गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

स्कूल काॅम्प्लेक्स: गरीब छात्रों को शिक्षा से बाहर करने की योजना
-महेश

    स्कूलों को क्लस्टर (मर्जर) करने की योजना पूरे देश में चलाई जा रही है। इसको लागू करने के पीछे सरकारें सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा के लिए लैब, पुस्तकालय, स्मार्ट क्लास रूम, खेल की सुविधा, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने आदि संसाधन की बात प्रचारित कर रही हैं। 2020 में जारी छम्च् (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) स्कूल काॅम्प्लेक्स की बात कही गई है। इस स्कूल काॅम्प्लेक्स में आंगनबाड़ी से लेकर 12 तक के सरकारी विद्यालय एक जगह बनाए जाने हैं। स्कूल काॅम्प्लेक्स में आसपास के विद्यालय मर्ज किए जाने हैं। जिसमें हजारों छात्र प्रभावित होने हैं।

    यह योजना केंद्र सरकार के दिशा निर्देश में सभी जगह लागू तो की जा रही हैं परंतु इसके दूरगामी परिणामों के बारे में उन्हें कोई चिंता नहीं है।

    उत्तर प्रदेश- उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा विभाग ने 16 जून 2025 को आदेश जारी कर 50 से कम छात्रों वाले प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों को निकटवर्ती बड़े स्कूलों में समायोजित (मर्जर) करने का निर्देश दिया। राज्य में लगभग 1.32 लाख से अधिक सरकारी स्कूल हैं। जिनमें से लगभग 29,000 में 50 से कम छात्र हैं। जुलाई 2025 से 10,000 से अधिक स्कूलों का मर्जर शुरू हो चुका है। जिसमें 1,85,467 छात्र और शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 14 जुलाई 2025 को बैठक में जोर दिया कि यह संसाधन अनुकूलन और शिक्षा गुणवत्ता सुधार के लिए है।

    31 जुलाई 2025 को शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने घोषणा की कि 1 किमी से अधिक दूरी वाले या 50 से अधिक छात्रों वाले स्कूलों का मर्जर रद्द किया जाएगा। अब तक 10,827 स्कूलों का मर्जर हुआ है, लेकिन नए नियमों से कई रद्द हो चुके हैं। संशोधन के बाद कई मर्जर रद्द किए गए, लेकिन सटीक संख्या अभी स्पष्ट नहीं है।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में सीतापुर जिले के 51 छात्रों (प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों से) और उनके अभिभावकों ने जुलाई 2025 में याचिका दायर की। उन्होंने बेसिक शिक्षा विभाग के 16 जून 2025 के आदेश को चुनौती दी। जिसमें 50 से कम छात्रों वाले प्राथमिक/उच्च प्राथमिक स्कूलों को निकटवर्ती बड़े स्कूलों में मर्ज करने का प्रावधान था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इससे त्ज्म् (राइट टू एजुकेशन) अधिनियम 2009 का उल्लंघन होगा। जो ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्कूल 1 किमी और उच्च प्राथमिक स्कूल 3 किमी के दायरे में सुनिश्चित करता है। साथ ही दूरी बढ़ने से ड्राॅपआउट (विशेषकर लड़कियों में) सुरक्षा और शिक्षा गुणवत्ता प्रभावित होगी। एकल पीठ ने याचिकाओं को खारिज कर दिया।

    स्कूल मर्जर मामले में लखनऊ खंडपीठ ने फिलहाल अंतरिम फैसले में यथास्थिति बनाये रखने की बात कह छात्रों को तात्कालिक राहत दी। हालांकि कोर्ट ने छम्च् 2020 के तहत मर्जर नीति की मेरिट पर कोई राय नहीं दी, केवल प्रक्रिया पर सवाल उठाये। इस मामले में एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में भी डाली गई है जिसमें सुनवाई चल रही है।

