शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

युवाओ! जेन-जी! आप किधर

    युवाओं ने शासकों को ऐसा नचाया कि कोई गद्दी छोड़ कर भाग रहा है तो कोई देश छोड़कर। हाल में नेपाल, मोरक्को, मेडागास्कर, पेरू, आदि इस फेहरिस्त में नये जुड़े हैं। ये युवा यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, एशिया सभी महाद्वीपों में शासकों को हैरान-परेशान करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं इन्हें जेन-जी कह दिया गया तो कहीं बस युवा या जनता। यह आम मेहनतकश जनता की इच्छा-आकांक्षाओं के अनुरूप संघर्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। गत वर्ष श्रीलंकर, केन्या, बांग्लादेश से निकलकर युवाओं के विद्रोह की दायरा बढ़ता गया है।

    जेन-जी के इन विद्रोहों में बढ़ती असमानता, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, जैसे मुद्दे हैं। इसी तरह पूंजीवादी सरकारों की असंवेदनशीलता, बेरुखी और दमन तंत्र इसके फैलने के कारण बने। सभी मामलों में यह देखा गया कि सरकार ने जनता की मांगों को अनसुना कर दिया। जब आन्दोलन आगे बढ़ा तो उसका दमन किया गया। नेपाल में तो जेन-जी के आक्रोश की अभिव्यक्ति बन रहे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर प्रतिबंध ही विद्रोह का तात्कालिक कारण बना।

    इन विद्रोहों और शासकों को भागने पर मजबूर कर देने का क्या असर हुआ? इससे क्या बदला? आगे क्या होगा? एक तरफ मेहनतकश जनता में उत्साह का संचार हुआ तो शासकों ने इससे बच निकलने के रास्ते सोचने शुरू कर दिये। वे लुटेरे शासकों को नहीं बचा सके पर लुटेरी व्यवस्था को बचाने में सफल हो गये। सत्ताधारियों और विपक्ष से नाखुश मेहनतकश जनता के लिए सेना या न्यायालय या किसी पूंजीवादी बुद्धिजीवी को सत्ता में बैठाकर काम चला लिया जा रहा है। इससे स्थिति कितने समय तक संभले रहेगी कहना मुश्किल है। हद तो ये है कि कई देशों में अंतरिम सरकार या सेना ही सत्ता को संभाले हुए है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को सामान्य तौर पर चलाने का विश्वास अभी शासकों को नहीं आ रहा है।

    पूंजीवादी शासकों के पास अतीत का सारा ज्ञान है। उसके हाथों में सत्ता की ताकत है। वह इतिहास से सबक लेकर सत्ता पर बैठे रहकर लूट का तंत्र चलाने पर आमादा है। वह इस सामान्य सच को नजरअंदाज करता है कि इतिहास का सारा ज्ञान शासक वर्ग से सत्ता उत्पीड़ित वर्गों के पास चले जाने का इतिहास रहा है। खुद पूंजीपति वर्ग सामंती व्यवस्था के खिलाफ में क्रांतिकारी वर्ग का हिस्सा था। हालांकि अन्य मेहनतकश वर्गों को नेतृत्व देते हुए उसने सत्ता अपने हाथों में रखी और मजदूर-मेहनतकश वर्ग का उत्पीड़क, शासक बन बैठा।

    यह अनायास नहीं है कि दुनिया भर की पूंजीवादी सरकारें निगरानी तंत्र को मजबूत कर रही हैं। लोकतंत्र की दुहाई देते हुए दक्षिणपंथी या फासीवादी, नवफासीवादी ताकतों को आगे बढ़ा रही हैं। तानाशाही के कदम उठा रही हैं। वे दमन के नये-नये तरीके ईजाद कर रही हैं। कैसे जनता के विद्रोहों को टाला जाये, इसकी कोशिश में लगी हैं। वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि मौजूदा लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था ही ऐसी है जिसमें विद्रोहों से नहीं बचा जा सकता।

    पूंजीवाद में प्रकृति से लेकर मानव जाति द्वारा अर्जित समस्त सम्पदा पर चंद पूंजीपतियों का मालिकाना होता है। सरकारें सामूहिक सम्पत्ति के इस निजी मालिकाने को सुनिश्चित बनाये रखने के लिए काम करती हैं। स्वतंत्र पूंजीपति और स्वतंत्र मजदूर के बीच लूटने और लुटने की स्वतंत्रता है, और यह असमानता को चरम पर ले जाता रहता है। इसमें भाईचारे के लिए कोई स्थान नहीं बचता। दुनियाभर में युवाओं के, जेन-जी के विद्रोह इसी संघर्ष की अभिव्यक्ति हैं। लेकिन अभी वे इस संघर्ष को आगे बढ़ाकर हल कर देने के ऐतिहासिक बोध से लैस नहीं हैं। इसके लिए युवाओं को इस संघर्ष की भविष्योन्मुखी शक्ति मजदूर वर्ग को आगे लाने में भूमिका निभानी होगी। जेन-जी के विद्रोहों ने यह दिखा दिया है कि वे इतिहास निर्माण के रथ को सजा रहे हैं।

    जेन-जी सहित समस्त मेहनतकश जनता शासकों की कुटिलता और भीरूता से जल्द ही यह जान जायेगी कि जो कुछ भी उन्होंने विद्रोह से हासिल किया उसे शासक वापस छीनने पर आमादा हैं। जबकि इसका सीधा समाधान लूटने और लुटने की इस पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म करने में है। जहां प्रकृति और मानव जाति द्वारा अर्जित समस्त सम्पत्ति साझी हो। उसका शोषणकारी निजी मालिकाना समाप्त कर दिया जाये। राज्य के ऐसे सारे रूप व नियम जो निजी सम्पत्ति की रक्षा के लिए बनाए गए उन्हें तत्काल खत्म कर दिया जाये। लेकिन सामान्य से लग रहे इस समाधान तक समाज अपने ही तरीके से पहुंचेगा। यहां जेन-जी पर यह जिम्मेदारी आ गयी है कि वह इतिहास की इस गति का वैज्ञानिक अध्ययन करे, पूरे जोश के साथ इतिहास के रथ को आगे बढ़ाने में अपनी ऊर्जा और मेधा लगाये। भविष्य की क्रांतियों के लिए इतिहास की क्रांतियों के अध्ययन और सबक को गहराई से आत्मसात किया जाये। फ्रांसीसी क्रांति, पेरिस कम्यून, महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति.....।

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