले जाना होगा। यानी ऊपर वाली समिति में या नीचे वाली समिति में। इसी तरह पूरी समिति का भी दर्जा घटाना या बढ़ाना पड़ सकता है। केवल इसी तरह रूप और अंतर्वस्तु के विस्फोटक अंतर्विरोध को हल किया जा सकता है।
संगठन के मामले में भी रूप व अंतर्वस्तु एक-दूसरे में अंतप्र्रवेश कर जाते हैं। रूप अंतर्वस्तु को विकसित कर देता है जबकि अंतर्वस्तु नया रूप ग्रहण करने की ओर ले जाती है। कार्यकर्ताओं और समितियों दोनों के मामले में इसे देखा जा सकता है। किसी ऊंचे स्तर की समिति में शामिल होकर कार्यकर्ता का विकास होता है। इसी तरह कार्यकर्ता का विकास उसे ज्यादा ऊंचे स्तर की जिम्मेदारी लायक बनाता है जो नये रूप के साथ संभव हो पाता है।
संगठन के मामले में हमेशा ही यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि हर अंतर्वस्तु कोई न कोई रूप ग्रहण करेगी ही तथा हर रूप में कोई न कोई अंतर्वस्तु होगी ही। देखने की बात यह होगी कि क्या-क्या रूप और अंतर्वस्तु मोटा-मोटी एक धरातल पर हैं। दोनों के बहुत ज्यादा बेमेल होने पर रूप और अंतर्वस्तु का अंतर्विरोध विस्फोटक हो जायेगा जिसका समाधान सुखद नहीं होगा। अंततः रूप और अंतर्वस्तु एक धरातल पर आयेंगे पर कम या ज्यादा हानिकारक विध्वंस के जरिये। रूप और अंतर्वस्तु के द्वन्द्व की सही समझ से इस परिणति से समय रहते बचा जा सकता है।
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