    उत्तराखंड- राज्य में 10 वीं और 12 वीं स्तर के 1,520 स्कूलों को चिन्हित कर 559 क्लस्टर स्कूलों में एकीकृत करने की योजना है। इसमें फिलहाल सीधे 961 स्कूल प्रभावित होने हैं। जुलाई 2025 में शिक्षा विभाग ने छम्च् 2020 के तहत क्लस्टर सिस्टम शुरू किया। प्रत्येक विकासखंड में एक क्लस्टर स्कूल बनाने का पहला चरण मार्च 2025 से शुरू हुआ। स्कूलों को चलाने में नाकाम सरकार 550 सरकारी स्कूलों को पूंजीपतियों को सौंपने जा रही है। जिसके लिए काॅरपोरेट सोशल रिस्पोस्बिलिटी (ब्ैत्) के तहत पूंजीपतियों को स्कूल गोद देकर इस ओर ललचाया जा रहा है।

    मध्य प्रदेश- मध्य प्रदेश में 2018 से ही क्लस्टर माॅडल अपना लिया गया। इसे ‘मध्य प्रदेश स्कूल समामेलन’ नाम दिया गया। इस योजना के पहले चरण में 36,000 स्कूलों को मर्ज कर 16,000 में एकीकृत किया गया। छम्च् 2020 के तहत आगे 2025 तक विस्तार किया जाना है। राज्य में कुल 1.05 लाख स्कूल हैं, जिनमें से हजारों पहले ही मर्ज हो चुके हैं।

    ओडिशा- 2025 में ‘स्कूल क्लस्टरिंग माॅडल’ अपनाने जा रहा है। पीएमश्री योजना के तहत 8,639 राजकीय स्कूलों को क्लस्टर में शामिल किया गया। महाराष्ट्र में सितंबर 2023 से योजना शुरू करते हुए 10,500 छोटे स्कूलों (20 से कम छात्र) को क्लस्टर में मर्ज करने का 2025 तक लक्ष्य रखा है। इसे ‘स्कूल क्लस्टर योजना’ नाम दिया है। इसमें 1,85,467 छात्र प्रभावित हो रहे हैं। शिक्षक संघों ने 15,000 स्कूल बंद होने का दावा किया है।

    आंध्र प्रदेश/तेलंगाना- में इसे ‘स्कूल कंसोलिडेशन’ नाम दिया गया है। गुजरात में ‘मिशन स्कूल आफ एक्सीलेंस’ नाम से योजना शुरू की है। इसी तरह हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक, गोवा, मेघालय, झारखण्ड, आदि राज्यों में अलग-अलग नामों से क्लस्टर योजना को लागू किया जा रहा है। इसे लागू करने की प्रक्रिया में फर्क है लेकिन कमोबेश सभी राज्य सरकारें इसी दिशा में बढ़ रही हैं। भाजपा शासित राज्यों में इसे आक्रामक तरीके से लागू किया जा रहा है।

    क्लस्टर स्कूल कैसे बन रहे- सरकारी स्कूल संसाधनों के अभाव में पहले से ही जूझ रहे हैं। विषम भौगोलिक स्थिति वाले राज्यों में शिक्षा की दुर्दशा बढ़ाई जा रही है। स्कूलों को मर्ज करने के लिए दूरी को एक पैमाना बनाया गया है। लेकिन पता चल रहा है कि सरकारों ने कई जगह स्कूलों की दूरी को कम करके दिखाया है। इससे शहरी या मैदानी क्षेत्रों में छात्र-छात्राओं पर किराये का बोझ अधिक होगा। वहीं पहाड़ी क्षेत्रों में नदी-पहाड़ के दुर्गम रास्तों को पार करने की आफत बढ़ जायेगी। इसी तरह स्कूलों में छात्र संख्या को कम करके दिखाया गया है। इस तरह की गलतियां बताती हैं कि सरकार की मंशा किसी भी तरह अधिकाधिक स्कूलों को मर्ज करने के नाम पर बन्द करने की है।

