गुरुवार, 4 दिसंबर 2025


आज अगर स्पिनोजा होते!

-कबीर

    स्पिनोजा ने कहा था कि ‘मन शरीर के बारे में ईश्वर का ज्ञान है।’  (Mind is God’s idea of the body)। बल्कि यह वाक्य उनके दर्शन की बुनियाद था।

    स्पिनोजा सत्रहवीं सदी के दार्शनिक थे। वे नीदरलैण्ड के एक यहूदी परिवार में पैदा हुए थे। उन्हें बाद में अपने दार्शनिक विचारों के लिए यहूदी धर्म से निष्कासित कर दिया गया था। इसकी वजह यह थी कि उनके दार्शनिक विचार मूलतः ईश्वर को नकारते थे। उनके दार्शनिक विचारों को उस श्रेणी में रखा जाता है जो पूरी प्रकृति को ही ईश्वर मानता है यानी जो प्रकृति से बाहर किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर को नहीं मानता। स्पिनोजा के अनुसार इस ईश्वर (यानी प्रकृति) के मूलतः दो आयाम हैं-एक विस्तार और दूसरा मन। पहले में सारे भौतिक पदार्थ (मानव शरीर सहित) हैं जबकि दूसरे में चेतना।

    अपनी इसी दार्शनिक सोच के तहत जब स्पिनोजा ने कहा कि मन शरीर के बारे में ईश्वर का ज्ञान है तो उसका दार्शनिक के साथ-साथ एक जीव वैज्ञानिक मतलब भी था। आज जीव विज्ञान की महती प्रगति के साथ यह मतलब और ज्यादा स्पष्ट हो गया है।

    मानव शरीर अपने वातावरण में विद्यमान रहता है। वातावरण उस शरीर पर भाँति-भाँति से प्रभाव डालता है। स्वयं मानव चूंकि श्रम करने वाला प्राणी है तो वह श्रम के दौरान प्रकृति के साथ जो क्रिया-प्रतिक्रिया करता है उसका शरीर पर तरह-तरह से प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव शरीर के बाहरी अंगों पर भी पड़ता है तथा भीतरी अंगों पर भी। बाहरी अंगों पर पड़ने वाले प्रभाव का संवेदन पांचों ज्ञानेन्द्रियों (आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) के जरिये दिमाग तक पहुंचता है। इसी तरह भीतरी अंगों पर पड़ने वाले प्रभाव का संवेदन एक खास तरीके के तंत्रिका तंत्र के जरिये दिमाग तक पहुंचता है जिसे जीव विज्ञान में ‘सिम्पैथेटिक और पैरासिम्पैथेटिक सिस्टम’ कहते हैं। इन सारे बाहरी-भीतरी अंगों से प्राप्त संवेदनों के जरिये ही दिमाग को वह चीज हासिल होती है जिसे ‘चेतना’ या ‘मन’ कहते हैं। यानी ‘मन’ शरीर की अवस्था का ज्ञान है। ‘मन’ को बाहरी दुनिया का ज्ञान भी इसका शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव के जरिये ही हासिल होता है। उदाहरण के लिए जब किसी पेड़ से टकराकर वापस आने वाली प्रकाश की किरणें आंख के लेन्स के जरिये रेटिना पर पड़ती हैं तो उससे जो प्रभाव पैदा होता है उसका संवेदन ही दिमाग में पहुंच कर ‘मन’ में पेड़ की छवि उत्पन्न करता है।

    इंसानी ‘मन’ या ‘चेतना’ जन्तुओं में पाई जाने वाली चेतना का सर्वोच्च रूप है। बाकी जन्तुओं से यह इतना अलग है कि अक्सर ‘चेतना’ को केवल इंसानी चीज ही माना जाता है। पर अपने मूल रूप में यह चेतना बाकी जन्तुओं मंे भी पाई जाती है। सभी के लिए यह बात सच है कि चेतना शरीर की अवस्था का ज्ञान है, वह शरीर जो अपने वातावरण में बाकी प्रकृति से लगातार क्रिया-प्रतिक्रिया करता है। जीवों के विकास के साथ चेतना की व्यवस्था ज्यादा जटिल होती जाती है और परिणाम स्वरूप उसका स्तर गुणात्मक तौर पर बदलता जाता है। इंसानों में तो यह इस हद तक पहुंच जाती है कि ‘चेतना’ स्वयं ‘चेतना’ के बारे में सचेत हो जाती है।

    लेकिन स्पिनोजा की मृत्यु के लगभग साढे़ तीन सौ साल बाद उनकी गूढ़ दार्शनिक बातों तथा उनकी आज की जीव वैज्ञानिक व्याख्या की चर्चा क्यों की जाये?