    उत्तर प्रदेश के बरेली के फतेहपुर पूर्वी में हरेला गांव के माध्यमिक विद्यालय में 104 बच्चे थे। हरेला गांव के ही पूर्व माध्यमिक विद्यालय के 40 बच्चे भी यहां पर मर्ज कर दिए गए। विद्यालय में चार कमरे हैं। एक कमरा, पुस्तकालय, खेल सामग्री सहित लैब के लिए रखा हुआ है। तीन कमरों में 144 छात्र-छात्राओं का पूर्व माध्यमिक स्कूल कैसे चलेगा, कोई भी समझ सकता है। शिक्षा संसाधनों के मामले में पूरे देश में ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ से भी ज्यादा बुरी स्थिति है।

    रोजगार प्रभावित- स्कूल काॅम्प्लेक्स नीति रोजगार छीनने की नीति भी साबित हो रही है। बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षक, शिक्षामित्र, संविदा शिक्षक, कर्मचारी, भोजनमाताएं/रसोईया इससे प्रभावित होने हैं।

    NEP 2020- यह पाॅलिसी शिक्षा छीनने की पाॅलिसी साबित हो रही है। सरकारें स्वयं सार्वजनिक शिक्षा से हाथ खींच रही हैं। शिक्षा को बड़े पैमाने पर निजी हाथों में देने का इंतजाम किया है। इसका दूसरा लक्ष्य संघ-भाजपा के सांप्रदायिक-फासीवादी विचारों को शिक्षा का भगवाकरण करने के लिए जबरन लागू करना है।

    स्कूल काॅम्प्लेक्स नीति का विरोध- स्कूल काॅम्प्लेक्स नीति का विरोध अलग-अलग राज्यों में देशव्यापी पैमाने पर होता रहा है। छात्र संगठनों, छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों, अभिभावकों, भोजनमाताओं/रसोईयां, जनवादी-प्रगतिशील-सामाजिक संगठनों, नागरिकों ने पुरजोर विरोध किया है। इस विरोध ने सरकारों के कदमों को कुछ रोकने की कोशिश की है। स्कूल बन्द होने पर परेशान हाल मजबूर छात्रों-अभिभावकों के हृदयविदारक वीडियो से लेकर सड़कों में इसका विरोध हुआ है। कुछ राज्यों में न्यायालयों तक भी संघर्ष को ले जाया गया।

    अंत में- यह स्पष्ट है कि इस नीति से सरकारों की मंशा स्कूलों में गुणवत्ता बढ़ाना नहीं बल्कि सार्वजनिक शिक्षा से हाथ खींचकर छात्रों को बाहर कर देना है। इससे गरीब, एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और छात्राएं बड़ी संख्या में प्रभावित होने हैं। 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद 89,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद किये जा चुके हैं। अब छम्च् 2020 की स्कूल काॅम्प्लेक्स योजना के तहत यह और तेज हो रहा है। सरकारी शिक्षा में सरकारें जीडीपी के खर्च को साल दर साल कम करती गई हैं।

    केंद्र में भाजपा, कांग्रेस की सरकार रही हो या राज्यों में भाजपा, कांग्रेस, सपा, त्रणमूल कांग्रेस, केरल में संसदीय वामपंथी सीपीएम, बिहार में नीतीश-बीजेपी गठबंधन हो इस मामले में सभी एक हैं। पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा बनाए गए त्ज्म् 2009, संविधान में दर्ज शिक्षा का मौलिक अधिकार जैसे कानूनों का भी कोई मतलब नहीं रह गया है। आज इस बची हुई सार्वजनिक सरकारी शिक्षा से भी सरकारें हाथ खींच लेना चाहती हैं। पिछले 30-35 सालों में यह और तेज गति से लागू की गई है।

    सरकारें मेहनतकश जनता से बाकी सब कुछ की तरह शिक्षा भी छीनने पर आमादा है। आज जरूरत सबको निःशुल्क, वैज्ञानिक, एकसमान सरकारी शिक्षा के लिए एकजुट होने की है। यह स्थापित किया जाए की शिक्षा को बचाने के लिए व्यापक संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है।

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