    इस चर्चा की वजह आज इंटरनेट और कम्प्यूटर-स्मार्टफोन की दुनिया है। इसने ‘मन शरीर की अवस्था का ज्ञान है’ को एकदम भिन्न स्वरूप प्रदान कर दिया है। इसमें ‘मन’ और ‘शरीर’ दोनों वह नहीं रह गये हैं जो अभी तक इंसानों के मामले में था। इसमें इंसान बस उसी तरह से पुर्जा मात्र बन कर रह गया है जैसे एक सदी पहले औद्योगिक उत्पादन में इंसान मशीन का पुर्जा मात्र बन कर रह गया।

    भाप के इंजन के आविष्कार तथा औद्योगिक क्रांति के पहले श्रमिक अपने औजार का मालिक होता था। औजार पर उसका पूरा नियंत्रण होता था। उसके हाथ-पांव औजार को संचालित करते थे। वह अपनी मर्जी से काम शुरू और बंद कर सकता था।

    पर भाप के इंजन के आविष्कार तथा उसके द्वारा चालित बड़ी और जटिल मशीनों के आगमन के बाद श्रमिक क्रमशः मशीन के अधीन होता गया और अंततः वह उसका एक पुर्जा मात्र बन कर रह गया। अब मशीन की गति उसके हिसाब से नहीं बल्कि वह मशीन की गति के हिसाब से चलता था और मशीन की गति पूंजी तय करती थी। बीसवीं सदी में फैक्टरियों में असेम्बली लाइन उत्पादन प्रणाली के साथ यह सब चरम पर पहुंच गया। इसे चार्ली चैपलिन ने अपनी फिल्म ‘माडर्न टाइम्स’ के शुरूआती हिस्सों में बहुत तीक्ष्णता के साथ प्रदर्शित किया है।

    यदि पहली और दूसरी औद्योगिक क्रांति में इंसान शारीरिक श्रम के मामले में क्रमशः मशीन का पुर्जा मात्र बन कर रह गया तो अब तीसरी और चैथी औद्योगिक क्रांति में वह ‘मन’ के मामले में मशीनों का हिस्सा मात्र बन रहा है। जहां पहले वह शारीरिक श्रम के मामले में मशीनों के अधीन हो गया था, वहीं अब वह चेतना और सोच के मामले में मशीनों के अधीन हो रहा है। जहां पहले मशीनें इंसानी शरीर की मालिक बनीं वहीं अब मशीनें इंसानी मन की मालिक बन रही हैं। जहां पहले इंसान को भ्रम रहता था (और अभी भी रहता है कि) वह बड़ी-बड़ी मशीनों को संचालित करता है वहीं अब इंसान को यह भ्रम रहता है कि वह ‘स्मार्ट गैजेट्स’ का मालिक है। हकीकत ठीक उल्टी है। ‘स्मार्ट गैजेट्स’ इंसानों के मालिक बन रहे हैं। कहने की बात नहीं कि इन ‘स्मार्ट गैजेट्स’ के पीछे पूंजी है, जैसे विशाल मशीनों के पीछे पूंजी होती है जो उन्हें संचालित करती है।

    आजकल एआई यानी ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स’ अथवा कृत्रिम मेधा की चर्चा है। लेकिन कम ही लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि यह कृत्रिम मेधा पैदा कैसे होती है और काम कैसे करती है? इसका क्रमशः विकास कैसे होता है? लोगों के आम दैनंदिन जीवन से इसका क्या संबंध है?

    इसका जवाब पाने के लिए एक बार फिर इंसानी मेधा या इंसानी ‘मन’ की ओर लौैटना होगा।

    इंसानी ‘मन’ या मेधा का विकास किसी एक व्यक्ति के अपने जीवन में विकास तथा सारे इंसानों के विकास (यानी मानव इतिहास) से जुड़ा होता है। इंसान पैदा होता है और इस दुनिया में कुछ करने के साथ क्रमशः उसके बारे में जानता भी जाता है। मानव जाति द्वारा पहले से हासिल ज्ञान इसमें उसकी मदद करते हैं। यानी करना और सीखना दोनों साथ-साथ चलते हैं। यह एक व्यक्ति के बारे में भी सच है और समूची मानव जाति के बारे में भी।

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में भी यही सच है। यहां भी करना और सीखना साथ-साथ चलते हैं। पिछले पच्चीस-तीस सालों में इंटरनेट की दुनिया क्रमशः व्यापक और विशाल होती गई है। इससे कम्प्यूटर-स्मार्टफोन के साथ भांति-भांति के नये आविष्कृत ‘स्मार्ट गैजेटस’ जुड़ते चले गये हैं। इनसे इंसान जो भी अंतक्र्रिया करते हैं उससे अत्यंत विशाल पैमाने का ‘डाटा’ इंटरनेट की दुनिया के कुछ खास बिन्दुओं (बड़ी टेक्नोलाजी कंपनियों जैसे गूगल, मेटा, माइक्रोसाफट, अमेजन, एप्पल, अलीबाबा, टेन्सेन्ट, इत्यादि) पर इकट्ठा होता जा रहा है। इसी ‘डाटा’ को ‘प्रोसेस’ कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता पैदा की जा रही है।

    इंसानी ज्ञानेन्द्रियों तथा सिम्पैथेटिक-पैरासिम्पैथेटिक व्यवस्था के जरिये हासिल संवेदनों (‘डाटा’) को इंसानी दिमाग खास तरह से ‘प्रोसेस’ करता है जिससे न केवल इंसानी ‘मन’ को सारे शरीर का तथा बाहरी दुनिया का ज्ञान होता है बल्कि स्वयं इंसानी ‘मन’ भी पैदा होता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मामले में भी यही हो रहा है। आज इंसानों द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे ‘स्मार्ट गैजेटस’ इंसानी ज्ञानेन्द्रियों तथा सिम्पैथेटिक-पैरासिम्पैथेटिक व्यवस्था की तरह हैं। स्वयं इंटरनेट का ताना-बाना तंत्रिका तंत्र की तरह है जो संवेदनों (‘डाटा’) को केन्द्र (बड़ी टेक्नालाजी कंपनियों के सर्वर) तक पहुंचाता है। वहां इस ‘डाटा’ की उसी तरह ‘प्रोसेसिंग’ होती है जैसे इंसानी दिमाग में होती है। बड़ी टेक्नालाजी कंपनियों तथा मध्यम व छोटी टेक कंपनियों को मिलाकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समाज बनता है जहां ज्ञान की कुछ साझेदारी भी है और कुछ एकाधिकार भी। इंसानी समाज की तरह यहां भी बुद्धिमत्ता और ज्ञान के मामले में भारी गैर-बराबरी है। कुछ बड़ी कंपनियों ने इस पर अपना एकाधिकार कायम कर रखा है।

    यहां जो बात खास तौर पर गौर करने लायक है वह है कृत्रिम बुद्धिमत्ता की इस व्यवस्था में इंसान की स्थिति। अक्सर इस बात पर चर्चा होती रहती है कि कब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंसानी बुद्धिमत्ता से आगे निकल जायेगी? अक्सर यह खौफ भी दिखाया जाता है कि तब मशीनें इंसानों पर राज करने लगेंगी। बहुत सारी फिल्मों और कहानी-उपन्यासों में इस खौफनाक मंजर को दर्शाया गया है। पर इस चर्चा में यह बात सिरे से ओझल हो जाती है कि इंसान आज ही मशीनों के अधीन हो गया है। आज ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानी बुद्धिमत्ता पर हावी हो गई है। आज इंसान बहुत सारा कुछ कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अधीन कर रहा है। यह कुछ इस तरह हो रहा है कि अक्सर ही लोगों को यह पता भी नहीं होता। इससे भी बड़ी बात यह कि जो इसके प्रति सचेत हैं वे भी इससे बच नहीं सकते। यह कुछ उसी तरह है कि यह जान और मान लेने के बाद भी कि पूंजीवाद में पैसा और पूंजी ही सब कुछ चला रहे हैं, पूंजीवाद में जीते हुए इनसे कोई बच नहीं सकता।

    आज की जिंदगी में ‘स्मार्टफोन’ अनिवार्य हो गया है। यह ‘स्मार्टफोन’ अन्य ‘स्मार्ट डिवाइसेज’ और ‘स्मार्ट गैजेट्स’ से जुड़ा है जो क्रमशः जिन्दगी में ऐश से जरूरत बनते जा रहे हैं। ये सारे इन्हें इस्तेमाल करने वालों के बारे में असंख्य जानकारियां अपने ‘केन्द्र’ को भेज रहे हैं जो इसके जरिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता को विकसित कर रहे हैं। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता फिर इन ‘स्मार्ट’ को और ज्यादा ‘स्मार्ट’ बनाने में इस्तेमाल होती है जिससे इन्हें इस्तेमाल करने वालों को और ज्यादा अपने अधीन लाया जा सके। यह चक्र लगातार बढ़ते पैमाने पर चल रहा है।

    आज लोगों पर एक नजर डालते ही इसके प्रभाव का अंदाज लग जाता है। दुधमंुहे बच्चे से लेकर कब्र में पांव लटकाये बूढे़ तक सारे ‘स्मार्ट फोन’ पर आंख गड़ाये बैठे होते हैं। ‘स्क्रीन टाइम’ आठ-दस या पन्द्रह घंटे तक हो गया है। खाने से लेकर निकालने तक हर समय ‘स्मार्टफोन’ सामने होता है। खरीददारी, मनोरंजन और झगड़ा प्यार सब इसी के जरिये सम्पन्न हो रहा है। और यह करते हुए लोग अपने बारे में सारी जानकारी ‘केन्द्र’ को देते रहते हैं जो उन्हें और ज्यादा नियंत्रित करने के ज्यादा ‘स्मार्ट’ तरीके विकसित करता जाता है।

    इंसानी मन का इस तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एक पुर्जा मात्र बन जाना अत्यन्त भयावह है। यह इंसानी शरीर के मशीनों का पुर्जा मात्र बन जाने से ज्यादा भयावह है। तुर्रा यह कि लोगों को इनकी कोई चेतना नहीं है। अपने आस-पास ‘निजता’ को लेकर सचेत लोग जरा भी सचेत नहीं होते कि बड़ी टेक्नालाजी कंपनियां ‘स्मार्ट’ के जरिये उनके हर क्षण पर तथा हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं। उसे रिकार्ड कर रहे हैं। यही नहीं, उसके जरिये विशाल मुनाफा कमा रहे हैं क्योंकि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना ही उनका लक्ष्य होता है।

    कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा इंसानी मन पर इस नियंत्रण में लालच या प्रोत्साहन जनित स्वेच्छतया समर्पण ही नहीं होता। इसमें मजबूरी और दबाव भी होता है। आज कोई भी ‘ऐप’ उपभोक्ता के पूर्ण समर्पण के बिना पूरा काम नहीं करता। ‘स्मार्ट गैजेटस’ में इसी तरह की शर्तें होती हैं। यानी बड़ी टेक कंपनियों ने वह स्थिति पैदा कर दी है कि लोगों को अपनी सारी जानकारी उन्हें सौंपनी ही होंगी। उनके नक्शे कदम पर छोटी कंपनियां भी ऐसी ही शर्तें थोपती हैं।

    कभी जार्ज आरवेल ने कम्युनिज्म से अपनी नफरत के चलते अपने ‘1984’ नामक उपन्यास में ऐसे कम्युनिस्ट समाज की कल्पना की थी जिसमें ‘बड़ा भाई’ हर किसी पर हर समय नजर रख रहा होगा। पर जार्ज आरवेल के दुर्भाग्य से उनका पूंजीवादी समाज ही वहां पहुंच गया है जहां बड़ी टेक कंपनियां दुनिया के हर व्यक्ति पर हर समय नजर रख रही हैं-ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए।

    इस सार्विक और सार्वजनीय निगरानी से बचने का रास्ता क्या है? वही, कि मशीनों पर इंसानों का नियंत्रण हो चाहे वे मशीनें उत्पादन की हों या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की। पर इसके लिए जरूरी है कि स्वयं इन मशीनों को पूंजी की कैद से मुक्त किया जाये।

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